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Rahul Dangi Panchal
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Rahul Dangi Panchal posted a blog post

उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर- ग़ज़ल

122 122 122 122पड़े जब कभी बेज़बानों के पत्थर चटकने लगे फिर चटानों के पत्थर मुहब्बत तेरी दास्तानों के पत्थर उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर बड़ी आग फेंकी बड़ा ज़हर थूका उगलता रहा वो गुमानों के पत्थर उठाये फिरा हूँ मैं कांधों पे जिनको हैं सर पे सवार अब वे शानों के पत्थरयहाँ दोस्ती, प्यार, नातों से बढ़करकई क़ीमती हैं ये खानों के पत्थर है जिंदा अभी तक मुहब्बत का जज़्बासितमगर उठा फिर दहानों के पत्थर मुझे याद है तेरी आँखों का जादू मुझे याद हैं तेरे कानों के पत्थर चिपकते रहें आदमी के लहू से चमकते…See More
Jul 15
Rahul Dangi Panchal commented on Rahul Dangi Panchal's blog post उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर- ग़ज़ल
"बहुत शुक्रिया आदरणीय मुसाफ़िर जी,  जी बिल्कुल आदरणीय समर सर जी से ही ग़ज़ल की बारीकियां सीखी हैं,  obo ने ही तुकबन्दी से ग़ज़ल कहना सिखाया है,  समर सर का तो शिष्य है हम,  उनकी टिप्पणी के बाद चिंता मुक्त हो जाता हूँ ग़ज़ल की…"
Jul 14
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Rahul Dangi Panchal's blog post उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर- ग़ज़ल
"आ. भाई राहुल जी अच्छा प्रयास हुआ है । हार्ईदिक बधाई। समर जी की सलाह का अनुशरण करें । अंतिम शेर को बदल कर यूँ कर सकते हैं  न जाने धरा का यहाँ हाल क्या हो  गिरे जो कभी आसमानों के पत्थर "
Jul 14
Samar kabeer commented on Rahul Dangi Panchal's blog post उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर- ग़ज़ल
"//वैसे एहसानों काफिया मैंने rekhta की काफिया संग्रह से लिया था जहां पर इसका 2122 दर्शाया गया,  मैं भी 222 ही का ही उपयोग किया है पहले// रेख़्ता पर अधिकतर जानकारियाँ ग़लत दी हुई हैं,उन पर भरोसा न किया करें । आख़री शैर हटाना ही उचित होगा ।"
Jul 12
Rahul Dangi Panchal commented on Rahul Dangi Panchal's blog post उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर- ग़ज़ल
"आखिरी शेर में आसमानों के पत्थर,  को ग्रहों के लिए प्रयोग करने की कोशिश की है,  ग्रहों का लगातर एक घर से दूसरे घर मे जाने के संदर्भ में,  शायद अर्थ स्पष्ट नहीं पाया मुझसे "
Jul 10
Rahul Dangi Panchal commented on Rahul Dangi Panchal's blog post उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर- ग़ज़ल
"वैसे एहसानों काफिया मैंने rekhta की काफिया संग्रह से लिया था जहां पर इसका 2122 दर्शाया गया,  मैं भी 222 ही का ही उपयोग किया है पहले,  मार्ग दर्शन करे "
Jul 10
Rahul Dangi Panchal commented on Rahul Dangi Panchal's blog post उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर- ग़ज़ल
"आदरणीय कबीर जी "
Jul 10
Rahul Dangi Panchal commented on Rahul Dangi Panchal's blog post उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर- ग़ज़ल
"आदरणीय कबीर आपसे हम सब बहुत कुछ सीखते है,  इसलिए आपकी टिप्पणी का इन्तजार रहता है,  जो त्रुटियां हम नहीं देख पाते हम आपसे सीखते है,   बहुत बहुत आभार,  आप हमे सिखाने में बहुत मेहनत करते हो "
Jul 10
Samar kabeer commented on Rahul Dangi Panchal's blog post उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर- ग़ज़ल
"जनाब राहुल डांगी जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें । 'मुझे फिर लगे आज तानों के पत्थर' इस मिसरे में क़ाफ़िया दुरुस्त नहीं है क्योंकि सहीह शब्द है 'तअ'न:' और इसका बहुवचन होगा "तअ'नों" और आपने…"
Jul 10
Rahul Dangi Panchal commented on Rahul Dangi Panchal's blog post उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर- ग़ज़ल
"मेरी गुज़ारिश है जनाब कबीर साहब इस ग़ज़ल पर मेरा मार्गदर्शन करे "
Jul 9
Rahul Dangi Panchal commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास
"सुन्दर "
Jul 9
Rahul Dangi Panchal commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post भूख का व्यापार मत करवाइए- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"शेर पाला बहुत सुन्दर "
Jul 9
Rahul Dangi Panchal posted a blog post

उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर- ग़ज़ल

122 122 122 122पड़े जब कभी बेज़बानों के पत्थर चटकने लगे फिर चटानों के पत्थर मुहब्बत तेरी दास्तानों के पत्थर उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर बड़ी आग फेंकी बड़ा ज़हर थूका उगलता रहा वो गुमानों के पत्थर उठाये फिरा हूँ मैं कांधों पे जिनको हैं सर पे सवार अब वे शानों के पत्थरयहाँ दोस्ती, प्यार, नातों से बढ़करकई क़ीमती हैं ये खानों के पत्थर है जिंदा अभी तक मुहब्बत का जज़्बासितमगर उठा फिर दहानों के पत्थर मुझे याद है तेरी आँखों का जादू मुझे याद हैं तेरे कानों के पत्थर चिपकते रहें आदमी के लहू से चमकते…See More
Jul 9
Rahul Dangi Panchal commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post बूढ़ा ट्रैक्टर (नवगीत)
"वाह वाह बहुत सुन्दर,  मजा आ गया,  जनाब"
Jun 26

सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari and Rahul Dangi Panchal are now friends
Feb 3, 2020
Rahul Dangi Panchal and Dr Ashutosh Mishra are now friends
Oct 1, 2019

Profile Information

Gender
Male
City State
Delhi
Native Place
Ranchhar (Baghpat) U.P.
Profession
Delhi police

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At 12:12pm on January 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…
आदरणीय राहुल दांगी जी, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन के अवसर पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें।
At 5:02pm on July 28, 2015, Harash Mahajan said…

आदरणीय Rahul Dangi जी आपका  बहुत बहुत शुक्रिया |उम्मीद है आप सभी का साथ यूँ ही बना रहेगा |

At 11:13pm on November 20, 2014,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

आदरणीय राहुलजी, आपका प्रश्न एक दम समीचीन और सही है. प्रथम दृष्ट्या आत और आथ क़ाफ़िया नहीं बन सकते. लेकिन हो सकता है कि राहत इन्दौरी के जिस मतले पर आपने शेर उद्धृत किया है वह किसी और ग़ज़ल का शेर हो. या, उर्दू के हिसाब से उन अक्षरों की वर्तनी अलग ढंग की हो. और वहाँ मान्य हो. जो हिन्दी में वैसी नहीं है.
सादर

At 12:36pm on November 9, 2014,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

भाई राहुल दांगीजी, आपसे मेरा अनुरोध है, कि आप पहले गीत-नवगीत/ गेय कवितायें पढ़ें.
इस पटल पर भी प्रबुद्ध रचनाकारों के अनेक गीत-नवगीत उपलब्ध हैं. उसके बाद आप कुछ नया लिख कर दिखायें.

शुभेच्छायें...

At 9:47am on November 9, 2014,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

आदरणीय राहुल दांगीजी,  आप गीतों से सम्बन्धित अक्सर प्रश्न करते हैं. आप अपनी शंकाओं के समाधान के लिए उत्सुक हैं यह जानना इस तथ्य से आश्वस्त करता है कि आप अपनी जानकारियों को लेकर आग्रही हैं. यह एक शुभ संकेत है. क्यों कि आपने गीत नहीं लिखे हैं तो आपके अंदर का रचनाकार / गीतकार गीतकर्म को लेकर उपयुक्त वातावरण बना रहा है. आप अवश्य अच्छे मनोनुकूल गीत प्रस्तुतकर पायेंगे.
इस संदर्भ में आपके प्रश्नों पर कुछ कहने के पूर्व मेरा विनम्र सुझाव यही होगा है कि सर्वप्रथम आप गीत और गेय कविताओं को खूब पढ़ें. गीतों के मात्रिक या वैधानिक विन्यास को समझने के पूर्व आप साहित्य में उपलब्ध गीतों और गेय रचनाओं के मर्म को समझने का प्रयास करें. उसके बाद, आप गीतकर्म करें. उन गीतों को पटल पर प्रस्तुत करें. स्वीकृत हो गयी रचनाओं पर टिप्पणियाँ आयेंगी. वे आपके रचनाकर्म के लिए मार्गदर्शन का काम करेंगी.
गीत रचना शिल्प और कोमल भावनाओं के संप्रेषण का अद्भुत तथा अद्वितीय साहित्यिक कर्म है.
विश्वास है, मेरा कहना आपकीउत्सुकता को कुछ आधार दे पायेगा.
शुभेच्छायें

