For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

September 2021 Blog Posts (55)

तो रो दिया .......

तो रो दिया .......

मौन की गहन कंदराओं में

मैनें मेरी मैं को

पश्चाताप की धूप में

विक्षिप्त तड़पते देखा

तो रो दिया ।

खामोशी के दरिया पर

मैंने मेरी मैं को

तन्हा समय की नाव पर

अपराध बोध से ग्रसित

तिमिर में लीन तीर की कामना में लिप्त

व्यथित देखा

तो रो दिया

क्रोध के अग्नि कुण्ड में

स्वार्थघृत की आहूति से परिणामों को

जब धू- धू कर जलते देखा

तो रो दिया

सच , क्रोध की सुनामी के बाद जब…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 30, 2021 at 10:41pm — 10 Comments

ग़ज़ल - सदफ़ के गौहर

वज़्न-2122 1122 1122 22/112

 

अज़्म से जो भी समेटेगा हदफ़* के गौहर                                             [ हदफ़ - लक्ष्य

ज़िंदगी में वही पाएगा शरफ़* के गौहर                                                [ शरफ़ - सम्मान 

 

इश्क़ है उनको भी हमसे ये हमें है मालूम

हमने देखे हैं उन आँखों में शग़फ़* के गौहर                                           [शग़फ़ - दिलचस्पी

  

हाथ में हाथ ले तुमने जो उठाए थे कभी

मेरे दिल में हैं अभी तक वो…

Continue

Added by Anjuman Mansury 'Arzoo' on September 30, 2021 at 5:00pm — 13 Comments

जुनून

रगो मे खून बनकर तेरे, यूँ “जुनून” बहता है

बिना मंज़िल के ना रुकना, ये सुकून कहता है

हुआ क्या राहों मे तेरे, जो बस पत्थर ही पत्थर है

चूमेंगे पाँव वो तेरे ये “जुनून” तुझसे कहता है

 

है मुश्किल सफर तेरा ये, गलियां तुझसे कहती है

चुनी ये राह जिसने भी, गुमान दुनिया करती है

तू देख कर चट्टानों को कभी हिम्मत नहीं खोना

पल भर की नाकामी पर तू भूल कर भी नहीं रोना

 

पहाड़ो मे सुराख कर दे, ये हिम्मत बस तुझी मे…

Continue

Added by AMAN SINHA on September 30, 2021 at 10:00am — 7 Comments

ग़ज़ल - कैसे कोई ख़ुश रहे जब दिल ही में आज़ार हो तो

2122 2122 2122 2122



इक भी आंसू क्यों गिरे जब आंख शोला-बार हो तो

कैसे कोई ख़ुश रहे जब दिल ही में आज़ार हो तो



आपसे है जंग तो मंज़ूर है ये सरफ़रोशी

क्या करें जब आपके ही हाथ में तलवार हो तो



लग रही है ज़िंदगी भी कुछ दिनों से अजनबी सी

लौट आना तुमको मुझसे थोड़ा सा भी प्यार हो तो



क्या किसी के सामने अब राज़े-ज़ख़्मे-पिन्हां खोलें

आपका ग़म-ख़्वार ही जब दुश्मनों का यार हो तो



तूने गरचे तोड़ डाले सारे नाते एक पल में

एक वहशी…

Continue

Added by Yamit Punetha 'Zaif' on September 29, 2021 at 7:30pm — 2 Comments

तरही ग़ज़ल - (अब तुमसे दिल की बात कहें क्या ज़बाँ से हम)

221 2121 1221 212



भागें कहाँ तलक ग़मे-आहो-फ़ुगाँ से हम

जाऐंगे तेरे इश्क़ में इक रोज़ जाँ से हम



बोला था सच, पलट नहीं पाए बयाँ से हम

अब तंग आ चुके हैं ख़ुद अपनी ज़बाँ से हम



लो देखते ही देखते सब सफ़्हे जल पड़े

क्या लिख गए सियाही-ए-सोज़े-निहाँ से हम!



