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नई रुत का अभी तूफ़ान बाक़ी है... ग़ज़ल- बलराम धाकड़

१२२२,१२२२,१२२२

नई रुत का अभी तूफ़ान बाकी है।

निज़ामत का नया उन्वान बाकी है।

निवाले छीनकर ख़ुश हो मेरे आका,

अभी अपना ये दस्तरख़ान बाकी है।

अभी टूटा नहीं है सब्र का पुल भी,

ज़रा सा और इत्मीनान बाकी है।

अभी थोड़ी सी घाटी ही तो खोई है,

अभी तो सारा हिन्दुस्तान बाकी है।

हथेली पर तुम्हारी रख तो दीं आँखें,

हमारे पास सुरमेदान बाकी है।

कयामत के बचे होंगे महीने कुछ,

अभी इंसान में इंसान बाकी…

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Added by Balram Dhakar on January 23, 2018 at 6:18pm — No Comments

ग़ज़ल-ये'  माया मोह का  चक्कर है’ कैसे काटे’ बंधन को|

काफिया :अन ; रदीफ़ : को

बहर : १२२२  १२२२  १२२२  १२२२

अलग अलग बात करते सब, नहीं जाने ये' जीवन को

ये'  माया मोह का  चक्कर है’ कैसे काटे’ बंधन को|

किए  आईना’दारी मुग्ध  नारी जाति  को जग में

नयन मुख के  सजावट  बीच भूले  नारी’ कंगन को |

सुधा रस  फूल का पीने दो’ अलि  को पर कली को छोड़

कली को नाश कर अब क्यों उजाड़ो पुष्प गुलशन को|

बदी की है वही जिसके लिए हमने दुआ माँगी

न ईश्वर दोस्त ऐसे दे मुझे या मेरे…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on January 23, 2018 at 11:02am — No Comments

अपनी अपनी समझ (लघु कथा)

गुरु द्रोणाचार्य ने दुर्योधन एवं युधिष्ठिर को एक-एक अच्छे और बुरे व्यक्ति को ढूँढ़ कर लाने को कहा।शाम को दोनों खाली हाथ वापस आ गए।

-क्यूँ, क्या हुआ?खाली हाथ क्यूँ आया',गुरूजी ने दुर्योधन से पूछा।

-गुरुदेव! मैंने बहुत कोशिश की,पर कोई भी ऐसा न मिला जिसमें एक भी बुराई न हो।

-युधिष्ठिर ,तुम क्यूँ खाली हाथ आ गए?'

-आचार्य! मुझे कोई ऐसा न मिला जिसमें एक भी अच्छाई न हो।'

आचार्य मुस्कुराये।

-"युधिष्ठिर समझ गए,पर दुर्योधन आज भी नासमझ बना बैठा है;चाहे लेखन में हो,पत्रकारिता…

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Added by Manan Kumar singh on January 23, 2018 at 8:00am — 1 Comment

आज़ादी के बाद सभी को, देश बनाना होता है..../ अलका 'कृष्णांशी'

छन्द- तांटक

जात धरम और ऊँच नीच का, भेद मिटाना होता है

आज़ादी के बाद सभी को, देश बनाना होता है

कैसी ये आज़ादी है औ, क्या हम सब ने पाया है

तहस नहस कर डाला सब कुछ ,दिल में जहर उगाया है

फुटपाथों पर फ़टे कम्बलों, में जब बचपन रोता है

तब प्रगति के आसमान की ,धुँध में सब कुछ खोता है

आज़ादी के बाद सभी को, देश बनाना होता है

क्या किसान औ क्या जवान है, सबकी हालत खस्ता है

टैक्स भरें भूखे मर जाएँ ,क्या ये ही इक रस्ता है

बीमारी…

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Added by अलका 'कृष्णांशी' on January 23, 2018 at 12:54am — 1 Comment

हमने हरिक उम्मीद का पुतला जला दिया- सलीम रज़ा

221 2121 1221 212

हमने हरिक उम्मीद का पुतला जला दिया

दुश्वारियों को पांव के नीचे दबा दिया

-

मेरी तमाम उँगलियाँ घायल तो हो गईं

लेकिन तुम्हारी याद का नक्शा मिटा दिया  

-

मैंने तमाम छाँव ग़रीबों में बांट दी

और ये किया कि धूप को पागल बना दिया

-

उसके हँसीं लिबास पे इक दाग़ क्या लगा 

सारा  ग़ुरूर ख़ाक़ में उसका मिला दिया 

-

जो  ज़ख्म  खाके भी रहा है आपका सदा 

उस दिल पे फिर से आपने खंज़र चला दिया

-

उसने निभाई ख़ूब मेरी दोस्ती "…

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Added by SALIM RAZA REWA on January 22, 2018 at 9:55pm — 14 Comments

