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लघुकथा-कुत्ता संस्कृति

मॉर्निंग वॉक के दो मित्र कुत्ते आपस में बतिया रहे थे । उन्हें अपने कुत्तेपन पर बड़ा अभिमान हो रहा था । इंसान के गिरते निकम्मेपन पर ठहाके भी बीच-बीच में लगाते जा रहे थे । पहला कुत्ता बोला-"हमें अपने कुत्तेपन पर नाज़ है ।" तब दूसरा कुत्ता उछलकर बोला -"व्हाय नॉट । वी आर सो फेथफुल ।"

पहला-"हममें से कुत्तापन के संस्कार धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे है । हम तेज़ी से सभ्य हो रहे हैं ।"

दूसरा-"एब्सोल्यूटली ! अगली सदी हमारी ही होगी ।"

पहला-"बेशक! हमारा आधिपत्य बढ़ता ही जा रहा है । हमने इंसान के… Continue

Added by Mohammed Arif on July 26, 2017 at 7:44pm — No Comments

कभी गम के दौर में भी हुई आखें नम नहीं पर- लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

गजल

2121    1221    1212    122



मेरे  रहनुमा  ही   मुझसे  मिले  सूरतें  बदल  के

भला क्या समझता तब मैं छिपे पैंतरे वो छल के।1।

न सितारे बोले  उससे  मेरा  हाल क्या है या रब

न ही चाँद आया मुझ तक कभी एकबार चल के।2।



खता क्या थी अपनी ऐसी अभीतक न समझा हूँ मैं

जो था राज मेरे दिल का खुला आँसुओं में ढल के।3।

कहूँ लाल कह के  उसने न  गले  लगाया क्यों मैं

न लिपट सका था मैं ही कभी उससे यूँ मचल के।4।



बड़ा ख्वाब  था  खिलाऊँ  उसे मोल की भी रोटी

न खरीद…

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Added by laxman dhami on July 26, 2017 at 1:10pm — 5 Comments

यहाँ हुजूर - ग़ज़ल- बसंत कुमार शर्मा

मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलात

मापनी २२१/२१२१/१२२१/२१२

 

करते नहीं हैं’ लोग शिकायत यहाँ हुजूर,

थोड़ी तो’ हो रही है’ मुसीबत यहाँ हुजूर.

बिकने लगे हैं’ राज सरे आम आजकल,

चमकी खबरनबीस की’ किस्मत यहाँ हुजूर.

बिछती कहीं है’ खाट, कहीं टाट हैं बिछे,

हो हर जगह रही है’ सियासत यहाँ हुजूर.

पलते रहे हैं’ देश में जयचंद हर जगह,

पहली नहीं है’ आज ये’…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 26, 2017 at 1:00pm — 5 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
भीगी सी रुत आई ....//डॉ० प्राची

भीगी सी रुत आई



भीगा सावन भीगी पलकें भीगी सी रुत आई

मन के पन्नों से यादों की मिटती नहीं लिखाई



पहली बारिश में तेरे संग बेसुध हो इतराना

बूँदों के मोती छिटकाना छिटका कर शरमाना

पक्के रस्ते छोड़छाड़ खुद जाना पगडण्डी से

तर हो कर बारिश में छप-छप पानी भी छपकाना



उन भीगी शामों में गर्म चाय की फिर गरमाई

मन के पन्नों से....



रात-रात भर जाग-जाग कर वो मेहंदी रचवाना

हर नन्हें-नन्हें बूटे में तेरा प्यार सजाना

मेहंदी रची हथेली पर… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on July 26, 2017 at 1:25am — 2 Comments

ग़ज़ल

2222 2222 222
दूरी अपने बीच मिटा भी नहीं सकता।
आना चाहूँ तो मैं आ भी नहीं सकता।

मैं तुझ से मिलने को आ भी नहीं सकता।
क्या दिल पे गुजरती है बता भी नहीं सकता।।

बेईमानी से मैं कमा भी नहीं सकता।
भूखा बच्चों को मैं सुला भी नहीं सकता।।

मैं इतना दूर चला आया हूँ उस से।
वो आना चाहे तो आ भी नहीं सकता।

पहले से दुख इतने हैं मेरे अंदर।
और कोई दिल मेरा दुखा भी नहीं सकता।।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by surender insan on July 25, 2017 at 11:58pm — 6 Comments