इक फूल था कि मुरझा गया सर-ए-गुलसिताँ

इक उम्र थी कि गुज़रे थे दौरे-ख़िजाँ से हम



आओ सिखा दूं तुमको निगाहों की गुफ़्तगू

अब तुमसे दिल की बात कहें क्या ज़बाँ से… Continue

Added by Yamit Punetha 'Zaif' on September 28, 2021 at 6:46pm — 8 Comments

क्षणिकाएं (२०२१ -१ )- डॉo विजय शंकर

जो समझते हैं

वे जमे पड़े हैं ,

ये ख्याल है उनका ,

सच में तो वे

केवल पड़े हैं। .........1 .

छत पड़ी भी नहीं

और बुनियाद खिसक रही है ,

वो महल बनाने चले थे

कितनों की झोपड़ी भी उजड़ गई ,

लोग फिसल रहे हैं या उनके

पैरों के नीचे जमीन खिसक रही है। ......... 2 .

यूँ ही सफर में ही गुजर जाए , जिंदगी

अच्छा है ,

जिनकी तलाश हो

वो मंजिलों पे मिला नहीं करते ll ......... 3 .

मौलिक एवं…

Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on September 27, 2021 at 8:30pm — 14 Comments

भय

पहाड़ की ऊंची चोटी पर

अपने चारों तरफ

हरियाले वृक्षों से घिरा

मैं ठूँठ सा तन्हा खड़ा हूँ ।

कुछ वर्ष पूर्व

आसमानी बिजली ने

हर ली थी मेरी हरियाली

यह सोच कर कि

वो मेरे तन-बदन को

जर्जर कर मेरे अस्तित्व को

नेस्तनाबूद कर देगी ।

मगर

वक्त के साथ

अपने नंगे बदन पर

मैं मौसम के प्रहार सहते-सहते

एक मजबूत काठ में

परिवर्तित होता गया ।

आज मैं

आसमान से

अपनी विध्वंसक शक्ति का डंका…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 27, 2021 at 1:30pm — 8 Comments

क्षितिज

वो जहां पर असमा और धरा मिल जाते है

छोर मिलते ही नहीं पर साथ में खो जाते है

है यही वो स्थान जिसका अंत ही नहीं

मिल गया या खो गया है सोचते है सब यही



सबको है चाह इसकी पर राह का पता नहीं

बिम्ब या प्रतिबिम्ब है ये भ्रम सभी को है यही

कामना को पूर्ण करने श्रम छलांगे भरता है

मरीचिका के जाल में जैसे मृग कोई भटकता है



है धरा का अंत वही जिस बिंदु से शुरुआत है

यात्रा अनंत इसकी कई युगों की बात है

ओर ना है छोर इसका शुन्य सा आकाश है

जिसका जग को…

Continue

Added by AMAN SINHA on September 27, 2021 at 10:36am — 3 Comments

स्वयं को तनिक एक बच्चा बना-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२/१२२/१२२/१२



न दे साथ जग  तो अकेला बना

नया अपने दम पर जमाना बना।१।

*

थका हूँ जतन कर यहाँ मैं बहुत

कि घर मेरा तू ही शिवाला बना।२।

*

तुझे अपना कहते बितायी सदी

न  ऐसे तो पल  में  पराया बना।३।

*

यहाँ सच की बातें तो अपराध हैं

यही सोच खुद को न झूठा बना।४।

*

बड़ों के दिलों में भरा दोष अब

स्वयं को तनिक एक बच्चा बना।५।

*

बहुत दम है साथी कहन में मगर

नहीं अपने…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 27, 2021 at 6:45am — 9 Comments

जो इजाजत हो

122  2122  2122  2122  2

तेरी तस्वीर होठों से लगा लूँ, जो इजाजत हो। 

उसे आगोश में लूँ, चूम डालूँ, जो इजाजत हो।

बहुत नायाब दौलत है तुम्हारे हुस्न की दौलत 

तुम्हारा हुस्न तुमसे ही चुरा लूँ जो इजाजत हो ।

नशीले नैन लाली होंठ की यूँ मुझ पे छाई…

Continue

Added by आशीष यादव on September 24, 2021 at 3:30pm — 8 Comments

वक्त के सिरहाने पर ......

वक्त के सिरहाने पर .........

