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पुस्तक समीक्षा

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इस ग्रुप में पुस्तकों की समीक्षा लिखी जा सकती है |

Location: Vishva
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समीक्षा : 'मन में भरो उजास' 1 Reply

“मन में भरो उजास” – कुण्डलिया छंद संग्रहछंदकार – सुभाष मित्तल ‘सत्यम्’प्रकाशक – बोधि प्रकाशन, जयपुर. (राज.)मूल्य – रुपये 150/- “बदलते परिवेश पर सत्यम् जी के उद्गार”जिसने कवि गिरधर को पढ़ा है, जिसने काका हाथरसी को मंचों से कुण्डलिया छंद नुमा रचनाएं…Continue

Started by Ashok Kumar Raktale. Last reply by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला 3 hours ago.

ग़ज़ल संग्रह “डाली गुलाब पहने हुए” : मेरे विचार 1 Reply

                      आज राजेश कुमारी ‘राज’ जी का ग़ज़ल संग्रह “डाली गुलाब…Continue

Started by मिथिलेश वामनकर. Last reply by rajesh kumari on Saturday.

रश्मि शर्मा का कविता संग्रह : ' मन हुआ पलाश'

कृति‍ : मन हुआ पलाश लेखिका : रश्मि शर्मा वि‍धा : काव्‍य मूल्‍य : 320 रुपये प्रकाशक : अयन प्रकाशन , नई दि‍ल्‍ली मन के पलाश की तलाश------------------------------अपने नव प्रकाशित संग्रह ‘मन हुआ पलाश’ में कवयित्री रश्मि शर्मा अपनी कविताओं में स्त्री की…Continue

Started by डॉ.लक्ष्मी कान्त शर्मा Sep 4.

शफ़क--राजकुमारी नायक का कविता संग्रह

श्रीमती राजकुमारी नायक का काव्य संग्रह शफ़क  जब हमारी लेखिका संघ की अध्यक्षा आ. अनिता सक्सेना जी ने मुझे सौंपा तो यह मेरे लिए एक नई चुनौती लेकर आया. रुबरु राजकुमारी जी से मेरा कोई परिचय नहीं है, लेकिन जैसे जैसे कविता दर कविता शफ़क से गुजरती गई उनसे…Continue

Started by नयना(आरती)कानिटकर Aug 23.

‘करो परिष्कृत अंतर्मन को’- काव्य की आत्मा से एक संवाद

(कवयित्री आभा खरे की पुस्तक   ‘करो परिष्कृत अंतर्मन को’  की संवाद शैली में आलोचना )                          ‘करो परिष्कृत अंतर्मन को‘ पढ़कर आत्मलीन हुआ ही था कि काव्य की आत्मा मुझमे प्रविष्ट हो गयी. उसने झकझोर कर कहा –‘क्या कर रहे हो ?’मैंने कहा…Continue

Started by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव Jun 26.

पुस्तक समीक्षा : लक्ष्मण की कुण्डलियाँ 3 Replies

समीक्षक : अशोक कुमार रक्ताले.       आदरणीय लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला जी कविताई तो लम्बे समय से कर रहे हैं किन्तु उन्होंने छंद रचनाएं करना पिछले कुछ वर्षों से ही प्रारंभ किया है और कुछ ही वर्षों में उन्होंने अपनी रचनाओं को इतना परिष्कृत कर लिया है की…Continue

Started by Ashok Kumar Raktale. Last reply by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला Mar 17.

‘पृथ्वी के छोर पर’- अभियान और अनुभूति का एक रोमांचक दस्तावेज - डॉ0 गोपाल नारायन श्रीवास्तव

हिन्दी साहित्य की गद्याधारित विधाओं में नाटक, उपन्यास, कहानी और निबंध के बाद जीवनी आत्म-कथा, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, रहस्य-रोमांच के इतिवृत्त और रेखाचित्र का विशेष स्थान है और इन इतर विधाओं को एक ही पुस्तक में ढाल देने  जैसे  जादुई करिश्मे का नाम…Continue

Started by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव Mar 16.

"कुंडलिया छंद के नये शिखर" संकलन की समीक्षा 2 Replies

 श्री त्रिलोक सिंह ठकुरेला जी द्वारा सम्पादित “कुंडलिया छंद के नये शिखर” में 14 कुण्डलियाकारों के कुंडलिया छंद है | इन छन्दों के बारे में प्रोफ. सोम ठाकुर ने इस पुस्तक पर अपने राय में ये उद्गार प्रकट किये है “कुंडलिया छंद के के इस संकलन में…Continue

Started by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला. Last reply by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला Dec 19, 2016.

समीक्षा : “अब किसे भारत कहें” एक कुण्डलिया छंद संग्रह.

  “अब किसे भारत कहें” नाम देखकर तो लगा न था की यह कोई कुण्डलिया संग्रह होगा. किन्तु यह डॉ. रमाकांत सोनी जी का जुलाई-१६ में प्रकाशित कुण्डलिया संग्रह है.           डॉ. रमाकांत सोनी जी की अब तक छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. सर्व प्रथम प्रकाशित…Continue

Tags: कहें, भारत, किसे, अब

Started by Ashok Kumar Raktale Nov 24, 2016.

छन्द काव्य संकलन ”करते शब्द प्रहार“ पुस्तक के विमोचन पर उदगार - 4 Replies

दिनांक 12 अक्तूबर, 2016 को छन्द काव्य संग्रह “करते शब्द प्रहार” पर अपने संबोधन में मुख्य अतिथि कलानाथ जी शास्त्री में कहाँ कि दोहों में जितनी मारक क्षमता होती है उतनी गंभीरता से दोहे नहीं लिखे जा रहे | उन्होंने स्पष्ट किया कि “सतसैया के दोहरा जो…Continue

Started by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला. Last reply by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला Oct 27, 2016.

 
 
 

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"आ. बृजेश भाई , मुस्काई लफ्ज़ मेरे खयाल से सही है ... कविता और गीत के अलावा  ''…"
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भले ही आईने धोये हुए हैं (फिल्बदीह ग़ज़ल 'राज')

१२२२  १२२२  १२२चढ़े सूरज तलक सोए हुए हैंकिसी की याद में खोए हुए हैं ग़ज़ल लिक्खी हुई है आंसुओं सेकहें…See More
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"वाह बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई सुरेन्द्र जी। बहुत बहुत बधाई हो जी । सादर नमन जी"
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"आदरणीय महेंद्र जी, मुझे आश्चर्य है कि इस रचना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं है. इस विषय को कथा में…"
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"चाँद बनकर वो निखर जाएंगे । शाम होते ही सँवर जाएंगे ।। जख्म परदे में ही रखना अच्छा । देखकर लोग सिहर…"
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