For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,175)

एक पंथ दो काज - लघुकथा -

एक पंथ दो काज - लघुकथा -

"हल्लो, मिश्रा जी, गुप्ता बोल रहा हूँ।"

"अरे यार नाम बताने की आवश्यकता नहीं है।मेरे मोबाइल में आपका नाम आ गया। बोलो सुबह सुबह कैसे याद किया?"

"आज आपकी थोड़ी मदद चाहिये।"

"कैसी बात करते हो मित्र।आपके लिये तो आधी रात को तैयार हैं।हुकम करो।"

"अरे भाई आज राम नवमी है।कुछ बच्चे बच्चियों को जिमाना है।मैडम का आदेश हुआ कि सोसाइटी में से अपने दोस्तों के बच्चे बुलालो।"

"ये तो बहुत टेढ़ा मामला है।लॉक डाउन का सरकारी आदेश है।उसकी अवहेलना तो…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on April 3, 2020 at 5:55pm — 6 Comments

समय :

समय :

न जाने किस अँधेरे की जेब में

सिमट जाता है समय

न जाने कब उजालों के शिखर पर

कहकहे लगाता है समय

अंतहीन होती है समय की सड़क 

बिना पैरों का ये पथिक

अपने काँधों पर ढोता है सदा

कल, आज और कल की परतों में

साँस लेते लम्हों की अनगिनित दास्तानें

और नुकीली सुईयों के पाँव के नीचे रौंदे गए

आफ़ताबी अरमानों के बेनूर आसमान



क्षणों की माल धारण किये

उन्नत भाल का ये आहटहीन अश्व

सृष्टि चक्र का वो वाहक है…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 3, 2020 at 3:00pm — 4 Comments

क्षणिकाएँ :

क्षणिकाएँ :

क्या ख़बर
हम फिर
मिलें न मिलें
मगर
छोड़ जाऊँगा मैं
समय के भाल पर
हमारे मिलन की गवाह

परछाईयाँ
काँपते चाँद की

.............................

झुलसे हुए होठों पर
रुक गया
फिसल कर
एक अश्क
बेवफ़ाई का

....................

खाली घड़ा
सूखी रोटी
टूटे छप्परों से झाँकती
झूठी आस की
धवल चाँदनी


सुशील सरना /2.4.20
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on April 2, 2020 at 5:20pm — 4 Comments

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

1

गर्म अफ़वाहों का बाज़ार ख़ुदा ख़ैर करे

बिक रहा झूठ का अख़बार ख़ुदा ख़ैर करे

2

चार सिक्कों की ख़नक जेब में क्या होने लगी

हो गए हम भी तलबगार ख़ुदा ख़ैर करे

3

शांत लहरों में भी कश़्ती को सहारा न मिला

डूबी मँझधार में पतवार ख़ुदा ख़ैर करे

4

इश़्क था या कि अज़ीयत ओ फ़ज़ीहत का सफर

है अलम दिल का पुर आज़ार ख़ुदा ख़ैर करे



बाँध रक्खा है किनारों ने संमदर ऐसे

रुक गई लहरों की रफ़्तार ख़ुदा ख़ैर… Continue

Added by Rachna Bhatia on April 2, 2020 at 1:31pm — 4 Comments

"ओबीओ की सालगिरह का तुहफ़ा"

2122 2122 212

.

देख साँसों में बसा है ओ बी ओ

मेरी क़िस्मत में लिखा है ओ बी ओ




कितने आए और कितने ही गए

शान से अब तक खड़ा है ओ बी ओ




बढ़ गई तौक़ीर मेरी और भी

तू मुझे जब से मिला है ओ बी ओ




हों वो 'बाग़ी' या कि भाई 'योगराज'

तू सभी का लाडला है ओ बी ओ



भाई 'सौरभ' शान से कहते…

Continue

Added by Samar kabeer on April 1, 2020 at 9:00pm — 18 Comments

अंतस के हिम निर्झर से जब भाव पिघलने लगते है|(७९ )

