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तरही ग़ज़ल - (अब तुमसे दिल की बात कहें क्या ज़बाँ से हम)

221 2121 1221 212

भागें कहाँ तलक ग़मे-आहो-फ़ुगाँ से हम
जाऐंगे तेरे इश्क़ में इक रोज़ जाँ से हम

बोला था सच, पलट नहीं पाए बयाँ से हम
अब तंग आ चुके हैं ख़ुद अपनी ज़बाँ से हम

लो देखते ही देखते सब सफ़्हे जल पड़े
क्या लिख गए सियाही-ए-सोज़े-निहाँ से हम!

इक फूल था कि मुरझा गया सर-ए-गुलसिताँ
इक उम्र थी कि गुज़रे थे दौरे-ख़िजाँ से हम

आओ सिखा दूं तुमको निगाहों की गुफ़्तगू
अब तुमसे दिल की बात कहें क्या ज़बाँ से हम

आना नहीं था उसको नहीं आया 'ज़ैफ़' वो
सर पीटते ही रह गए उस आस्ताँ से हम

© मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 10, 2021 at 9:30am

भावनात्मक दृष्टि से ये ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी यमित जी...बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 5, 2021 at 5:22pm

एक सद्प्रयास के लिए बधाइयाँ ! 

आदरणीय अमरुद्दीन जी ने कई बिन्दुओं पर चर्चा की है. 

शुभ-शुभ

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 4, 2021 at 4:15am

आ. भाई यमित जी, अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा है। गुणीजनों की बात का संज्ञान लेकर यह और बेहतर हो सकती है । फिलहाल इस पर बधाई स्वीकारें। 

Comment by Samar kabeer on September 30, 2021 at 3:30pm

जनाब यमित पुनेठा 'ज़ैफ़' जी आदाब, ओबीओ के तरही मिसरे पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है, बधाई स्वीकार करें I 

बाक़ी जनाब अमीरुद्दीन साहिब सब बता ही चुके हैं I 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 30, 2021 at 12:05am

'सर पीटते ही रह गए उस आस्ताँ से हम'   इस मिसरे का वाक्य विन्यास सही नहीं है 'आस्ताँ से हम' 'आस्ताँ पे हम' हो रहा है इसलिए रदीफ़ से इन्साफ़ नहीं हो रहा है। देखियेगा, सादर। 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 29, 2021 at 11:54pm

जनाब यमित पुनेठा 'ज़ैफ़' जी आदाब, तरही मिसरे पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें।

भागें कहाँ तलक ग़मे-आहो-फ़ुगाँ से हम

जाऐंगे तेरे इश्क़ में इक रोज़ जाँ से हम      मतले के मिसरों में रब्त का अभाव है, ऊला मिसरे का शब्द विन्यास 'ग़मे-आहो-फ़ुगाँ' भी ठीक नहीं है। 

लो देखते ही देखते सब सफ़्हे जल पड़े

क्या लिख गए सियाही-ए-सोज़े-निहाँ से हम!   इस शे'र के सानी मिसरे में शब्द विन्यास' सियाही-ए-सोज़े-निहाँ' और यहाँ 'सियाही' को 121 पर लेना भी ठीक नहीं लगता है। 

इक फूल था कि मुरझा गया सर-ए-गुलसिताँ

इक उम्र थी कि गुज़रे थे दौरे-ख़िजाँ से हम    इस शे'र के मिसरों में रब्त नहीं है, शुतरगुरबा दोष भी है और ऊला मिसरा बह्र में नहीं है 'सर-ए-गुलसिताँ' में 'सर-ए' को 21 पर नहीं ले सकते हैं। 

आना नहीं था उसको नहीं आया 'ज़ैफ़' वो.   इस शे'र में शुतरगुरबा दोष है। 

सर पीटते ही रह गए उस आस्ताँ से हम

Comment by Yamit Punetha 'Zaif' on September 29, 2021 at 7:21pm
शुक्रिया अमन जी। आभार।
Comment by AMAN SINHA on September 29, 2021 at 10:27am

आज कुछ नए लफ्ज़ सिखा मैने। आपका शुक्रिया 

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