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Sheikh Shahzad Usmani
  • Male
  • SHIVPURI M.P.
  • India
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Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"आदाब। आपकी सम्मान्य उपस्थिति व प्रोत्साहक टिप्पणी हेतु बहुत-बहुत शुक्रिया जनाब ईंजी. गणेश जी बाग़ी साहिब। गीत की पंक्ति लेकर कुछ नया सा सूझ गया, तो उसी अनुरूप रचना का आरंभिक अनुच्छेद लिख गया। आपको अच्छा लगा। जानकर ख़ुशी हुई। विषय पर ही एक दूसरे कथानक…"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"आदाब। मेरी रचना पर हमेशा की तरह समय व टिप्पणी देकर मेरी 'सुधी पाठकीय हौसला अफ़ज़ाई' हेतु हार्दिक धन्यवाद जनाब मनन कुमार सिंह साहिब। एक श्लोक के अर्थ में पढ़ा था : //तदा = तब-तब//"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"आदाब। रचना का आरंभ सोचा कुछ और था, लेकिन लिखते समय वैसा लिखता चला गया। बहुत ही महत्वपूर्ण मार्गदर्शन व आपकी सम्मानित उपस्थिति हेतु बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय योगराज सर जी।"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"आदाब। क्लिष्टता से बाहर आने की कोशिश करूंगा। दरअसल कम समय अवधि में क़लम जैसी चलती गई, उसी अनुरूप सहभागिता सुनिश्चित करता गया। रचना पटल पर इतना समय देकर पाठकीय व स्नेही टिप्पणी से मार्गदर्शन प्रदान करने हेतु हार्दिक धन्यवाद जनाब तेजवीर सिंह साहिब।"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"रचना पटल पर समय देकर प्रोत्साहित करने हेतु हार्दिक धन्यवाद जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' साहब।"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"आदाब। बेहतरीन समीक्षा से हमें भी लघुकथा व सार्थक सृजन संबंधित मार्गदर्शन हासिल हुआ। बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय सर जी।"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"जी।.बहुत ख़ूब। लेखनी ऐसी ही सहज बेहतर।"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"जी, ऐसा ही लघुकथा लेखन हम सब सीखना चाहते हैं। शुक्रिया।"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"इन्न-लिल्लाहि व इन्न-इलैहि राजिऊन।"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"अहम् यदा, यदा; तदा, कदा (लघुकथा) : “तुम होतीं, तो ऐसा होता; तुम होतीं, तो वैसा होता! मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बातें करते हैं!” एक मशहूर फ़िल्मी नग़में की इस पंक्ति में शब्द ‘तन्हाई’ की जगह मैंने ‘रुसवाई, जगहँसाई,…"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"सादर नमस्कार। 'घूंघट/लेखक/लेखिका/क़लमकला/पुरुषत्व/नारीत्व व लघुकथा' आदि के बिम्बों में 'मर्यादा' का चलचित्र दिखाती बढ़िया व उम्दा रचना हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह जी। आपकी विशिष्ट शैली की एक और विचारोत्तेजक रचना।…"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"आदाब। पन्नी बीननेवाली का नशे की हालत में गालियाँ बकना और कोरोना कालीन परिस्थितियों में बिना नशे की अवस्था में होशहवास में गालियाँ बकना इस रचना का मुख्य आकर्षण है विषयांतर्गत। बहुत बढ़िया व उम्दा प्रयास है। हार्दिक बधाई आदरणीया वीणा सेठी जी।…"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"आदाब। विषयांतर्गत बेहतरीन शीर्षक के इस बार आपने अपनी उम्दा शैली में चिरपरिचित कथानक को आकर्षक कथनोपकथन में प्रस्तुत किया है।  //भरोसा शब्द से मेरा तो भरोसा ही उठ गया।// का विचारोत्तेजक संदेश देती बढ़िया रचना हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय तेजवीर…"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"आदाब। इस गोष्ठी में इस विषय पर इतने कम नपे-तुले शब्दों में  गहरी कटाक्षपूर्ण बात इतने तीखेपन से कहती बेहतरीन सार्थक लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया नमिता सुंदर जी। हालांकि कथानक बहुत पुराना है। लेकिन कहन प्रभावशाली है।"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"आदाब। 'कम लिखो, विधागत उत्तम लिखो' - को चरितार्थ करती विषय पर सार्थक, सटीक और बेहद उम्दा सारगर्भित लघुकथा से हमें लाभान्वित कराने के लिए हार्दिक आभार मुहतरम जनाब इंजी. गणेश जी बाग़ी साहिब। मिहनत स्पष्ट दिख रही है। बेहतरीन उम्दा शीर्षक…"
May 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"सादर नमस्कार। हमेशा की तरह विषयांतर्गत आपने संवेदनाओं को शाब्दिक किया है। हार्दिक बधाई आदरणीय मोहन बेगोवाल जी। जनाब योगराज सर जी ने बेहतरीन परिमार्जन किया है। हम सबको ग़ौर फ़रमाना चाहिए।"
May 31

Profile Information

Gender
Male
City State
Shivpuri M.P.
Native Place
Shivpuri
Profession
Radio Announcer
About me
A Private School- teacher, Freelancer and a Casual Radio Announcer. Simlple living, high thinking, fond of reading and writing.

Sheikh Shahzad Usmani's Blog

दिल के हाल सुने दिलवाला (लघुकथा)

"अपनी पैरों से रौंदें, दूजी जो भा जाये!"



"घर की मुर्ग़ी दाल बराबर; नयी पीढ़ी को कौन समझाये!"



