For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

September 2019 Blog Posts (71)

आत्मा की आहट

कितने "अपने"

पहचाने थे यही रास्ते

पेड़ों की छाँह ओढ़े

कुहनी टेक

सरक जाते थे कितने

अच्छे-बुरे तजुर्बे

अचानक

चौंक जाती थी शाम

"मुझको घर जाना है"

तुम्हारे अरुणिम ललाट पर

अकस्मात चिंता की छायाएँ

और फिर ...

और फिर देख 

मेरी आँखों में अपनी आँखों की चमक

तुम्हारा ही मन नहीं करता था 

हाथ छोड़ चले जाने को

कि मानो जाते-जाते रुक जाती थी शाम

एक "और" आज के प्रेम-पत्र…

Continue

Added by vijay nikore on September 30, 2019 at 10:22pm — 6 Comments

जहाँ ये कर दिखाना होगाl

जहाँ ये कर दिखाना होगाl

हमारे  दिल   बताना होगा l

करोगे  बात जैसी  तुम भी  ,

सवालों को उठाना होगा l

सुनी  जो  भीड़ तूने   गाती  ,

मिरे दिल का फ़साना होगा l

ख़बर जाती  कहानी…

Continue

Added by मोहन बेगोवाल on September 30, 2019 at 7:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल (तीर नज़रों का उनका चलाना हुआ)

212*

तीर नज़रों का उनका चलाना हुआ,

और दिल का इधर छटपटाना हुआ।

हाल नादान दिल का न पूछे कोई,

वो तो खोया पड़ा आशिक़ाना हुआ।

ये शब-ओ-रोज़, आब-ओ-हवा आसमाँ,

शय अज़ब इश्क़ है सब सुहाना हुआ।

अब नहीं बाक़ी उसमें किसी की जगह,

जिनकी यादों का दिल आशियाना हुआ।

क्या यही इश्क़ है, रूठा दिलवर उधर,

और दुश्मन इधर ये जमाना हुआ।

जो परिंदा महब्बत का दिल में बसा,

बाग़ उजड़ा तो वो बेठिकाना…

Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 30, 2019 at 5:49pm — 4 Comments

व्यथित हृदय

व्यथित हृदय

अनुपम सृजन सृष्टि की बेटी

बेटी को ना ठुकराएं।

प्यार मुहब्बत की निधि बेटी

हाथ बढ़ाकर अपनाएं।।

बेटी अगर अनादृत होगी

जग कलुषित हो जाएगा।

आन मान सम्मान धरा पर

कहीं नहीं बच पायेगा।।

मृदुल भाव मधु सदृश बेटियाँ

जग रोशन नित करतीं हैं।

अंतर्मन के हर विषाद तम

सुखद अमिय रस भरतीं हैं।।

सस्मित सुरभि लुटाकर हर पल

जग मधुमय कर देतीं हैं।

सदा अंक में प्रदीप्त करके

हर बाधा हर लेतीं…

Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on September 27, 2019 at 7:05pm — 7 Comments

पुरोधा कौन — डॉo विजय शंकर

मूर्खता विद्व्ता के सर पर ताण्डव कर रही है ,

सर के अंदर छुपी विद्व्ता संतुलन बनाये हुए है ,

क्योंकि मूर्खता में कोई वजन नहीं है ,

विद्व्ता शालीन है , संयत है , संतुलित है

आराम से मूर्खता को ढोये जा रही है ,

क्योंकि यही युग धर्म है आज , शायद ,

कि वह मूर्खता को शिरोधार्य करे ,

उसे नाचने के लिए ठोस मंच दे , आधार दे।

युगदृष्टा जाने विद्व्ता ने शायद ही कभी

मूर्खता का पृश्रय लिया हो , उसे आधार बनाया हो।

भाषा वैज्ञानिक स्वयं भ्रमित…

Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on September 27, 2019 at 6:30pm — 4 Comments

यक्ष प्रश्न - लघुकथा -

यक्ष प्रश्न - लघुकथा -

गौतम ने बैंड बाजे  के साथ अपनी  एस यू वी गाड़ी से गणेश जी की प्रतिमा को विसर्जन हेतु दोनों बांहों में सहेज कर बाहर निकाला।

गौतम जैसे ही मूर्ति को लेकर  विसर्जन हेतु नदी के तट पर पहुंचा और मूर्ति को विसर्जित करने ही वाला था कि एक अज्ञात हाथ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