अंतस के हिम निर्झर से जब

भाव पिघलने लगते है|

गीतों में ढलने को मेरे

शब्द मचलने लगते हैं ॥

***

लेखन आता नहीं मुझे पर लिखता हृद उद्गारों को |

और बुझा लेता हूँ लिखकर हिय तल के अंगारों को |

कहाँ निभा पाता हूँ अक्सर मैं छंदो का अनुशासन

अलंकार-से भूल गया हूँ शब्दों के श्रृंगारों को |

भाषा शुद्ध न हुई भले ही

लय सुर ताल रहे बाक़ी

बिम्ब-प्रतीक सृजन से जब…

Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 1, 2020 at 8:00pm — 4 Comments

कोरोना पर कुछ दोहे :

कोरोना पर कुछ  दोहे :
वृत कोरोना का नहीं, इतना भी आसान।
रहना निज आवास में, है मात्र समाधान।।
कोरोना के काल से, हुआ विश्व…
Continue

Added by Sushil Sarna on April 1, 2020 at 5:30pm — 4 Comments

गजल(शोर हवाओं....)

22 22 22 22

शोर हवाओं ने बरपाए,

घाव हरे होने को आए।1

बंटवारे का दर्द सुना,अब

देख कलेजा मुंह को धाए।2

रोजी खातिर परदेश गए

घर भागे सब,धक्के खाए।3

आफत ऐसी आई उड़कर

सबने अपने रंग दिखाए।4

बबुआ भैया जो कहते थे,

सबने फिर से हाथ उठाए।5

बांट रहे कुछ मुंह की रबड़ी

खाने को भूखे ललचाए।6

तीर कमान चढ़ाए चलते

दोमुख सबको कौन बताए?7

मांग बना जो राजा,बैठा

दाता लाठी -…

Continue

Added by Manan Kumar singh on April 1, 2020 at 1:20pm — 4 Comments

यक़ीं के साथ तेरा सब्र इम्तिहाँ पर है(७८)

(1212 1122 1212  22 /112 )

यक़ीं के साथ तेरा सब्र इम्तिहाँ पर है

हयात जैसे बशर लग रही सिनाँ पर है

**

हमारा मुल्क परेशान और ख़ौफ़ में है

सुकून-ओ-चैन की अब जुस्तजू यहाँ पर है

**

वजूद अपना बचाने में अब लगा है बशर

न जाने आज ख़ुदा छुप गया कहाँ पर है

**

बचेगा क़ह्र से कोविड के आज कैसे भला 

बशर पे ज़ुल्म-ओ-सितम उसका आसमाँ पर है

**

वहाँ की प्यास भला दूर क्या करे…

Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 1, 2020 at 1:00pm — 7 Comments

एक ग़ज़ल

सुन  रहे  हैं  कि  वो  इक ऐसी दवाई देगा

जिससे  अंधे  को भी रातों में दिखाई देगा



प्यार  से  उसने  बुलाया है मुझे मक़्तल में

जानता हूँ   मैं जो  दावत   में  क़साई देगा



ऐसे चिल्लाओ कि आवाज़ वहाँ तक जाए

एक  दिन  तो  सभी  बहरों को सुनाई देगा



पास  रहता  हूँ  तो मुंह फेर के चल देता है

दूर  जाऊँगा  तो   आने   की   दुहाई  देगा



क़ैदख़ाने   में  उसी  ने  ही रखा सालों तक

जिसने   उम्मीद  जताई   थी   रिहाई  देगा



घुप   अंधेरे  से …

Continue

Added by सालिक गणवीर on April 1, 2020 at 12:00pm — 5 Comments

धूप छाँह होने वाले

तमाम उम्र लगे रहे शहर शहर हो जाने में 
क्यों गांव गांव आज फिर होने लगी है ज़िंदगी …
Continue

