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Sheikh Shahzad Usmani
  • Male
  • SHIVPURI M.P.
  • India
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Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-58 (विषय: परिवर्तन)
"मेरी इस प्रविष्टि पर त्वरित उपस्थिति और मेरी यूं हौसला अफ़ज़ाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरमा बबीता गुप्ता जी।"
Jan 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-58 (विषय: परिवर्तन)
"मेरी इस तात्कालिक रचना पर त्वरित प्रोत्साहक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार आदरणीय योगराज सर जी।"
Jan 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-58 (विषय: परिवर्तन)
"आदाब। आदररणीय मंच संचालक महोदय योगराज सर.जी ने बहुत बढ़िया व्याख्या कर समीक्षा के ज़रिए इस संकेतात्मक बेहतरीन रचना में चार चाँद लगा दिये हैं हमें बढ़िया सीखें और मार्गदर्शन प्रदान करते हुए हार्दिक बधाई और आभार आप दोनों के प्रति आदरणीया कनक हरलाल्का जी।…"
Jan 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-58 (विषय: परिवर्तन)
"आदाब। ...वाह और आह! ग़ज़ब के ट्विस्ट दिये/हुए हैं रचना में। थोड़ी सी दाल से पूरी दाल वापसी... और फ़िर... बदल गये ..से.. नारी में नैसर्गिक या थोपे गये बदलाव और फिर समापन पंच-संवाद में बेटे में आये अनपेक्षित बदलाव की विचारोत्तेजक बात। बहुत ख़ूब। हार्दिक…"
Jan 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-58 (विषय: परिवर्तन)
"आदाब। उपरोक्त टिप्पणियों में वह सब कह दिया गया है जो आपके फैन पाठकगण कहना चाहते हैं। गागर में सागर रूपी कसी हुई सारगर्भित रचना का समापन भी बेहतरीन है। शीर्षक भी।  बेक़सूरों की मौतों, फ़सादों के तत्वों व तत्वाधानों पर बेहतरीन सार्थक सृजन के लिए…"
Jan 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-58 (विषय: परिवर्तन)
"तुम वही तो... नहीं (लघुकथा) : "अच्छा! तो तुम इस देश के नाग...रिक.... हो!" "हाँ, कोई शक! नागरिक हूँ। नागरिकता के सारे सुख भोगते-भोगते ऑलराउंडर बन गया हूँ!" "आलराउंडर बोले तो...?" "अजी मतलब यह कि जो करना है कर लेता…"
Jan 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-58 (विषय: परिवर्तन)
"आदाब। पात्र हवा के माध्यम से सांकेतिक गंभीर बातें कहती. बढ़िया रचना के लिए हार्दिक बधाई जनाब मनन कुमार सिंह जी। कुछ संवादों में भाषा शैली ज़रा बोलचाल वाली भी हो सकती थी सरल शब्दों के साथ, मेरे विचार से।"
Jan 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-58 (विषय: परिवर्तन)
"आदाब। एक नये कथानक पर विषयांतर्गत बढ़िया विचारोत्तेजक रचना के साथ आग़ाज़ के लिए हार्दिक बधाई जनाब ओमप्रकाश क्षत्रीय 'प्रकाश' जी। वसंत पंचमी पर्व की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ओबीओ परिवार को।"
Jan 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-58 (विषय: परिवर्तन)
"आदाब। विषयांतर्गत. बढ़िया कहावत को बेहतरीन परिभाषित करती रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया बबीता गुप्ता जी। वसंत पंचमी की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं समस्त ओबीओ परिवार को"
Jan 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-58 (विषय: परिवर्तन)
"आदाब। बेहतरीन प्रतीकात्मक समसामयिक ज्वलंत मुद्दों पर बढ़िया संदेशवाहक रचना के लिए हार्दिक बधाई जनाब विनय कुमार साहिब। मेरे विचार से अंत कुछ अधिक झकझोरने वाला हो, तो बेहतर।"
Jan 30
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-57 (विषय: औलाद)
"आदाब। ये हुई न विषयांतर्गत औलाद की परतें खोलती रचना! सकारात्मक-नकारात्मक ऐटीट्यूड और औलाद की ऐप्टिट्यूड के बीच पिता की ब्रॉड-माइन्डिडनेस और उस पर असली औलाद का हास्य व समर्थन। कम शब्दों में सबकुछ समेट लिया है लेखनी ने। बहुत-बहुत मुबारकबाद जनाब विनय…"
Dec 31, 2019
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-57 (विषय: औलाद)
"आदाब। मेरी इस रचना के कथ्य पर सार्थक रौशनी डालती और मुझे प्रोत्साहित करती इस विस्तृत टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरमा प्रतिभा जोशी पाण्डेय साहिबा। "
Dec 31, 2019
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-57 (विषय: औलाद)
"आदाब। टीवी समाचार देखकर अचानक सूझी यह रचना आपको अच्छी लगी। मेरी सहभागिता सार्थक हुई। हार्दिक धन्यवाद जनाब ओमप्रकाश क्षत्रीय 'प्रकाश' साहिब।"
Dec 31, 2019
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-57 (विषय: औलाद)
"आदाब रचना आपको पसंद आई। मिहनत सफ़ल हुई। हार्दिक धन्यवाद मुहतरमा बबीता गुप्ता साहिबा।"
Dec 31, 2019
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-57 (विषय: औलाद)
"आदाब। आपकी टिप्पणियाँ मुझे सतत लिखते रहने को प्रेरित करती हैं। पहली बार किसी ने मेरे समसामयिक विषयों पर यूं लिखने को यूं पसंद किया है। दरअसल अचानक ही कुछ सूझ जाता है, तो यूं तुरंत लिख कर अपनी अभिरुचि का अभ्यास कर लेता हूँ। सर्वकालिक रचनायें लिखना…"
Dec 31, 2019
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-57 (विषय: औलाद)
"आदाब। वर्ष के अंतिम व्यस्त दिवस पर रचना पर समय देकर मुझे यूँ प्रोत्साहित करने के लिए हार्दिक धन्यवाद जनाब विनय कुमार साहिब। नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं आप सभी को।"
Dec 31, 2019