गौतम अचंभित होकर उस हाथ को पहचानने की चेष्टा करने लगा। उसे यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि यह तो उसकी बाँहों में बैठे प्रभु गणेश का ही हाथ था।

 उसे लगा कि प्रभु इस अंतिम विदा की बेला में…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on September 27, 2019 at 12:47pm — 10 Comments

अहसास की ग़ज़ल

12122×4

हमीं थे सच के करीब दिलबर यकीन तुमको दिलायें कैसे

नज़र से तुमने गिरा दिया जब नज़र में तुमको बसायें कैसे

मिज़ाज़ से तो गई नहीं है तुम्हारी यादें तुम्हारी बातें

जमीं से पौधा उखड़ गया पर हवा से खुशबू मिटायें कैसे

जो पकड़े बैठे हैं जिंदगी को वो अपने साये से डर गए हैं

तमाम दौलत कमा चुके हैं सुकून दिल का कमायें कैसे

ग़ज़ल की उंगली पकड़ के चलना सभी के गम में उदास होना

यही तो शाइर की जिंदगी है हम इसको नेमत बतायें…

Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on September 27, 2019 at 2:36am — 6 Comments

चन्द्रयान-2 पर सात दोहे..

चन्द्रयान-दो चल पड़ा, ले विक्रम को साथ।

दुखी हुआ  बेचैन भी,  छूट गया जब हाथ।।1

चन्द्रयान  का  हौसला,  विक्रम था  भरपूर।

क्रूर समय ने छीन कर, उसे किया मजबूर।।2

माँ की  ममता देखिए,  चन्द्रयान में डूब।

ढूँढ अँधेरों में लिया, जिसने विक्रम खूब।।3

चन्द्रयान दो का सफर, हुआ बहुत मशहूर।

सराहना कर  विश्व ने, दिया मान  भरपूर।।4

चन्द्रयान दो के लिए, विक्रम प्राण समान।

छीन लिया यमराज से, साध…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on September 26, 2019 at 9:00pm — 6 Comments

समीकरण- लघुकथा

अचानक उसे लगा कि पीछे से किसी ने नाम लेकर पुकारा, उसने साइकिल रोकी और पलट कर देखा. थोड़ा पीछे ही उसके परिचित वकील साहब खड़े थे और उसकी तरफ इशारा कर रहे थे. वह साइकिल धीरे धीरे चलाते हुए वकील साहब के पास पहुंचा और उनको नमस्ते किया.

"क्या बात है मैनेजर साहब, आज साइकिल चला रहे हैं. गाड़ी पंचर हो गयी है या खराब है", वकील साहब ने मुस्कुराते हुए पूछा.

उसे हंसी आ गयी, वह क्या साइकिल सिर्फ तभी चला सकता है जब उसकी गाड़ी खराब हो. फिर उसने हँसते हुए ही कहा "अरे नहीं वकील साहब, गाड़ी ठीक है. बस यूँ…

Continue

Added by विनय कुमार on September 26, 2019 at 5:49pm — 4 Comments

दो पल (बह्र-ए-मीर)

22 22 22 22 22 22 22 2   

 -चॉंदी-सोने  से  दो  पल  हैं,  प्रिय देखॅूं या बात करूं  ।

या बांहों  में चाँद खिलाकर  जगमग सारी रात करूं II

                         

आज असंयम को  बहलाऊॅं –‘मेरा पुण्य तुझे मिल जाये ।

जब मैं शांत,  अशांत हृदय का पागल झंझावात करूं I।

 

                         

गजरे का आडंबर तोडूँ , कुंतल शशि -मुख पर छा जाये I   

मैं कर से उलझन सुलझाऊॅ, प्रेम -प्रकंपित गात करूं …

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 26, 2019 at 12:30pm — 3 Comments

गजल - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/ २१२१/ २२२/१२१२



रस्ते सभी जहाँ के ढब आसान जिंदगी

तू ही उलझ के रह गयी नादान जिंदगी।१।



पानी हवा बहुत  है  यूँ  जीने  के वास्ते

करती इकट्ठा  मौत का सामान जिंदगी।२।



जीवन नहीं करे है तू जीवन सा पर करे

सासों पे झूठ - मूठ का अहसान जिंदगी।३।



क्यूबा बनी सोमालिया, ईराक, सीरिया

कब होगी तू पता नहीं जापान जिन्दगी।४।



देती है उसको मान ढब आती है मौत…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 26, 2019 at 6:54am — 8 Comments

