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Dr. Vijai Shanker
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Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-131
"आपका ह्रदय से आभार , सादर। क्या कहें , गंतव्य क्या है"
Sunday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-131
"आपका ह्रदय से आभार , सादर। क्या कहें , गंतव्य क्या है"
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Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-131
"कुर्सी पाने कोहर कोई गद्दार बननेको तैयार हैं।आदरणीय दयाराम मैथानी जी, बहुत सही , सार्थक प्रस्तुति , बधाई , सादर।"
Sunday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-131
"जीवन में रख तू तनिक, काँटों से भी मेलबात सीख यह फूल से, दुख में भी हँस खेल।७।आदरणीय लक्ष्मण धामी जी , बहुत ही प्रेरक प्रस्तुति, बहुत बहुत बधाई, सादर।"
Sunday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-131
"जो जिद्दी और बेशर्म हैं, उनको सबक सिखाना है।बात मेरी जो ना माने, उसे स्वर्ग लोक पहुँचाना है॥ आदरणीय अखिलेश कृष्ण जी , बहुत सुन्दर प्रस्तुति हुयी है , बधाई , सादर।"
Sunday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-131
"क्या कहें , गंतव्य क्या है कहें भी तो क्या कहें ? कौन सुनता है ? हरेक तो अपनी ही कहता है , कहता ही जाता है। हरेक हर दूसरे को ज्ञान बांट रहा है , जैसे असीमित ,अनंत , अद्वितीय , ज्ञान है उसके पास जो कभी समाप्त होगा ही नहीं। इंटरनेट इस कार्य में सदैव…"
Sunday
Dr. Vijai Shanker commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post मानता हूँ तम गहन सरकार लेकिन-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी , अत्यंत मार्मिक , सामयिक प्रस्तुति के लिए अनेकानेक बधाइयां , सादर।"
May 7
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post विसंगति —डॉo विजय शंकर
"आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी , आपकी रचना पर उपस्थिति एवं सराहना के लिए ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद , सादर।"
May 7
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Dr. Vijai Shanker's blog post विसंगति —डॉo विजय शंकर
"आ. भाई विजय जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
May 7
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"विनम्र श्रद्धांजलि."
May 3
Dr. Vijai Shanker posted a blog post

विसंगति —डॉo विजय शंकर

बीते कुछ दिनों में लगा कि हम कुछ बड़े हो गये , अहंकार से फूलने लगे और फूलते...चले गए। फूले इतना कि हर समस्या के सामने बौने हो गये। यकीन नहीं होता कि आदमी खुद कुछ नहीं होता , ये जानने के बाद भी , कुछ का ख्याल हैं कि लूटो-खाओ, पाप-पुण्य कहीं कुछ नहीं होता , भगवान भी कहीं नहीं होता।मौलिक एवं अप्रकाशित See More
Apr 30
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post मुहब्बत हो जाती है - डॉo विजय शंकर
"आदरणीय लक्षमण धामी मुसाफिर जी , रचना पर उपस्थिति एवं सम्मान प्रदान करने हेतु हार्दिक आभार एवं धन्यवाद , सादर"
Apr 30
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Dr. Vijai Shanker's blog post मुहब्बत हो जाती है - डॉo विजय शंकर
"आ. भाई विजय शंकर जी, अच्छी प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई।"
Apr 26
Dr. Vijai Shanker posted a blog post

मुहब्बत हो जाती है - डॉo विजय शंकर

मुहब्बत हो जाती है , मुहब्बत हो जाती है , मुहब्बत हो जाती है , ये तो नफ़रतें हैं , जिनके लिए टेंडर निकाले जाते हैं . मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Apr 25
Dr. Vijai Shanker commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post ढूँढा सिर्फ निवाला उसने - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"खुद औरों के कन्धे पर चढ़कहता बोझ सँभाला उसने।३। बहुत सुन्दर प्रस्तुति , बधाई , आदरणीय लक्षमण धामी मुसाफिर जी , सादर।"
Jan 23
Dr. Vijai Shanker commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सब कुछ है अब यार सियासी- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"देश का पहिया जाम पड़ा हैदौड़ रही बस कार सियासी।६।बहुत सटीक विवेचन। बधाई, आदरणीय लक्षण धामी मुसाफिर जी, सादर।"
Jan 7

Profile Information

Gender
Male
City State
UP
Native Place
Allahabad
Profession
Retired
About me
Educationist

.जिंदगी तुझे ही पढ़ लेते हैं ---डा० विजय शंकर

चलो किताबों को बंद कर देते हैंजिंदगी तुझे ही सीधे-सीधे पढ़ लेते हैं .किताबों में सबकुझ तेरे बारे में ही तो हैलो , तुझसे ही सीधे-सीधे बात कर लेते हैं.किताबें तो बहुत सी हैं , मिल भी जायेंगींउन को पढ़ लूँ तो क्या तू मिल जायेगी .मौत को कितने और कौन-कौन पढ़ते हैंपर उसका वादा है , सबको मिलती है .भरोसा नहीं , तू किसको मिले , कितनी मिलेतेरे लिये , तेरे चाहने वाले दिन रात लगे रहते हैं .अरे सब कुछ तो तेरे लिए ही है जिंदगी मेंतू है तो सब है , तू नहीं तो क्या है जिंदगी में .इसलिए चलो किताबों को बंद कर देते हैं .तू है , तुझसे सीधे-सीधे बात कर लेते हैं ...डा० विजय शंकर---------------( मौलिक और अप्रकाशित )

