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मन पर दोहे ...........

मन पर दोहे ...........

मन माने तो भोर है, मन माने तो शाम ।
मन के सारे खेल हैं, मन के सब संग्राम । 1।
हर मन को मिलता नहीं, मन वांछित परिणाम ।
मन फल की चिन्ता करे, मन अशांति का धाम ।2।…
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Added by Sushil Sarna on April 13, 2021 at 1:30pm — 4 Comments

अगर हक़ माँगते अपना कृषक, मजदूर खट्टे हैं (ग़ज़ल)

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

अगर हक़ माँगते अपना कृषक, मजदूर खट्टे हैं

तो ख़ुश्बू में सने सब आँकड़े भरपूर खट्टे हैं

मधुर हम भी हुये तो देश को मधुमेह जकड़ेगा 

वतन के वासिते होकर बड़े मज़बूर, खट्टे…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 12, 2021 at 10:28pm — 5 Comments

कोरोना को हराना है।

हमने तो अब  ये ठाना है

कोरोना   को   हराना  है

अब  साथ  न  छूटेगा  ये 

वादा   हमें   निभाना   है

कोरोना   को   हराना  है... कोरोना को हराना है। 

जाना  हो   जब   ज़रूरी 

सबसे  दो  गज़  की  दूरी  

कर   हाथ    सेनिटाइज़्ड 

और मास्क भी लगाना है 

कोरोना   को    हराना  है... कोरोना को हराना है। 

बाहर  से  जब भी आओ

अच्छी     तरह    नहाओ

ज्वर, छींक हो या  खाँसी

डाॅक्टर को ही दिखाना है 

कोरोना   को   …

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' on April 12, 2021 at 7:02pm — 5 Comments

नग़मा: इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी

22 22 22 22 22 22 22 22

इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी

ना दिल से सियाही निकलेगी ना सांस मुझे लिख पायेगी

जिस रोज़ नये लब गाएंगे जिस रोज़ मैं चुप हो जाऊंगा

इक चाँद फ़लक से उतरेगा इक रूह फ़लक तक जायेगी

फिर नये नये अफ़सानों में कुछ नये नये चहरे होंगे

फिर नये नये किरदारों के किरदार नये गहरे होंगे

फिर कोई पिरोयेगा रिश्तों को नये नये अल्फाज़ों में

फिर कोई पुरानी रश्मों को ढालेगा नये रिवाज़ों…

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Added by Aazi Tamaam on April 11, 2021 at 8:00pm — No Comments

गरीबी ........

गरीबी..........
कैसी होती है गरीबी
शायद
तिमिर के गहन आवरण को
भेदने में असफल होती
जुगनू की
क्षीण सी रोशनी…
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Added by Sushil Sarna on April 11, 2021 at 12:00pm — 2 Comments

लघुकथा-- नहले पर दहला

" कूड़े मल इस दुकान को मैंने खरीद लिया है, अब से एक हफ़्ते में खाली कर देना"

" क्या.... क्या बकवास कर ती हो, मैं कई वर्ष पुराना किरायेदार हूँ, मेरी रोज़ी - रोटी चलती है, यहाँ से! बिल्कुल खाली नहीं करूँगा" ! कूड़े मल कस्बे का बड़ा किराना व्यापारी था! बूढ़े, कमज़ोर राम आसरे का मूल किरायेदार था जिसको उसने किराया देना बंद कर दिया था! हारकर राम आसरे ने दबंग, झगड़ालू औरत सुनहरी देवी को आधी कीमत अग्रिम लेकर पावर आफ अटार्नी कर दी थी! 

कूड़े मल अब परेशान था! भागा-भागा अपने वकील साहब के…

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Added by Chetan Prakash on April 11, 2021 at 4:00am — No Comments

कौन आया काम जनता के लिए- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२



कौन आया काम जनता के लिए

कह गये सब राम जनता के लिए।१।

*

सुख सभी रखते हैं नेता पास में

हैं वहीं दुख आम जनता के लिए।२।

*

देख पाती है नहीं मुख सोच कर

बस बदलते नाम जनता के लिए।३।

*

छाँव नेताओं  के हिस्से हो गयी

और तपता घाम जनता के लिए।४।

*

अच्छे वादे और बोतल वोट को

हो गये तय दाम जनता के लिए।५।

*

न्याय के पलड़े में समता है कहाँ

भोर नेता  साम …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 8, 2021 at 10:01pm — 3 Comments

धूप से ओस की बूंदों ने गुज़ारिश नहीं की (-रूपम कुमार 'मीत')

2122 / 1122 / 1122 / 112

धूप से ओस की बूंदों ने गुज़ारिश नहीं की

मरना मंजूर था जीने की सिफ़ारिश नहीं की [1]

एक ही शहर में हम दोनों का है घर फिर भी

हमने इक दूसरे से मिलने की ख़्वाहिश नहीं की [2]

ख़ुदा के सामने हर शख़्स बराबर है तभी

काफ़िरों के घरों पे संग की बारिश नहीं की [3]

