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बृजेश कुमार 'ब्रज'
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"उत्तम ग़ज़ल कही आदरणीय धामी जी..."
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-गलियों में सन्नाटा पसरा शमशानों में शोर
"आपने ठीक ही कहा है आदरणीय समर जी...देखने में सबसे आसान लेकिन निभाने में मुश्किल बह्र...जरूर आपकी सलाहनुसार और पढ़ने की कोशिश करूँगा... बिना पढ़े तो वैसे भी गुजारा नहीं है।सादर"
Aug 31
Samar kabeer commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-गलियों में सन्नाटा पसरा शमशानों में शोर
"मतले और मक़्ते का सानी सुधारना इस बह्र में बहुत मुश्किल है, इस बह्र पर कुछ ग़ज़लें पढ़ें और देखें कि इसे कैसे निभाया जाता है, कुछ ग़ज़लें तो मेरे ब्लॉग पर ही मिल जाएँगी ।"
Aug 31
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-गलियों में सन्नाटा पसरा शमशानों में शोर
"आदरणीय समर कबीर जी ग़ज़ल पे आपकी शिरकत...हौसलाफजाई और हमेशा की तरह ज्ञानबर्धक टिप्पड़ी के लिए आपका शुक्रगुजार हूँ... दरअसल खंडर और दीदा-ए--तर ये दोनों ही शब्द हूबहू रेख़्ता में कई बार पढ़े हैं...इसलिए इस्तेमाल किया है।इसके अलावा मतले का सानी बन ही…"
Aug 30
Samar kabeer commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-गलियों में सन्नाटा पसरा शमशानों में शोर
"जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब, 6 फ़ेलुन 1 फ़ा पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें । 'मुद्दत से वीरान पड़े इस उजड़े खंडर कीअब कौन करे परवाह जहाँ में दीदा-ए-तर की' मतले के ऊला मिसरे में 'खँडर' शब्द को अमूमन 12 पर…"
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-गलियों में सन्नाटा पसरा शमशानों में शोर
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय अमीरुद्दीन जी..."
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अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-गलियों में सन्नाटा पसरा शमशानों में शोर
"जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब, बह्र-ए-मीर पर अच्छी ग़ज़ल कही है आपने मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।"
Aug 27
बृजेश कुमार 'ब्रज' posted a blog post

ग़ज़ल-गलियों में सन्नाटा पसरा शमशानों में शोर

बह्र-ए-मीरमुद्दत से वीरान पड़े इस उजड़े खंडर की अब कौन करे परवाह जहाँ में दीदा-ए-तर कीगलियों में सन्नाटा पसरा शमशानों में शोर आँखों को उम्मीद नहीं थी ऐसे मंज़र कीपास तुम्हारे बढ़ने लगता है जब कोलाहल याद बड़ी तब आती है अपने सूने घर कीमिलकर मंज़िल पा लेंगे कब ऐसा बोला था लेकिन तैयारी करते दोनों एक सफ़र कीअक्सर दरवाजे पे आ 'ब्रज' ने राह निहारी इक दिन तो चिट्ठी आयेगी मेरे दिलबर कीअन्दर के खालीपन से डर डर के घबरा के 'ब्रज' आया पास तुम्हारे तुमने तंग-नज़र की (मौलिक एवं अप्रकाशित) बृजेश कुमार 'ब्रज'See More
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Aug 26

Profile Information

Gender
Male
City State
noida
Native Place
jhansi

बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog

ग़ज़ल-गलियों में सन्नाटा पसरा शमशानों में शोर

बह्र-ए-मीर

मुद्दत से वीरान पड़े इस उजड़े खंडर की

अब कौन करे परवाह जहाँ में दीदा-ए-तर की

गलियों में सन्नाटा पसरा शमशानों में शोर

आँखों को उम्मीद नहीं थी ऐसे मंज़र की

पास तुम्हारे बढ़ने लगता है जब कोलाहल

याद बड़ी तब आती है अपने सूने घर की

मिलकर मंज़िल पा लेंगे कब ऐसा बोला था

लेकिन तैयारी करते दोनों एक सफ़र की

अक्सर दरवाजे पे आ 'ब्रज' ने राह निहारी

इक दिन तो चिट्ठी आयेगी मेरे दिलबर की

अन्दर के खालीपन से डर डर के घबरा के

'ब्रज' आया…

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Posted on August 26, 2021 at 8:06pm — 6 Comments

ग़ज़ल-आख़िर

1222     1222     1222      1222

छुड़ाया  चाँद ने  दामन अँधेरी  रात में  आख़िर

परेशां  हूँ कमी  क्या है  मेरे ज़ज़्बात  में आख़िर

उसे कुछ कह नहीं सकता मगर चुप भी रहूँ कैसे

करूँ तो क्या करूँ उलझे हुए हालात में आख़िर

भुलाना  चाहता तो  हूँ मगर  मजबूरियाँ  भी  हैं

उसी की बात आ जाती मेरी हर बात में आख़िर

सुनो अय आँसुओं बेवक़्त का ढलना नहीं अच्छा

जलूँगा कब तलक मैं इस क़दर बरसात में आख़िर

मुख़ातिब हैं सभी मुझसे कि आगे…

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Posted on May 17, 2021 at 2:20pm — 6 Comments

ग़ज़ल-मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना

121   22   121   22   121   22

अगर कभी जो क़रार आये झिझोड़ देना

मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना

बिना तुम्हारे  ये ज़िन्दगी अब  कटेगी कैसे

जो तू नहीं तो नफ़स की डोरी भी तोड़ देना

जरा  सी कोई  रहे  हरारत  न जान  बाकी

कि  जाते जाते  बदन  हमारा निचोड़ देना

कभी हमारे ग़मों पे तुझको दुलार आये

वहीं उसी पल कतार भावों की मोड़ देना

तेरे ग़मो का उसे न होगा पता, है मुमकिन

मगर सिरा 'ब्रज' उदासियों का न जोड़…

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Posted on April 7, 2021 at 10:30am — 11 Comments

ग़ज़ल-उदासी इस क़दर मुझमें उतरती जा रही है

1222      1222      1222      122

ग़मों की दिन-ब-दिन क़िस्मत सँवरती जा रही है

उदासी इस क़दर मुझमें उतरती जा रही है



अभी तो वक़्त है पतझर के आने में,हवा क्यों

चली ऐसी कि मन वीरान करती जा रही है



बहारों ने चमन लूटा मगर बाद-ए-सबा ये 

खिज़ाओं पे हरिक इलज़ाम धरती जा रही है



फ़िराक-ए-यार का मौसम बहुत नज़दीक…
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Posted on March 19, 2021 at 10:30am — 14 Comments

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At 6:59pm on October 24, 2017, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

स्वागत है आदरणीय ,  आपको मित्र के रूप में पाना मेरा सौभाग्य है .

At 11:43pm on November 17, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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