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Usha Awasthi
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Monday
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साल पचहत्तर बाद

कैसे अपने देश की नाव लगेगी पार?पढ़ा रहे हैं जब सबक़ राजनीति के घाघजिनके हाथ भविष्य की नाव और पतवारवे युवजन हैं सीखते गाली के अम्बारअपने को कविवर समझवाणी में विष घोलमानें बुध वह स्वयं को उनके बिगड़े बोलवेद , पुराण, उपनिषदसत्य सनातन भाष्यसमझ सके न आज भीसाल पचहत्तर बादमौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Monday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Usha Awasthi's blog post ख़्याली पुलाव
"उत्तम शिक्षाप्रद रचना के लिए बधाई आदरणीया..."
Jan 17
Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-135
"भूली बिसरी यादें भूली बिसरी यादें आजब तब मानस पर छा जातीं कड़वे खट्टे मीठे अनुभव का, अहसास करा जातीं क्या खोया, क्या पाया हमनेक्या बदला, क्या वही रहाइतने दिन के लेखा जोखा का यह पाठ पढ़ा जातीं कभी पड़े अन्तर के घावों के, निशान दिखला जातींमिटा सभी…"
Jan 15
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post ख़्याली पुलाव
"आ0 शरद सिंह "विनोद" जी,आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया पाकर अत्यन्त खुशी हुई। काश, इस खूबसूरत सपने का चौथाई अंश भी सही हो जाए तो मैं स्वयं को धन्य समझूँगी बहुत-बहुत आभार आपका "
Jan 7
SHARAD SINGH "VINOD" commented on Usha Awasthi's blog post ख़्याली पुलाव
"यही लक्ष्य है मानवता का इसीओर सब बढ़े चलें, सभी प्रयासरत हो करके, ख्याली सीढ़ी चढ़े चलें। आदरणीया आपकी यही ख्याली पुलाव ही मानव संस्कृत का चरम लक्ष्य होना चाहिए……सादर।"
Jan 6
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Jan 2
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ख़्याली पुलाव

एक साथ यदि सारी दुनियाक्वारन्टाइन हो जाएसदा सर्वदा दूर संक्रमणजग से निश्चित ही जाएप्रलयंकारी अस्त्र-शस्त्र ग़र सभी साथ में नष्ट करेंसारे देश सम्मुनत, हर्षितसर्व सुखों का भोग करेंवन उपवन से प्रकृति सुसज्जितमानव का कल्याण करेनित नवीन होता परिवर्तनसुखद, सात्विक मोद भरेसकल विश्व का मंगल तय तबचँहु दिशि व्यापे खुशहालीसुन्दर पर कल्पित, सपना हैयह पुलाव तो है ख़्यालीमौलिक एवं अप्रकाशित See More
Jan 2
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post परम चेतना एक (कुछ विचार)
"आ. ऊषा जी, सादर अभिवादन। अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Nov 23, 2021
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post परम चेतना एक (कुछ विचार)
"आ0 समर कबीर साहेब, आदाब, रचना अच्छी लगी, जान कर हर्ष हुआ। हार्दिक आभार आपका"
Nov 5, 2021
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post परम चेतना एक (कुछ विचार)
"मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 5, 2021
Usha Awasthi posted a blog post

परम चेतना एक (कुछ विचार)

सब धर्मों का सार जोवह तो केवल एकबाह्य रूप दिखता अलगपरम चेतना एकफैलाते भ्रम व्यर्थ हीजो विवेक से शून्यवे मतिभ्रष्ट, विवेकहीनउन्हे चढ़ा अहमन्यहुए विषमता से परे जिन्हे सत्य का बोधगुण-अवगुण से हो विलगनित्य बसे मन मोदप्रकृति और चैतन्य काआपस का संयोगउस दर्पण में फलीभूत हो ज्ञानी का योगमौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Nov 3, 2021
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post सत्य (अतुकान्त)
"आ0 तेज वीर सिंह जी, हार्दिक आभार आपका"
Nov 1, 2021
TEJ VEER SINGH commented on Usha Awasthi's blog post सत्य (अतुकान्त)
"हार्दिक बधाई आदरणीय । बेहतरीन प्रस्तुति।"
Oct 31, 2021
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post सत्य (अतुकान्त)
"आदाब , आ0 शेख शहज़ाद उस्मानी साहेब, आपको विचार बेबाक लगे , मेरा लेखन सार्थक हुआ। हार्दिक धन्यवाद"
Oct 30, 2021

