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Mohammed Arif
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लघुकथा-कुत्ता संस्कृति

मॉर्निंग वॉक के दो मित्र कुत्ते आपस में बतिया रहे थे । उन्हें अपने कुत्तेपन पर बड़ा अभिमान हो रहा था । इंसान के गिरते निकम्मेपन पर ठहाके भी बीच-बीच में लगाते जा रहे थे । पहला कुत्ता बोला-"हमें अपने कुत्तेपन पर नाज़ है ।" तब दूसरा कुत्ता उछलकर बोला -"व्हाय नॉट । वी आर सो फेथफुल ।"पहला-"हममें से कुत्तापन के संस्कार धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे है । हम तेज़ी से सभ्य हो रहे हैं ।"दूसरा-"एब्सोल्यूटली ! अगली सदी हमारी ही होगी ।"पहला-"बेशक! हमारा आधिपत्य बढ़ता ही जा रहा है । हमने इंसान के हर क्षेत्र पर…See More
8 hours ago
Samar kabeer commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"जनाब मिहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश है ।"
yesterday
Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"आदरणीय आशुतोष जी बहुत दिनों के बाद आपका मेरी रचना पर आना हुआ । ग़ज़ल पर शिरकत का बहुत-बहुत शुक्रिया ।"
yesterday
Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"आदरणीय नरेंद्र सिंह जी ग़ज़ल पर शिरकत का बहुत-बहुत आभार ।"
yesterday
Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"आदरणीय नीरज कुमारजी ग़ज़ल में का बहुत-बहुत शुक्रिया ।"
yesterday
Niraj Kumar commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"आदरणीय मोहम्‍म्‍द आरिफ साहब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है. ये शेर बहुत अच्छा लगा : जतलाता है हरदम वो, ये उसका ओछापन है । सादर"
yesterday
narendrasinh chauhan commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"बहुत ही उम्दा ग़ज़ल,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ"
yesterday
Dr Ashutosh Mishra commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"आदरणीय आरिफ जी अच्छी ग़ज़ल है इस रचना के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं सादर "
yesterday
Mohammed Arif commented on Naveen Mani Tripathi's blog post मेरी आबाद मुहब्बत को मिटाने वाले
"आदरणीय नवीन मणित्रिपाठी जी आदाब, बेहतरीन ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।"
yesterday
Mohammed Arif commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post ग़ज़ल- कब किसी से यहाँ मुहब्बत की
"आदरणीय बसंत कुमार जी आदाब, बेहतरीन ग़ज़ल का आगाज़ । हर शे'र लाजवाब ।.शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजन अपनी अमूल्य राय से अवगत करवाएँगे ।"
yesterday
Mohammed Arif commented on Ravi Shukla's blog post गीत : एक भारत श्रेष्ठ भारत
"आदरणीय रवि शुक्ला जी आदाब, देश भक्ति की भावना से ओतप्रोत बेहतरीन गीत । आजकल ऐसे गीतों की काफी आवश्यकता है। गीत में आक्रोश भी है,बदलाव का विशेष आग्रह भी है और परिवर्तन की छटपटाहट भी है । ढेरों बधाइयाँ स्वीकार करें ।"
yesterday
Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"बहुत-बहुत आभार बसंत कुमार शर्मा जी । लेखन सार्थक हुआ ।"
Monday
Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"बहुत-बहुत आभार प्रिय मोहित मुक्त जी ।"
Monday
Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"बहुत-बहुत आभार आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी ।"
Monday
Tasdiq Ahmed Khan commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"मुहतरम जनाब आरिफ़ साहिब आदाब , बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है , दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ"
Monday
बसंत कुमार शर्मा commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"बहुत खूब "
Monday

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लघुकथा-कुत्ता संस्कृति

मॉर्निंग वॉक के दो मित्र कुत्ते आपस में बतिया रहे थे । उन्हें अपने कुत्तेपन पर बड़ा अभिमान हो रहा था । इंसान के गिरते निकम्मेपन पर ठहाके भी बीच-बीच में लगाते जा रहे थे । पहला कुत्ता बोला-"हमें अपने कुत्तेपन पर नाज़ है ।" तब दूसरा कुत्ता उछलकर बोला -"व्हाय नॉट । वी आर सो फेथफुल ।"

पहला-"हममें से कुत्तापन के संस्कार धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे है । हम तेज़ी से सभ्य हो रहे हैं ।"

दूसरा-"एब्सोल्यूटली ! अगली सदी हमारी ही होगी ।"

पहला-"बेशक! हमारा आधिपत्य बढ़ता ही जा रहा है । हमने इंसान के… Continue

Posted on July 26, 2017 at 7:44pm

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)

बाक़ी थोड़ा बचपन है,
ये उसका भोलापन है ।
रूठे-रूठे चहरें हैं,
अब घर-घर सूनापन है ।
जतलाता है हरदम वो,
ये उसका ओछापन है ।
हाँ, उसकी रचनाओं में,
रहता कुछ तो चिंतन है ।
उनसे रिश्ता है लेकिन ,
रहती थोड़ी अनबन है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Posted on July 24, 2017 at 2:45pm — 15 Comments

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/22)

ये रंजिश का दौर नया है ,

हाँ, साज़िश का दौर नया है ।

कितने बेबस चहरे देखो ,

फिर यूरिश का दौर नया है ।

हम क्या खायें, क्या पहनें अब ,

बस, काविश का दौर नया है ।

भाई-भाई का दुश्मन है ,

ये सोज़िश का दौर नया है ।

शक हर इक पर है अब यारो ,

हाँ, पुरसिश का दौर नया है ।

धन-दौलत के दीवाने सब ,

पैमाइश का दौर नया है ।

सूखी-सूखी नदियाँ हैं सब ,

अब बारिश का दौर नया है… Continue

Posted on July 20, 2017 at 12:07am — 14 Comments

सावन की ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/22)

मन में आग लगाये सावन ,
यौवन को भड़काये सावन ।
दो दिल मचल रहे हैं देखो ,
ऐसा राग सुनाये सावन ।
छैल-छबीला , रंगीला-सा ,
बाग़ों में इतराये सावन ।
छन-छन छन-छन करता छत पर
बेहद शोर मचाये सावन ।
खेतों में हरियाली लाये ,
संग घटा के छाये सावन ।
मस्ती में जब झूमे नाचे
ऐसा रंग जमाये सावन ।
गीत मिलन के गाता है ये
झूलों में इठलाये सावन ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Posted on July 16, 2017 at 2:09pm — 20 Comments

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At 10:54am on January 2, 2017, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय आरिफ जी ..आपके मित्रों की श्रेणी में खुद को पाकर मैं सुखद अनुभव कर रहा हूँ ..सादर 

At 4:59pm on August 30, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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