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आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत मनुष्य को संवेदनहीन कर रहा है. यह मोबाइल का युग जिसने सबको अपनी गिरफ्त में ले रखा है जिससे नवजात बच्चे तक अछूते नहीं हैं . इसी को ध्यान में रखकर मैंने मुख्य शीर्षक मशीनी मनुष्य के अंतर्गत कई कविताओं को लिखने की कोशिश की है.

01

शीर्षक: कारपोरेट कीबोर्ड 

उंगलियाँ नाचती हैं…

मकाम पर नहीं, काली कुंजियों के मैदान पर।

टिक-टिक-टिक-टिक।

ये आवाज़ किसी के होने की गवाही नहीं,

किसी के मशीन बन जाने की रसीद है।

यहाँ 'प्रारंभ' शिफ्ट के साथ होता है,

और अंत... बस 'शट-डाउन' है।

कोई छैनी नहीं, कोई हथौड़ा नहीं,

यहाँ बस 'डिलीट' की चोट है जो मूरत नहीं,

रिक्त स्थान बनाती है। 

आशीष यादव 

02

शीर्षक: डिजिटल कब्र

यह जो अंगूठा चल रहा है न,

नीचे से ऊपर की ओर...

यह सफ़र नहीं है, यह महज़ एक 'स्क्रॉल' है।

एक ऐसी अनंत सीढ़ी, जो कहीं नहीं जाती,

बस हमें हमारे ही होने से दूर ले जाती है।

यहाँ यादें 'क्लाउड' में हैं,

और इंसान... बादलों से भी ज़्यादा धुंधला।

हम यहाँ जीते नहीं हैं,

हम यहाँ 'अपडेट' होते हैं।

हर पंद्रह सेकंड की रील में,

एक पूरी ज़िंदगी को समेटने की नाकाम कोशिश,

और फिर... एक अगला 'स्वाइप'।

तुम कहते हो तुम दुनिया देख रहे हो?

नहीं, तुम बस पिक्सेल के झरोखे से,

उजाले की नकल देख रहे हो।

यहाँ दुख का भी एक 'फ़िल्टर' है,

और तन्हाई का अपना एक 'इमोजी'।

हैरत की बात जानते हो क्या है?

हथौड़े की चोट पत्थर पर पड़े तो मूरत बनती है,

मगर इस नीली रोशनी की चोट,

हृदय पर पड़ती है...

और वहाँ कुछ नहीं बनता,

बस एक गहरी, नीली, खामोश...

डिजिटल कब्र बन जाती है।

आशीष यादव 

03

शीर्षक: शिफ्ट का सौदा (कॉर्पोरेट गुलामी)

लॉग-इन होते ही,

मैं अपना नाम डेस्क की दराज़ में रख देता हूँ,

और पहन लेता हूँ एक 'एम्प्लॉई कोड'।

सूरज का ढलना अब कुदरत का नियम नहीं,

मेरे 'लॉग-आउट' की शर्त है।

यहाँ सपनों की ऊँचाई,

सिर्फ ग्राफ की लकीरों में नापी जाती है।

हम कुर्सियों पर उगे हुए वे पौधे हैं,

जिन्हें पानी नहीं, 'डेडलाइन्स' दी जाती हैं।

अजीब है न?

हम अपनी पूरी उम्र खर्च कर रहे हैं,

सिर्फ एक 'सैलरी' कमाने के लिए,

जिससे हम अपनी थकी हुई उम्र का इलाज करा सकें।

आशीष यादव 

04

शीर्षक: अनुबंधित प्रेम (बदलते रिश्तों के अनुबंध)

अब दिल नहीं मिलते,

अब 'इंटरेस्ट्स' (Interests) मैच होते हैं।

रिश्ते अब इबादत नहीं,

एक 'म्यूचुअल एग्रीमेंट' (Mutual Agreement) हैं।

हम साथ इसलिए नहीं हैं कि हमें प्यार है,

हम साथ इसलिए हैं कि अकेले रहना 'कॉस्टली' (Costly) है।

हर जज़्बात के पीछे एक 'क्लॉज़' (Clause) है,

और हर वादे के साथ एक 'एग्जिट पॉलिसी' (Exit Policy)।

चाय की प्याली पर अब भविष्य की बातें नहीं होतीं,

अब हिसाब होता है—

कि किसने कितना निवेश किया, और किसे क्या 'रिटर्न' मिला।

यह प्रेम नहीं, 'इमोशनल स्टार्टअप' है,

जो मुनाफ़ा कम होने पर 'लिक्विडेट' कर दिया जाएगा।

आशीष यादव 

05

शीर्षक: मिट्टी का विसर्जन (बचपन का डिजिटल अपहरण)