अहसास की ग़ज़ल

2×15

एक ताज़ा ग़ज़ल

वो कहते हैं चाहत कब थी वो इक झूठा सपना था

मुझको भी वो भूलना होगा जो कुछ मैंने सोचा था

इससे बेहतर खुद को समझाने की बात नहीं कोई

जो कुछ किस्मत में लिक्खा था वो तो आखिर होना था

कुछ सालों से मैंने खुद को हँसते हुए नहीं देखा

कुछ सालों मैंने तेरी झूठी मुस्कान को देखा था

सोच समझ वाले लोगों की कुछ भी समझ नहीं आया

जाने कौन सा योग था जो मेरी कुंडली में बैठा था

तरकीबें नाकाम रही सब दुख से तुझे…

Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on September 26, 2019 at 12:48am — 2 Comments

कह-मुकरियाँ

कह-मुकरियाँ
(१)
जिसकी ठाँव में दिवस बिताऊँ,
पाकर   जिसको   मैं   इतराऊँ,
अफसर  काटें  उसके  चक्कर,
क्यों सखि साजन? ना सखि दफ्तर!
(२)
जीवन  को  वह  सुलभ  बनाए,
वह सुख  दुख में  साथ निभाए,
महका…
Continue

Added by Satyanarayan Singh on September 25, 2019 at 10:47pm — 6 Comments

कुछ क्षणिकाएँ :

कुछ क्षणिकाएँ :

ख़ामोश जनाज़े

करते हैं अक्सर

बेबसी के तकाज़े

ज़माने से

..........................

सवालों में उलझी

जवाबों में सुलझी

अभिव्यक्ति की तलाश में

बीत गयी

ज़िंदगी

.................................

कोलाहल

ज़िंदगी का

डूब जाता है

श्वासहीन एकांत में

...................................

देकर

एक आदि को अंत

लौटते हुए

सभी खुश थे अंतस में

लेकर ये भ्रम…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 25, 2019 at 7:00pm — 12 Comments

प्रतीक्षा

मैंने ढेरों पत्र लिखे तुमको

उत्तर जिनका अपेक्षित है

तुम व्यस्त हो गये हो शायद

या पता पता तुम्हारा है बदला

लिखते ऊँगली के पोर दुखे

मन करता लेकिन और लिखे

इसलिए डायरी लिख डाली…

Continue

Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on September 25, 2019 at 12:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल - कुबूल है

1212 1212 1212 1212

शराब जब छलक पड़ी तो मयकशी कुबूल है ।

ऐ रिन्द मैकदे को तेरी तिश्नगी कुबूल है ।

नजर झुकी झुकी सी है हया की है ये इंतिहा ।

लबों पे जुम्बिशें लिए ये बेख़ुदी कुबूल है ।।

गुनाह आंख कर न दे हटा न इस तरह नकाब ।

जवां है धड़कने मेरी ये आशिकी कबूल है ।।

यूँ रात भर निहार के भी फासले घटे नहीं ।

ऐ चाँद तेरी बज़्म की ये बेबसी कुबूल है ।।

न रूठ कर यूँ जाइए मेरी यही है…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 24, 2019 at 9:30pm — 2 Comments

अहसास की ग़ज़ल

12122×4

अंधेरी घाटी में रोशनी का हसीन चश्मा जरूर होगा

हमें खबर तो नहीं है फिर भी तलब का रस्ता जरूर होगा

पुराने शब्दों की बारिशों में सकून अपना तलाश कर ले

जो उसके दिल में कहीं नहीं था वो खत में लिक्खा जरूर होगा

तेरे कदम यूं जमे हुए हैं, तुझे हिलाना सरल नहीं है

हमारी आहों से फिर भी इक दिन तेरा तमाशा जरूर होगा

चरागों का दम चुराने वाले क्या तुझको इतनी समझ नहीं है,

बुझेगी सूरज की जिंदगी जब, इन्हें जलाना जरूर होगा…

Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on September 24, 2019 at 12:50am — 4 Comments

"लक्ष्य तय करो जीवन का "(कविता)

स्वरचित कविता

शीर्षक- "लक्ष्य तय करो जीवन का"

पंचभूत तन दो दिन का

लक्ष्य तय करो जीवन का

शैशव में मासूम रहें सब

सीखें हैं जीने का ढब

धीरे-धीरे तन मुस्काए

मन में चुलबुल शोखी आए

पथ पर मंथर कदम पड़ें

करतब करते लघु बड़े

गतिमय जीवन निश-दिन का

पंचभूत तन दो दिन का

लक्ष्य तय करो जीवन का

सदाचार का पाठ पढ़ो

सुगढ़ प्रेम के तंत्र गढ़ो

करो बड़ों का तुम सम्मान

बंधु!देव!मनुज-संतान!

