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PHOOL SINGH
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PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post पिशुन/चुगलखोर-एक भेदी
"भाई विजय निकोरे आपने मेरी रचना के अपना समय निकाला उसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद "
Tuesday
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post एक पागल की आत्म गाथा
"कबीर साहब को मेरी रचना के लिए समय निकालने के लिए कोटि कोटि धन्यवाद "
Tuesday
Samar kabeer commented on PHOOL SINGH's blog post एक पागल की आत्म गाथा
"जनाब फूल सिंह जी आदाब,अच्छी रचना है,बधाई स्वीकार करें ।"
Monday
PHOOL SINGH posted a blog post

एक पागल की आत्म गाथा

दुनियाँ कहे मै पागल हूँमै कहता पागल नहीं, बस घायल हूँकभी व्यंग्य, कभी आक्षेप कोखुद पर रोज मैं सहता, अपनी व्यथा किसे सुनाऊकितनी चोटों से घायल हूँजीने की मै कोशिश करता, मै इस समाज की रंगत हूँ || क्यूँ पागल मै कैसे हुआपुंछने वाला ना हमदर्द मिला, जो मिला वो ताने कसता  देख उसे अब मै हँसता हूँपल भर में ये वक़्त बदलताकौन जाने, तेरा आने वाला कल मै ही हूँ कितनी चोटों से घायल हूँ || कोई प्रेम की चोट में पागलकोई षडयंत्रो का शिकार हुआ, कोई घर का भेदी बनमेरी दशा में आ गिराकोई यारों से धोखा खाया किसी को…See More
Monday
vijay nikore commented on PHOOL SINGH's blog post पिशुन/चुगलखोर-एक भेदी
"अच्छे खयाल पिरोय हैं। बधाई, मित्र फूल सिंह जी।"
Nov 30
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on PHOOL SINGH's blog post पिशुन/चुगलखोर-एक भेदी
"आद0 फूल सिंह जी सादर अभिवादन। पहले तो सृजन पर बधाई। मित्र इस रचना को अगर आप नवगीत, अतुकांत, या किसी मानक छंद (या कम से कम समान मात्रा भार) पर लिखते तो और बढ़िया लगता। कविताएं सपाटबयानी ठीक नहीं लगतीं।"
Nov 28
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post पिशुन/चुगलखोर-एक भेदी
"कबीर साहब को मेरा कोटि कोटि धन्यवाद कि आप अपना थोड़ा मूल्यवान समय मेरी रचना को देते है "
Nov 25
Samar kabeer commented on PHOOL SINGH's blog post पिशुन/चुगलखोर-एक भेदी
"जनाब फूल सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 25
PHOOL SINGH posted a blog post

पिशुन/चुगलखोर-एक भेदी

तरीफे उनकी क्यूँ लगतीजहर से भरी मीठी बातेंहर पिशुन/चुगलखोर कीझूठी बातें भी सच्ची लगती|| स्वार्थ की तह तक गिरऔछी हरकते करते रहतेभलाई का दामन औढकर  सहकर्मियों की बुराई वो करते|| दूसरों के काम में टांग अड़ानाआदतों में शुमार उनकीसहकर्मियों को आपस में भिड़ाकरफिर निश्छल होने का ढोंग रचाते|| लाभ ना हो जाए कहीं किसी कोबुगले के जैसा ध्यान लगातेएडी चोटी का ज़ोर लगाअडचने पैदा खूब कराते आने-जाने और खाने-पीने पर भीगिद्ध की तरह वो नजरे रखतेमौका मिले उन्हे जब कुछ कहने काना समय गवाए सभी का दोष बताते|| अपने पन का…See More
Nov 19
vijay nikore commented on PHOOL SINGH's blog post मुक्ति का द्वार
"इस सुन्दर रचना के लिए बधाई, मित्र फूल सिंह जी"
Nov 19
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बाल साहित्य

यहाँ पर बाल साहित्य लिखा जा सकता है |
Nov 14
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post आगे बढ़, बस बढ़ता चल
"कबीर सर, मेरी रचनाओ को आपकी टिप्पणी का सदा इंतज़ार रहता इसके लिए मै बहुत शुक्र गुज़र हूँ "
Nov 13
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post मुक्ति का द्वार
"कबीर सर, मेरी रचनाओ को आपकी टिप्पणी का सदा इंतज़ार रहता इसके लिए मै बहुत शुक्र गुज़र हूँ "
Nov 13
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post मुक्ति का द्वार
"भाई लक्ष्मण को मेरी रचना के लिए आपने समय निकाला इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद "
Nov 13
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on PHOOL SINGH's blog post मुक्ति का द्वार
"आ. भाई फूलसिंह जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Nov 10
Samar kabeer commented on PHOOL SINGH's blog post मुक्ति का द्वार
"जनाब फूल सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 9