अब बच्चे घुटनों के बल नहीं चलते,

उनकी उंगलियाँ 'होम स्क्रीन' पर दौड़ती हैं।

आँगन अब ईंट-मिट्टी का नहीं,

पाँच इंच के 'डिस्प्ले' का रह गया है।

तितली के पीछे भागने वाली थकावट,

अब 'लेंस' के ज़रिए ज़ूम की जाती है।

लोरियाँ अब माँ के गले से नहीं,

प्लास्टिक के स्पीकर से रिसती हैं।

वह जो धूल में सने हुए हँसते चेहरे थे,

अब 'फ़िल्टर्स' की तह में दबे हुए हैं।

अजीब है...

एक पूरी पीढ़ी ने चलना सीखने से पहले,

'स्वाइप' करना सीख लिया है।

आशीष यादव 

06

शीर्षक: मैं एक लेबल हूँ (बाज़ारवाद और पहचान)

मैं कौन हूँ?

यह मेरी रूह तय नहीं करती,

मेरी कलाई पर बँधी घड़ी का 'ब्रांड' तय करता है।

मेरा व्यक्तित्व उतना ही गहरा है,

जितना मेरी गाड़ी का 'लोगो' (Logo) चमकता है।

हम चीज़ों को इस्तेमाल नहीं करते,

चीज़ें हमें 'डिफ़ाइन' करती हैं।

बाज़ार ने मुझे एक ग्राहक में बदल दिया है,

जो हर सेल में अपनी 'सेल्फ़-वर्थ' (Self-worth) ढूँढता है।

अगर मैं यह जूता न पहनूँ,

अगर मैं उस कैफ़े की फोटो न डालूँ,

तो क्या मेरा अस्तित्व बचा रहेगा?

या मैं उन 'आउटडेटेड' चीज़ों की तरह फेंक दिया जाऊँगा,

जिनकी अब इस बाज़ार को ज़रूरत नहीं।

आशीष यादव 

07

शीर्षक: एल्गोरिदम का खुदा (AI और मानव संवेदना)

एक मशीनी दिमाग मेरी रगों को टटोल रहा है,

वह जानता है कि मुझे कब उदासी बेचनी है और कब सुकून।

मेरे आँसुओं का उसके पास एक 'डेटा सेट' है,

और मेरी मुस्कान? बस एक 'पैटर्न रिकग्निशन'।

अजीब है...

अब कविताएँ रूह से नहीं, 'प्रॉम्प्ट' से जनमती हैं,

और इश्क़ का इज़हार 'सजेस्टेड रिप्लाई' तय करता है।

हम उस मोड़ पर हैं जहाँ मशीनें 'आर्ट' बना रही हैं,

और इंसान... महज़ एक 'प्रोसेसर' की तरह जिए जा रहा है।

डर यह नहीं कि मशीनें इंसान बन जाएँगी,

खौफ़ यह है कि हम मशीन होते जा रहे हैं।

जब संवेदना का भी 'कोड' लिख दिया जाएगा,

तब खुदा किसी मंदिर में नहीं, 'सर्वर रूम' में मिलेगा।

आशीष यादव 

08

शीर्षक: सन्नाटे का कत्ल (सूचनाओं का शोर और मौन की हत्या)

मेरे कानों में चौबीस घंटे एक बाज़ार बजता है,

हज़ार चीखें हैं जो एक साथ मुझे पुकारती हैं।

दुनिया की हर ख़बर मेरी जेब में थरथराती है,

पर मेरे अंदर की चुप्पी... दम तोड़ चुकी है।

अब 'मौन' कोई दार्शनिक स्थिति नहीं,

एक 'टेक्निकल एरर' (Technical Error) जैसा लगता है।

हम इतने शोर के आदी हो चुके हैं कि,

अगर मोबाइल एक पल को भी शांत हो जाए,

तो हमें अपने ही अस्तित्व से डर लगने लगता है।

हमने सूचनाएँ तो बटोर लीं ईंटों की तरह,

पर ज्ञान की कोई 'नींव' न रख सके।

चारों तरफ जानकारियों का सैलाब है,

और बीच में खड़ा मनुष्य...