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Comment Wall (19 comments)

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At 7:54pm on August 31, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय डॉ. विजय शंकर जी प्रणाम! बहुत बहुत शुक्रिया आपको मेरी प्रथम लघुकथा अच्छी लगी आपने अपना अमूल्य समय निकाला और जो हौसला बढ़ाया उसका ह्रदय से आभार आपका स्नेहभाव सदा यूँ ही बना रहे!
At 5:38pm on January 1, 2017, Mohammed Arif said…
आदरणीय डॉ.विजय शंकर मेहताजी सकारात्मक सोच को उद्घरित करती रचना के लिए बधाई । नव वर्ष मंगलमय हो !
At 4:58pm on November 5, 2015, Abid ali mansoori said…

देर से ही सही.. हर्दिक आभार आपका आदरणीय विजय शंकर जी!

At 10:23pm on November 4, 2015, Abid ali mansoori said…

Haardik abhaar aapka!

At 3:46pm on July 1, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर,

आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें 

At 7:50pm on June 3, 2015, Tanuja Upreti said…
आभार आदरणीय
At 7:28pm on May 4, 2015, Seema Singh said…
आभार सर मार्गदर्शन के लिए
At 8:35am on April 17, 2015, Mohan Sethi 'इंतज़ार' said…

आदरणीय Dr. Vijai Shanker जी आप का हार्दिक आभार ....मंगलकामनाएँ...सादर  

At 6:57am on January 18, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, निवेदन स्वीकार करने के लिए आभार...

विद्यार्थी की मुक्त कंठ प्रशंसा आपका बड़प्पन और आपके हृदय की विशालता का प्रमाण है.

आपका  स्नेह और आशीर्वाद  सदैव मिलता रहे, इसके लिए सदैव प्रयास करता रहूँगा. नमन 

At 10:51pm on January 15, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, आभार, धन्यवाद.... आप लोगो के स्नेह और आशीर्वाद से ही मंच पर सक्रिय हो पाता हूँ. आपका आभार हार्दिक धन्यवाद 

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विसंगति —डॉo विजय शंकर

बीते कुछ दिनों में लगा
कि हम कुछ बड़े हो गये ,
अहंकार से फूलने लगे
और फूलते...चले गए।
फूले इतना कि हर समस्या
के सामने बौने हो गये।
यकीन नहीं होता कि
आदमी खुद कुछ नहीं होता ,
ये जानने के बाद भी ,
कुछ का ख्याल हैं कि
लूटो-खाओ, पाप-पुण्य
कहीं कुछ नहीं होता ,
भगवान भी कहीं नहीं होता।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on April 30, 2021 at 10:48am — 2 Comments

मुहब्बत हो जाती है - डॉo विजय शंकर

मुहब्बत हो जाती है ,
मुहब्बत हो जाती है ,
मुहब्बत हो जाती है ,
ये तो नफ़रतें हैं ,
जिनके लिए टेंडर
निकाले जाते हैं . 

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on April 25, 2021 at 10:00pm — 2 Comments

दो लघु कवितायें —डॉo विजय शंकर

( एक )

लोग राजनीति में बड़े - बड़े

बदलाव लाने के लिए आते हैं।

सत्ता में आते ही कद-काठी ,

डील-डौल , रंग-रूप , वाणी ,

पहनावा सब बदल जाते हैं ,

सबसे बड़ी बात , चेहरे - मोहरे

और इरादे तक बदल जाते हैं।



( दो )

वह गतिमान है ,

चलते रहना उसकी प्रकृति।

वह समय है , गुजर जाता है।

पर अतीत को छोड़ जाता है ,

और छोड़ जाता है ,

अतीत के अवशेष, धरोहरें,

स्मृतियाँ , स्मारक , कहानियां।

समय प्रति क्षण चलायमान…

Continue

Posted on December 17, 2020 at 9:30am — 6 Comments

कौन हो तुम — डॉo विजय शंकर

ओजस्वी तेजस्वी

से दिखाई देते हो ,

अपनी जयकार से

आत्म मुग्ध लगते हो।

आईने में खुद को

रोज ही देखते हो ,

क्या खुद को

कुछ पहचानते भी हो।

बड़े आदमी हो , बहुत बड़े ,

लोग तुम्हें जानते हैं ,

बच्चे सामान्य ज्ञान के लिए

तुम्हारा नाम रटते और जानते हैं ,

रोज कितने ही लोग तुम्हारी ड्योढ़ी

पर खड़े रहते हैं , टकटकी लगाए ,

कितने आदमी तुमसे रोज ही

मिलने के लिए आते रहते हैं ,

तुम भी कभी किसी से

आदमी की तरह मिलते हो…

Continue

Posted on December 4, 2020 at 11:28am — 8 Comments

 
 
 

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