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December 2015 Blog Posts (159)

मुफ़्त शिविर

बिटिया के छोटे-छोटे बच्चे,दो वक़्त की रोटी जुटाने की मशक्कत,और बेटी की जान पर मंडराता खतरा देखकर परमेसर सिहर उठा।उसने अपनी एक किडनी देकर उसके जीवन को बचाने का संकल्प कर लिया।

" तुम तो पहले ही अपनी एक किडनी निकलवा चुके हो,तो अब क्या मजाक करने आये थे यहाँ ?" डॉक्टर ने रुष्ट होकर कहा।

" जे का बोल रै हैं डागदर साब,हम भला काहे अपनी किटनी निकलवाएंगे।

ऊ तो हमार बिटिया की जान पर बन आई है।छोटे-2 लरिका हैं ऊ के सो हमन नै सोची की एक उका दे दै।"

" पर तुम्हारी तो अब एक ही किडनी है,और ये… Continue

Added by jyotsna Kapil on December 4, 2015 at 2:18pm — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - कहीं पंडित मरे, टूटे थे मन्दिर - गिरिराज भंडारी

1222    1222    122

हथेली खून से जो तर हुई थी

न जाने क्यूँ यहाँ रहबर हुई थी

 

जो सच जाना उसे सहना कठिन था

ज़बाँ तो इसलिये बाहर हुई थी

 

कि उनके नाम में धोखा छिपा है

समझ धीरे सहीं , घर घर हुई थी  

 

वही इक बात जो थी प्रश्न हमको

वही आगे बढ़ी , उत्तर हुई थी

 

निकाले जब गये सब ओहदों से

ज़मीं बस उस समय बेहतर हुई थी

 

कहीं पंडित मरे, टूटे थे मन्दिर

कहो कब आँख किसकी तर हुई थी…

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Added by गिरिराज भंडारी on December 4, 2015 at 8:02am — 19 Comments

जीत-हार (लघुकथा)

 “बीबी जी, आज के बाद आप की कोठी में  काम नहीं करूंगी” कांता ने काम खत्म करते हुए कहा ।

“क्या सभी घरों का काम छोड़ रही हो। ”

“नहीं” “तो मेरा क्यूँ ?” सरबजीत  ने फिक्रमंदी जाहिर करते हुए कहा ।

“तुम बीच में काम कैसे छोड़ जाओगी, मुझे कोई प्रबंध करने का मौका तो दिया होता ।

” बस हम ने तो फैसला कर लिया है कि हम आप की कोठी में काम नहीं करेंगे”

बात को आगे बड़ाते  हुए कांता ने कहा “हमने सोचा था कि आप पढ़े लिखे हैं, मगर अब पता चला कि पढाई ने तो बस आपकी सुरत ही बदली है,…

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Added by मोहन बेगोवाल on December 3, 2015 at 10:30pm — 4 Comments

भ्रष्टाचार पर कुछ दोहे

धन लालसा नष्ट करे बुद्धि बल व् ज्ञान
निष्ठा के सम्भार से होव चित्त महान l

भ्रष्टाचार में लिपट हुए भूले धर्म का पाठ
पड़ी जो लाठी न्याय की सब कुछ सुन सपाट l

Added by Nikunj Pathak on December 3, 2015 at 4:49pm — 2 Comments

दबे कुचले हुए लोगो! तुम्हें अब तक भरोसा है? -- इमरान खान

हुकूमत तुम ग़रीबों के सरों पर हाथ रक्खेगी,

दबे कुचले हुए लोगो! तुम्हें अब तक भरोसा है?

सियासत अपने मंसूबों में तुमको साथ रक्खेगी,

मसाइल से घिरे लोगो! तुम्हें अब तक भरोसा है?

तुम्हारी आंख से निकले हुए आंसू को वो देखें?

तुम्हारी सिसकियाँ देखें या फॉरेन टूर को देखें?

तुम्हारी फस्ल ना आने के मातम को मनायेगें,

या जाकर वेस्ट कंट्री से वो एफडीआई लायेंगे?