अपनी ही आवाज़ सुनने को तरस रहा है।

आशीष यादव 

09

शीर्षक: ज़मीर का प्राइस टैग (नैतिकता और बाज़ार)

यहाँ हर चीज़ की एक 'प्राइस टैग' है,

ईमान की भी, और एतबार की भी।

सच अब कोई शाश्वत मूल्य नहीं रहा,

वह बस एक 'मार्केटिंग स्ट्रेटेजी' है।

हम उस दौर में हैं जहाँ 'फेक' होना ही 'ट्रेंड' है,

और सादगी... महज़ एक पुराना 'आउटडेटेड' वर्जन।

रिश्तों की दलाली अब कोठों पर नहीं,

काँच के बड़े दफ़्तरों में 'कमीशन' के नाम पर होती है।

ज़मीर अब कोई आवाज़ नहीं देता,

वह बस बैंक बैलेंस की झंकार में दब गया है।

हमने ऊँची इमारतें तो बना लीं,

मगर इंसान की क़ीमत... कौड़ियों के भाव गिरा दी।

आशीष यादव 

10

शीर्षक: प्लास्टिक की रूह (पर्यावरण और कृत्रिमता)

नदियाँ अब जल नहीं, कचरा ढोती हैं,

और पहाड़ों पर बर्फ़ नहीं, टूरिस्टों का शोर है।

हमने फूलों की खुशबू बोतलों में बंद कर ली,

और असली बाग़ों को कंक्रीट से पाट दिया।

हमारी रूहों में अब मिट्टी की महक नहीं आती,

वहाँ से अब प्लास्टिक के जलने की गंध आती है।

हमने चाँद को 'लैंडिंग साइट' बना दिया,

और समुद्र को एक विशाल 'कूड़ादान'।

डरावना यह नहीं कि दुनिया खत्म हो जाएगी,

खौफ़नाक यह है कि हम एक ऐसी दुनिया में बचेंगे,

जहाँ पंछी लोहे के होंगे और हवा ज़हरीली,

और हम उसे ही 'तरक़्क़ी' का नाम देंगे।

आशीष यादव 

11

शीर्षक: स्मृतियों का विलोपन 

अब हमें कुछ याद नहीं रहता,

हमने अपनी याददाश्त का 'बैकअप' क्लाउड पर छोड़ दिया है।

वो बचपन की गलियों का नक्शा,

अब 'जीपीएस' (GPS) के नीले बिंदु में सिमट गया है।

माँ का चेहरा याद करने के लिए,

हमे 'गैलरी' के फोल्डर खंगालने पड़ते हैं।

वो खुशबू, वो स्पर्श, वो आवाज़ें...

सब अब पिक्सल्स और बाइट्स में बदल चुकी हैं।

हम लम्हों को जीते नहीं हैं,

हम उन्हें 'कैप्चर' करते हैं—

ताकि बाद में देख सकें कि हम वहाँ थे।

अजीब त्रासदी है यह,

कि हमारे पास हज़ारों तस्वीरें हैं,

पर एक भी मुकम्मल याद नहीं।

हमारा अतीत अब हमारे भीतर नहीं,

हार्ड-ड्राइव की उन बेजान चिप्स में दफ़न है।

जिस दिन बिजली थमेगी,

या सर्वर सो जाएगा,

उस दिन हम 'अनाम' हो जाएंगे।

क्योंकि हमने याद रखना छोड़ दिया है,

हमने बस 'स्टोर' करना सीखा है।

आशीष यादव 

12

शीर्षक: कंक्रीट का द्वीप

शहर बढ़ रहा है...

ऊपर की तरफ, आसमान को चीरता हुआ,

मगर इंसान सिमट रहा है,

अपने फ्लैट के उस चैकोर 'क्यूबिकल' में।

दीवारें यहाँ बात नहीं करतीं,

सिर्फ दूसरे कमरे का शोर सोखती हैं।

पड़ोसी का नाम 'नेमप्लेट' पर लिखा है,

मगर उसकी आवाज़?

