For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

November 2021 Blog Posts (25)

आज का सच

लव यू -लव यू कहते रहो ,मिस यू -मिस यू जपते रहो 

पीठ फिरे तो गो टू हैल ,नारा भी बुलंद करो 

नहीं रहे वो सच्चे रिश्ते ,प्यार जहां पर पलता था 

आज के रिश्ते बस एक छलावा,सबकुछ एक दिखावा है 

मात-पिता का प्यार भी अब ,लगता ज़िम्मेदारी है 

भाई बहन का प्यार अब बस एक नातेदारी है 

रिश्तों का जहां मान नहीं ,कैसा युग ये आया है 

कहते हैं वे हमें पुरातन ,पर नवयुग से क्या पाया है ?

पति-पत्नी के रिश्तों की भी ,गरिमा अब है कहाँ बची 

नित होते तलाक़ों…

Continue

Added by Veena Gupta on November 30, 2021 at 1:09am — 2 Comments

जिसकी आदत है घाव देने की - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२ १२१२ २२

बल रहित मैं हूँ  भीम कहता है

तुच्छ खुद को असीम कहता है/१

*

जिसकी आदत है घाव देने की

वो स्वयम को हकीम कहता है/२

*

आम पीपल  को  भूल बैठा वो

और कीकर को नीम कहता है/३

*

राम से जो गुरेज उस को नित

क्यों तू खुद को रहीम कहता है/४

*

धर्म क्या है समझ  न पाया जो

धर्म को  वो  अफीम  कहता है/५

*

हाथ जिसका है कत्ल में या रब

वो भी खुद को नदीम कहता…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 29, 2021 at 10:04pm — 4 Comments

तेरे मेरे दोहे ......

तेरे मेरे दोहे :......

बनकर यकीन आ गए, वो ख़्वाबों के ख़्वाब ।

मिली दीद से दीद तो, फीकी लगी शराब ।।

जीवन आदि अनंत का, अद्भुत है संसार ।

एक पृष्ठ पर जीत है, एक पृष्ठ पर हार ।।

बढ़ती जाती कामना ,ज्यों-ज्यों घटता  श्वास ।

अवगुंठन में श्वास के, जीवित रहती प्यास ।।

कल में कल की कामना ,छल करती हर बार ।

कल के चक्कर में फँसा , ये सारा संसार ।।

बेचैनी में बुझ गए , जलते हुए चराग़ ।

उम्र भर का दे गए, इस…

Continue

Added by Sushil Sarna on November 28, 2021 at 1:30pm — 16 Comments

क्यों कर हसीन ख्वाब की बस्ती मिटा दूँ मैं- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२



कैसे किसी की याद में सब कुछ भुला दूँ मैं

क्यों कर हसीन ख्वाब की बस्ती मिटा दूँ मैं/१

*

बचपन में जिसने आँखों को आँसू नहीं दिया 

क्योंकर जवानी जोश  में  उस को रुला दूँ मैं/२

*

शायद कहीं  पे  भूल  से वादा  गया मैं भूल

जिससे लिखा है न्याय में खुद को दगा दूँ मैं/३

*

घर में उजाला  मेरे  भी  आयेगा डर यही

पथ में किसी के दीप तो यारो जला दूँ मैं/४

*

अपना पराया भेद  वो  भूलेगा इस से क्या

उसकी जमीं में अपनी भी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 27, 2021 at 11:14pm — 2 Comments

भूख नैसर्गिक है — डॉo विजय शंकर

भूख नैसर्गिक है ,

पर रोटी , रोटी

नैसर्गिक नहीं है।

भूख का निदान

स्वयं को करना होता है ,

रोटी कमानी पड़ती है ,

रोटी खरीदनी पड़ती है ,

रोटी पर टैक्स चुकाना पड़ता है ,

रोटी निदान है , आय का जरिया है।

भूख ऐसी कुछ नहीं , उसका निदान ,

आदमी से क्या कुछ नहीं करा देता है ,

उसे एक शब्द में कमाई कह देते हैं।

अपने लिए , अपने पेट के लिए।

सब कुछ नैसर्गिक है ......... ?

