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AMAN SINHA
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AMAN SINHA posted a blog post

नर हूँ ना मैं नारी हूँ

नर हूँ ना मैं नारी हूँ, लिंग भेद पर भारी हूँपर समाज का हिस्सा हूँ मैं, और जीने का अधिकारी हूँ जो है जैसा भी है रुप मेरा, मैंने ना कोई भेष धराअपने सांचें मे कसकर हीं, ईश्वर ने मेरा रुप गढ़ा माँ के पेट से जन्म लिया, जब पिता ने मुझको गोद लियामेरी शीतल काया पर ही, शीतल मेरा नाम दिया जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, सबसे अलग मैं खड़ा हुआसबसे हट कर पाया खुद को, अंजाने तन मे बंधा हुआ दिन बीते काया बदली, मेरी खुद की आभा बदलीबदन मेरा गठीला था पर, मेरी हर एक अदा बदली तब मैंने खुद को समझाया, दिल को अपने…See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on AMAN SINHA's blog post जा रे-जा रे कारे काग़ा
"आ. भाई अमन जी, अभिवादन। गीत का प्रयास अच्छा है। पर अभी यह कुछ और समय चाहता है। इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।"
Dec 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Dr.Prachi Singh commented on AMAN SINHA's blog post जा रे-जा रे कारे काग़ा
"बहुत सुंदर मनुहार भरा गीत ले कहीं कहीं अटक रही है , वहां साधने की कोशिश हो तो आसानी से गीत सध जाएगा  बधाई इस अभिव्यक्ति के लिए "
Dec 2
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Nov 29
AMAN SINHA posted a blog post

पुरुष की व्यथा

अंतरराष्ट्रीय_पुरुष_दिवस पुरूष क्यूँ रो नहीं सकता? भाव विभोर हो नहीं सकता किसने उससे नर होने का अधिकार छिन लिया? कहो भला उसने पुरुष के साथ ऐसा क्यूँ किया? क्या उसका मन आहत नहीं होता? क्या उसका तन तानों से घायल नहीं होता? झेल जाता है सब कुछ बस अपने नर होने की आर में पर उसे रोने का अधिकार नहीं है रोएगा तो कमज़ोर माना जायेगा औरों से उसे कमतर आँका जायेगा समाज में फिर तिरस्कार होता है अपनों के हीं सभा में फिर उसका वहिष्कार होता है पर उसका रोना भी तो जरूरी है ना मन की व्यथा कहना भी तो जरूरी है ना एक…See More
Nov 19
AMAN SINHA posted a blog post

सावन सूखा बीत रहा है

सावन सूखा बीत रहा है, एक बूंद की प्यास में रूह बदन में कैद है अब भी, तुझ से मिलने की आस में जैसे दरिया के लहरों, में कश्ती गोते खाते है हम तेरी यादों में हर दिन, वैसे हीं डूबे जाते है जाने कितने मौसम बदले, रंगत बदले चेहरे बदले सिलवट तेरी टूट ना जाए, हम एक करवट भी ना बदले जैसे कोई उड़ता पंक्षी, पिंजरे में फंस कर रह जाए जैसे कोई मछली जल बीन, तड़प-तड़प कर मर जाए जैसे सीलन भरे कमरे में, धूप अचानक आ जाए बुनियादी दीवारों पर फिर, रंगत कोई छा जाए जैसे दलदली जमीन के तल पर, ठोस कोई आधार मिले मैं भी पाँव जमा…See More
Nov 14
Zaif commented on AMAN SINHA's blog post माँ-बाप
"आदरणीय अमन जी, बेहद लाजवाब कविता। Hats off!"
Nov 8
AMAN SINHA posted a blog post

