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एक ग़ज़ल मनोज अहसास

एक ताज़ा ग़ज़ल

1222    1222     1222    1222

उदासी घिर के आई है चलो फिर कुछ नया कह दें

पलक को बेवफा कह दें या पैसे को खुदा कह दें

यहाँ से टूट कर जुड़ना नहीं मुमकिन मगर फिर भी

चलो एक बार फिर से आंसुओं को अलविदा कह दें

समंदर सी बड़ी नाकामियां है सामने अपने

ये सोचा है कि अपना नाम मिट्टी पर लिखा कह दें

तुम्हारे आने की उम्मीद की भी क्या जरूरत है

हमें ही लोग शायद कुछ दिनों में जा चुका कह दें

ये धड़कन…

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Added by Manoj kumar Ahsaas on January 19, 2019 at 10:39pm — 1 Comment

गज़ल

122 122 122 122

ग़ज़ल

****

है दुनिया में कितनी रवानी न पूछो

महकती है कितनी कहानी न पूछो

इसे चाँद के पार जाना था मिलने

कहाँ रह गई ज़िंदगानी न पूछो

रहा दर बदर आशिक़ी का मैं मारा

गई बीत कैसे जवानी न पूछो

तेरे इश्क़ में मैंने गोता लगाया

मिली मुझको क्या क्या निशानी न पूछो

मुहब्बत की रस्में निभाते निभाते

रहा चश्म में कितना पानी न पूछो

कभी ग़म के बादल कभी सर्द आहें

पड़ीं कितनी बातें भुलानी न…

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Added by क़मर जौनपुरी on January 19, 2019 at 4:07pm — 1 Comment

एक बोझ भरी गठरी: लघुकथा

एक तो पिछला कर्ज ही अभी तक माफ नहीं हुआ था उस पर इस बार फिर फसल के चौपट होने और साहूकार के ब्याज की दोहरी मार उसके लिए असहनीय थी, घर में सभी को कुपोषण और बीमारी ने घेर रखा था। इस बार ना तो मदद को सरकार थी, ना ही लोग।

आखिरकार उसने शहर जाकर मजदूरी या कुछ और कर कमाने का फैसला लिया और जब वह लगभग नग्न बदन, एक बोझ भरी गठरी जिसमें कुछ सुखी रोटी और प्याज थी, लेकर , शहर के चौराहे नुमा पुल पर पहुंचा तो उसने पाया की उसके लिए सभी रास्ते बंद हैं और अवसाद ग्रस्त होकर उसने उसी पुल से नीचे…

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Added by Hari Prakash Dubey on January 19, 2019 at 12:30pm — 1 Comment

झूठ फैलाते हैं अक़्सर जो तक़ारीर के साथ (१५)

(२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ )

झूठ फैलाते हैं अक़्सर जो तक़ारीर के साथ

खेल करते हैं वतन की नई तामीर के साथ 

***

ख़्वाब देखोगे न तो खाक़ मुकम्मल होंगे 

ये तो पैवस्त* हुआ करते हैं ताबीर के साथ 

***

जो बना सकते नहीं चन्द निशानात कभी 

हैफ़* क्या हश्र करेंगे वही तस्वीर के साथ 

***

ग़म मेरे पास हमेशा नहीं रह पाते हैं 

कोई शम्शीर कहाँ रहती है…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 19, 2019 at 2:30am — 1 Comment

मेरे आसमान का चाँद ...

आसमान का चाँद :

शीत रैन की

धवल चांदनी में

बैचैन उदास मन

बैठ जाता है उठकर

करने कुछ बात

आसमान के चाँद से

मैं अकेली

छत की मुंडेर पर

उसकी यादों में

स्वयं को आत्मसात कर

मांगती हूँ अपना प्यार

आसमान के चाँद से

केसरिया चांदनी में

उसका प्यार

लेकर आया था

मेरे पास

मौन चाहतें

उदास प्यास

अदृश्य समर्पण

कहती रही

मौन व्यथा

देर तक

आसमान का चाँद…

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Added by Sushil Sarna on January 18, 2019 at 5:53pm — 1 Comment

