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Dayaram Methani
  • Male
  • Bhilwara - rajsthan
  • India
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Dayaram Methani's Page

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Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-104
"आदरणीय सुरेंद्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार।"
Jun 15
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-104
"आदरणीय हरिआेम श्रीवास्तव जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार।"
Jun 15
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-104
"आदरणीय शैलेश चंद्राकर जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।"
Jun 15
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-104
"प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार आदरणीय नीलम उपाघ्याय जी।"
Jun 15
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-104
"प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार आदरणीय वासुदेव अग्रवाल जी।"
Jun 15
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-104
"आदरणीय प्रतिभा पांडे जी, अति सुंदर सृजन। बधाई आपको।"
Jun 14
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-104
"पर्यावरण खराब हुआ, यह नहिं संयोग।मानव का खुद का ही है, निर्मित ये रोग।।.........सुंदर सृजन। बधाई आदरणीय वासुदेव अग्रवाल जी।"
Jun 14
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-104
"प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार आदरणीय प्रतिभा पांडे जी।"
Jun 14
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-104
"बैर ना बढ़ाईये कुदरत से अब आप कुछ और बैर ना बढ़ाईये  तपन बहुत है गांव गली में कुछ पेड़ उगाईये  काम करे ऐसा मेघा बरसे और धरा महके हरी भरी हो ये धरती ऐसा कदम उठाईये  खूब बनाये ऊंचे महल अब तो जरा रुक जाओ जंगल हैं श्रृंगार धरा का इसे ना…"
Jun 14
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-107
"उजले कपड़े दिल का काला लगता हैबनता अपना पर बेगाना लगता है...................अति सुंदर। बधाई स्वीकार करें।"
May 25
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-107
"प्रेम दया के भाव सृष्टि पर यदि रख लो,यह जग भगवत मय तब सारा लगता है।..............सुंदर सृजन हेतु बधाई स्वीकार करें।"
May 25
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-107
"आदरणीय आदरणीय अमित कुमार जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार।"
May 25
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-107
"आदरणीय अजय गुप्ता जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार।"
May 25
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-107
"आदरणीय समर कबीर जी, शुतरगुरबा दोष के बाबत मार्ग दर्शन के बहुत बहुत धन्यवाद। वस्तुत: शुतरगुरबा दोष के बाबत मुझे केवल एक ही पं​क्ति में एक वचन और बहुवचन का ध्यान था तथा एक जैसे अर्थ वाले शब्द नहीं आने की जानकारी थी। आपने ​शेर के दोनो मिसरों के बारे…"
May 25
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-107
"आदरणीय अनीस शेख जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार।"
May 25
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-107
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार।"
May 25

Profile Information

Gender
Male
City State
BHILWARA
Native Place
BHILWARA
Profession
journlist and writer
About me
I like to read and write kavita, gazal, short stories and artical.

Dayaram Methani's Blog

झूठ का व्यापार - ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212

झूठ का व्यापार बढ़ता जा रहा है आजकल,

और हर इक पर नशा ये छा रहा है आजकल

है लड़ाई का नजारा हर तरफ देखें जिधर,

आदमी ही आदमी को खा रहा है आजकल

इस प्रगति के नाम पर ही मिट रहे संस्कार सब

झूठ को हर आदमी अपना रहा है आजकल

बाँटकर भगवान को नेता खुशी से झूमकर

काबा’ तेरा काशी’ मेरी गा रहा है आजकल

जाग ‘मेठानी’ बचायें आग से अपना चमन

नित नया जालिम जलाने आ रहा है…

Continue

Posted on April 8, 2019 at 2:01pm — 7 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212

आंख से आंसू कभी यों ही बहाया ना करो

दर्द दिल का भी जमाने को बताया ना करो

हर किसी को मुफ्त में कोई खुशी मिलती नहीं

मेहनत से आप अपना जी चुराया ना करो

जिन्दगी ले जब परीक्षा हौसलों से काम लो

आपदा के सामने खुद को झुकाया ना करो

हैं सफलता और नाकामी समय का खेल ही 

लक्ष्य से अपनी नजर को तो हटाया ना करो

जीत लेंगे जिन्दगी की जंग ’मेठानी‘ सुनो

तुम निराशा को कभी मन में बसाया ना…

Continue

Posted on March 15, 2019 at 1:14pm — 5 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122

जख्म हम अपने छिपाने में लगे है,

खुद को’ हम पत्थर बनाने में लगे है।

पूछ मत हमको हुआ क्या आजकल ये,

दर्द दिल का हम भुलाने में लगे है।

कौन देता है सहारा अब यहां पर,

बोझ अपना खुद उठाने में लगे है।

दिल जगत का बेरहम चट्टान जैसा,

फिर भी’ पत्थर को मनाने में लगे है।

देश हित की बात ‘‘मेठानी’’ करे क्या,

द्रोहियों को हम बचाने में लगे है।

( मौलिक एवं अप्रकाशित)

- दयाराम…

Continue

Posted on February 19, 2019 at 10:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल गांव

2122 2122 2122

.
गांव भी अब तो शहर बनने लगा है
प्यार औ सद्भाव भी घटने लगा है

खुल गई है खूब शिक्षा की दुकानें
ज्ञान भी अब दाम पर बिकने लगा है

हो गये है लोग बैरी अब यहां भी
खून सड़कों पर बहुत बहने लगा है

गांव के हर मोड़ पर टकराव है अब
खेत औ खलियान तक जलने लगा है

सोच ’‘मेठानी‘’ हुआ है, क्या यहां पर
जो कभी बोया वही उगने लगा है


( मौलिक एवं अप्रकाशित )
- दयाराम मेठानी

Posted on January 23, 2019 at 12:00pm — 21 Comments

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At 10:09pm on May 24, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय दयाराम मेथानि जी आदाब बहुत बहुत शुक्रिया जनाब
 
 
 

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"सादर नमन आदरणीय समर कबीर जी। बहुत बहुत शुक्रिया।"
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"आप का स्वागत है ।"
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