Profile Information

Gender
Female
City State
Lucknow
Native Place
Uttar Pradesh
Profession
Author

ब्राहम्ण

उषा अवस्थी

मान दिया होता यदि तुमने
ब्राम्हण को , सुविचारों को
सदगुण की तलवार काटती
निर्लज्जी व्यभिचारों को

उसको काया मत समझो ,
ज्ञान विज्ञान समन्वय है
द्वैत भाव से मुक्त, जितेन्द्रिय
सत्यप्रतिज्ञ , समुच्चय है

कर्म , वचन , मन से पावन
वह ब्रम्हपथी , समदर्शी है
नहीं जन्म से , सतत कर्म से
तेजस्वी , ब्रम्हर्षि है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Usha Awasthi's Blog

साल पचहत्तर बाद

कैसे अपने देश की
नाव लगेगी पार?
पढ़ा रहे हैं जब सबक़
राजनीति के घाघ

जिनके हाथ भविष्य की
नाव और पतवार
वे युवजन हैं सीखते
गाली के अम्बार

अपने को कविवर समझ
वाणी में विष घोल
मानें बुध वह स्वयं को
उनके बिगड़े बोल

वेद , पुराण, उपनिषद
सत्य सनातन भाष्य
समझ सके न आज भी

साल पचहत्तर बाद

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on January 24, 2022 at 10:18am

ख़्याली पुलाव

एक साथ यदि सारी दुनिया

क्वारन्टाइन हो जाए

सदा सर्वदा दूर संक्रमण

जग से निश्चित ही जाए

प्रलयंकारी अस्त्र-शस्त्र 

ग़र सभी साथ में नष्ट करें

सारे देश सम्मुनत, हर्षित

सर्व सुखों का भोग करें

वन उपवन से प्रकृति सुसज्जित

मानव का कल्याण करे

नित नवीन होता परिवर्तन

सुखद, सात्विक मोद भरे

सकल विश्व का मंगल तय तब

चँहु दिशि व्यापे खुशहाली

सुन्दर पर कल्पित, सपना है

यह पुलाव तो है…

Continue

Posted on January 2, 2022 at 11:31am — 3 Comments

परम चेतना एक (कुछ विचार)

सब धर्मों का सार जो

वह तो केवल एक

बाह्य रूप दिखता अलग

परम चेतना एक

फैलाते भ्रम व्यर्थ ही

जो विवेक से शून्य

वे मतिभ्रष्ट, विवेकहीन

उन्हे चढ़ा अहमन्य

हुए विषमता से परे 

जिन्हे सत्य का बोध

गुण-अवगुण से हो विलग

नित्य बसे मन मोद

प्रकृति और चैतन्य का

आपस का संयोग

उस दर्पण में फलीभूत 

हो ज्ञानी का योग

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on November 3, 2021 at 6:44am — 3 Comments

सत्य (अतुकान्त)

ऊँचे तो वही उठ पाएंगे

जो सत्य की गहराई

झूठ का उथलापन

जान जाएंगे

जो सत्य को कमजोर समझते

विनम्रता का तिरस्कार करते

वैराग्य का उपहास उड़ाते हैं

वह बुद्धि बल से पंगु

अपनी दुर्बलता छिपाते हैं

जो सत्य को तोड़ते, मरोड़ते हैं

वे साहित्यकार नहीं

चाटुकार होते हैं

दिन कहाँ समान रहते हैं?

सत्य है, आज इसकी

कल उसकी झोली भरते हैं

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on October 27, 2021 at 10:36pm — 10 Comments

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At 6:29am on August 5, 2018, Kishorekant said…

सुन्दर रचना केलिये हार्दिक अभिनंदन सुश्री उषा अवस्थिजी ।

At 9:01pm on September 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए....

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है.

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