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Comment by Seema Singh on September 5, 2017 at 10:26am
कविता जी! आपने कथा गलत जगह पोस्ट कर दी है।
Comment by Amit Tripathi Azaad on July 30, 2016 at 3:08pm

आके सजन लग जा गले सावन जले भादो जले
अंबर की छाया तले दो दिल मिले संग संग चलें
आके सजन .....

किस बात से मजबूर है किस बात से है तू ख़फ़ा
कियूँ ख़्वाब में आता है तू कियूँ
बन गया है बेवफ़ा
कियूँ दूर तक थे हम चले
सावन जले भादो जले ...२

तू तो मेरा हमराज़ था मैं थी तेरी जाने वफ़ा
कैसी ख़ता हमसे हुई बूँदे हुई हमसे ख़फ़ा
हँसके मिटा दे शिकवे गिले सावन जले भादो जले ....२

मैं जोगन बन बन फिरूँ तेरे लिए बिरहन भई
दिल में भी तू साँसों में तू छोड़ा जहाँ तेरी हुई
आँखों की पलकों तले सावन जले भादो जले
आके सजन लग ..

अमित आज़ाद

Comment by Abid ali mansoori on November 4, 2015 at 9:01pm

महत्वपूर्ण जानकारी!

Comment by Ajay Kumar Sharma on October 4, 2015 at 12:45pm

समस्त प्रियजनों को प्रणाम।।

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