Added by amita tiwari on April 1, 2020 at 1:30am — 1 Comment

ग़ज़ल

मुल्क़ है ख़ुशहाल बतलाती रही मुझको हँसी

नित नये किस्सों से भरमाती रही मुझको हँसी

गफ़लतों में झूमते थे छुप गया है सूर्य अब

बादलों की सोच पर आती रही मुझको हँसी

मौत आगे लोग पीछे, था सड़क पर क़ाफ़िला

क़ाफ़िले का अर्थ समझाती रही मुझको हँसी

देखकर मायूस बचपन और सहमी औरतें

चुप्पियाँ हर ओर शरमाती रही मुझको हँसी

गालियों के संग अब तो मिल रहीं हैं लाठियाँ

मौत सच या भूख उलझाती रही मुझको हँसी

अब करोना क़हर…

Continue

Added by Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) on March 31, 2020 at 8:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

2122   2122     2122    212

तोड़ने से पहले मुझको आजमा कर देख ले

अपने घर के एक कोने में सजा कर देख ले

आज भी ज़िंदा है दुनिया में वफ़ा की रोशनी

अपने आंगन में कोई पौधा लगाकर देख ले

कोई अक्षर तुझको मिल जाएगा मेरे नाम का

अपने हाथों की लकीरों को मिला कर देख ले

हौसला करने से मिल ही जाता है सब कुछ यहाँ

वक़्त की भट्टी में बस खुद को तपा कर देख ले

सबसे बढ़कर खूबसूरत कैसे हैं तेरी हया

आइने को आंखों में काजल सजाकर देख…

Continue

Added by मनोज अहसास on March 31, 2020 at 12:31am — 6 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

कैसा हाहाकार मचा है मालिक करुणा बरसाओ

सन्नाटा खुद चीख रहा है मालिक करुणा बरसाओ

भूख, गरीबी, लाचारी से पहले ही आतंकित थे

एक नया तूफान उठा है मालिक करुणा बरसाओ

वादा तुमने किया था सबसे भीड़ पड़ी तो आओगे

खतरे में फिर मानवता है मालिक करुणा बरसाओ

कौन सुनेगा टेर हमारी बिना तुम्हारे ओ पालक

बेबस मानव कांप गया है मालिक करुणा बरसाओ

तुमने साथ दिया न तो फिर किसके दर पर जाएंगे

सबके मन मे व्याकुलता है मालिक करुणा…

Continue

Added by मनोज अहसास on March 30, 2020 at 10:19pm — 1 Comment

आसमाँ .....

आसमाँ .....

बहुत ढूँढा
आसमाँ तुझे
दर्द की लकीरों में
मोहब्बत के फ़कीरों में
ख़ामोश जज़ीरों में
मगर
तू छुपा रहा
धड़कन की तड़पन में
यादों के दर्पण में
कलाई के कंगन में
वक्त सरकता रहा
सागर छलकता रहा
अब्र बरसता रहा
मगर
तू न समझा
मैं किसे ढूँढता हूँ
पागल आसमाँ
मैं तो
इस दिल की ज़मी का
आँखों की नमी का
अपनी ज़बीं का
आसमाँ ढूँढता हूँ

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on March 30, 2020 at 8:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल

हवा ख़ामोश है वीरान हैं सड़कें

बहुत अब हो चुका बेकार मत भटकें

नहीं देंगे झुलसने आग से गुलसन

हमीं हैं फूल इसके रोज़ हम महकें

हमेशा ही रही तूफ़ान से यारी

घड़ी नाज़ुक अभी हम आज कुछ बहकें

हमें मंज़ूर है, हम शंख फूकेंगे

कि अब तो चश्म अपनों के नहीं छलकें

क़सम ले लें लड़ेंगे हम करोना से

मगर ऐसे कि अब दंगे नहीं भडकें

पुराना डर मुझे बेचैन करता जब

कभी उठतीं कभी गिरतीं तेरी…

Continue

Added by Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) on March 30, 2020 at 4:30pm — 2 Comments

अ़ज़्म

डरते  हैं  जो मुश्किल से घबराते हैं  ख़तरों से , 

लरज़ीदः क़दम फिर वो मन्ज़िल को नहीं पाते ,, 

गर अ़ज़्म जो पुख़्ता हो लें काम भी हिम्मत से, 

तो  लोग  सितारों  से  आगे  हैं  निकल  जाते ।

                   

'मौलिक व अप्रकाशित' 

Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on March 29, 2020 at 12:19pm — 2 Comments

