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बृजेश कुमार 'ब्रज'
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ग़ज़ल-रफ़ूगर

121 22 121 22 121 22 सिलाई मन की उधड़ रही साँवरे रफ़ूगर सुराख़ दिल के तमाम सिल दो अरे रफ़ूगर उदास रू पे न रंग कोई उदास टांको करो न ऐसा मज़ाक तुम मसखरे रफ़ूगर हज़ार ग़म पे छटाक भर की ख़ुशी मिली है तुझे अभी कुछ पता नहीं मद भरे रफ़ूगर कहीं पलक से टपक न जाये हरेक आँसू भला हो तेरा न और दे मशवरे रफ़ूगर यही भरोसा है एक दिन फिर से आ मिलेंगे यहीं कहीं खो गये सभी आसरे रफ़ूगर कि 'ब्रज' इसी इक उधेड़बुन में रहे हमेशा छुपाऊँ कैसे ह्रदय के सब घाव रे रफ़ूगर (मौलिक एवं अप्रकाशित) बृजेश कुमार 'ब्रज'See More
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ग़ज़ल-रफ़ूगर

121 22 121 22 121 22



सिलाई मन की उधड़ रही साँवरे रफ़ूगर

सुराख़ दिल के तमाम सिल दो अरे रफ़ूगर



उदास रू पे न रंग कोई उदास टांको

करो न ऐसा मज़ाक तुम मसखरे रफ़ूगर



हज़ार ग़म पे छटाक भर की ख़ुशी मिली है

तुझे अभी कुछ पता नहीं मद भरे रफ़ूगर



कहीं पलक से टपक न जाये हरेक आँसू

भला हो तेरा न और दे मशवरे रफ़ूगर



यही भरोसा है एक दिन फिर से आ मिलेंगे

यहीं कहीं खो गये सभी आसरे रफ़ूगर



कि 'ब्रज' इसी इक उधेड़बुन में रहे हमेशा…

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Posted on February 2, 2023 at 9:30pm

ग़ज़ल

1222 1222 122
बड़ी दिल-जू रही सूरत हमारी
उदासी खा गई सूरत हमारी

ग़मों को एक चहरा चाहिए था
उन्हें भी भा गई सूरत हमारी

सभी हैरान होकर देखते हैं
लगे सबको नई सूरत हमारी

न जाने कौन शब भर ख़्वाब में था
किसे अच्छी लगी सूरत हमारी

हमारे लब भले चुप हो गये 'ब्रज'
कहे हर अनकही सूरत हमारी

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on December 15, 2022 at 6:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल

221 2121 1221 212



आँखों को रतजगे मिले हैं जल भराव भी

उल्फ़त में दुख मिले तो मिले गहरे भाव भी



कानों को आहटें सुने बर्षों गुज़र गये

बुझने लगे हैं आँखों के जलते अलाव भी



कुछ इसलिये खमोशियाँ ये रास आ गईं

दुनिया न जान ले कहीं अंतस के घाव भी



गर डूबना नसीब है तो फ़िक़्र क्यों करूँ

दरिया में अब उतार दी है टूटी नाव भी



वो साथ दे सका न बहुत देर तक मेरा

इक तो हवा ख़िलाफ़ थी उसपे बहाव भी



वो चाँद है,वो चाँद भला किसका हो…

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Posted on November 1, 2022 at 6:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल

121 22 121 22 121 22



हरिक  धड़क पे  तड़प  उठें बद-हवास आँखें

बिछड़ के  मुझसे कहाँ गईं  ग़म-शनास आँखें



कहाँ  गगन  में  छुपे  हुये  हो ओ चाँद जाकर

तमाम  शब  अब  किसे  निहारें  उदास आँखें



बिछड़ के तुझसे सिवाय इसके रहा नहीं कुछ

कि  एक  बिगड़ा हुआ  मुक़द्दर क़यास आँखें



यक़ीन  होता  नहीं  कि  कैसे  चला  गया  वो

दिखा  रही थीं  डगर  उसी की  उजास…

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Posted on October 5, 2022 at 7:00pm — 10 Comments

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At 6:59pm on October 24, 2017, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

स्वागत है आदरणीय ,  आपको मित्र के रूप में पाना मेरा सौभाग्य है .

At 11:43pm on November 17, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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