मिटाना चाहते हैं वो दुकानों को बाज़ारों से,

कोई…

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Added by इमरान खान on December 3, 2015 at 3:00pm — 13 Comments

धर्म – -( लघुकथा ) –

तीन दिन से शहर में कर्फ़्यु लगा हुआ था!चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा हुआ था!सडक पर एक मक्खी भी नहीं दिख रही थी! उसका  पूरा परिवार एक शादी में दिल्ली गया हुआ था!शहर में दंगों के कारण उनका लौटना भी नहीं हो पा रहा था!वह घर पर अकेला ही था!बुढापे और बीमारी के कारण वह शादी में नहीं जा सका था! तीन दिन से दूध वाला,सब्ज़ी वाला ,कामवाली बाई,खाना बनाने वाली बाई आदि भी नहीं आ रहे थे!डाइबिटीज़ और ब्लड प्रैसर की दवा भी खत्म हो गयी थी!जैसे तैसे डबल रोटी के सहारे दिन गुजार रहा था!सुबह से उसे चक्कर आ रहे थे…

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Added by TEJ VEER SINGH on December 3, 2015 at 2:00pm — 18 Comments

मुझे सच को कभी भी झूठ बतलाना नहीं आता - बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

अरकान -1222  1222  1222   1222

मुझे सच को कभी भी झूठ बतलाना नहीं आता|

तभी तो मेरे घर भी यार नज़राना नही आता|

 

अगर तुम प्यार से कह दो लुटा दूँ जान भी अपनी,…

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Added by BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 2, 2015 at 11:30pm — 14 Comments

संकल्प (लघुकथा)

अरे ये क्या किया आपने, वक्त ज़रूरत के लिए एक ज़मीन थी वो भी बेच दी कल को बेटी की शादी करनी है और रिटायरमेंट के बाद के लिए कुछ सोचा है । एक सहारा था वह भी चला गया ।
अरे भाग्यवान, बेटी के इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन के लिए ही तो बेचा है, और बुढ़ापे का सहारा ये ज़मीन जायजाद नहीं हमारे बच्चे हैं और उनकी तरबियत की जिम्मेदारी हमारी है । रही बात शादी की तो, न लड़की की शादी में दहेज़ देंगे, न लड़के की शादी में दहेज़ लेंगे
हिसाब बराबर है, न लेना एक न देना दो ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by नादिर ख़ान on December 2, 2015 at 10:45pm — 16 Comments

साये....

साये....

रहने दो

तुम सायों की खामोशी क्या जानो

तुम सिर्फ खोखले अहसासों के

सूखे शज़र हो

साये का दर्द तो सिर्फ

ज़मीन सहती है

हर जिस्मानी खरोंच को

खामोशी से पी जाती है

उफ़ नहीं करती

रेज़ा रेज़ा बिखरती

तारीक में सिमट जाती है

जब कोई तन्हा शब

किसी परिंदे की तरह

पेड़ पर फड़फड़ाती है

बेतरतीब से सलवटों में

तब वफा भी कराहती है

गुजरे लम्हों के साये

तमाम उम्र

जीने की सजा दे जाते हैं

ज़िस्म की कश्कोल में…

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Added by Sushil Sarna on December 2, 2015 at 8:02pm — 12 Comments

सवाल[ लघु कथा]

तीन दिन के नागे के बाद वो आज आई थी Iमन में आया खींच के डांट लगाऊं पर साथ में चार साल के मुन्नू को देख चुप रह गई I

"बड़ी नई  साड़ी पहन कर आई है आज तो ,और ये मुन्नू ने भी नए कपड़े पहन रखे हैं "?

"मैडम जी वो दो दिन मंदिर में रत जगा था ना "I

"पहले ये परांठा सब्जी खिला दे मुन्नू को फिर काम करना "I

"ये नहीं खायेगा मैडम जी ,सुबह से ही प्रसाद  मिठाई फल खूब खा रहा है "मुन्नू ने भी आँखों से नानी  की बात का अनुमोदन कर दिया I

"कहाँ से आ गया इतना प्रसाद  ?"

"वो…

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Added by pratibha pande on December 2, 2015 at 8:00pm — 11 Comments

प्रार्थना ( लघुकथा )

जैसे ही वह घर से निकलने को हुई ,बंटी भी साथ जाने की जिद करने लगा I सोचा था आज पैदल ही जायेगी सब्जिया लेने I थोड़ी दूर मुख्य सड़क तक तो चलना था वहीं ताज़ी सब्जिया मिल जाती थीं I पर ये बंटी भी न !! अब सब्जियों के साथ इसे भी टांगना पड़ेगा गोद में ,पैदल तो चलने से रहा ये !वह भुनभुनाई थी कि ससुर जी बोल पड़े -' ले जाओ न बहू !नहीं तंग करेगा ये !जनता हु मैं I 'उन्होंने उसके सिर पर स्नेह भरा हाथ फिराते हुए कहा I