अपनापन त्याग कर ख़ुदग़र्ज़ी, मनमर्ज़ी, दोगलापन, पागलपन, बचकानापन दिखाती अपने मुल्क की नई पीढ़ी की सोच और पलायन-गतिविधियों पर दो बुजुर्गों ने अपनी-अपनी राय यूं ज़ाहिर की।



"... 'ओल्ड इज़ गोल्ड' कहावत को छोड़ो जी; ओल्ड इज़ सोल्ड! नई पीढ़ी है सो बोल्ड! उन्हें ज़मीनी स्टोरीज़ टोल्ड हों या अनटोल्ड! हम बुड्ढे तो हुए क्लीन-बोल्ड!" उनमें से एक ने दूसरे से कहा, लेकिन ख़ुद के…

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Posted on March 10, 2020 at 2:34pm — 4 Comments

हिताय और सुखाय (संस्मरण)

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Posted on November 23, 2019 at 1:00pm — 7 Comments

फ़िर वही राग (क्षणिकायें)

दीये बनते, बिकते, जलते हैं

पेट पालते हैं

दीपक तले अंधेरा

फ़िर वही रात, वही सबेरा!

दीये पालते हैं, दीये पलते हैं

विरासत पलती है

दीपक तले अंधेरा

फ़िर वही बात, वही बखेड़ा!

विरासत पालती है, विरासत पलती है

उद्योग पलते हैं; राजनीति पलती है

लोकतंत्र पलता है

दीपक तले अंधेरा

फ़िर वही धपली, वही राग!

स्वच्छता पालती है, स्वच्छता पलती है

नारे-पोस्टर पलते हैं, भाषण पलते हैं

दीपक तले अंधेरा

फ़िर वही चाल, वही…

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Posted on October 25, 2019 at 6:46am — 5 Comments

दीये पलते हैं...! (लघुकथा)

दीपावली के चंद रोज़ पहले से ही त्योहार सा माहौल था उस कच्चे से घर में। सब अपने पालनहार बनाने में जुटे हुए थे; कोई मिट्टी रौंद रहा था, कोई पहिया चला-चला कर उसके केंद्र पर मिट्टी के लौंदों को त्योहार मुताबिक़ सुंदर आकार दे रहा था। वह उन्हें धूप में कतारबद्ध जमाती जा रही थी। लेकिन अपने-अपने काम में तल्लीन और सपनों में खोये अपनों को देख कर उसे अजीब सा सुकून मिल रहा था हर मर्तबा माफ़िक़। एक तरफ़ उसकी सास; दूसरी तरफ़ समय के पहिये संग कुम्हार का पैतृक पहिया चलाता उसका पति दीपक और उसके कंधों पर झूलता…

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Posted on October 22, 2019 at 10:40pm — 3 Comments

Comment Wall (13 comments)

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At 12:50am on October 5, 2018, mirza javed baig said…

आली जनाब शहज़ाद उस्मानी साहिब आदाब, 

मुझे अपनी दोस्तों की फ़ेहरिस्त में जोड़ने का शुक्रिया 

At 6:43am on July 2, 2018, राज़ नवादवी said…

"आदरणीय Sheikh Usmani साहब, तरही मुशायरे में मेरी ग़ज़ल में शिरकत का दिल से शुक्रिया. समयाभाव था, कमेंट बॉक्स बंद हो चुका है. इसलिए यहाँ से आभार प्रकट कर रहूँ हूँ.सादर "

At 11:59am on April 12, 2018, MD SHAFIQUE ASHRAF said…

जी बहूत  बहुत शुक्रिया जनाब ... नया हूँ .... थोड़ा सीखने का मौका दीजिये  

At 10:23am on January 8, 2017, Dr Ashutosh Mishra said…
आदरणीय शेख भाई जी आपके मित्रों की सूची में खुद को शामिल पाकर मैं सुखद अनुभूति कर रहा हूँ आपकी लघु कथाएं इस मंच पर मेरे बिशेष आकर्षण का केंद्र है आपकी हर लघु कथा मैं पढता हूँ आपकी कलम सृजन के नए आयाम स्थापित करती रहे ऐसी अपनी शुभकामनाओं के साथ सादर
At 8:23pm on August 5, 2016, pratibha pande said…

आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ  आदरणीय उस्मानी जी  ,आपका रचनाकर्म हर दिन नई बुलंदियां छुएँ ,ये कामना करती हूँ 

At 7:30am on June 20, 2016, सुरेश कुमार 'कल्याण' said…
श्रद्धेय शेख शहजाद उस्मानी साहब ये सब तो आप जैसे मित्रों के सहयोग से ही हुआ है और आशा करता हूं कि भविष्य में भी मेरा मार्गदर्शन करते रहेंगे। हृदय की गहराईयों से धन्यवाद ।
At 8:42am on May 24, 2016, महिमा वर्मा said…

आभार आपका आ.शेख उस्मानी सर जी,अभी जानकारी  पूरी नहीं है ,तो आपको जवाब देने में देर हो गई.पुनः आभार आपका .

At 2:11pm on May 1, 2016, pratibha pande said…

मित्रता के लिए आभार 

At 8:41am on November 18, 2015, pratibha pande said…

हार्दिक आभार आपका आदरणीय 

At 9:27am on November 4, 2015, kanta roy said…

देखी वफ़ा-ए-फ़ुरसत-ए-रंज-ओ-निशात-ए-दहर

ख़मियाज़ा यक दराज़ी-ए-उमर-ए-ख़ुमार था---- 

मिर्ज़ा ग़ालिब साहब का ये शेर आज आपके लिए
असीम शुभकामनाएँ आपको आदरणीय शहजाद जी।

 

 
 
 

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