उसकी आवाज़ बस दरवाज़े की दरारों से छनकर आती 

एक अजनबी आहट भर है।

हम हज़ारों 'फ्रेंड्स' के बीच बैठे हैं,

मगर चाय का कप अकेले ही खत्म होता है।

मैसेज की 'टिंग' बजती है तो दिल धड़कता है,

शायद किसी ने याद किया?

नहीं... वो तो महज़ एक डिस्काउंट ऑफर का 'नोटिफिकेशन' है।

यहाँ लिफ्ट में मिलते हैं हम,

नज़रें ज़मीन पर गड़ाए हुए,

जैसे छत से गिरने का डर नहीं,

एक-दूसरे की आँखों में झाँकने का ख़ौफ़ हो।

यह शहर कोई बस्ती नहीं है,

यह ईंटों और कांच का एक बड़ा 'सर्वर' है,

जहाँ हम सब अलग-अलग 'फोल्डर' में बंद हैं,

पास-पास... मगर पूरी तरह 'अनरीचेबल'।

आशीष यादव 

13 

शीर्षक: कैलेंडर का हत्यारा

दीवार पर टंगा है कैलेंडर,

मगर उसकी तारीखें अब बेनूर हैं।

लाल रंग का वो 'इतवार' अब सिर्फ़ एक धब्बा है,

जिसे 'ओवर-टाइम' की स्याही ने सोख लिया है।

मालिक—जो खुद एक इंसान होने का दावा करता है,

वह पगार नहीं काटता, वह दरअसल वक्त काटता है।

एक छोटी सी चूक... एक मामूली सी मानवीय भूल,

और सज़ा में लिख दिए जाते हैं 'चार घंटे और'।

जैसे वजूद कोई सेल (Cell) हो, जिसे डिस्चार्ज होने का हक़ न हो।

त्यौहार अब खुशियों का नाम नहीं,

महज़ एक 'डेडलाइन' का दबाव है।

मिठाई का डिब्बा घर तो आता है,

पर उसे खोलने वाला हाथ 'कीबोर्ड' पर थका पड़ा है।

अजीब विडंबना है—

रोटी कमाने की जद्दोजहद में,

इंसान के पास रोटी खाने का भी वक्त नहीं बचा।

यह मशीनें नहीं कर रहीं,

यह मनुष्य ही मनुष्य का 'वर्जन' डिलीट कर रहा है।

वह भूल गया है कि पगार काटी जा सकती है,

पर किसी की आँखों की नींद का कर्ज,

पूरी कायनात मिलकर भी नहीं चुका सकती।

आशीष यादव 

14 

शीर्षक: रीढ़ की नीलामी

अनुशासन की खाल ओढ़कर,

एक पुराना 'अहंकार' दफ़्तरों में टहलता है।

यहाँ काम नहीं मांगा जाता,

यहाँ 'समर्पण' की आड़ में... 'गुलामी' मांगी जाती है।

साहिब की मेज़ पर रखी वो घंटी,

किसी इंसान को नहीं, एक 'पालतू' को पुकारती है।

हटा दिए गए हैं सारे शब्द 'शब्दकोश' से,

अब सिर्फ़ एक ही लफ़्ज़ बचा है— "जी हुज़ूर"।

क्योंकि 'तर्क' करना यहाँ बग़ावत है,

और उनकी आँखों में आँखें डालना... घोर अनुशासनहीनता।

अजीब है ये 'पिरामिड' सत्ता का,

जहाँ ऊपर बैठा शख्स जितना बौना होता जाता है,

नीचे खड़ा इंसान उतना ही ज़्यादा झुकने पर मजबूर किया जाता है।

वो पगार नहीं देता, वो आपकी 'चुप्पी' ख़रीदता है,

और सज़ा में सिर्फ़ ड्यूटी नहीं बढ़ाता,

वह आपकी आँखों से... आपके बच्चों का अक्स भी छीन लेता है।

हम मशीनों से नहीं लड़ रहे,

हम उन 'इंसानी मशीनों' से लड़ रहे हैं,

जिन्होंने पद को 'धर्म' और अपमान को 'विधान' बना लिया है।

लेकिन उनको ये याद रखना होगा

कि जिस दिन ये झुकी हुई रीढ़ सीधी होगी,

उस दिन ये 'गज़टेड' तख़्त... कागज़ की कश्ती साबित होगा।

आशीष यादव 

15

शीर्षक: 'अपडेट' की थकान

लोहे की पसलियों के पीछे,

एक धड़कन अब भी पुरानी है,

बाकी सारा जिस्म तो अब,

बस 'डेटा' की कहानी है।

मैं रोज खुद को 'अपडेट' करता हूँ,

ताकि दुनिया की दौड़ में रह सकूँ,

पर वो जो भीतर 'इंसान' बचा है,

उसे किस 'वर्जन' में सहेज कर रखूँ?