बसंत - लघुकथा –

बसंत - लघुकथा –

रजनी के पति का जन्म बसंत पंचमी को हुआ था इसलिये घरवालों ने उसका नाम बसंत ही रख दिया था। रजनी उसके जन्म दिन को खूब जोश  के साथ मनाती थी। शादी को चार साल हुए थे लेकिन अभी तक उसकी गोद खाली थी। इसका एक मुख्य कारण उसके पति का सेना में होना भी था। चूंकि बसंत की तैनाती सीमा पर थी अतः परिवार साथ नहीं रख सकता था।

अभी कुछ दिन पहले एक फोन आया था कि बसंत लापता है, तलाश जारी है। रजनी के अरमानों पर तो मानो वज्रपात हो गया था। वह बसंत के जन्म दिन के लिये क्या क्या सपने बुन रही…

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Added by TEJ VEER SINGH on January 22, 2018 at 6:20pm — 5 Comments

असाधारण आस

असाधारण आस

हवा की लहर का-सा

हल्का स्पर्ष

कि मानो कमरे में तुम आई

मेरे कन्धे पर हल्का-सा हाथ ...

छू कर मुझे, स्वपन-सृष्टि में

पुन: विलीन हो गई

कुछ कहा शायद

जो अनसुना रहा

या जो न कहा

वह मेरे खयालों ने सुना

कोई एक खयाल अधूरा

जो पूरा न हुआ

कण-कण काँप रहे तारों के

तिमिर-तल के तले

खयाल जो पूरा न हुआ

मुराद

बन कर रह गया,…

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Added by vijay nikore on January 22, 2018 at 12:33pm — 7 Comments

'रिश्तों का बसंत' (लघुकथा)

"ज़्यादा मत उड़ो, ज़मीन पे रहो; घर-गृहस्थी पे ध्यान दो, समझे!"

"ऐसा क्यों कह रहे हैं बाबूजी, मुझसे क्या ग़लती हुई?"

"ग़लती नहीं, ग़लतियां कर रहे हो मियां!"

" समझा नहीं! क्या मेरी साहित्यिक यात्राओं से आपको कोई कष्ट?"

" मुझे ही नहीं, हम सब को तक़लीफ है! सुना है कि कल फिर तुम दिल्ली से क़िताबें सूटकेश में भर कर लाये हो! पगलिया गये हो क्या?"

"बाबूजी, ये वे पुस्तकें हैं जिनमें मेरी रचनाएं प्रकाशित हुई हैं या जिन्हें पढ़कर मुझे अपना लेखन सुधारना है!"

"अब बहू ही तुम्हें…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 22, 2018 at 4:34am — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मखमल के गद्दों पे गिरगिट सोए हैं (नवगीत 'राज')

मखमल के गद्दों पे गिरगिट सोए हैं

कंठ चीर तरु सरकंडों के

अल्गोज़े की बीन बनी है

अंतड़ियों के बान पूरकर

तिलचट्टों ने खाट बुनी है

मजबूरी ने कोख में फ़ाके बोए हैं

 

लूट खसोट के दंगल भिड़तु

किसने लूटी किसकी जाई

बुक्का फाड़ देवियाँ रोती

सनी लहू में साँजी माई

कंधों पे संयम के मुर्दे ढोए हैं

 

छल के पैने नाखूनों से

देह खुरचते जात धरम की

मक्कारी की आरी लेकर

लाश बिछाते लाज शरम…

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Added by rajesh kumari on January 21, 2018 at 10:08pm — 10 Comments

बढ़े तो दर्द अक्सर टूटता है-ग़ज़ल


1222 1222 122
बढ़े तो दर्द अक्सर टूटता है
अबस आँखों से झर कर टूटता है

गुमाँ ने कस लिया जिस पर शिकंजा
भटकता है वो दर-दर,टूटता है

नहीं गम घर मेरे आता अकेले
कि वो तो कोह बनकर टूटता है

सुने गर चीख बच्चे की तो देखो
रहा जो सख़्त पत्थर टूटता है

बजें बर्तन हमेशा साथ रह कर
भला इनसेे कभी घर टूटता है

मौलिक अप्रकाशित

अबस:बेबस

कोह:पहाड़

Added by सतविन्द्र कुमार on January 21, 2018 at 9:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल...धूल की परतें-बृजेश कुमार 'ब्रज

1222 1222 1222 1222

गुलाबों से किताबों तक समाईं धूल की परतें

जरा देखो तो अब माथे पे आईं धूल की परतें!!

