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बयालीस हैं जा चुके,बीत रहा है काल।

सुखदुख चलते साथ में,जीवन इक जंजाल।।

यारों की ये कामना,रहे सदा ही साथ।

यार सलामत हों सदा, हे नाथों के नाथ।।

उन्यासी उन्नीस सौ,माह सितंबर जान।

सोलहवीं तारीख थी, जब जन्मे 'कल्याण'।।

गुरु आभे ने लिख दई,यही जन्म तारीख।

गुरु न देते ज्ञान तो, फिरूं मांगता भीख।।

मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on September 22, 2021 at 3:14pm

जनाब सुरेश कुमार कल्याण जी आदाब, दोहों का अच्छा प्रयास हुआ है, बधाई स्वीकार करें ।

'सुखदुख चलते साथ में,जीवन इक जंजाल'

इस पंक्ति के विषम चरण में 'साथ' शब्द के साथ 'में' का प्रयोग उचित नहीं होता 'में' की जगह "ही" कर सकते हैं ।

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