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Dayaram Methani
  • Male
  • Bhilwara - rajsthan
  • India
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Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-120
"आदरणीय जवाहरलाल सिंह जी, प्रदत्त विषय पर सुंदर व सामयिक दोहे। सुंदर सृजन के लिए बधाई।"
Oct 11
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-120
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण जी, प्रदत्त विषय पर अति सुंदर सृजन के लिए बधाई स्वीकार करें।"
Oct 11
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-120
"पंदत्त विषय पर अति सुंदर व सार्थक दोहे आदरणीय लक्ष्मण धामी जी। सुंदर सृजन के लिए बधाई स्वीकार करें।"
Oct 11
Dayaram Methani commented on Sushil Sarna's blog post वेदना कुछ दोहे :
"आदरणीय सुशील सरना जी, अत्यंत सुंदर दोहे। बधाई स्वीकार करें।"
Oct 6
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय समर कबीर जी, विस्तार से समझाने के लिए आभारी हूं। यहां केवल इतना निवेदन करना चाहता हूं  कि आपने जिस तरह से गणना की है उस तरह मैने नहीं की थी।  भविष्य में ध्यान रखूंगा। सादर।"
Sep 26
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय निलेश जी, वाह क्या गज़ल कही है आपने। आंखों की उपमा भी आपने निराली दी है। इस सुंदर सृजन के लिए बधाई स्वीकार करें आदरणीय।"
Sep 26
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय अजेय जी,  तरही मिसरे पर अति सुंदर सृजन के लिए बहुत बहुत बधाई।"
Sep 26
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय मनीष तन्हा जी, तरही मिसरे पर सुंदर गज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।"
Sep 26
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय नाकाम जी,  तरही मिसरे पर सुंदर गज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें।"
Sep 26
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय नादिर खान जी, बहुत अच्छी गजल के लिए बधाई स्वीकार करें।"
Sep 26
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। "
Sep 26
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय समर कबीर जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार। आपके सुझाव के लिए भी आभार व्यक्त करता हूं।  आदरणीय, 'मेठानी’ चुनाव में विजयी हो जब स्वागत को पहुँचे' में आपने बह्र चेक करने को कहा। मैने प्रयास किया पर अपनी गलती खुद से…"
Sep 26
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय दण्डपाणी नासहक जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहत  धन्यवाद एवं आभार।"
Sep 26
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय सालिक गणवीर जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहत आभार।"
Sep 26
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय डिंपल शर्मा जी,  प्रोत्साहन के लिए बहुत बहत  धन्यवाद एवं आभार।"
Sep 26
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय अमीरुद्दीन अमीर जी,  प्रोहत्साहन के लिए बहुत बहत धन्यवाद एवं आभार।"
Sep 26

Profile Information

Gender
Male
City State
BHILWARA
Native Place
BHILWARA
Profession
journlist and writer
About me
I like to read and write kavita, gazal, short stories and artical.

Dayaram Methani's Blog

ग़ज़ल

 2122 2122 2122 212

नाव है मझधार में नाविक नशे में चूर है

सांझ है होने लगी मंजिल नज़र से दूर है

संकटों से आदमी क्या देव भी बचते नहीं

वक्त के आगे सभी होते यहां मजबूर है

जिन्दगी की कशमकश में जीना’ जिसको आ गया

यों समझ लो हौसलों से वो बहुत भरपूर है

दोष है अपना समय के साथ चल पाये नहीं

बंद मुट्ठी से फिसलना वक्त का दस्तूर है

हाल ‘‘मेठानी’’ बतायंे क्या किसी को अब यहां

आदमी सुनता नहीं अब हो गया मगरूर…

Continue

Posted on August 27, 2019 at 10:00pm — 2 Comments

गज़ल सीख लो

2122 2122 212

दर्द को दिल में दबाना सीख लो

ज़िन्दगी में मुस्कराना सीख लो

आंख से आंसू बहाना छोड़िये

हर मुसीबत को भगाना सीख लो

ज़िन्दगी है खेल, खेलो शान से

खेल में खुद को जिताना सीख लो

फूल को दुनिया मसल कर फैंकती

खुद को कांटों सा दिखाना सीख लो

छोड़ दें अब गिड़गिड़ाना आप भी

कुछ तो कद अपना बढ़ाना सीख लो

थी जवानी जोश भी था स्वप्न भी

दिन पुराने अब भुलाना सीख लो

कौन…

Continue

Posted on July 4, 2019 at 9:30pm — 8 Comments

झूठ का व्यापार - ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212

झूठ का व्यापार बढ़ता जा रहा है आजकल,

और हर इक पर नशा ये छा रहा है आजकल

है लड़ाई का नजारा हर तरफ देखें जिधर,

आदमी ही आदमी को खा रहा है आजकल

इस प्रगति के नाम पर ही मिट रहे संस्कार सब

झूठ को हर आदमी अपना रहा है आजकल

बाँटकर भगवान को नेता खुशी से झूमकर

काबा’ तेरा काशी’ मेरी गा रहा है आजकल

जाग ‘मेठानी’ बचायें आग से अपना चमन

नित नया जालिम जलाने आ रहा है…

Continue

Posted on April 8, 2019 at 2:01pm — 7 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212

आंख से आंसू कभी यों ही बहाया ना करो

दर्द दिल का भी जमाने को बताया ना करो

हर किसी को मुफ्त में कोई खुशी मिलती नहीं

मेहनत से आप अपना जी चुराया ना करो

जिन्दगी ले जब परीक्षा हौसलों से काम लो

आपदा के सामने खुद को झुकाया ना करो

हैं सफलता और नाकामी समय का खेल ही 

लक्ष्य से अपनी नजर को तो हटाया ना करो

जीत लेंगे जिन्दगी की जंग ’मेठानी‘ सुनो

तुम निराशा को कभी मन में बसाया ना…

Continue

Posted on March 15, 2019 at 1:14pm — 5 Comments

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At 10:09pm on May 24, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय दयाराम मेथानि जी आदाब बहुत बहुत शुक्रिया जनाब
 
 
 

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