Profile Information

Gender
Male
City State
Shivpuri M.P.
Native Place
Shivpuri
Profession
Radio Announcer
About me
A Private School- teacher, Freelancer and a Casual Radio Announcer. Simlple living, high thinking, fond of reading and writing.

Sheikh Shahzad Usmani's Blog

हिताय और सुखाय (संस्मरण)

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Posted on November 23, 2019 at 1:00pm — 7 Comments

फ़िर वही राग (क्षणिकायें)

दीये बनते, बिकते, जलते हैं

पेट पालते हैं

दीपक तले अंधेरा

फ़िर वही रात, वही सबेरा!

दीये पालते हैं, दीये पलते हैं

विरासत पलती है

दीपक तले अंधेरा

फ़िर वही बात, वही बखेड़ा!

विरासत पालती है, विरासत पलती है

उद्योग पलते हैं; राजनीति पलती है

लोकतंत्र पलता है

दीपक तले अंधेरा

फ़िर वही धपली, वही राग!

स्वच्छता पालती है, स्वच्छता पलती है

नारे-पोस्टर पलते हैं, भाषण पलते हैं

दीपक तले अंधेरा

फ़िर वही चाल, वही…

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Posted on October 25, 2019 at 6:46am — 5 Comments

दीये पलते हैं...! (लघुकथा)

दीपावली के चंद रोज़ पहले से ही त्योहार सा माहौल था उस कच्चे से घर में। सब अपने पालनहार बनाने में जुटे हुए थे; कोई मिट्टी रौंद रहा था, कोई पहिया चला-चला कर उसके केंद्र पर मिट्टी के लौंदों को त्योहार मुताबिक़ सुंदर आकार दे रहा था। वह उन्हें धूप में कतारबद्ध जमाती जा रही थी। लेकिन अपने-अपने काम में तल्लीन और सपनों में खोये अपनों को देख कर उसे अजीब सा सुकून मिल रहा था हर मर्तबा माफ़िक़। एक तरफ़ उसकी सास; दूसरी तरफ़ समय के पहिये संग कुम्हार का पैतृक पहिया चलाता उसका पति दीपक और उसके कंधों पर झूलता…

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Posted on October 22, 2019 at 10:40pm — 3 Comments

विकासोन्मुखी (लघुकथा)

"ख़ामोश!" एक बलात्कार पीड़िता और सरेआम उसकी हत्या करने वाले युवकों के बाद बारी-बारी से माइक पर उसने मशहूर नेताओं-अभिनेताओं और पुलिसकर्मियों की मिमिक्री करते हुए कहा, "कितने आदमी थे!"



