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तुम्हारे इन्तज़ार में ........

तुम्हारे  इन्तज़ार में ........

देखो न !
कितने सितारे भर लिए हैं मैंने
इन आँखों के क्षितिजहीन आसमान में
तुम्हारे इन्तज़ार में ।

गिनती रहती हूँ इनको
बार- बार सौ बार
तुम्हारे इन्तज़ार में ।

तुम क्या जानो
घड़ी की नुकीली सुइयाँ
कितना दर्द देती हैं ।
सुइयों की बेपरवाह चाल
हर  उम्मीद को
बेरहमी से कुचल देती है।
अन्तस का ज्वार
तोड़ देता है
घुटन की हर प्राचीर को
और बहते- बहते ठहर जाता है
खारी बूँद की शक्ल में
ठोड़ी पर
तुम्हारे इन्तज़ार में।

देखो!
विलम्ब न करो।
छोड़ न दें साँसें
कहीं काया कुटीर को
तुम्हारे इन्तज़ार में।

सुशील सरना / 20-9-21
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on October 3, 2021 at 4:29pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब, सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by Sushil Sarna on October 3, 2021 at 4:29pm
आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - सृजन के भावों को आत्मीय मान से सम्मानित करने का दिल से आभार आदरणीय
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 23, 2021 at 7:44pm

छोड़ न दें साँसें
कहीं काया कुटीर को
तुम्हारे इन्तज़ार में।  वाह! क्या शब्दावली है, लाजवाब।

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, एक और शानदार कृति के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें। सादर। 

Comment by Samar kabeer on September 22, 2021 at 3:25pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

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