वक्त के सिरहाने पर बैठा

देखता रहा मैं देर तक

दर्द की दहलीज पर

मिलने और बिछुड़ने की

रक्स करती परछाइयों को

जाने कितने वादे

कसमों की चौखट पर

चरमरा रहे थे 

अरसा हुआ बिछड़े हुए

मगर उल्फ़त के

ज़ख्म आज भी हरे हैं

तुम्हारी बात

शायद ठीक ही थी कि

मोहब्बत अगर बढ़ नहीं पाती

माहताब की मानिंद घटते-घटते

एक ख़्वाब बनकर रह जाती है

और

वक्त…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 22, 2021 at 8:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल

1222 1222 1222



मिला था जो हमें पल खो दिया हमने

मुलायम नर्म मखमल खो दिया हमने ।

*

बचा रख्खे हैं यादों के नुकीले शर

मज़े से झूमता कल खो दिया हमने ।

*

उड़ा दी खुशबुएँ जो साथ रहती थीं

गँवा दी उम्र संदल खो दिया हमने ।

*

मुहब्बत नाम से हर दिन जिहालत की

सुकूँ था एक आँचल खो दिया हमने ।

*

सवालों पर सवालों की थीं बौछारें

जवाब आए तो संबल खो…
Continue

Added by Ashok Kumar Raktale on September 22, 2021 at 8:00pm — 10 Comments

कुछ बदला सा

कुछ बदला-बदला सा ये जहां नज़र आता है, 

राह अब भी है वही पर, अजनबी सा नज़र आता है

तन तो हमेशा ही अपना था मगर,

न जाने क्यों अब पराया सा नज़र आता है

 

ज़िंदगी को हमने कुछ यूं गुज़रते देखा

जैसे रेत को बंद मुट्ठी से फिसलते देखा

ज़ोर जितना भी लगाया रोकने मे उसे

छोटे से छेद से जिंदगी को निकलते देखा

एक आहट सी हुई किसी के आने की जैसे

साँसो मे घुल सी गयी किसी की खुशबू जैसे

इस खुशबू से मेरा वास्ता एक अरसे से रहा

रूह…

Continue

Added by AMAN SINHA on September 22, 2021 at 10:00am — 5 Comments

ग़ज़ल खुशी तेरे पैरों की चप्पल रही है

मेरी ज़िंदगी ग़म का जंगल रही है 

खुशी तेरे पैरों की चप्पल रही है 

कहीं कोई तो बात है साथ उसके 

कमी बेवफ़ा की बड़ी खल रही है

इसी ग़म का तो बोझ है मेरे जी पे

इसी ग़म से तो शायरी फल रही है…

Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on September 21, 2021 at 10:42pm — 4 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
पाँच दोहे : उच्छृंखल संकोच // -- सौरभ

चकाचौंध की चुप्पियाँ, मौन शोर का देश
अँधियारे के गाँव में, सूरज करे प्रवेश ।।
 
रोम-रोम में चाँदनी, घटता-बढ़ता ज्वार 
मधुर-मदिर खनकार का कितना चुप संसार !…
Continue

Added by Saurabh Pandey on September 21, 2021 at 5:03pm — 13 Comments

दिखने दो

दर्द है तो दिखने दो, आँख से आँसू बहने दो

किसने रोका है तुमको, जो रोना है तो रो लेने दो

कब तक तुम रोके रखोगे, उन भूली बिसरी यादों को

दिल के कोने मे दबी है जो, न रोको उस चिंगारी को

रोकोगे दिल भर जाएगा, घुट-घुट के दम घुट जाएगा

गुब्बारे सा है दिल अपना, भर गया जो फिर फट जाएगा

अरमानों की कोई गठरी हो, या तेज़ घोर दोपहरी हो

चिंता मे तुम जो ना घिरे, तुम अपने जाल के मकड़ी हो

बस कर खुदको दोष न दे, जो गुम है खुदको होश…

Continue

Added by AMAN SINHA on September 21, 2021 at 10:20am — 4 Comments

तुम्हारे इन्तज़ार में ........

तुम्हारे  इन्तज़ार में ........

देखो न !

कितने सितारे भर लिए हैं मैंने

इन आँखों के क्षितिजहीन आसमान में

तुम्हारे इन्तज़ार में ।

गिनती रहती हूँ इनको

बार- बार सौ बार

तुम्हारे इन्तज़ार में ।

तुम क्या जानो

घड़ी की नुकीली सुइयाँ

कितना दर्द देती हैं ।

सुइयों की बेपरवाह चाल

हर  उम्मीद को

बेरहमी से कुचल देती है।

अन्तस का ज्वार

तोड़ देता है

घुटन की हर प्राचीर को

और बहते- बहते ठहर जाता है

खारी…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 20, 2021 at 11:46am — 4 Comments

बेबसी.........