व्यापार के लिए , राजस्व के लिए।

मौलिक…

Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on November 27, 2021 at 11:29am — 2 Comments

हुई कागजों में पूरी यूँ तो नीर की जरूरत - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

११२१/२१२२/११२१/२१२२



भरें खूब घर स्वयं के सदा देशभर को छल के

मिले सारे अगुआ क्योंकर यहाँ सूरतें बदल के/१

*

गिरी  राजनीति  ऐसी  मेरे  देश  में  निरन्तर

कोई जेल से लड़ा तो कोई जेल से निकल के/२

*

मिटा भाईचारा अब तो बँटे सारे मजहबों में

सही बात हैं समझते कहाँ लोग आजकल के/३

*

हुई कागजों में  पूरी  यूँ  तो  नीर की जरूरत

चहुँ ओर किन्तु दिखते हमें सिर्फ सूखे नल के/४

*

कई दौर गुफ्तगू के किये हल को हर समस्या

नहीं आया कोई रस्ता कभी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 25, 2021 at 11:22pm — 2 Comments

ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल

1222 1222 1222 1222

जरा सा मसअला है ये नहीं  तकरार के  क़ाबिल

किनारा हो नहीं सकता कभी मझधार के क़ाबिल

न ये संसार  है मेरे  किसी भी  काम का  हमदम

नहीं हूँ मैं किसी  भी तौर से  संसार के  क़ाबिल

न मेरी  पीर है  ऐसी  जिसे  दिल  में रखे  कोई

न मेरी  भावनायें हैं  किसी  आभार के  क़ाबिल

ये मुमकिन है ज़माने में हंसी तुझसे ज़ियादा हों

सिवा तेरे  नहीं कोई  मेरे  अश'आर के  क़ाबिल

मेरे आँसू तुम्हारी आँखों से बहते तो अच्छा…

Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 25, 2021 at 12:00pm — 14 Comments

मिथ्या जगत

मिथ्या अगर जगत ये होता ,क्यूँ कर इसमें आते हम 

देवों को भी जो दुर्लभ है ,वह मानुष जन्म क्यों पाते हम 

ज्ञानी जन बस यही बताते ,मिथ्या जग के सुख दुःख सारे 

पर इस जग में आ कर ही तो ,मोती ज्ञान के पाए सारे 

ईश्वर की अद्भुत रचना ये सृष्टि ,नहीं जानता कोई कुछ भी 

फिर भी ज्ञान सभी जन बाटें ,मानो स्रषटा हैं बस वे ही  

जगत सत्य है या है मिथ्या ,क्यूंकर इसपर करें बहस 

ईश्वर प्रदत्त अमूल्य जीवन को ,जिएँ सभी हम जी भरकर 

उस अद्भुत कारीगर की ,रचना…

Continue

Added by Veena Gupta on November 19, 2021 at 4:43am — 3 Comments

ग़ज़ल नूर की - मेरी ज़ीस्त की कड़ी धूप ने मुझे रख दिया है निचोड़ कर

.

मेरी ज़ीस्त की कड़ी धूप ने मुझे रख दिया है निचोड़ कर,

अभी शाम ढलने ही वाली थी कोई चल दिया मुझे छोड़ कर.

.

मैं था मुब्तिला किसी ख़ाब में किसी मोड़ पर ज़रा छाँव थी

उसे ये भी रास न आ सका सो जगा गया वो झंझोड़ कर.

.

मेरे दिल में अक्स उन्हीं का था उन्हें ऐतबार मगर न था 

कभी देखते रहे तोड़ कर कभी दिल की किरचों को जोड़ कर.   

.

जो  किताब ए ज़ीस्त में  शक्ल थी वो जो नाम था मुझे याद है  

वो जो पेज फिर न मैं पढ़ सका जो रखा था मैने ही मोड़ कर.  …

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on November 18, 2021 at 5:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल - गुरप्रीत सिंह जम्मू

22-22-22-22-22-2

तुम कोई पैग़ाम कभी तो भिजवाओ।

वरना मेरे कबूतर वापिस दे जाओ।

जिसको तुमने अपने दिल से भुलाया है,

क्या ये वाजिब है खुद उसको याद आओ ?

मैने कहा जब,तुमने दिल को ज़ख़्म दिया,

वो बोले, कितना गहरा है, दिखलाओ।

जब से तुम बिछड़े हो, खुद से दूर हूं मैं,

प्लीज़ किसी दिन मुझ को मुझ से मिलवाओ।

आंखों में हैं ख्वाब भरे, पर नींद उड़ी,

गर ये प्यार नहीं तो क्या है, समझाओ।

'वो' कब के…

Continue

Added by Gurpreet Singh jammu on November 15, 2021 at 11:30am — 6 Comments

अब तो इंसाफ भी करें साहिब.......ग़ज़ल सालिक गणवीर

2122-1212-22/112

अब तो इंसाफ भी करें साहिब

हक़ मिरा मुझको दे भी दें साहिब (1)

ऊँचे पेड़ों ने फिर से की साजिश

लोग सब धूप में रहें साहिब (2)

