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Dayaram Methani
  • Male
  • Bhilwara - rajsthan
  • India
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Dayaram Methani replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।"
Sunday
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"आदरणीय प्रतिभा पांडे जी, चित्रानुसार अति सुन्दर दोहा गीत के लिए बहुत बहुत बधाई।"
Sunday
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"आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी, चित्रानुसार सुन्दर दोहावली के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।"
Sunday
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"आदरणीय हरिओम श्रीवास्तव जी, चित्रानुसार अति सुन्दर दोहावली के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।"
Sunday
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"आदरणीय मिथलेश जी, आपने जो टिप्पणी लिखी है, मैं तो धन्य हो गया। आपका आभार प्रकट ​करने के लिए भी शब्द नहीं है मेरे पास। आप और आपकी कला की जितनी तारीफ करूं कम होगी। मेरा प्रणाम स्वीकार करें।"
Sunday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय प्रतिभा पांडे जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।"
Sunday
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"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, चित्रानुकूल सुंदर दोहावली के लिए हार्दिक बधाई।"
Sunday
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"आदरणीय मिथलेश जी, आपने बिलकुल नए अंदाज में लक्ष्मण धामी जी दोहावली पर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत की है। टिप्पणी भी दोहो में। यह आपकी कला है। आपने जो दोहे रचे है। अति सुंदर है। इस कला के लिए बधाई आपको।"
Sunday
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"आदरणीय अशोक कुमार जी, सुझाव के लिए हार्दिक आभार। गेयता हेतु आपके कहे अनुसार करके देखता हूँ। सादर।"
Saturday
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"आदरणीय समर कबीर जी, सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, आपकी टिप्पणी एवं सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"दोहा पंचक भूल मेरी माफ करो, बाबा जी इस बार,नेता चरणों पर गिरा, नाव लगाना पार। -- पूरी कीजै कामना, सब होंगे खुशहाल,बातें मेरी है सही, समझे आप न चाल। -- आदमी मैं बुरा नहीं, मिले आपका साथ,कीजिए विश्वास सदा, चरणों में है माथ। -- बाबा बोला अब उठो, खूब…"
Saturday
Dayaram Methani commented on मिथिलेश वामनकर's blog post बालगीत : मिथिलेश वामनकर
"बहुत सुंदर बाल गीत। रिबन के विभिन्न रंगो के चमत्कार आपने बता दिए। बहुत खूब आदरणीय।"
Jul 3
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-168
"आदरणीय रचना भाटिया जी, अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें।"
Jun 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-168
"आदरणीय रचना भाटिया जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Jun 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-168
"आदरणीय अमित जी, हम हिन्दी में दर्द को तो 21 ही गिनते है किन्तु शहर ऐसे लिखते है इसलिए 12 और शमा एवं दफा को भी 12 ही गिनते है। हम फ के नीचे बिन्दु भी नहीं लगाते है। इसलिए यहां गलती हो जाती है। शायद ऐसे और भी अनकों शब्द होंगे जिनकी गणना हम हिन्दी के…"
Jun 28

Profile Information

Gender
Male
City State
BHILWARA
Native Place
BHILWARA
Profession
journlist and writer
About me
I like to read and write kavita, gazal, short stories and artical.

Dayaram Methani's Blog

गज़ल

गज़ल

2122 2122 2122 212

आजकल हर बात पर लड़ने लगा है आदमी,

क्रोध के साये तले पलने लगा है आदमी।

चाह झूठी शान की अब बढ़ गई है बहुत ही,

इस लिये बेचैन सा रहने लगा है आदमी।

आग हिंसा की बहुत झुलसा रही है देश को,

खूब धोखा दल बदल करने लगा है आदमी।

धन कमाया पर बचाया कुछ नहीं अपने लिये,

अब बुढ़ापे में छटपटाने लगा है आदमी।

जिन्दगी भर झगड़ने से क्या मिला इंसान को,

देख ’’मेठानी‘‘ बहुत रोने लगा है आदमी।

मौलिक…

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Posted on January 30, 2022 at 12:16pm — 2 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 2



ज़िन्दगी में हर कदम तेरा सहारा हूँ

नाव हो मझधार तो तेरा किनारा हूँ

तुम भटक जाओ अगर अनजान राहों में

पथ दिखाने को तुम्हें रौशन सितारा हूँ

ज़िन्दगी का खेल खेलो तुम निडरता से

हर सफलता के लिए मैं ही इशारा हूँ

राह जीने की सही तुमको दिखाऊंगा

ज़िन्दगी के सब अनुभवों का पिटारा हूँ

साथ क्यों दूं मैं तुम्हारा सोच मत ऐसा

अंश तुम मेरे पिता मैं ही तुम्हारा हूँ

- दयाराम मेठानी…

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Posted on November 6, 2021 at 10:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल

 2122 2122 2122 212

नाव है मझधार में नाविक नशे में चूर है

सांझ है होने लगी मंजिल नज़र से दूर है

संकटों से आदमी क्या देव भी बचते नहीं

वक्त के आगे सभी होते यहां मजबूर है

जिन्दगी की कशमकश में जीना’ जिसको आ गया

यों समझ लो हौसलों से वो बहुत भरपूर है

दोष है अपना समय के साथ चल पाये नहीं

बंद मुट्ठी से फिसलना वक्त का दस्तूर है

हाल ‘‘मेठानी’’ बतायंे क्या किसी को अब यहां

आदमी सुनता नहीं अब हो गया मगरूर…

Continue

Posted on August 27, 2019 at 10:00pm — 2 Comments

गज़ल सीख लो

2122 2122 212

दर्द को दिल में दबाना सीख लो

ज़िन्दगी में मुस्कराना सीख लो

आंख से आंसू बहाना छोड़िये

हर मुसीबत को भगाना सीख लो

ज़िन्दगी है खेल, खेलो शान से

खेल में खुद को जिताना सीख लो

फूल को दुनिया मसल कर फैंकती

खुद को कांटों सा दिखाना सीख लो

छोड़ दें अब गिड़गिड़ाना आप भी

कुछ तो कद अपना बढ़ाना सीख लो

थी जवानी जोश भी था स्वप्न भी

दिन पुराने अब भुलाना सीख लो

कौन…

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Posted on July 4, 2019 at 9:30pm — 8 Comments

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