लघुकथा --वो आ गए

बड़े बाबा के जिगरी दोस्त,छोटे चाचा यूँ तो हमारे परिवार की रिश्तेदारी में कुछ नहीं लगते पर रिश्तेदारों से बढ़कर करते हैं |घर पर कोई मौका हो गम का या खुशी का,पिछले चालीस सालों से,वे सदैव उपस्थित रहते हैं|घर के किसी भी सदस्य का जन्मदिन हो या शादी की सालगिरह ,छोटे चाचा गुलाबजामन की हंडिया लेकर आते | ढेरों आशीष तो देते ही थे ,शेरो शायरी सुना कर माहौल को खुशगवार बना देते थे |हम सब भाई बहिन हँसते हुए आपस में कहते “वो आये नहीं ?”या “वो आ गए हैं |” “वो आ रहे हैं|”

आजकल के बच्चों व बहुओं…

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Added by Manisha Saxena on July 25, 2017 at 11:30am — 1 Comment

गीत : एक भारत श्रेष्ठ भारत

एक भारत श्रेष्ठ भारत आइये मिलकर बनाएं

देश का  सम्मान गौरव लक्ष्य हासिल कर बढ़ाएं

 

शांति के हम पथ प्रदर्शक ध्वज अहिंसा ले चलेंगे

विश्‍व गुरु बन कर पुन: संस्थापना सच की करेंगे

दें नहीं उपदेश अपने आचरण से  कर दिखाएं

 

धर्म पूजा, जाति भाषा, वेश भूषा, बोलियाँ सब

एकता के सूत्र में बंध कर चली है टोलियाँ सब

संगठन में शक्ति है, ऐसी लिखें फिर से कथाएं

 

रेल का हमको दिखाई दे रहा है पथ समांतर

मूल में इसके छिपा है साथ…

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Added by Ravi Shukla on July 25, 2017 at 11:00am — 7 Comments

ग़ज़ल- कब किसी से यहाँ मुहब्बत की

कब किसी से यहाँ मुहब्बत की.  

जब भी' की आपने सियासत की.

 

प्यार  पूजा  सदा  ही हमने तो,

आपने कब इसकी इबादत की

 

जुल्म  धरती ने सह लिए सारे,

आसमां  ने मगर बगावत की

 

आदमी आदमी  से  जलता है,

कुछ कमी है यहाँ जहानत…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 25, 2017 at 10:10am — 7 Comments

कालिख: लघुकथा :हरि प्रकाश दुबे

“सुन कमला, सारा काम निपट गया या अभी भी कुछ बाकी है!”

नहीं ‘मेमसाहब’ सब काम पूरा कर दिया है, दाल और सब्जी भी बना के फ्रिज मैं रख दी है, आटा भी गूंथ दिया है, साहब आयेंगे तो आप बना कर दे दीजियेगा !

“अरे बस जरा सा ही काम तो बचा है, कमला,ऐसा कर रोटी भी बना कर हॉट केस मैं रख जा !”

“मेमसाहब मुझे देर हो रही है, घर पर बच्चे भूखे होंगे !”

अरे चल पगली १५ मिनट में मर थोड़ी ही जायेंगे, चल जल्दी से बना दे !