छोटों पर वात्सल्य लुटाओ

खिलखिल करके गले…

Continue

Added by Dr. Anju Lata Singh on September 23, 2019 at 6:44pm — 3 Comments

शमा और मैं

शमा जली, उठा धुँआ 

तुम वहाँ औऱ मैं यहाँ 

सोचती हूँ के क्या लिखूं 

जिस्म यहाँ औऱ दिल वहाँ

पकड़ी क़लम ने उंगलियां 

टो सुझा नहीं के क्या लिखें 

तेरी अधूरी दास्तां या फ़िर …

Continue

Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on September 23, 2019 at 6:30pm — 1 Comment

कहाँ हूँ, कौन हूँ मैं

कहाँ हूँ, कौन हूँ मैं

क्यूँ मद हवा सा डोल रहा

क्या कोई हवा का झोका हूँ जो

क्यूँ हर नियम को तोड़ चला ||

 

क्या बहते जल की धारा हूँ

जिधर चले उस ओर मार्ग बना

कल-कल, छल-छल की आवाज कर

शुद्ध तन-मन को मैं करता चला ||

 

क्या खुला आकाश हूँ मैं

जो अनंत, असीम है

जीव जन्म का बीज है जो

छोर का जिसके नहीं पता ||

 

क्या असीमित सी भू-धरा हूँ मैं

सहनता की सीमा नहीं

हर…

Continue

Added by PHOOL SINGH on September 23, 2019 at 3:51pm — 6 Comments

Monthly Archives

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Gurpreet Singh jammu commented on Gurpreet Singh jammu's blog post ग़ज़ल - गुरप्रीत सिंह जम्मू
"शुक्रिया आदरणीय सुशील सरना जी"
17 minutes ago
Gurpreet Singh jammu commented on Gurpreet Singh jammu's blog post ग़ज़ल - गुरप्रीत सिंह जम्मू
" शुक्रिया आदरणीय अमीरुद्दीन अमीर जी "
17 minutes ago
TEJ VEER SINGH commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हमें लगता है हर मन में अगन जलने लगी है अब
"हार्दिक बधाई आदरणीय मुसाफ़िर जी। लाजवाब ग़ज़ल। "
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

हमें लगता है हर मन में अगन जलने लगी है अब

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२ बजेगा भोर का इक दिन गजर आहिस्ता आहिस्ता  सियासत ये भी बदलेगी मगर आहिस्ता…See More
15 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा त्रयी. . . . . .
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। बेहतरीन दोहे हुए हैं ।हार्दिक बधाई।"
yesterday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा त्रयी. . . . . .
"आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, बहुत ख़ूब दोहा त्रयी हुई है। विशेष कर प्रथम एवं तृतीय दोहा शानदार हैं।…"
yesterday
vijay nikore posted a blog post

धक्का

निर्णय तुम्हारा निर्मलतुम जाना ...भले जानापर जब भी जानाअकस्मातपहेली बन कर न जानाकुछ कहकरबता कर…See More
yesterday

प्रधान संपादक
योगराज प्रभाकर replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आ० सौरभ भाई जी, जन्म दिवस की अशेष शुभकामनाएँ स्वीकार करें। आप यशस्वी हों शतायु हों।.जीवेत शरद: शतम्…"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा त्रयी. . . . . .

दोहा त्रयी. . . . . . ह्रदय सरोवर में भरा, इच्छाओं का नीर ।जितना इसमें डूबते, उतनी बढ़ती पीर…See More
yesterday
अमीरुद्दीन 'अमीर' posted a blog post

ग़ज़ल (जो भुला चुके हैं मुझको मेरी ज़िन्दगी बदल के)

1121 -  2122 - 1121 -  2122 जो भुला चुके हैं मुझको मेरी ज़िन्दगी बदल के वो रगों में दौड़ते हैं…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post तेरे मेरे दोहे ......
"आ. भाई सौरभ जी, आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ ।"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आपका सादर आभार, प्रतिभा जी"
Monday

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service