मेरा सपना

कल नींद में हमने एक सपना देखा।

देखा कि ,मेरा देश बदल गया है।।

जाति ,धर्म का नहीं है रगड़ा

ऊंच-नीच का खत्म है झगड़ा।।

नारी का नहीं है शोषण,

गरीब को भरपूर है पोषण।

सब के, भंडार भरे हैं,

निठल्ले भी काम करें हैं।

ना अपराधों की कही है गंध,

थाना ,कचहरी सब है बंद।

नेता सब सुधर गए हैं,

भ्रष्टाचारी ना जाने किधर गए हैं।

ना रिश्वत है ,ना चित्कार कहीं,

है शांति चहु ओर,

पर जब नींद खुली तो देखा, हकीकत है कुछ और।।



द्वारा भूपेंद्र… Continue

Added by Bhupender singh ranawat on March 29, 2020 at 10:15am — 1 Comment

स्नेह-धारा

स्नेह-धारा

कल्पना-मात्र नहीं है यह स्नेह का बंधन ...

उस स्वप्निल प्रथम मिलन में, प्रिय

कुछ इस तरह लिख दी थीं तुमने

मेरे वसन्त की रातें

मेरी समस्याओं ने

अव्यव्स्थाओं ने, अभिलाषाओं…

Continue

Added by vijay nikore on March 29, 2020 at 8:00am — 3 Comments

तड़प उनकी भी चाहत की इधर जैसी उधर भी क्या ?(७७ )

(1222 1222 1222 1222 )

तड़प उनकी भी चाहत की इधर जैसी उधर भी क्या ?

लगी आतिश मुहब्बत की इधर जैसी उधर भी क्या ?

**

मिलन के बिन तड़पते हैं वो क्या वैसे कि जैसे हम

जो बेचैनी है सोहबत  की इधर जैसी उधर भी क्या ?

**

हुआ है अनमना सा दिल हुई कुछ शाम भी बोझिल

तम्मना आज ख़िलवत की इधर जैसी उधर भी क्या ? 

**

बग़ैर इक दूसरे के जी सकें और मर न पाएँगे

ज़रूरत ऐसी…

Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 29, 2020 at 12:00am — 7 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

माँ

माँ यह शब्द नहींं केवलइस जग की माँ से काया है। हम सबकी खातिर अतिपावन माँ के आँचल की छाया है।१।माँ…See More
Tuesday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अगर आप यों घबरा कर मैदान छोड़ देंगे तो जिन्होने एक जुट होकर षड़यन्त्र किया है वे अपनी जीत मानेंगे।…"
Tuesday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अब, जबकि यह लगभग स्पष्ट हो ही चुका है कि OBO की आगे चलने की संभावना नगण्य है और प्रबंधन इसे ऑफलाइन…"
Monday
amita tiwari posted a blog post

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें बेगुनाही और इन्साफ की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप अहिल्या बन…See More
May 15
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post गर्भनाल कब कट पाती है किसी की
" मान्य,सौरभ पांडे जीआशीष यादव जी , , ह्रदय से आभारी हूँ. स्नेह बनाए रखियगा | सौरभ जी ने एक…"
May 14

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on amita tiwari's blog post बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें
"आदरणीया अमिताजी, तार्किकता को शाब्दिक कर तटस्थ सवालों की तर्ज में बाँधा जाना प्रस्तुति को रुचिकर…"
May 14

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, आपकी प्रस्तुति निखर कर सामने आयी है. सभी शेर के कथ्य सशक्त हैं और बरबस…"
May 14

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय नीलेश भाई, आपका स्वागत है.     करेला हो अथवा नीम, लाख कड़वे सही, लेकिन रुधिर…"
May 14
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय बाग़ी जी एवं कार्यकारिणी के सभी सदस्यगण !बहुत दुखद है कि स्थिथि बंद करने तक आ गयी है. आगे…"
May 13

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय अजय गुप्ता जी, आपकी भावनाओं और मंच के प्रति आपके जुड़ाव को शब्द-शब्द में महसूस किया जा सकता…"
May 13
amita tiwari and आशीष यादव are now friends
May 11
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
May 11

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service