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सालिक गणवीर
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Samar kabeer commented on सालिक गणवीर's blog post धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें । 'धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा हैमुझे वो आग बन कर छल रहा है' मतला और बहतर करने का प्रयास करें । 'कभी तनहाइयों में शादमाँ थाये सूनापन अभी क्यों खल रहा है' इस शैर…"
14 minutes ago
Samar kabeer commented on सालिक गणवीर's blog post कल कहा था आज भी कल भी कहो..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें । 'कल कहा था आज भी कल भी कहोआम को हर बार ही इमली कहो' मुझे मतले के दोनों मिसरों में रब्त नज़र नहीं आया,और ऊला में वाक्य विन्यास भी ठीक नहीं लगा, 'कल भी कहो'…"
3 hours ago
सालिक गणवीर posted a blog post

धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

1222 1222 122धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है मुझे वो आग बन कर छल रहा हैपिछड़ जाउंँगा मैं ठहरा कहीं गर ज़माना मुझसे आगे चल रहा हैकभी तनहाइयों में शादमाँ था ये सूनापन अभी क्यों खल रहा हैअंधेरे में उसे दिखता मैं कैसे मगर फिर भी वो आँखें मल रहा हैबड़ा होकर दुखों की छाँव देगा शजर नन्हा है दिल में पल रहा हैनिगल जाएगा मुझको भी अँधेराये सूरज ज़िंदगी का ढल रहा हैपिघल जाएँगी चट्टानें दुखों की हिमालय भी तो यारों गल रहा हैसुधारेगा उसे अब कौन यारो वही जो उम्रभर अड़ियल रहा हैन था वो बज़्म में रौनक नहीं थी वो है मौजूद…See More
6 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on सालिक गणवीर's blog post धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आदरणीय सालिक गणवीर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। चन्द अश'आ़र में सुधार की गुंजाइश है अगर आप मुनासिब समझें तो : "कभी तनहाइयाँ भी शादमाँ थीं         कभी तन्हाइयों में भी थे ख़ुश…"
yesterday
बसंत कुमार शर्मा commented on सालिक गणवीर's blog post धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आदरणीय  सालिक गणवीर जी सादर नमस्कार  बहुत खुबसूरत गजल हुई है  बधाई स्वीकारें "
yesterday
सालिक गणवीर commented on अजय गुप्ता's blog post ग़ज़ल (और कितनी देर तक सोयेंगें हम)
"भाई अजय गुप्ता जी सादर अभिवादन अच्छी ग़ज़ल कही आपने, बधाइयाँ स्वीकार करें.आखिरी क़ाफ़िया में आपने 'होयेंगे ' शब्द का इस्तेमाल किया है, क्या ऐसा कोई शब्द होता है?.मैंने होंगे सुना/लिखा और पढ़ा है."
Sunday
सालिक गणवीर posted a blog post

धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

1222 1222 122धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है मुझे वो आग बन कर छल रहा हैपिछड़ जाउंँगा मैं ठहरा कहीं गर ज़माना मुझसे आगे चल रहा हैकभी तनहाइयों में शादमाँ था ये सूनापन अभी क्यों खल रहा हैअंधेरे में उसे दिखता मैं कैसे मगर फिर भी वो आँखें मल रहा हैबड़ा होकर दुखों की छाँव देगा शजर नन्हा है दिल में पल रहा हैनिगल जाएगा मुझको भी अँधेराये सूरज ज़िंदगी का ढल रहा हैपिघल जाएँगी चट्टानें दुखों की हिमालय भी तो यारों गल रहा हैसुधारेगा उसे अब कौन यारो वही जो उम्रभर अड़ियल रहा हैन था वो बज़्म में रौनक नहीं थी वो है मौजूद…See More
Sunday
सालिक गणवीर commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post अब से झूटा इश्क़ नहीं करना जानाँ (-रूपम कुमार 'मीत')
"प्रिय रुपम कुमार बह्र-ए-मीर इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए शैर दर शैर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल करो.सलामत रहो और ख़ूब लिखो."
Saturday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post कल कहा था आज भी कल भी कहो..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"भाई हर्ष महाजन जीसादर अभिवादनग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और सराहना के लिए ह्रदय तल से आपका आभार."
Saturday
Harash Mahajan commented on सालिक गणवीर's blog post कल कहा था आज भी कल भी कहो..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आदरणीय सालिक गणवीर जी आदाब । अच्छी पेशकश हेतु बधाई स्वीकार करें । सादर ।"
Saturday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post कल कहा था आज भी कल भी कहो..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"भाई लक्षण धामी 'मुसाफ़िर' जीसादर अभिवादनग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और सराहना के लिए ह्रदय तल से आपका आभारी हूँ."
Friday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post कल कहा था आज भी कल भी कहो..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आदरणीय निलेश शेगाँवकर साहेब सादर अभिवादन ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए बहुत आभार .सही कहा आपने, ही की बजाय तुम  करुँ तो?"
Friday
Nilesh Shevgaonkar commented on सालिक गणवीर's blog post कल कहा था आज भी कल भी कहो..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आ. सालिक गणवीर जी,बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है .. कुछ नए आयाम भी हैं.. बधाई..मतले के सानी में "ही" भर्ती का लग रहा है.. कुछ और कर सकें तो देखें..थोडा बहुत फाइन ट्यून एक दो शेरोन में भी किया जाए तो ग़ज़ल और निखर उठेगी सादर "
Friday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सालिक गणवीर's blog post कल कहा था आज भी कल भी कहो..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Thursday
सालिक गणवीर posted a blog post