इतने खुद्दार थे हम अपने ही मालिक की तरफ

हाथ फैलाए मगर होंटों ने जुम्बिश नहीं की [4]

इक सफ़ीना हुआ यूँ ग़र्क़ के सब डूब गए

भागने के लिए…

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Added by Rupam kumar -'मीत' on April 8, 2021 at 5:00pm — 3 Comments

नज़्म: मटर

ज़िंदगी भी मटर के जैसी है 

तह खोलो बिखरने लगती है

कितने दाने महफूज़ रहते हैं उन फलियों की आगोशी में

कुछ टेढ़े से कुछ बुचके से कुछ फुले से कुछ पिचके से

हू ब हू रिश्तों के जैसे लगते हैं

कुनबे से परिवारों से कुछ सगे या रिश्तेदारों से

पर सभी आज़ाद होना चाहते हैं कैद से

रिवायतों से बंदिशों से बागवाँ से साजिशों से

ज़िंदगी भी मटर के जैसी है

तह खोलो बिखरने लगती है

(मौलिक व अप्रकाशित) 

आज़ी तमाम

Added by Aazi Tamaam on April 8, 2021 at 2:00pm — 4 Comments

नज़्म: ख़्वाहिश

कोई ख़्वाब न होता आँखों में 

कोई हूक न उठती सीने में

कितनी आसानी होती 

या रब तन्हा जीने में

दिल जब से टूटा चाहत में

रिंद बने पैमानों के

ढलते ढलते ढल गई

सारी उम्र गुजर गई पीने में

यूँ ही सांसें लेते रहना

यूँ ही जीते रहना बस

हर दिन साल के जैसा 'गुजरा

हर इक साल महीने में

दुनिया डूबी लहरों में

हम डूबे यार सफ़ीने में

देखीं कैसी कैसी बातें

अज़ब ग़ज़ब दुनियादारी

वो कितने ना पाक…

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Added by Aazi Tamaam on April 8, 2021 at 11:30am — No Comments

अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास

2122   2122   2122   212

इक न इक दिन आपसे जब सामना हो जाएगा ।

जो भरम दिल में बचा है खुद रिहा हो जाएगा ।

इतने बुत मौजूद है तेरे खुदा के भेष में,

सजदा करते-करते तू खुद से जुदा हो जाएगा ।

सब पुराने पेड़ों को गर काट दोगे तुम यूं ही,

घर सलामत भी रहा तो लापता हो जाएगा।

ढूंढना अब छोड़ दे उस तक पहुँच का रास्ता,

खुद को पाले तो तू खुद ही रास्ता हो जाएगा ।

छोड़ दूँ शेरों सुखन और तेरी यादों का सफर ,

ऐसा करने…

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Added by Manoj kumar Ahsaas on April 8, 2021 at 12:14am — 2 Comments

ग़ज़ल: जैसे जैसे ही ग़ज़ल रुदाद ए कहानी पड़ेगी

2122 1122 2112 2122

जैसे जैसे ही ग़ज़ल रूदाद ए कहानी पड़ेगी

वैसे वैसे ही सनम दिल की फज़ा धानी पड़ेगी

रश्म हर दिल को महब्बत में ये उठानी पड़ेगी

दिल जलाकर भी कसम दिल से ही निभानी पड़ेगी

ख़ुश न होकर भी ख़ुशी दिल में है दिखानी पड़ेगी

कुछ न कहकर भी रज़ा दिल की यूँ सुनानी पड़ेगी

हुस्न वालो की सुनो ना ख़ुद पे भी इतना इतराओ

लम्हा दर लम्हा महंगी तुम्हें न'दानी…

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Added by Aazi Tamaam on April 7, 2021 at 3:00pm — No Comments

( बेजान था मैं फिर भी तो मारा गया मुझे......(ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212

बेजान था मैं फिर भी तो मारा गया मुझे

कल घाट मौत के यूँ उतारा गया मुझे (1)

मैं जा रहा था रूठ के लेकिन सदा न दी

था सामने खड़ा तो पुकारा गया मुझे (2)

मैं एक साँस में कभी बाहर न आ सकूँ

दरिया में और गहरे उतारा गया मुझे (3)

अक्सर यही हुआ है मैं जब भी दुरुस्त था

बिगड़ा नहीं था फिर भी सुधारा गया मुझे (4)

देता रहूँ सबूत मैं कब तक वज़ूद का

हर बार हर क़दम पे नक़ारा गया मुझे…

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Added by सालिक गणवीर on April 7, 2021 at 1:51pm — 3 Comments

हमने कहीं पे लौट आ बचपन क्या लिख दिया-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२



हमने कहीं पे लौट आ बचपन क्या लिख दिया

बोली जवानी क्रोध  में दुश्मन क्या लिख दिया।१।

*

घर के बड़े  भी  काट  के  पेड़ों  को  खुश हुए

बच्चों ने चौड़ा चाहिए आँगन क्या लिख दिया।२।

*

तस्कर तमाम  आ  गये  गुपचुप  से  मोल को

माटी को यार देश की चन्दन क्या लिख दिया।३।

*

आँखों से उस की धार  ये  रुकती नहीं है अब 

भाता है जब से आपने सावन क्या लिख दिया।४।

*

वो  सब  विहीन  रीड़  के  श्वानों  से  बन …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 7, 2021 at 1:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल-मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना

121   22   121   22   121   22

अगर कभी जो क़रार आये झिझोड़ देना

मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना

बिना तुम्हारे  ये ज़िन्दगी अब  कटेगी कैसे

जो तू नहीं तो नफ़स की डोरी भी तोड़ देना

जरा  सी कोई  रहे  हरारत  न जान  बाकी

कि  जाते जाते  बदन  हमारा निचोड़ देना

कभी हमारे ग़मों पे तुझको दुलार आये

वहीं उसी पल कतार भावों की मोड़ देना

तेरे ग़मो का उसे न होगा पता, है मुमकिन

मगर सिरा 'ब्रज' उदासियों का न जोड़…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 7, 2021 at 10:30am — 10 Comments

ग़ज़ल

2122    1212    22/ 112

  

भारती धर्म  अपना क़द करे हैं !

माँ की खायी कसम न मद करे हैं !

तीरगी को हटाया जाँ हमी ने,

रघुवंशी  हम उजालों क़द  करे है !

मोमबत्ती भी जिनसे जल न सकी,

सूरज  होने का दावा ज़द करे  हैं !

जाने  क्या वो अँधेरों  के  हामी 

वरिष्ठों के है अदु वो हद करे  हैं !

सावन  अंधे जुड़ाव  हो  कैसे ?

है  रतौंधी  उन्हें  अहद  करे…

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Added by Chetan Prakash on April 7, 2021 at 9:30am — No Comments

ग़ज़ल: माँ

2212 2212 2222 2

मुझको तेरी आवाज़ से खुशबू आती है

तेरे हर इक अल्फाज़ से खुशबू आती है

आँचल से जैसे इत्र सा झरता रहता है…

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Added by Aazi Tamaam on April 7, 2021 at 8:00am — 4 Comments

मिर्च कोई आग पर बोता है क्या- ग़ज़ल

2122 2122 212

मिर्च कोई आग पर बोता है क्या,
लोन-पानी ज़ख्म को धोता है क्या।

हो रहा जो अब भले होता है क्या,
कोई अपने आप को खोता है क्या।

बेबसी को तू हटा औज़ार बन,
इसका दामन थाम कर रोता है क्या।

इश्क़ करता, सब्ज़ धरती देख ले,
बीज इसका तू कभी बोता है क्या।

'बाल' चुप्पी साध लेना जुर्म पर,
जुर्म से खुद कम कभी होता है क्या।

लोन-नमक

मौलिक अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on April 6, 2021 at 8:06pm — No Comments

गर तबीयत जाननी है देश की -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२



सादगी से  घर  सँभाला कीजिए

लालसा को मत उछाला कीजिए।१।

*

यह धरा  तो  रौंद  डाली  जालिमों

चाँद का मुँह अब न काला कीजिए।२।

*

करके सूरज से उधारी आब की

चाँद से कहते उजाला कीजिए।३।

*

जब नया देने की कुव्वत ही नहीं

मत फटे में  पाँव  डाला कीजिए।४।

*

गर तबीयत  जाननी  है  देश की

सबसे पहले ठीक आला कीजिए।५।

*

चाँद तारे सिर्फ महलों को न दो

झोपड़ी में भी उजाला कीजिए।६।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 6, 2021 at 6:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल: रोयेंगे और मुस्कुरायेंगे

2122 1212 22/112

रोयेंगे और मुस्कुरायेंगे

उम्र भर तुम को गुनगुनायेंगे

तुम जो रहते हो बादलों में सनम

तुम को हम कैसे भूल पायेंगे

जब भी देखेंगे आसमानों को

दिल के अरमाँ मचल ही जायेंगे

ग़म की आँधी न रोक पायेंगे

अश्क आँखों से बहते जायेंगे

कैसे रोकेंगे हसरतें दिल की

चीख कर तुम को फ़िर बुलायेंगे

जी न पायेंगे मर न पायेंगे

दिल जलायेंगे…

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Added by Aazi Tamaam on April 5, 2021 at 11:00am — No Comments

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"बहुत शुक्रिय:,जनाब । मुझे भी ओबीओ के बग़ैर चैन नहीं मिलेगा, ओबीओ के तरही मुशाइर: में शिर्कत की भरपूर…"
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Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post मन पर दोहे ...........
"आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - - - सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है ।"
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Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post मन पर दोहे ...........
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार । आप सही ✅ हैं सर । मैं अभी संशोधित…"
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अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Sushil Sarna's blog post मन पर दोहे ...........
"जनाब सुशील सरना जी आदाब, मन पर अच्छे दोहे हुए हैं, बधाई स्वीकार करें।  हालांकि मैं इस विधा का…"
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