गरीबी चाहे जो न…

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Added by Hari Prakash Dubey on July 25, 2017 at 2:49am — 5 Comments

मेरी आबाद मुहब्बत को मिटाने वाले

2122 1122 1122 22

मेरी आबाद मुहब्बत को मिटाने वाले ।

तू सलामत रहे यूँ छोड़ के जाने वाले ।।



चन्द रातों की मुलाकात न् सोने देगी ।

याद आएंगे बहुत नींद चुराने वाले ।।



कितना बदला है जमाने का चलन देख जरा ।

तोड़ जाते हैं ये दिल ,प्यार निभाने वाले ।।



इस तरह रूठ के जाने की जरूरत क्या थीं।

यूँ किताबों में गुलाबों को छिपाने वाले ।।



खास अशआर लिखे थे जो कभी खत में तुझे ।

क्या मिला तुझ को मेरे ख़त को जलाने वाले ।।



आज निकले वो… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on July 25, 2017 at 2:30am — 7 Comments

दिल्ली में सूरज: कविता :हरि प्रकाश दुबे

दिल्ली में भी

सूरज उगता है

शहादरा में

काले धुएं की, ओट से

धीरे –धीरे संघर्ष करते

ठीक उसी तरह जैसे

माँ के गर्भ से कोई

बच्चा निकलता है

बड़ा होता है

बसों और मेट्रो में

लटक –लटक कर

धक्के खा-खा कर

जीवन जीना सीखता है

पसीने को पीता जाता है

पर थक हार कर भी

जनकपुरी की तरफ बढ़ता जाता है

रक्त से लाल होकर

वहीँ कहीं किसी स्टाप पर

चुपके से उतर जाता है

पर, सूरज का जीवन…

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Added by Hari Prakash Dubey on July 24, 2017 at 11:10pm — 1 Comment

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)

बाक़ी थोड़ा बचपन है,
ये उसका भोलापन है ।
रूठे-रूठे चहरें हैं,
अब घर-घर सूनापन है ।
जतलाता है हरदम वो,
ये उसका ओछापन है ।
हाँ, उसकी रचनाओं में,
रहता कुछ तो चिंतन है ।
उनसे रिश्ता है लेकिन ,
रहती थोड़ी अनबन है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on July 24, 2017 at 2:45pm — 15 Comments

'महब्बत कर किसी के संग हो जा'

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन



हिमाक़त छोड़ दे फ़रहंग हो जा

महब्बत कर किसी के संग हो जा



ग़ज़ल मेरी सुना लहजे में अपने

मैं गूँगा हूँ मेरा आहंग हो जा



यहाँ घुट घुट के मरने से है बहतर

निकल मैदाँ में मह्व-ए-जंग हो जा



करे अपना के दुनिया फ़ख़्र जिस पर

वफ़ा का वो निराला ढंग हो जा



चढ़े इक बार जिस पर फिर न उतरे

महब्बत का तू ऐसा रंग हो जा



ये दुनिया सीधे साधों की नहीं है

उदासी छोड़ शौख़्-ओ-शंग हो जा



जुदा ता उम्र कोई कर न… Continue

Added by Samar kabeer on July 24, 2017 at 12:00am — 21 Comments

तन्हा...

तन्हा....

बहुत डरता हूँ
हर आने वाली

सहर से 

शायद इसलिए कि
शाम ने सौंपी थी
जो रात
मेरे ख़्वाबों को
जीने के लिए
ढक देगी उसे सहर
अपने पैरहन से
हमेशा के लिए
और मैं
रह जाऊंगा
सहर की शरर से
छलनी हुए
ख्वाबों के साथ
तन्हा

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on July 23, 2017 at 9:18pm — 4 Comments

झंझावात

धूप की तिरछी किरणें

बारिश की बूँदें

रंभाती हवाएँ

सभी एक संग ...

धूल के कण

मानो उड़ रहे हैं सपने

विचित्र रूप ओढ़े है धरती

सारा कमरा

चौकन्ना हो गया है

असंतोष मुझको है गहरा

लौट-लौट आ रहे हैं

दर्दीले दृश्य दूरस्थ हुई दिशाओं से

भूली भीषण अधूरी कहानी-से

उलझे ख़याल ... 