ये किस आगोश ने सारे शहर को घेर के रक्खा

घना है कोहरा या फिर हैं छाईं धूल की परतें?

गया इक वक़्त वो आया न तो सन्देश ही आया

हमीं ने रिश्ते नातों पर चढ़ाईं धूल की परतें

गिला इस बात का उनसे करें भी तो करें कैसे

गमे दिल ने मेरे लब पर सजाईं धूल की परतें

बड़ी मगरूरियत से छोडीं थीं वो गाँव की गलियाँ

मगर 'ब्रज' को यही गम है कमाईं धूल की…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 21, 2018 at 7:05pm — 20 Comments

ताकत कलम की

हे भारत के वीर युवाओं,

कर लो नमन माँ सरस्वती को,

दिखा दो ताकत दुनियाँ को,

कितनी शक्ति है तेरे कलमों में!!

कोई बाँट ना पाये हमको,

ऐसा इतिहास लिखो युवाओं,

हर घर में वीर जन्मा है,

बस कोई उन्हें जगा दो!!

तलवार नहीं अपनी-अपनी कलम उठाओ,

देश में ऐसा क्रान्ति लाओ,

लूटेरे और भ्रष्टाचारियों को,

अपनी कलम की ताकत दिखा दो!!

कलम की ताकत को समझ लो युवाओं,

ये बिन चिंगारी के भी आग जलाती है,

देश के गद्दारों और दुश्मनों को, …

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Added by Sushil Kumar Verma on January 21, 2018 at 12:00pm — 1 Comment

शक्करपारे (लघुकथा) -सुनील वर्मी

"हैलो, भैया यहाँ मूर्ति चौक पर एक भयानक एक्सीडेंट हो गया है| आप जल्दी आईये|" शहर की आपातकालीन सेवा के नम्बर पर एक फोन आया|

संबंधित निर्देश मिलते ही चालक ने एंबुलेंस स्टार्ट की, तभी उसका मोबाईल बजा|

"सुनो, मुनिया को बहुत तेज़ बुखार है|" फोन उठाने पर दूसरी तरफ से उसकी पत्नी का स्वर आया|

"अभी रूको, मुझे थोड़ा समय लगेगा| एक एमरजेंसी है, तुम तब तक मुनिया के सिर पर ठंडे पानी की पट्टी करो| मैं समय मिलते ही आता हूँ|"

फोन रखकर उसने गाड़ी को कुछ आगे बढ़ाया ही था कि पास बैठे सहायक ने…

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Added by Sunil Verma on January 21, 2018 at 10:14am — 3 Comments

कविता- बसंत


हृदय की फुलवारी में
राग-बसंती छिड़ गया
अंग-प्रत्यंग प्रफुल्लित
आनंदित हो गया
चहुँदिश दिशा में
छा गया यौवन
लग गया बाग़ों में फिर से
सरसों , जूही , केतकी का मेला
चटखने लगी कमसिन कलियाँ
उन्हें भी प्रेम निमंत्रण मिलने लगा
मतवाले भँवरों का कारवाँ चला
देखो, कामदेव का जादू फिर चला ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on January 21, 2018 at 10:06am — 15 Comments

अक़्ल पर ताले (लघुकथा)

शहर की व्यस्ततम सड़क पर रुके वाहनों और उनके हॉर्न्स की आवाज़ों पर किसी धनाढ्य परिवार की बारात का डीजे बैन्ड हावी हो चुका था। लोग लाइट्स से घिरे दूल्हे के नज़दीक चल रहे डांस के मज़े ले रहे थे। दुकानों पर खड़े ग्राहक भी किसी तरह झांक-झांक कर सजे-धजे युवा बारातियों का नृत्य देखने और आँखें सेंकने की कोशिश कर रहे थे। वहीं पास की पान की दुकान पर खड़े एक बुज़ुर्ग ने नज़दीक़ खड़े परिचित युवक से पूछा - "ये कौन से गाने पर डांस कर रहे हैं , मुझे तो बोल समझ में ही नहीं आ पा रहे…
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Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 20, 2018 at 10:35pm — 5 Comments