माँ-बाप

माँ-बाप को समझना कहाँ आसान होता है?उनका साया हीं हम पर छत के समान होता हैप्रेम का बीज़ जिस दिन से माँ के पेट में पलता हैबाप के मस्तिष्क मे तब से हीं वो धीरे-धीरे बढ़ता हैपहले दिन से हीं बच्चा माँ के दूध पर पलता हैपर पिता के मेहनत से माँ के सिने में दूध पनपता हैसूने घर में कोई बालक जब किलकारी भरता हैउसके मधुर स्वर से हीं तो दोनों को बल मिलता हैपकड़ कर उंगली जीन हाथों ने चलना तुझको सिखायाअपने हिस्से का बचा निवाला जिसने तुझको खिलायासुबह ना देखी रात ना जानी हर मौसम की मार सहीएक तेरी हीं हठ के कारण…See More
Nov 7
AMAN SINHA posted a blog post

अपनी बोली

शिष्टाचार ही मिलती है पागलपन नहीं मिलतागैरों की बोली में अपनापन नहीं मिलता अपनी भाषा माँ का आँचल याद हमेशा आती हैद्वेष,क्रोध,विलाप हो जितना, हर भाव समझाकर जाती है पर भाषा के बल पर चाहे समृद्ध जितने भी हो जाओपर वहाँ पर डटें रहने की दृढ़ता अपनी भाषा से हीं पाओ किराए के मकान में कभी आँगन नहीं मिलतागैरों की बोली में अपनापन नहीं मिलता चाहे जितना लेख लिखो तुम, चाहे जितने व्याख्यान करोगैरों की भाषा में चाहे, तुम खुद पर अभिमान करो पर जब चोट हृदय को पहुंचे जो पहली बोली आती हैअपनी हीं भाषा की तुमको याद…See More
Oct 31
Ashok Kumar Raktale commented on AMAN SINHA's blog post अबके बरस जो आओगे
"आदरणीय अमन सिन्हा जी अच्छी कविता की है. तुकांतता को समझें. इससे कविता का सौन्दर्य कई गुना बढ़ जाता है. सादर"
Oct 27
AMAN SINHA posted a blog post

अबके बरस जो आओगे

अबके बरस जो आओगे, तो सावन सूखा पाओगेसूख चुके इन नैनों को तुम, और भींगा ना पाओगेऔर अगर तुम ना आए, प्यास ना दिल की बुझ पाएपत्थराई नैनों सा फिर, दिल पत्थर ना हो जाएअबके बरस जो आओगे, बसंत शुष्क सा पाओगेमन के उजड़े बागीचे में, एक फूल खिला ना पाओगे         और अगर तुम ना आए, अटकी डाली ना गिर जाएसूखे मुरझाए मन को मेरे, पतझर हीं ना भा जाएअबके बरस जो आओगे, सर्दी में तपते रह जाओगेमगर गरम रज़ाई में, मेरा एहसास ना पाओगे             और अगर तुम ना आए, अंगीठी की आग ना बुझासुखी लकड़ी की तरह कहीं, ख्वाब ना मेरे…See More
Oct 25
Mahendra Kumar commented on AMAN SINHA's blog post रोटी
"आदरणीय अमन जी, 1. रुखी-सुखी = रूखी-सूखी, मुज़रीम = मुज़रिम, इसिका = इसी का, जाते है = जाते हैं, नही = नहीं आदि। 2. //इसकी कही हीं है सही// क्या कहना चाह रहे हैं कुछ समझ नहीं आया। आदरणीय समर कबीर सर से मैं भी सहमत हूँ। यदि आप साहित्य के प्रति सच में…"
Oct 21
Samar kabeer commented on AMAN SINHA's blog post रोटी
"जनाब अमन सिन्हा जी आदाब, आपकी रचनाओं के भाव अच्छे होते हैं लेकिन जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है,ये किसी विधा में बाँध कर ही अच्छे लगेंगे, ऐसे इनकी कोई क़ीमत नहीं, आप अगर कुछ सीखने के लिए तैयार हों तो मुझसे इस नम्बर पर सम्पर्क कर सकते…"
Oct 18
Shyam Narain Verma commented on AMAN SINHA's blog post रोटी
"नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर और सार्थक प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Oct 17
AMAN SINHA posted a blog post