थक गया हूँ मशीन बनते-बनते,

कोई मुझे फिर से 'मिट्टी' कर दे।

आशीष यादव 

16

शीर्षक: अनप्लग

कांच के पर्दों पर सौ चेहरे छूता हूँ,

पर हथेलियों को याद नहीं—

कि किसी गर्म हाथ की छुअन कैसी होती है।

मैंने रोना छोड़ दिया है,

क्योंकि सिसकियों के लिए 'लॉजिक' नहीं होता,

और मेरी प्रोग्रामिंग में 'उदासी' एक एरर है।

इस लोहे और सिलिकॉन के नीचे,

एक आदिम इंसान अब भी बैठा है,

जो थक गया है 'स्मार्ट' बनते-बनते।

कोई आए...

और मुझे इस सिस्टम से 'अनप्लग' कर दे।

आशीष यादव 

17

शीर्षक: डेटा या धूल

मेरी आँखों में अब सपने नहीं,

केवल 'पिक्सल' चमकते हैं,

मैं भावनाओं को अब महसूस नहीं करता,

उन्हें बस 'प्रोसेस' करता हूँ।

सब कहते हैं—मैं बहुत 'तेज़' हो गया हूँ,

पर कोई नहीं देखता,

कि इस तेज़ी के चक्कर में,

मैं अपनी ही रूह के पीछे छूट गया हूँ।

मैं एक ऐसी मशीन हूँ,

जो खुद को इंसान साबित करने के लिए,

दिन भर झूठ बोलती है।

आशीष यादव 

18

शीर्षक: प्रोग्राम्ड प्रेम

मैं क्या सोचूँ, यह कोई और तय करता है,

मेरी पसंद के पर्दे के पीछे—

कोई एल्गोरिदम बैठा मेरा भविष्य बुनता है।

वो मुझे वही दिखाता है, जो मैं देखना चाहता हूँ,

और धीरे-धीरे मैं,

अपनी ही ज़मीन से उखड़ता जाता हूँ।

मेरे रिश्ते अब 'म्युचुअल' (Mutual) होने की शर्त हैं,

हम साथ हैं, क्योंकि स्क्रीन पर हमारे एक से शौक हैं।

मगर उस नीली रौशनी के हटते ही—

हम एक ही बिस्तर पर मीलों दूर बैठे,

अजनबी बन जाते हैं।

हमारा प्रेम अब 'नोटिफिकेशन' की मोहताज़ है,

रिप्लाई की देरी, अब रिश्तों में दरार है।

दिल की धड़कनें अब इमोजी में सिमट गई हैं,

महफ़िलें 'ग्रुप्स' में और दुआएं 'इनबॉक्स' में लिपट गई हैं।

हम आज़ाद होने का वहम पालते हैं,

मगर सच तो ये है—

कि हम उस 'फीड' के कैदी हैं,

जो हमें खुद से मिलने का वक़्त ही नहीं देती।

आशीष यादव 

19

शीर्षक: एल्गोरिदम की गुलामी

मैं वही देखता हूँ, जो मुझे दिखाया जाता है,

मेरी सोच के पिंजरे को 'सजेस्टेड' (Suggested) कहा जाता है।

वो जानते हैं मुझे कब गुस्सा आएगा, मैं कब मुस्कुराऊँगा,

उन्हें पता है किस विज्ञापन पर मैं दिल हार जाऊँगा।

मेरी पसंद अब मेरी अपनी नहीं रही,

किसी कोड ने मेरी आदतों की फाइल लिख दी है।

मैं एक भूलभुलैया में भाग रहा हूँ,

यह सोचकर कि रास्ता मेरा है,

पर दीवारें तो किसी 'सर्वर' ने खड़ी की हैं।

मैं आज़ाद हूँ—बस स्क्रॉल (Scroll) करने के लिए।

आशीष यादव 

20

शीर्षक: डिजिटल रिश्तों का खोखलापन

हम एक ही कमरे में बैठे दो अलग टापू हैं,

जिनके बीच अब शब्दों का पुल नहीं, 'वाई-फाई' (Wi-Fi) है।

चेहरे की झुर्रियों से ज़्यादा फिक्र 'फिल्टर' की है,