आप सब क्यों उड़े हवाओं में

हम ज़मीं पर ही क्यों चलें साहिब (3)

काग़ज़ों पर लिखा तो पढ़ते हैं

पीठ पर भी कभी लिखें साहिब (4)

न ज़मीं है न आसमाँ अपना

ये बता दो कहाँ रहें साहिब (5)

इतना अफ़सोस है अगर फिर तो

शर्म से डूब कर मरें साहिब (6)

आप सुनते नहीं…

Continue

Added by सालिक गणवीर on November 13, 2021 at 9:54pm — 10 Comments

ग़ज़ल -बेटे से बढ़ के फर्ज निभाती हैं बेटियाँ

2 2 1 2 1 2 1 1 2 2 1 2 1 2

बचपन की याद हमको दिलाती हैं बेटियाँ|

उंगली पकड़ के जब भी घुमाती हैं बेटियाँ|

 

हाथों से अपने जब भी खिलाती हैं  देखिये 

दादी की याद हमको दिलाती हैं बेटियाँ|

 

बेटा बसा है देखिये जब से विदेश में

इस घर के सारे बोझ उठाती हैं बेटियाँ |

 

जर्जर शरीर में जो न आती है नींद तो 

दे दे के थपकियाँ भी सुलाती हैं बेटियाँ|

 

बेटी की शान में मैं भला और क्या कहूँ,

बेटे से बढ़ के…

Continue

Added by BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 11, 2021 at 9:00pm — 3 Comments

यूँ जो दिल खोलकर मिल रही हो तुम

यूँ जो दिल खोलकर मिल रही हो तुम 

लगता है के अब मैं तुमको बिल्कुल याद नही 

ऐसा होता है निकाह के बाद अक्सर 

ऐसा होने मे कोइ गलत बात नही 

अब मेरे खयालों से आज़ाद हो तुम 

किसी और के साथ आबाद हो…

Continue

Added by AMAN SINHA on November 11, 2021 at 11:00am — No Comments

बन्धनहीन जीवन :. . . .

बन्धनहीन जीवन :......

क्यों हम 

अपने दु :ख को

विभक्त नहीं कर सकते ?

क्यों हम

कामनाओं की झील में

स्वयं को लीन कर

जीवित रहना चाहते हैं ?

क्यों

यथार्थ के शूल

हमारे पाँव को नहीं सुहाते ?

शायद

हम स्वप्न लोक के यथार्थ से

अनभिज्ञ रहना चाहते हैं ।

एक आदत सी हो गई है

मुदित नयन में

जीने की ।

अन्धकार की चकाचौंध को

अपनी सोच की हाला में

मिला कर पीने की…

Continue

Added by Sushil Sarna on November 10, 2021 at 1:54pm — 4 Comments

ग़ज़ल नूर की - क्या ही तुझ में ऐब निकालूँ क्या ही तुझ पर वार करूँ

क्या ही तुझ में ऐब निकालूँ क्या ही तुझ पर वार करूँ

ये तो न होगा फेर में तेरे अपनी ज़ुबाँ को ख़ार करूँ.

.

हर्फ़ों से क्या नेज़े बनाऊँ क्या ही कलम तलवार करूँ

बेहतर है मैं ख़ुद को अपनी ग़ज़लों से सरशार करूँ.

.

ग़ालिब ही के जैसे सब को इश्क़ निकम्मा करता है

लेकिन मैं भी बाज़ न आऊँ जब भी करूँ दो चार करूँ.

.

चन्दन हूँ तो अक्सर मुझ से काले नाग लिपटते हैं

मैं भी शिव सा भोला भाला सब को गले का हार करूँ.

.

सब से उलझना तेरी फ़ितरत और मैं इक आज़ाद मनक…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on November 9, 2021 at 3:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल नूर की - ज़ुल्म सहना छोड़ कर इन्कार करना सीख ले

ज़ुल्म सहना छोड़ कर इन्कार करना सीख ले

है अगर ज़िन्दा पलटकर वार करना सीख ले.   

.

एक नुस्ख़ा जो घटा देता है हर दुःख की मियाद

सच है जैसा वैसा ही स्वीकार करना सीख ले.

.

मज़हबों के खेल में होगी ये दुनिया और ख़राब 

अपने रब का दिल ही में दीदार करना सीख से.

.

तन है इक शापित अहिल्या चेतना के मार्ग पर

राम सी ठोकर लगा.. उद्धार करना सीख ले.

.

नफ़रतों की बलि न चढ़ जाए तेरी मासूमियत

मान इन्सानों को इन्सां प्यार करना सीख ले.

.