लघुकथा - गवाह –

 लघुकथा - गवाह –

नेताजी की हवेली में काम करने वाली चंपा की नाबालिग लड़की रूपा की नेताजी के लड़के ने ज़बरन इज्जत लूट ली। नेताजी ने साम, दाम, दंड और भेद सब हथकंडे अपना लिये, लेकिन चंपा किसी भी तरह मामले को रफ़ा दफ़ा करने को राजी नहीं हुयी।

आखिरकार नेताजी अपनी औक़ात पर आ गये। चंपा को बोल दिया,"जा जो तेरी मर्जी हो कर ले"।

चंपा भी इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी। चीख चीख कर सारी बस्ती इकट्ठा कर ली। चंपा के दो चार पुराने शुभ चिंतकों ने मशविरा दे डाला कि सब जुलूस लेकर थाने चलो…

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Added by TEJ VEER SINGH on January 20, 2018 at 8:54pm — 7 Comments

तेरे नज़दीक ही हर वक़्त ....”संतोष”

 

फ़ाइलातुन फ़ईलातुन फ़ईलातुन फ़ेलुन

तेरे नज़दीक ही हर वक़्त भटकता क्यों हूँ

तू बता फूल के जैसा मैं महकता क्यों हूँ

मैं न रातों का हूँ जुगनू न कोई तारा पर

उसकी आँखों में मगर फिर भी चमकता क्यों हूँ

इस पहेली का कोई हल तो बताओ यारो

हिज्र की रातों में आतिश सा दहकता क्यों हूँ

घर बनाया है तेरे दिल में उसी दिन से सनम

सारी दुनिया की निगाहों में खटकता क्यों हूँ

हासिदों को बड़ी तश्वीश है इसकी…

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Added by santosh khirwadkar on January 20, 2018 at 11:21am — 6 Comments

वो कहते हैं मेरी पहचान को मिटटी में मिला डाला

वो कहते हैं मेरी पहचान को मिटटी में मिला डाला

बह्र-1222-1222-1222-1222

वो कहतें हैं मेरी पहचान को मिटटी में मिला डाला।।

मैं कहता हूँ पुरानी थी नया रिश्ता बना डाला।।

न भूला कर की रिश्ते में मैं तेरा बाप हूँ बेटा।

कहाँ भूला यही तो सोंच उल्फत को भुना डाला।।

मैं कहता हूँ मेरी पहचान इक दिन आप की होगी।

वो बोले तुझ से कितने  बीज बो कर के उगा डाला ।।

मुझे अब तक यकीं होता न उल्फत की मिसालों पर।

मुहब्बत नाम है किसका उसे किसका बना…

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Added by amod srivastav (bindouri) on January 19, 2018 at 7:29pm — 2 Comments

मुझे है भला क्या कमी जिंदगी से

बह्र- 122-122-122-122

मुझे है भला क्या कमी जिंदगी से।।

है रिश्ता मेरा तीरगी ,रौशनी से।।

मुझे बज्म इतना न पहचां रही है।

है पहचान मेरी-तेरी माशुकी से।।

कई बार गुजरे हैं तेरे शह्र से।

तेरी आशिक़ी से तेरी बेरुख़ी से।।

मुहब्बत के कुछ ऐसे क़िस्से सुने हैं।

की डर लगता है आज की आशिक़ी से।।

दिये की जरुरत किसे अब नही है?

बता किसकी कब है बनी तीरगी से??

पता मुझको उस शख्स का भी जरा…

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Added by amod srivastav (bindouri) on January 19, 2018 at 5:24pm — 5 Comments

ग़ज़ल - आजकल

2122 2122 212



बेखुदी की जिंदगी है आजकल ।

खूब सस्ता आदमी है आजकल ।।

जी रहे मजबूरियों में लोग सब।

महफिलों में ख़ामुशी है आजकल ।।

लग रही दूकान अब इंसाफ की ।

हर तरफ़ कुछ ज़्यादती है आजकल।।

छोड़ कर तन्हा मुझे मत जाइए ।

कुछ जरूरत आपकी है आजकल ।।

अब नहीं मिलता कोई मुझसे यहां।

बर्फ रिश्तों पर जमी है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on January 19, 2018 at 1:07pm — 5 Comments

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