तुम्हारे, मेरे

मकड़ी के जाल में अटके जैसे

हमारे सारे प्रसंग

जिनका आघात

हम दोनों को…

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Added by vijay nikore on July 23, 2017 at 3:00pm — 27 Comments

एक अतुकांत कविता मनोज अहसास

तुम्हें मेरी लिखावट बहुत पसंद थी

और मुझे तुम्हारी

तुम अक्सर कहती

"जैसे घुमा घुमाकर लपेटकर तुम लिखते हो,ऐसे ही मैं भी लिखना चाहता हूं"

मैं भी कई बार सोचता

"जैसे धीरे धीरे ,सोच सोचकर तुम लिखती हो ना ऐसे ही मैं भी लिखना चाहता हूँ"



बहुत दिनों तक साथ साथ लिखते रहे

और देखते रहे

एक दूसरे की लिखावट को

और मेरी लिखावट मिल गई तुम्हारी लिखावट में

और तुम्हारी लिखावट मिल गई मेरी लिखावट में

एक नया लेख बना

जो न तुम्हारा था न मेरा

और हम… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on July 23, 2017 at 1:22pm — 1 Comment

लगती रही फिर भी भली

जिन्दगी की रेलगाड़ी,

भागती सरपट चली.

 

मिल न पायीं दो पटरियाँ,

साथ पर चलती रहीं.

देख कर अपनों की खुशियाँ,

दीप बन जलती रहीं.

 

दे गयी राहत सफर में,

चाय की इक केतली.

 

मौसमों की मार…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 23, 2017 at 1:11pm — 8 Comments

विरह गीत

हृदय पटल को तेरी यादें , देती चीर।

आकुल रहता मन ये मेरा, सुन बेपीर।



विस्मित होती आत्ममुग्ध सी, थी ये गूँज।

तुझमें सिमटी रहती थी जो, ये अनुगूँज।

पुलकित हो जाया करती थी, हुई अधीर।

हृदय पटल को तेरी यादें, देती चीर।



सुधियों में कर याद तुझे भर , लेती आह।

हुआ हमें अहसास नही अब, बाकी चाह।

किन्तु नही समझे ये आंखें , भरती नीर।

हृदय पटल को तेरी यादें, देती चीर।



आद्र नयन ये हस भी जाएँ, फिर से देख।

प्रेम पुनः जो अंकित करते, हिय… Continue

Added by अनहद गुंजन on July 23, 2017 at 11:44am — No Comments

दुनिया के मर्ज़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"भाई, मैंने तो अब सोच लिया है कि अब नहीं रहना संयुक्त परिवार में!"



"अबे, तुम्हारी बीवी की ये पहली प्रेगनेंसी है। कुछ ही महीनों में डिलेवरी होगी। यही तो सही समय है सबके साथ रहने का!"



"साथ रहने में कोई हर्ज़ नहीं, लेकिन हर रोज़ की टोका-टाकी और दकियानूसी से तंग आ चुका हूं। मैं नहीं चाहता कि गर्भ में पल रहे बच्चे को शुरू से ही धार्मिक चीज़ें सुनवाई जायें। रीति-रिवाज़ों की छाप उस पर पड़े!"



"क्या तुम्हारी बीवी भी!"



"कहां यार, वह तो भारतीय नारी है न।!… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 23, 2017 at 10:47am — 12 Comments

जनता(ब्यथा और प्रण ):-मोहित मुक्त

अन्तर्वेदना से छिन्न-भिन्न

आक्रांत उर की मर्म कराहें ,

अश्रुनिमग्न कातर स्वर में

पूछती हैं किसको पुकारें |

आह भारत-वर्ष हाय

क्या यहीं रह गया है शेष ?

स्वर्णयुक्त इतिहास का-

कुछ ,रहा नहीं भग्न-अवशेष ?

क्यों नहीं कुक्षि तेरी

अब कोई अशोक जन्माती है ?

क्यों नहीं स्वसम्मान की

आज ललकारें लहलहाती हैं ?

जनता कोई खिलौना है-

क्या, गणतंत्रता की सत्ता में ?

नहीं तो फिर गौण-

क्यों ,बन…

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Added by Mohit mishra (mukt) on July 23, 2017 at 8:09am — 6 Comments

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