At 8:07pm on November 7, 2014, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…
दांगी जी
आपने गीत के बारे में जानकारी चाही है i पर गीत को चंद शब्दो में बता पाना संभव नहीं है i इसके लिए एक लम्बे लेख की आवश्यकता है i फिर भी संक्षेप में जान ले कि गीत में एक पंक्ति टेक की होती है जो बार बार हर परवर्ती स्टेंजा के बाद दोहराई जाती है i गीत में कोई बंधन नहीं होता आप अपने हिसाब से मुक्त छंद बना सकते है iपर गीत का आवश्यक तत्व यह है कि इसमें गेयता होनी चाहिये i जितना सुन्दर गान होगा उतनी ही सुन्दर रचना होगी i गजल की तरह गीत में किसी बह्र या बंधन की अपेक्षा नहीं है i आप् पूर्ण स्वतंत्र है पर जो भी मुक्त छान्द आप रचते है सभी छंद उसी तरह के हों i सादर i
At 6:57pm on November 7, 2014, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…
Rahul jee
welcome . Sir.
At 1:14pm on November 7, 2014,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…
आदरणीय राहुल डांगी साहब, आपका फ्रेण्ड रिक्वेस्ट मिला. आप अपने प्रोफ़ाइल में अपना हालिया फोटो लगा दें आदरणीय.
सादर
At 7:17pm on October 27, 2014, Rahul Dangi Panchal said…
आदरणीय addmin जी विन्रम निवेदन है!

मै पहले की तरह गजल की क्लाश के शुरुआती प्रष्ठ नहीं पढ़ पा रहा हुँ !
आदरणीय मेरी समस्या का समाधान करें!
पुलिस की नौकरी होने की वजह से मैं चर्चा में समय देने से विवश हो जाता हुँ!

Rahul Dangi Panchal's Blog

उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर- ग़ज़ल

122 122 122 122

पड़े जब कभी बेज़बानों के पत्थर 

चटकने लगे फिर चटानों के पत्थर 

मुहब्बत तेरी दास्तानों के पत्थर 

उठा लाये फिर हम फ़सानों के पत्थर 

बड़ी आग फेंकी बड़ा ज़हर थूका 

उगलता रहा वो गुमानों के…

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Posted on July 9, 2021 at 5:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल-बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।

2122 2122 2122 212



काँच के टुकडों में दे दे ज्यों कोई बच्चा मणी

आधुनिकता में कहीं खोया तो है कुछ कीमती।

हुस्न की हर सू नुमाइश़ चल रही है जिस तरह

बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।

ताश, कन्चें, गुड्डा, गुड़िया छीन के घर मिट्टी के

लाद दी हैं मासुमों पर रद्दियों की टोकरी।

अब कहाँ हैं गाँव में वें पेड़ मीठे आम के

वे बया के घोसलें, वे जुगनुओं की रौशनी।

ले गयी सारी हया पश्चिम से आती ये हवा…

Continue

Posted on December 17, 2018 at 9:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल -प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।

2122 2122 2122 212



रोज के झगड़े, कलह से दिल अब उकता सा गया।

प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।



दफ़्न कर दी हर तमन्ना, हर दफ़ा,जब भी उठी

बारहा इस हादसे में रब्त पिसता सा गया।



रोज ही झगड़े किये, रोज ही तौब़ा किया

रफ़्ता रफ़्ता हमसे वो ऐसे बिछड़ता सा गया।

चाहकर भी कुछ न कर पाये अना के सामने

हाथ से दोनों ही के रिश्ता फिसलता सा गया।



छोडकर टेशन सनम को लब तो मुस्काते रहें

प्यार का मारा हमारा दिल तड़पता…

Continue

Posted on December 16, 2018 at 8:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल-खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

2122 2122 2122 212

खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

चाहो मत बढकर किसी को चाह की औकात से।

जिसकी ख़ातिर छोड़ दी दुनिया की सारी दौलतें

रख न पाया मन भी मेरा वो दो मीठी बात से ।

दे रहा है तुहमतें उल्टा मुझे ही बेवफ़ा 

बेहया से क्या कहूँ मैं, क्या कहूँ इस जात से।

मैं समझता था मुहब्बत की सभी को हैं तलब

उसको तो मतलब है लेकिन और कोई बात से।

हैं मुसलसल शिद्दतें कुछ यूँ जुदाई की…

Continue

Posted on December 1, 2018 at 3:30pm — 6 Comments

 
 
 

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