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Anjuman Mansury 'Arzoo'
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ग़ज़ल - मैं अँधेरी रात हूंँ और शम्स के अनवर-से आप

2122 2122 2122 212मैं अँधेरी रात हूंँ और शम्स के अनवर-से आप शाम-सी मुझ में उदासी, सुब्ह के मंज़र-से आपजाने कैसे मिलना होगा अपना इक मे'यार पर मैं ज़मीं की ख़ाक-सी हूंँ चर्ख़ के मिंबर-से आपजो भी आया चल दिया वो मुझ से हो कर आप तक मैं अधूरी रहगुज़र हूँ और मुकम्मल घर-से आपक्यों पसंद आये किसी को भी कभी होना मेरा मैं कि अनचाही सी बेड़ी क़ीमती ज़ेवर-से आपआपके बिन इस जहांँ में कुछ नहीं मेरा वजूद मैं हूंँ मानिंद-ए-मुजस्सम और मेरे आज़र-से आपतिश्नगी सबकी मिटा कर भी रही मैं तिश्ना लब मैं कि इक प्यासी नदी…See More
4 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Anjuman Mansury 'Arzoo''s blog post ग़ज़ल - अभी बस पर ही टूटे हैं अभी अंबर नहीं टूटा
"आ. अंजुमन जी, अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा है हार्दिक बधाई।"
13 hours ago
Anjuman Mansury 'Arzoo' posted a blog post

ग़ज़ल - अभी बस पर ही टूटे हैं अभी अंबर नहीं टूटा

1222 1222 1222 1222अभी बस पर ही टूटे हैं अभी अंबर नहीं टूटा परिंदा टूटा है बाहर अभी अंदर नहीं टूटा /1सितारा यूंँ तो टूटा है मेरी तक़दीर का लेकिन ख़ुदा का शुक्र है तदबीर का अख़्तर* नहीं टूटा /हमारे ख़ैर ख़्वाहों ने बहुत चाहा मगर अब तक हमारे दिल में है उम्मीद का जो घर नहीं टूटा /3सियासत के सताने पर भी बोला जो हमेशा सच वो जाने कैसी मिट्टी का है ज़र्रा भर नहीं टूटा /4कई मख़्लूक़* की है ज़िंदगी गौहर का घर फिर भी फ़क़त खारा कहा सबने मगर सागर नहीं टूटा /5हर इक टूटी हुई शय से नयी इक चीज़ बनती है न उसका…See More
Tuesday
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Friday
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ग़ज़ल - हैं ख़ाक फिर भी उठाकर जो सर खड़े हैं पहाड़

1212 1122 1212 22/112हैं ख़ाक फिर भी उठाकर जो सर खड़े हैं पहाड़ तो हौसला रखो क्या हमसे भी बड़े हैं पहाड़ /1है इनके दिल में नदी-सी बड़ी नमी लेकिन मुग़ालता* है कि वालिद-से ही कड़े हैं पहाड़़/2 पहाड़ कह के कोई तंज़ गर करे इन पर तो आबशार बने अश्क से झड़े हैं पहाड़ /3पहाड़ जैसी मुसीबत उठा के हम यूंँ चले कि हम को देखते ही शर्म से गड़े हैं पहाड़ /4हम अपने पैर गँवा कर भी चढ़ गए इन पर हमारे जैसे तलातुम* से कब लड़े हैं पहाड़़/5 पहाड़ काट के राहें भी हम बनाते हैं हमारा अज़्म जो देखा तो गिर पड़े हैं पहाड़…See More
Dec 2
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Dec 2
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Anjuman Mansury 'Arzoo''s blog post ग़ज़ल - सियाह शब की रिदा पार कर गया सूरज
"आ. अंजुमन जी, अभिवादन। अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
Nov 28
Anjuman Mansury 'Arzoo' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-149
"मोहतरम  Ashok Kumar Raktale साहब आदाब, ग़ज़ल पसंद करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया"
Nov 26
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"मोहतरम नादिर ख़ान साहब आदाब, ग़ज़ल पसंद करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया"
Nov 26
Anjuman Mansury 'Arzoo' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-149
"मोहतरम अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी साहब आदाब, ग़ज़ल पसंद करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया । गिरह का मतला मेरी ग़ज़ल का हिस्सा नहीं है, बहरहाल आइंदा ध्यान रखूंगी बहुत शुक्रिया ।"
Nov 26
Anjuman Mansury 'Arzoo' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-149
"मोहतरम dandpani nahak साहब आदाब, ग़ज़ल पसंद करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया ।"
Nov 26
Anjuman Mansury 'Arzoo' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-149
"मोहतरम zaif साहब आदाब, ग़ज़ल पसंद करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया ।"
Nov 26
Anjuman Mansury 'Arzoo' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-149
"ऋचा यादव जी आदाब, ग़ज़ल पसंद करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया । क्योंकि गिरह मेरी ग़ज़ल का मतला नहीं है इसलिए मैंने इसे बाद में जोड़ा था, बहरहाल आगे ध्यान रखूंगी । सादर "
Nov 26
Anjuman Mansury 'Arzoo' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-149
"उस्ताद मोहतरम समर कबीर साहब आदाब, अम्न ओ चैन इतने बार देखा है कि इस बात का ध्यान नहीं रहा, सुधारने की कोशिश करूंगी, गिरह लगाते वक़्त आइंदा ध्यान रखूंगी ।"
Nov 26
Anjuman Mansury 'Arzoo' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-149
"जनाब ओम रायज़ादा जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही आपने, बधाई स्वीकारें"
Nov 26
Anjuman Mansury 'Arzoo' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-149
"221 2121 1221 212 हर सम्त हो ख़ुशी न किसी को मलाल हो या रब तेरे जहान में ऐसा कमाल हो /1 तरसे न रोज़गार की ख़ातिर कोई यहाँ दो वक़्त सब के वास्ते रोटी हो दाल हो /2 कायम हो अम्न-ओ-चैन फिर आसाँ हो ज़िंदगी मज़हब के नाम पर न कोई भी वबाल हो /3 हो…"
Nov 26