लग न…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on November 7, 2021 at 7:30pm — 15 Comments

ग़ज़ल-हमारे आँसू

2122      1122      1122       22
खोजने  जाऊँ कहाँ  जान से प्यारे  आँसू

ढल गये  आँख  से  चुपचाप हमारे  आँसू


इस तरह  देख सकूँगा न बिखरते  इनको

कितना टूटे हैं तो आँखों  में  सँवारे  आँसू



शब अँधेरी  है हवा  सर्द  तसव्वुर  उनका

याद  मीठी  है  बड़ी  और  हैं खारे  आँसू



मुझको भाती नहीं ये बोलती पुरनम आँखें

काश  आँखों से  चुरा लूँ  मैं  तुम्हारे  आँसू…

Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 7, 2021 at 4:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 2



ज़िन्दगी में हर कदम तेरा सहारा हूँ

नाव हो मझधार तो तेरा किनारा हूँ

तुम भटक जाओ अगर अनजान राहों में

पथ दिखाने को तुम्हें रौशन सितारा हूँ

ज़िन्दगी का खेल खेलो तुम निडरता से

हर सफलता के लिए मैं ही इशारा हूँ

राह जीने की सही तुमको दिखाऊंगा

ज़िन्दगी के सब अनुभवों का पिटारा हूँ

साथ क्यों दूं मैं तुम्हारा सोच मत ऐसा

अंश तुम मेरे पिता मैं ही तुम्हारा हूँ

- दयाराम मेठानी…

Continue

Added by Dayaram Methani on November 6, 2021 at 10:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल नूर की - हाँ में हाँ मिलाइये

हाँ में हाँ मिलाइये
वर्ना चोट खाइए.
.
हम नया अगर करें
तुहमतें लगाइए.
.
छन्द है ये कौन सा
अपना सर खुजाइये
.
मीर जी ख़ुदा नहीं
आप मान जाइए.
.
कुछ नये मुहावरे
सिन्फ़ में मिलाइये.
.
कोई तो दलील दें
यूँ सितम न ढाइए.
.
हम नये नयों को अब
यूँ न बर्गलाइये.
.
नूर है वो नूर है
उस से जगमगाइए.    .
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Added by Nilesh Shevgaonkar on November 5, 2021 at 8:32pm — 9 Comments

दीप जलाना

जहाँ दिखे अँधियार वहीं पर दीप जलाना 

छाये खुशी अपार वहीं पर दीप जलाना 

अपने मन के भीतर का जो पापी तम है 

'अयं निजः' का भाव जहाँ पलता हरदम है 

'वसुधा ही परिवार' जहाँ अंधेरे में है 

सबसे पहले यार वहीं पर दीप जलाना 

जहाँ दिखे अँधियार………………..

मुरझाए से होठों पर मुस्कान बिछाने 

छोटी-छोटी खुशियों को सम्मान दिलाने 

जिन दर दीप नहीं पहुँचे हैं उन तक जाकर 

रोशन करना द्वार वहीं पर दीप जलाना 

जहाँ दिखे…

Continue

Added by आशीष यादव on November 4, 2021 at 2:30pm — 6 Comments

Monthly Archives

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-144
"आदरणीय दयाराम जी नमस्कार ख़ूब ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार कीजिये लक्ष्मण जी की बात पे सहमत हूँ सादर"
30 minutes ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-144
"आ. आपने शायद, अमित जी को दिया, मेरा प्रत्युत्तर नहीं पढ़ा ।"
30 minutes ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-144
"आदरणीय बहुत बहुत आभार आपका संज्ञान लेने के लिए सादर"
31 minutes ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-144
"आ. कृपया देखें ः मारता खुद ( 2122 ) के ही पैरों ( 1122 ) पे कुल्हाड़ी ( 1122 ) है जहाँ ( 112 )…"
41 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-144
"आ. भाई अस्फाक जी, तरही मिसरे पर बहुत खूबसूरत गजल हुई है । हार्दिक बधाई।"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-144
"आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन। तरही मिसरे पर गजल का प्रयास अच्छा है। हार्दिक बधाई।  कुछ जगहों…"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-144
"आ. भाई संजय जी, सादर अभिवादन।सुन्दर गजल हुई है । हार्दिक बधाई। मतले में कुछ सुधार की गुंजाईस है।…"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-144
"आ. भाई दयारामजी , सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-144
"आ. भाई तस्दीक अहमद जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-144
"आ. रिचा जी, हार्दिक धन्यवाद।"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-144
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-144
"आ. भाई अमित जी , हार्दिक धन्यवाद।"
7 hours ago

© 2022   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service