Profile Information

Gender
Male
City State
DELHI
Native Place
DELHI
Profession
KALSHANIA CONSULTANCY
About me
NOTHING MUCH

जीवन संगिनी

हार हार का टूट चुका जब

तुमसे ही आश बाँधी है

मैं नहीं तो तुम सही

समर्थ जीवन की ठानी है||

 

मजबूर नहीं मगरूर नहीं मैं 

मोह माया में चूर नहीं मैं

साथ तुम्हारा मिल जाए तो

लक्ष्य से भी दूर नहीं मैं ||

 

सुख दुःख की घटना तो

जीवन में घटती रहती है

छोटी छोटी नोक झोंक भी

हर रिश्ते में होती है 

छोड़ न देना साथ निभाना

तुमसे, प्रेम की डोर जो बाँधी है||

 

गलत किये थे कुछ निर्णय

ये बात भी स्वीकारी है

मैं  गलत और तुम सही

गलती मैंने मानी है

मझधार में फसीं जिंदगी की

नैया पार लगानी है||

 

जीवन संगिनी बनकर,

मेरी जिंदगी, सँवारी है

घर नहीं मेरे दिल में रहना

बस ख़्वाहिश ये हमारी है

मैं नहीं तो तुम सही

समर्थ जीवन की ठानी है||

 

PHOOL SINGH's Blog

एक पागल की आत्म गाथा

दुनियाँ कहे मै पागल हूँ

मै कहता पागल नहीं, बस घायल हूँ

कभी व्यंग्य, कभी आक्षेप को

खुद पर रोज मैं सहता, अपनी व्यथा किसे सुनाऊ

कितनी चोटों से घायल हूँ

जीने की मै कोशिश करता, मै इस समाज की रंगत हूँ ||

 

क्यूँ पागल मै कैसे हुआ

पुंछने वाला ना हमदर्द मिला, जो मिला वो ताने कसता  

देख उसे अब मै हँसता हूँ

पल भर में ये वक़्त बदलता

कौन जाने, तेरा आने वाला कल मै ही हूँ

 कितनी चोटों से घायल हूँ ||

 

कोई प्रेम…

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Posted on December 6, 2019 at 4:30pm — 2 Comments

पिशुन/चुगलखोर-एक भेदी

तरीफे उनकी क्यूँ लगती

जहर से भरी मीठी बातें

हर पिशुन/चुगलखोर की

झूठी बातें भी सच्ची लगती||

 

स्वार्थ की तह तक गिर

औछी हरकते करते रहते

भलाई का दामन औढकर  

सहकर्मियों की बुराई वो करते||

 

दूसरों के काम में टांग अड़ाना

आदतों में शुमार उनकी

सहकर्मियों को आपस में भिड़ाकर

फिर निश्छल होने का ढोंग रचाते||

 

लाभ ना हो जाए कहीं किसी को

बुगले के जैसा ध्यान लगाते

एडी चोटी का ज़ोर…

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Posted on November 19, 2019 at 2:56pm — 5 Comments

मुक्ति का द्वार

एक फूल दो है, माली

धर्म-कर्म की यही कहानी

आत्मा-परमात्मा में भेद करा

दुनियांदारी में हमे फसा-फसाकर, जन्म-मरण का चक्कर कटवाती ||

 

अहंकार रूपी ये पुत्र हमारा, धन रूपी सा भाई,

मोह रूपी ये पुत्रवधू, आशा रूपी ये स्त्री प्यारी

आसक्ति लगा के इनमे

कर्म बंधन से ना मुक्ति पाई||

 

ममतामयी माँ रूप बना ये, हम पर खूब ये, प्यार लुटाता

बहन बन ये जब भी…

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Posted on November 8, 2019 at 11:52am — 5 Comments

आगे बढ़, बस बढ़ता चल

चहेरे पर मुस्कान को रख

कुछ नया करने की चाहत रख

स्वयं पर दृढ़ विश्वास को रख

आगे बढ़ बस आगे बढ़ता चल ||



सहयोग बलिदान की भावना रख

जिम्मेदारियों ना तू डर

टीम वर्क पर विश्वास जता

हौंसले संग तू आगे बढ़ ||

 

नामुमकिन कुछ नहीं है जग में

मन में थोड़ा धैर्य रख

असफलताओ से सीख ले

मुकाम को अपने हासिल कर ||

 

कहने वाले कहते हैं

उनकी बातों पर ध्यान ना धर

कठिन पर अडचने…

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Posted on November 6, 2019 at 5:00pm — 2 Comments

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