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ग़ज़ल - मैं अँधेरी रात हूंँ और शम्स के अनवर-से आप

2122 2122 2122 212

मैं अँधेरी रात हूंँ और शम्स के अनवर-से आप

शाम-सी मुझ में उदासी, सुब्ह के मंज़र-से आप

जाने कैसे मिलना होगा अपना इक मे'यार पर

मैं ज़मीं की ख़ाक-सी हूंँ चर्ख़ के मिंबर-से आप

जो भी आया चल दिया वो मुझ से हो कर आप तक

मैं अधूरी रहगुज़र हूँ और मुकम्मल घर-से आप

क्यों पसंद आये किसी को भी कभी होना मेरा

मैं कि अनचाही सी बेड़ी क़ीमती ज़ेवर-से आप

आपके बिन इस जहांँ में कुछ नहीं…

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Posted on December 8, 2022 at 6:16pm

ग़ज़ल - अभी बस पर ही टूटे हैं अभी अंबर नहीं टूटा

1222 1222 1222 1222

अभी बस पर ही टूटे हैं अभी अंबर नहीं टूटा

परिंदा टूटा है बाहर अभी अंदर नहीं टूटा /1

सितारा यूंँ तो टूटा है मेरी तक़दीर का लेकिन

ख़ुदा का शुक्र है तदबीर का अख़्तर* नहीं टूटा /

हमारे ख़ैर ख़्वाहों ने बहुत चाहा मगर अब तक

हमारे दिल में है उम्मीद का जो घर नहीं टूटा /3

सियासत के सताने पर भी बोला जो हमेशा सच

वो जाने कैसी मिट्टी का है ज़र्रा भर नहीं टूटा /4

कई मख़्लूक़* की है ज़िंदगी…

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Posted on December 6, 2022 at 10:13pm — 1 Comment

ग़ज़ल - हैं ख़ाक फिर भी उठाकर जो सर खड़े हैं पहाड़

1212 1122 1212 22/112

हैं ख़ाक फिर भी उठाकर जो सर खड़े हैं पहाड़

तो हौसला रखो क्या हमसे भी बड़े हैं पहाड़ /1

है इनके दिल में नदी-सी बड़ी नमी लेकिन

मुग़ालता* है कि वालिद-से ही कड़े हैं पहाड़़/2 

पहाड़ कह के कोई तंज़ गर करे इन पर

तो आबशार बने अश्क से झड़े हैं पहाड़ /3

पहाड़ जैसी मुसीबत उठा के हम यूंँ चले

कि हम को देखते ही शर्म से गड़े हैं पहाड़ /4

हम अपने पैर गँवा कर भी चढ़ गए इन पर

हमारे जैसे…

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Posted on December 2, 2022 at 8:13pm

ग़ज़ल - सियाह शब की रिदा पार कर गया सूरज

सियाह शब की रिदा पार कर गया सूरज

जो सुब्ह आई तो उम्मीद भर गया सूरज

बड़ा ग़ुरूर तमाज़त पे था इसे लेकिन

तपिश हयात की देखी तो डर गया सूरज

हमारे साथ भी रौनक हमेशा चलती है

कि जैसे नूर उधर है जिधर गया सूरज

ग्रहण लगा के जहाँ ने मिटाना चाहा मगर 

मेरे वजूद का फिर भी संँवर गया सूरज

ज़मीं से दूर बहुत दूर जब ये रहता है 

तो कैसे दरिया के दिल में उतर गया सूरज

यतीम बच्चों ने वालिद की मौत पर सोचा

किसी…

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Posted on November 17, 2022 at 11:45pm — 4 Comments

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At 11:56am on September 30, 2021, Sheikh Shahzad Usmani said…

आदाब।.बहुत-मुबारकबाद और हार्दिक स्वागत आदरणीया अंजुमन 'आरज़ू' साहिबा। अब आपकी रचनायें अधिक सुविधा से पढ़ सकेंगे। गोष्ठियों में आपका इंतज़ार और स्वागत।

At 10:53pm on September 29, 2021, Anjuman Mansury 'Arzoo' said…
जी बहुत-बहुत शुक्रिया मोहतरम, आदाब
At 10:53pm on September 29, 2021, अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी said…

मुहतरमा अंजुमन साहिबा ओ बी ओ के मंच पर आप का स्वागत है। सादर। 

 
 
 

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