मेरे घर अब उजाला बन के मुझमे कौन रहता है

बह्र 1222-1222-1222-1222

बता हर सिम्त तेरा बनके मुझमें कौन रहता है।।

तुझे लेकर अकेला बनके मुझमे कौन रहता है।।

अगर अब मुस्कुराते हो मेरी जद्दोजहद से तुम।

तो बोलो आज तुम सा बनके मुझमें कौन रहता है।।

तुम्हारा प्यार, तुम सा यार तेरी यादें वो सारी।

भुला हर कुछ अवारा बनके मुझमे कौन रहता है।।

गरीबी के दिये सा गर्दिशों में भी मैं जगमग हूँ।

मेरे घर अब उजाला बन के मुझमें कौन रहता है।।

बहा कर खत तेरे सारे यूँ गंगा के…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on January 17, 2019 at 6:35pm — 1 Comment

खुशी बाँटो कि बँटकर  भी  - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२२/१२२२-/१२२२/१२२२

किसी के घर बहुत आवागमन से प्यार कम होगा

इसी  के  साथ  हर बारी  सदा  सत्कार कम होगा।१।



जरूरत सब को पड़ती है यहाँ कुछ माँगने की पर

हमेशा   माँगने   वाला  सही  हकदार  कम  होगा।२।



खुशी बाँटो कि बँटकर  भी  नहीं भंडार होगा कम

अगर साझा करोगे दुख तो उसका भार कम होगा।३।



नजाकत देख  रूठो  तो  मिलेगा  मान रिश्तों को

जहाँ रूठोगे पलपल में सुजन मनुहार कम होगा।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 17, 2019 at 5:58pm — 3 Comments

हास्य कुंडलिया

(1)

सारे घर के लोग हम, निकले घर से आज

टाटा गाड़ी साथ ले, निपटा कर सब काज।

निपटा कर सब काज, मौज मस्ती थी छाई

तभी हुआ व्यवधान, एक ट्रक थी टकराई।

ट्रक पे लिखा पढ़ हाय, दिखे दिन में ही तारे

'मिलेंगे कल फिर बाय', हो गए घायल सारे।।

(2)

खोया खोया चाँद था, सुखद मिलन की रात

शीतल मन्द बयार थी, रिमझिम सी बरसात।

रिमझिम सी बरसात, प्रेम की अगन लगाये

जोड़ा बैठा साथ, बात की आस लगाये।

गूंगा वर सकुचाय, गोद में उसकी सोया

बहरी दुल्हन पाय, चैन जीवन का…

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Added by सुचिसंदीप अग्रवालl on January 17, 2019 at 4:23pm — 9 Comments

ग़ज़ल (दिल ने जिसे बना लिया गुलफाम दोस्तो)

ग़ज़ल (दिल ने जिसे बना लिया गुलफाम दोस्तो)

(मफ ऊल _फाइ लात _मफा ईल _फाइ लुन)

दिल ने जिसे बना लिया गुलफाम दोस्तो l

उसने दिया फरेबी का इल्ज़ाम दोस्तो l

मैं ने खिलाफे ज़ुल्‍म जुबां अपनी खोल दी

अब चाहे कुछ भी हो मेरा अंजाम दोस्तो l

दिल को अलम जिगर को तड़प अश्क आँख को

मुझ को दिए ये इश्क़ ने इनआम दोस्तो l

लाए हैं अंजुमन में किसी अजनबी को वह

दिल में न यूँ उठा मेरे कुहराम दोस्तो l

सच्चा है यार वो उसे पहचान…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 17, 2019 at 3:57pm — 11 Comments