बेबसी ........

निशा के श्यामल कपोलों पर

साँसों ने अपना आधिपत्य जमा लिया ।

झींगुरों की लोरियों ने

अवसाद की अनुभूतियों को सुला दिया ।

स्मृतियाँ किसी खिलौने की भाँति

बेबसी के पलों को बहलाने का

प्रयास करने लगीं ।

आँखों की मुंडेरों पर 

बेबसी की व्यथा तरल हो चली ।

आँखों के बन्द करने से कब दिन ढला है ।

मुकद्दर का लिखा कब टला है ।

मृतक कब पुनर्जीवित हुआ है  ।

प्रतीक्षा की बेबसी के सभी उपचार

किसी रेत के महल से ढह गए…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 17, 2021 at 5:55pm — 4 Comments

समयानुकूल

बयालीस हैं जा चुके,बीत रहा है काल।

सुखदुख चलते साथ में,जीवन इक जंजाल।।

यारों की ये कामना,रहे सदा ही साथ।

यार सलामत हों सदा, हे नाथों के नाथ।।

उन्यासी उन्नीस सौ,माह सितंबर जान।

सोलहवीं तारीख थी, जब जन्मे 'कल्याण'।।

गुरु आभे ने लिख दई,यही जन्म तारीख।

गुरु न देते ज्ञान तो, फिरूं मांगता भीख।।

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 17, 2021 at 12:01pm — 1 Comment

मुझे ना मार पाएगी (अतुकान्त)

खाली हो गई हूँ

इच्छाओं से, आशाओं से

व्यर्थ विचारों से

निरर्थक प्रवाहों से

अस्थिर लगावों से

अनर्गल खिंचावों से

आधुनिक चकाचौंध से

कौन जाने, मौत

कब दरवाजा खटखटा दे

साथ ले जाने को

किन्तु वह क्या साथ

ले जा पाएगी ?

वह तो पंच तत्वों में

तन को मिलाएगी

मुझे ना मार पाएगी

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on September 16, 2021 at 10:59pm — 6 Comments

Monthly Archives

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post गज़ल - ज़ुल्फ की जंजीर से ......
"आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रशंसा का एवं मार्गदर्शन का दिल से आभार…"
1 hour ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Sushil Sarna's blog post गज़ल - ज़ुल्फ की जंजीर से ......
"आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, ग़ज़ल विधा में भी अपनी काव्यात्मक योग्यता साबित करने के लिए हार्दिक बधाई…"
2 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक 133 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय दिनेश  भाई इस लम्बी और सार्थक छंद के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें|  इस जगत का सार…"
2 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक 133 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय दिनेश  भाई हार्दिक धन्यवाद आभार आपका"
3 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक 133 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय दयाराम  भाई हार्दिक धन्यवाद आभार आपका"
3 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक 133 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय लक्षमण भाई हार्दिक धन्यवाद आभार आपका"
3 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक 133 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय लक्षमण भाई सुन्दर छंद  के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें|  १ अंतिम छंद के दूसरे चरण…"
3 hours ago
Aazi Tamaam posted a blog post

ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये

12112 12112सुरूर है या शबाब है येके जो भी है ला जवाब है येफ़क़ीर की है या पीर की हैके चश्म जो…See More
4 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक 133 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन। छंदों पर उपस्थिति व प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
5 hours ago
DINESH KUMAR VISHWAKARMA replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक 133 in the group चित्र से काव्य तक
"सादर अभिवादन धामी जी। छंद पर प्रोत्साहित करने हेतु बहुत बहुत आभार आपका।"
6 hours ago
DINESH KUMAR VISHWAKARMA replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक 133 in the group चित्र से काव्य तक
"सादर नमन आपको आदरणीय । बहुत बहुत आभार आपका ।"
6 hours ago
DINESH KUMAR VISHWAKARMA replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक 133 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय धामी sir। सादर अभिवादन स्वीकार करें। चित्र अनुरूप छंद पर बहुत अच्छी रचना है, आदरणीय।आपको…"
6 hours ago

© 2022   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service