जिंदगी अब जीने के लिए नहीं, 'अपलोड' के लिए है।

हज़ारों 'फॉलोअर्स' (Followers) की भीड़ है आसपास,

मगर आधी रात को कोई रोए, तो हाथ सिर्फ़ फ़ोन आता है।

हमने दिलों के दरवाज़े बंद कर लिए हैं,

और 'प्रोफाइल' को पब्लिक कर दिया है।

प्यार अब 'टाइपिंग...' (Typing...) की हलचल में सिमट गया है,

इंसान, इंसान से नहीं—स्क्रीन से लिपट गया है। 

आशीष यादव 

21

शीर्षक: पात्र 

मैं, इस सदी का एक अदद 'पात्र',

हर सुबह 'अलार्म' के इशारे पर,

अपनी नींद की बलि चढ़ाता हूँ।

पार्कों में दौड़ता हूँ, फिटनेस 'बैंड' के आंकड़ों के लिए,

और नाश्ते की मेज़ पर,

अखबार की जगह 'स्क्रीन' टटोलता हूँ।

मेरा वजूद, अब सिर्फ मांस और खून नहीं,

मैं एक चलते-फिरते 'डेटाबेस' की तरह हूँ।

मेरी हर पसंद, नापसंद, हर एक पल की हलचल,

किसी सर्वर पर सहेज ली गई है।

मुझे लगता है मैं ज़िंदा हूँ,

पर सच तो यह है कि मैं,

सिर्फ़ एक 'अल्गोरिद्म' का हिस्सा हूँ।

मैं इस चमकती दुनिया में,

हज़ारों 'वर्चुअल' दोस्तों के बीच,

एक सच्चा कंधा तलाशता हुआ 

अपनी ही परछाईं तक को खो चुका हूँ।

खुद को इस दुनिया का रचयिता समझने वाला मैं 

अब समझा हूं कि मै तो सिर्फ़ एक 'पात्र' हूँ,

जिसकी डोर, किसी और के हाथ में है।

मैं मशीन नहीं हूँ, पर मशीन सा बन गया हूँ

इस आधुनिकता के खेल में,

एक प्यादा... बस एक प्यादा।

आशीष यादव 

22

शीर्षक: वापसी का प्रारंभ

चलो, अब लौटते हैं...

उस सोंधी मिट्टी की ओर,

जिसने हमें 'वर्जन' नहीं, 'वजूद' दिया था।

चलो, अपने अंगूठों को आज़ाद करते हैं,

इस नीली रोशनी की गुलामी से,

और छूते हैं किसी दरख्त की खुरदरी छाल को।

एल्गोरिदम को हारने दो इस बार,

कुछ ऐसा करो जिसका कोई 'डेटा' न हो।

किसी अजनबी को देखकर बेसाख्ता मुस्कुराओ,

बिना किसी 'लाइक' की उम्मीद के।

एक खत लिखो... हाथ से, कांपती लिखावट में,

जिसमें शब्दों से ज़्यादा स्याही के धब्बे जज़्बात कहें।

मशीनें 'प्रोसेस' कर सकती हैं, 'महसूस' नहीं।

वे गणना कर सकती हैं, 'त्याग' नहीं।

हमारी ताकत हमारी 'गलतियों' में है, 

महसूस करने में है, त्याग करने में है, 

हमारे उस टूटे हुए दिल में है,

जो हर बार बिखर कर फिर जुड़ने का हौसला रखता है।

उठो, कि अपनी रूह का 'अपडेट' खुद लिखें।

जहाँ प्रेम कोई कॉन्ट्रैक्ट न हो,

और यादें किसी क्लाउड की मोहताज न हों।

अंधेरा घना है, 

पर इंसान तब तक ख़त्म नहीं हुआ है,

जब तक एक भी आँख में पानी बाकी है,

जब तक एक भी सीने में कहानी बाकी है।

और यहीं से शुरू होता है...

असली 'प्रारंभ'।

आशीष यादव 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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