ग़ज़ल

1222 1222 122

अभी तक आना जाना चल रहा है ।

कोई रिश्ता पुराना चल रहा है ।।

सुना है शह्र की चर्चा में आगे ।

तुम्हारा ही फ़साना चल रहा है ।।

इधर दिल पर लगी है चोट गहरी ।

उधर तो मुस्कुराना चल रहा है ।।

कहीं तरसी जमीं है आब के बिन ।

कहीं मौसम सुहाना चल रहा है ।।

तुझे बख्सा खुदा ने हुस्न इतना ।

तेरे पीछे ज़माना चल रहा है ।।

दिया था जो वसीयत में तुम्हें वो ।

अभी तक वह खज़ाना चल रहा है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on January 16, 2019 at 11:37pm — 14 Comments

'वतन को आग लगाने की चाल किसकी है'

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन

1212     1122     1212      22

ग़ज़ल

उठा है ज़ह्न में सबके सवाल,किसकी है

तू जिस पे नाच रहा है वो ताल किसकी है

खड़े हुए हैं सर-ए-राह आइना लेकर

हमारे सामने आए मजाल किसकी है

ज़रा सा ग़ौर करोगे तो जान जाओगे

वतन को आग लगाने की चाल किसकी है

हमें तू बेवफ़ा कहता है ,ये तो देख ज़रा

लबों पे सबके वफ़ा की मिसाल किसकी…

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Added by Samar kabeer on January 16, 2019 at 8:30pm — 9 Comments

मातृ भूमि के लिए ..

मनहरण धनाक्षरी  ..

तन मन प्राण वारूँ वंदन नमन करूँ 

गाऊँ यशोगान सदा   मातृ भूमि के लिए ..

पावन मातृ भूमि ये, वीरों और शहीदों  की 

जन्मे राम कृष्ण यहाँ हाथ सुचक्र लिए ,

ये बेमिसाल देश है संस्कृति भी विशेष है

पूजते पत्थर यहाँ  आस्था अनंत लिए 

शौर्य और त्याग की  भक्ति और भाव की

कर्म पथ चले सभी हाथ में ध्वजा  लिए .....

.

अप्रकाशित /मौलिक 

महेश्वरी कनेरी 

Added by Maheshwari Kaneri on January 16, 2019 at 5:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल : अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं

बह्र : 221 1221 1221 122

अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं

वो लोग किसी और ज़माने के लिए हैं

कुछ लोग हैं जो आग बुझाते हैं अभी तक

बाकी तो यहाँ आग लगाने के लिए हैं

यूँ आस भरी नज़रों से देखो न हमें तुम

हम लोग फ़क़त शोर मचाने के लिए हैं

हर शख़्स यहाँ रखता है अपनों से ही मतलब

जो ग़ैर हैं वो रस्म निभाने के लिए हैं

अब क्या किसी से दिल को लगाएँगे भला हम

जब आप मेरे दिल को दुखाने के लिए…

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Added by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 4:00pm — 10 Comments

जागो उठो हे लाल तुम (मधुमालती छंद)

(14 मात्राओं का सम मात्रिक छंद, सात सात मात्राओं पर यति, चरणान्त में रगण अर्थात गुरु लघु गुरु)

जागो उठो, हे लाल तुम, बनके सदा, विकराल तुम ।

जो सोच लो, उसको करो, होगे सफल, धीरज धरो।।

भारत तुम्हें, प्यारा लगे, जाँ से अधिक, न्यारा लगे।

मन में रखो, बस हर्ष को, निज देश के, उत्कर्ष को।।

इस देश के, तुम वीर हो, पथ पे डटो, तुम धीर हो।

चिन्ता न हो, निज प्राण का, हर कर्म हो, कल्याण का।।

हो सिंह के, शावक तुम्हीं, भय हो तुम्हें,…

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Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 16, 2019 at 6:00am — 8 Comments

अपनों का दर्द- लघुकथा

दो तीन बार सोमारू आवाज़ लगा चुका था, हर बार वह उसकी तरफ उचटती नजर से देखता और खाट पर लेटे लेटे सोचता रहा. अंदर से तो उसे भी लग रहा था कि उसको जाना चाहिए लेकिन फिर उसका मन उसे रोक देता. वैसे तो बात बहुत बड़ी भी नहीं थी, इस तरह की घटनाओं से उसको अक्सर दो चार होना ही पड़ता था. लेकिन अगर कोई बड़ी जात वाला यह सब कहता तो उसे तकलीफ नहीं होती थी.