"साहब, ती..ई...तीन थे!"



"वे तीन थे ... और ये सब तीस-चालीस...ऐं! लानत है... तुम लोगों की ख़ामोशी पर!"

"साला... एक मच्छर इस देश के आदमी को हिजड़ा बना देता है!"



"साहब... मच्छर! .. मच्छर बोले तो... पैसा, डर, पुलिस, नेता, क़ानून या स्वार्थ!..है न!"



"कोई…

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Posted on October 8, 2019 at 8:30am — 4 Comments

Comment Wall (13 comments)

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At 12:50am on October 5, 2018, mirza javed baig said…

आली जनाब शहज़ाद उस्मानी साहिब आदाब, 

मुझे अपनी दोस्तों की फ़ेहरिस्त में जोड़ने का शुक्रिया 

At 6:43am on July 2, 2018, राज़ नवादवी said…

"आदरणीय Sheikh Usmani साहब, तरही मुशायरे में मेरी ग़ज़ल में शिरकत का दिल से शुक्रिया. समयाभाव था, कमेंट बॉक्स बंद हो चुका है. इसलिए यहाँ से आभार प्रकट कर रहूँ हूँ.सादर "

At 11:59am on April 12, 2018, MD SHAFIQUE ASHRAF said…

जी बहूत  बहुत शुक्रिया जनाब ... नया हूँ .... थोड़ा सीखने का मौका दीजिये  

At 10:23am on January 8, 2017, Dr Ashutosh Mishra said…
आदरणीय शेख भाई जी आपके मित्रों की सूची में खुद को शामिल पाकर मैं सुखद अनुभूति कर रहा हूँ आपकी लघु कथाएं इस मंच पर मेरे बिशेष आकर्षण का केंद्र है आपकी हर लघु कथा मैं पढता हूँ आपकी कलम सृजन के नए आयाम स्थापित करती रहे ऐसी अपनी शुभकामनाओं के साथ सादर
At 8:23pm on August 5, 2016, pratibha pande said…

आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ  आदरणीय उस्मानी जी  ,आपका रचनाकर्म हर दिन नई बुलंदियां छुएँ ,ये कामना करती हूँ 

At 7:30am on June 20, 2016, सुरेश कुमार 'कल्याण' said…
श्रद्धेय शेख शहजाद उस्मानी साहब ये सब तो आप जैसे मित्रों के सहयोग से ही हुआ है और आशा करता हूं कि भविष्य में भी मेरा मार्गदर्शन करते रहेंगे। हृदय की गहराईयों से धन्यवाद ।
At 8:42am on May 24, 2016, महिमा वर्मा said…

आभार आपका आ.शेख उस्मानी सर जी,अभी जानकारी  पूरी नहीं है ,तो आपको जवाब देने में देर हो गई.पुनः आभार आपका .

At 2:11pm on May 1, 2016, pratibha pande said…

मित्रता के लिए आभार 

At 8:41am on November 18, 2015, pratibha pande said…

हार्दिक आभार आपका आदरणीय 

At 9:27am on November 4, 2015, kanta roy said…

देखी वफ़ा-ए-फ़ुरसत-ए-रंज-ओ-निशात-ए-दहर

ख़मियाज़ा यक दराज़ी-ए-उमर-ए-ख़ुमार था---- 

मिर्ज़ा ग़ालिब साहब का ये शेर आज आपके लिए
असीम शुभकामनाएँ आपको आदरणीय शहजाद जी।

 

 
 
 

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"गजब की रचना। बहुत-बहुत बधाई इस सृजन हेतु।"
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रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post जानता हूँ मैं (ग़ज़ल)
"आदरणीय समर कबीर साहब, सादर प्रणाम। ग़ज़ल को अपने आशीर्वाद से नवाज़ने के लिए आपका बहुत आभारी हूँ। सर,…"
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"प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब, बहुत अच्छी रचना हुई है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
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