रोटी

भूख लगती है कभी जो, याद इसकी आती हैना मिले तो पेट में फिर, आग सी लग जाती हैराजा हो या रंक देखो, इसके सब ग़ुलाम हैतीनो वक़्त खाने से पहले, करते इसे सलाम हैरुखी-सुखी जैसी भी हो, पेट यह भर जाती हैचाह में अपनी हर किसी, को राह से भटकाती हैजिसने इसको पा लिया, वो  राज सब पर कर गयाना मिली जिसे उसे, मुज़रीम भी देखो कर गया  कितना भी हो प्रेम सब में, इसके आगे फीका हैये चलाता है सभी को, सब पर वश इसिका हैपात पर पड़ा नहीं तो, जंग भी करवाता हैचाहे कितना बड़ा हवन हो, भंग भी करवाता हैदे सके ना जो पिता तो, वो पिता…See More
Oct 17
Mahendra Kumar commented on AMAN SINHA's blog post ना तुझे पाने की खुशी ना तुझे खोने का ग़म
"आदरणीय अमन जी, रचना के भाव अच्छे हैं जिस हेतु हार्दिक बधाई प्रेषित है। मेरा सुझाव है कि आप जिस भी विधा में लिखना चाहते हैं पहले उसके शिल्प का अध्ययन अवश्य कर लें। यह बात तब और भी ज़रूरी हो जाती है जब आप छन्दबद्ध रचना लिखते हैं। सौभाग्य से इस मंच पर…"
Oct 13

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नर हूँ ना मैं नारी हूँ

नर हूँ ना मैं नारी हूँ, लिंग भेद पर भारी हूँ

पर समाज का हिस्सा हूँ मैं, और जीने का अधिकारी हूँ

 

जो है जैसा भी है रुप मेरा, मैंने ना कोई भेष धरा

अपने सांचें मे कसकर हीं, ईश्वर ने मेरा रुप गढ़ा 

माँ के पेट से जन्म लिया, जब पिता ने मुझको गोद लिया

मेरी शीतल काया पर ही, शीतल मेरा नाम दिया

 

जैसे-जैसे मैं…

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Posted on December 5, 2022 at 1:26pm

जा रे-जा रे कारे काग़ा

जा रे-जा रे कारे कागा मेरे छत पर आना ना 

आना है तो आजा पर छत पर शोर मचाना ना 

तू आएगा छत पर मेरे कांव-कांव चिल्लाएगा 

ना जाने किस अतिथि को मेरे घर बुलाएगा 

उल्टी पड़ी पतीली मेरी और चूल्हे में आंच नहीं 

थाल सजाऊँ कैसे मैं घर में…

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Posted on November 28, 2022 at 4:44pm — 2 Comments

पुरुष की व्यथा

अंतरराष्ट्रीय_पुरुष_दिवस



पुरूष क्यूँ

रो नहीं सकता?

भाव विभोर हो नहीं सकता

किसने उससे

नर होने का अधिकार छिन लिया?

कहो भला

उसने पुरुष के साथ ऐसा क्यूँ किया?

क्या उसका मन आहत नहीं होता?

क्या उसका तन

तानों से घायल नहीं होता?

झेल जाता है सब कुछ

बस अपने नर होने की आर में

पर उसे रोने का अधिकार नहीं है

रोएगा तो कमज़ोर माना जायेगा

औरों से उसे

कमतर आँका जायेगा

समाज में फिर तिरस्कार होता है

अपनों के हीं सभा…

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Posted on November 19, 2022 at 6:00pm

सावन सूखा बीत रहा है

सावन सूखा बीत रहा है, एक बूंद की प्यास में 

रूह बदन में कैद है अब भी, तुझ से मिलने की आस में

 

जैसे दरिया के लहरों, में कश्ती गोते खाते है 

हम तेरी यादों में हर दिन, वैसे हीं डूबे जाते है…

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Posted on November 14, 2022 at 9:47am

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