"दद्दा, जल्दी चलो, सब लोग तुम्हरी राह देखत हैं", सोमारू ने इस बार थोड़ी तेज आवाज में कहा.

वह खटिया से उठा और बाहर निकलकर लोटे से मुंह धोने लगा. गमछी…

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Added by विनय कुमार on January 14, 2019 at 6:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल-बलराम धाकड़ (किसने सूरज यहाँ खंगाले हैं)

2122 1212 112/22
किसने सूरज यहाँ खंगाले हैं।
कितने मैले से ये उजाले हैं।
आज के दौर के ये अहल-ए-वतन,
बस दरकते हुए शिवाले हैं।
अब तो किस्सा तमाम ही कर दे,
ऐ हुक़ूमत! तेरे हवाले हैं।
सच तिजोरी में क़ैद रख्खा…
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Added by Balram Dhakar on January 14, 2019 at 4:44pm — 12 Comments

जो पतंगों को उड़ाता है।

जो पतंगों को उड़ाता है।
डोर खुद भी छोड़ जाता है।
जख्म सबको दिखाना मत,
हर न मरहम इस लगाता है।
पास आकर बैठ जाये जो,
क्यूँ वो आसूँ फिर छुपा ता है।
क्या हुआ देखों अँधेरे को,
बीज सपने क्यूँ चुराता है।
कलम कैसी भी रही होगी,
सोच अक्सर वो लिखाता है।
“मौलिक व अप्रकाशित

Added by मोहन बेगोवाल on January 14, 2019 at 4:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल: ख़त्म इकबाल-ए-हुकूमत को न समझे कोई (१४)

(२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ )

ख़त्म इकबाल-ए-हुकूमत* को न समझे कोई 

और लाचार अदालत को न समझे कोई 

***

मीर सब आज वुजूद अपना बचाने में लगे 

आम जनता की ज़रूरत को न समझे कोई 

***

ख़ून के रिश्ते भुला देती है जो इक पल में 

हैफ़ !भारत की सियासत को न समझे कोई 

***

जिस्म को छू लिया और इश्क़ मुकम्मल समझा 

इतना आसाँ भी महब्बत…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 14, 2019 at 12:30pm — 11 Comments

फर्स्ट-साईट-लव (लघुकथा )

दोनों सर्विस में थे I दोनों एक ही मंजिल के दैनिक रेल यात्री थे I दोनों के बीच आँखों-आँखों में प्यार का व्यापार कुछ माह चला I प्लेटफार्म में, ट्रेन के कम्पार्टमेंट में दोनों एक दूसरे को ढूंढते I लडकी सोचती कि पहले लडका पहल करे, पर लडका नैन- सुधारस पान कर ही संतुष्ट था I एक दिन लडकी की सहेलियों ने कहा –‘ मि० शील-संकोच से तुझे ही बात करनी पड़ेगी i’

            लडकी ने साहस किया I एक दिन ट्रेन से उतरकर उसने लडके से कहा -‘आप को ऐतराज न हो तो हम साथ-साथ काफी पी सकते हैं…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 13, 2019 at 8:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल : कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो

बह्र : 2122 1122 1122 22

कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो

आओ बैठो यहाँ पे हश्र हमारा देखो

कैसे हिन्दू को किया दफ़्न वहाँ लोगों ने

एक मुस्लिम को यहाँ कैसे जलाया देखो

जिस तरह लूटा था दिल्ली को कभी नादिर ने

उसने लूटा है मेरे दिल का ख़ज़ाना देखो

आदमी वो नहीं होता जो दिखा करता है

जो नहीं दिखता हो जैसा उसे वैसा देखो

नूर से जल के, फ़लक से कोई साज़िश करके

चाँद को कैसे सितारों…

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Added by Mahendra Kumar on January 13, 2019 at 7:30pm — 17 Comments

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