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बृजेश कुमार 'ब्रज'
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TEJ VEER SINGH commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-लालफीताशाही-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"हार्दिक बधाई आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी। बेहतरीन गज़ल। ये  कहा था  साहिबों  ने घर नये  देंगे  बनासाब की दरियादिली भी झोपड़ों को खा गई"
9 hours ago
सतविन्द्र कुमार राणा commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-लालफीताशाही-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"उत्तम अति उत्तम!"
14 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on TEJ VEER SINGH's blog post जलेबी - लघुकथा -
"शानदार लघुकथा सृजित हुई है आदरणीय..."
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल मनोज अहसास इस्लाह के लिए
"बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है भाई मनोज जी..बधाई"
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post गज़ल _तुम चाहे गुज़र जाओ किसी राह गुज़र से
"वाह आदरणीय वाह बेहद खूब ग़ज़ल हुई..."
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post अरसा गुज़र गया है कोई गुफ़्तुगू नहीं (६२ )
"वाह वाह आदरणीय क्या ही शानदार ग़ज़ल कही है...बधाई"
yesterday
बृजेश कुमार 'ब्रज' posted a blog post

ग़ज़ल-लालफीताशाही-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मंच को प्रणाम करते हुए ग़ज़ल की कोशिशफ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फाइलुनलालफीताशाही कितनी मिन्नतों को खा गईये व्यवस्था  ढेर  सारे  मरहलों  को खा गईये  कहा था  साहिबों  ने घर नये  देंगे  बनासाब की दरियादिली भी झोपड़ों को खा गईअब तरक़्क़ी की बयारें इस क़दर काबिज़ हुईंपेड़ तो काटे  जड़ों से कोपलों  को खा गईकुछ गवाही दे रही है मयक़दे की रहगुज़रमयकशी हँसते हुये कितने घरों को खा गईभूख  से बेहाल थे  वो  कुछ नहीं सूझा  उन्हेंपेट की 'ब्रज' आग पहले हौसलों को खा गई(मौलिक एवं अप्रकाशित)बृजेश कुमार 'ब्रज'See More
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on SALIM RAZA REWA's blog post जनाबे मीर के लहजे की नाज़ुकी कि तरह - सलीम रज़ा रीवा
"वाह क्या कहने बेहतरीन ग़ज़ल कही है सलीम साहब..बधाई"
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on रामबली गुप्ता's blog post वागीश्वरी सवैया-रामबली गुप्ता
"वाह जी वाह आदरणीय गुप्ता जी खूब छंद निभाया है सुन्दर सरस.."
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post वेदना ...
"बेहतरीन शब्दों को बड़े ही सलीके से पिरोया है कविता में..वाह"
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सौदा जो सिर्फ देह  का  परवान चढ़ गया - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"वाह बहुतखूब ग़ज़ल कही है आदरणीय..बधाई"
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"वाह बड़ी ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय..बहुत बहुत बधाई"
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on PHOOL SINGH's blog post हैरान हो जाता हूँ, जब कभी
"उत्तम सन्देशप्रद रचना आदरणीय..बधाई"
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post क्षणिकाएँ :
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post पलकों पे ठहर जाता है - ग़ज़ल
"बड़ी ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय शर्मा जी..बधाई"
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SALIM RAZA REWA commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल...मुझे तू याद मत कर- बृजेश कुमार 'ब्रज'
"ब्रिजेश की ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद, मोहतरम समर साहब सही कह रहे हैं, दोष का कारण आपका रदीफ़ है......."
Apr 18

Profile Information

Gender
Male
City State
noida
Native Place
jhansi

बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog

ग़ज़ल-लालफीताशाही-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मंच को प्रणाम करते हुए ग़ज़ल की कोशिश

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फाइलुन

लालफीताशाही कितनी मिन्नतों को खा गई

ये व्यवस्था  ढेर  सारे  मरहलों  को खा गई

ये  कहा था  साहिबों  ने घर नये  देंगे  बना

साब की दरियादिली भी झोपड़ों को खा गई

अब तरक़्क़ी की बयारें इस क़दर काबिज़ हुईं

पेड़ तो काटे  जड़ों से कोपलों  को खा गई

कुछ गवाही दे रही है मयक़दे की रहगुज़र

मयकशी हँसते हुये कितने घरों को खा गई

भूख  से बेहाल…

Continue

Posted on September 19, 2019 at 2:29pm — 2 Comments

नवगीत-वेदना तुझको बुलाऊँ-बृजेश कुमार 'ब्रज'

छा रहा नभ में अँधेरा

जुगनुओं  ने सूर्य घेरा

नेह भावों से  निचोड़ूँ  दीप  मैं घर घर  जलाऊँ

वेदना तुझको बुलाऊँ

रो दिए वीरान पनघट

टूट के बिखरे हुए घट

हैं बहुत मुश्किल समय के ये थपेड़े सह न पाऊँ 

वेदना तुझको बुलाऊँ

अश्रुओं से सिक्त वीणा

न कहूँ अंतस की पीड़ा 

रिक्त भावों से पड़े तो किस तरह ये गीत गाऊँ

वेदना तुझको बुलाऊँ…

Continue

Posted on April 7, 2019 at 10:30am — 7 Comments

नवगीत-वेदना ने नेत्र खोले-बृजेश कुमार 'ब्रज'

वेदना ने नेत्र खोले

रात ने उर लौ लगाई
चांदनी कुछ मुस्कुराई
आज फिर चन्दा गगन में बादलों के बीच डोले
वेदना ने नेत्र खोले

रातरानी खिलखिलाई
रुत रचाती है सगाई
आ गया मौसम बसंती प्रीत पंछी ले हिंडोले
वेदना ने नेत्र खोले

ओ बटोही देश आजा
छोड़कर परदेश आजा
टेरती कोयल सलोनी मन पपीहा नित्य बोले
वेदना ने नेत्र खोले
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on March 20, 2019 at 6:11pm — 8 Comments

ग़ज़ल... जिस रास्ते पे उनकी मन्ज़िलें नहीं

बह्र ए मीर
अब तक रहे भटकते उजड़े दयार में
अब कौन बसा आन दिले बेक़रार में

जिस रास्ते पे  उनकी मन्ज़िलें  नहीं
उस  राह में  खड़े  हैं  इन्तज़ार  में

बेकार  हर सदा है कितना पुकारता
ये कौन सो रहा है गुमसुम मज़ार में

उस फूल को ख़िज़ायें ले के कहाँ गईं
जिस फूल को चुना था लाखों हजार में

ऐ मीत इस कदर भी मत आज़मा मुझे
आ जाये न कमी 'ब्रज' के ऐतबार में
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on January 3, 2019 at 2:30pm — 4 Comments

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At 6:59pm on October 24, 2017, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

स्वागत है आदरणीय ,  आपको मित्र के रूप में पाना मेरा सौभाग्य है .

At 11:43pm on November 17, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

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