कल कहा था आज भी कल भी कहो..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122 2122 212कल कहा था आज भी कल भी कहो आम को हर बार ही इमली कहोबोलते हो झूठ लेकिन एक दिन आइने के सामने सच ही कहोकौन रोकेगा तुम्हें कहने से अब तुम ज़हीनों को भी सौदाई कहोहम ग़ुलामों की तरह पेश आएंँगे आप जिसको हुक्म की रानी कहोज़िंदगी बदलेगी रातों - रात फिर मत कभी कहना नहीं हाँ जी कहोवो बने हैं एक दूजे के लिए दोस्तों उनको दीया बाती कहोकह नहीं पाया मैं जब उसने कहा जो भी कहना है तुम्हें जल्दी कहो*मौलिक एवं अप्रकाशित.See More
Sep 17
सालिक गणवीर posted a blog post

जहाँ की नज़र में वो शैतान हैं..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

122 122 122 12जहाँ की नज़र में वो शैतान हैं समझते हैं हम वो भी इंसान हैंन हिंदू न यारो मुसलमान हैं यहाँ सबसे पहले हम इंसान हैंखु़दा कितने हैं ,कितने भगवान हैं यही सोचकर लोग हैरान हैंनहीं उनको हमसे महब्बत अगर हमारे लिये क्योंं परेशान हैंरिहा कर मुझे या तू क़ैदी बनातेरे हैं क़फ़स तेरे ज़िंदान हैं*मौलिक एवं अप्रकाशित.See More
Sep 16

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhilai, Chhattisgarh
Native Place
Bhilai
Profession
Retired from SAIL,as a Senior Electrical engineer
About me
Reading,writing and photography were my hobbies and after retirement I am totally indulged to fulfill my dreams.

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धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

1222 1222 122

धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है

मुझे वो आग बन कर छल रहा है

पिछड़ जाउंँगा मैं ठहरा कहीं गर

ज़माना मुझसे आगे चल रहा है

कभी तनहाइयों में शादमाँ था

ये सूनापन अभी क्यों खल रहा है

अंधेरे में उसे दिखता मैं कैसे

मगर फिर भी वो आँखें मल रहा है

बड़ा होकर दुखों की छाँव देगा

शजर नन्हा है दिल में पल रहा है

निगल जाएगा मुझको भी अँधेरा

ये सूरज…

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Posted on September 20, 2020 at 1:30pm — 3 Comments

कल कहा था आज भी कल भी कहो..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122 2122 212

कल कहा था आज भी कल भी कहो

आम को हर बार ही इमली कहो

बोलते हो झूठ लेकिन एक दिन

आइने के सामने सच ही कहो

कौन रोकेगा तुम्हें कहने से अब

तुम ज़हीनों को भी सौदाई कहो

हम ग़ुलामों की तरह पेश आएंँगे

आप जिसको हुक्म की रानी कहो

ज़िंदगी बदलेगी रातों - रात फिर

मत कभी कहना नहीं हाँ जी कहो

वो बने हैं एक दूजे के लिए

दोस्तों उनको दीया बाती कहो

कह नहीं पाया…

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Posted on September 17, 2020 at 8:43am — 7 Comments

जहाँ की नज़र में वो शैतान हैं..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

122 122 122 12

जहाँ की नज़र में वो शैतान हैं
समझते हैं हम वो भी इंसान हैं

न हिंदू न यारो मुसलमान हैं
यहाँ सबसे पहले हम इंसान हैं

खु़दा कितने हैं ,कितने भगवान हैं
यही सोचकर लोग हैरान हैं

नहीं उनको हमसे महब्बत अगर
हमारे लिये क्योंं परेशान हैं

रिहा कर मुझे या तू क़ैदी बना

तेरे हैं क़फ़स तेरे ज़िंदान हैं

*मौलिक एवं अप्रकाशित.

Posted on September 11, 2020 at 5:30pm — 11 Comments

क्या जाने किस जनम का सिला दे गया मुझे..( ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212

क्या जाने किस जनम का सिला दे गया मुझे

था बेगुनाह फिर भी सज़ा दे गया मुझे

कैसे यक़ीन कीजिए ग़ैरों की बात का

समझा था जिसको अपना दगा दे गया मुझे

लम्बी हो उम्र मेरी दुआ मांँगता रहा

मरने की मुफ़्त में जो दवा दे गया मुझे

उसके इशारों को मैं समझ ही नहीं सका

गूंँगा था आदमी जो सदा दे गया मुझे

ग़ज़लें पुरानी ले गया आया था ख़्वाब में

इनके इवज में घाव नया दे गया मुझे

भीगा था जिस्म…

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Posted on September 6, 2020 at 10:00pm — 18 Comments

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