' एयेए .....I 'बंटी ख़ुशी से अपनी ही जगह पर नाच उठा I वह मन ही मन और भन्ना उठी थी I कहना…

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Added by meena pandey on December 2, 2015 at 7:00pm — 19 Comments

नस्री नज़्म :- "तीसरा विश्व युद्ध"

आत्म ग्लानी से

मेरी गर्दन झुक जाती है

जब मैं यह देखता हूँ

कि इंसान ,तरक़्क़ी करते करते

इन हदों पर पहुँच चुका है

कि उसने,

पिशाच का रूप ले लिया है,

आज हम तीसरे विश्व युद्ध के

दहाने पर खड़े हैं,

इसी पिशाचता के कारण,

ताक़त की भूक

बहुत बढ़ गई है,

अब सिर्फ़,एक चिंगारी की आवश्यकता है,

और युद्ध शुरू,

परिणाम ?

तबाही ,बर्बादी

नरसंहार ,ख़ून के दरिया

लाशों के अंबार

भूक,लाचारी,

इंसानी जान की कोई क़ीमत नहीं,

सब… Continue

Added by Samar kabeer on December 2, 2015 at 4:08pm — 14 Comments

हां, मैं हत्यारा हूं /प्रदीप नील

मैं खड़ा हूं आपकी अदालत में सर झुकाए

हांलाकि मेरे सर एक भी इलज़ाम नहीं है ।

और ये भी सच है कि दुनिया भर के पुलिस थानों में

किसी भी एफ आई आर में मेरा नाम नहीं है ।

पर इसका मतलब ये नहीं कि मैं निर्दोष हूं, बेचारा हूं

सच तो ये है कि मैं हत्यारा हूं,

हां मैं हत्यारा हूं



मैं हत्यारा हूं अपने बेटे के मासूम बचपन का

मैं हत्यारा हूं अपनी बेटी के खिलते हुए यौवन का

मैं हत्यारा हूं मां-बाप की बूढ़ी आस का

मैं हत्यारा हूं अपनी पत्नी के कमज़ोर से…

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Added by प्रदीप नील वसिष्ठ on December 2, 2015 at 10:00am — 13 Comments

नज़दीक़ियां-दूरियां - (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (39)

संयुक्त परिवार के मुखिया अपने कमरे में पधार चुके थे। पोता-पोती अपने-अपने कमरों में जाकर टीवी पर मनपसंद चैनल देखने लगे थे। बहुयें अपने-अपने कामों में व्यस्त थीं। एक बहू ने अपनी पारी संभालते हुए मुखिया की टेबल पर खाना-पानी परोसा और फिर वह भी अपने कमरे में टीवी पर मनपसंद धारावाहिक देखने लगी। मुखिया का भोजन जैसे-तैसे सम्पन्न हुआ। थाली शेष बचे भोजन सहित टेबल पर बहू के इंतज़ार में पड़ी रही। मुखिया ने एक धार्मिक पुस्तक उठायी, टीवी ओन किया, अपनी पसंद का न्यूज चैनल लगाया, कुर्सी पर बैठे तीन काम शुरू किए-… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 1, 2015 at 11:49pm — 12 Comments

टीस......

टीस.....

चलो न

कुछ और बात करते हैं

अपनी अपनी टीस से

मुलाक़ात करते हैं

नेह से देह की थकान

तो अधरों से तृप्ति हारी है

सच कहूँ तो

बीती हुई रात की

चुपके से हुई बात

कुछ तेरी पलक पर

तो कुछ मेरी पलक पर

अभी तक भारी है

जूही के फूलों में लिपटे

वो स्वप्निल लम्हे

अस्त व्यस्त से सलवटों में

अपनी गंध से

अलौकिक अनुभूति की

व्याख्या करते प्रतीत होते हैं

निर्वसन शरीर के उजास की चांदनी

एकान्तता से लिपट…

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Added by Sushil Sarna on December 1, 2015 at 7:45pm — 10 Comments

फ़िरोज़ा बेगम –लघुकथा -

फ़िरोज़ा बेगम –लघुकथा - 

 असली नाम तो उसका शबनम बानो था मगर पूरा गॉव उसे फ़िरोज़ा बेगम पुकारता था!इसकी वज़ह थी कि वह निकाह वाले दिन फ़िरोज़ी सूट पहनी थी!सबने मना किया था कि यह शुभ रंग नहीं है!लेकिन वह ज़िद पर अडी रही! क्योंकि फ़िरोज़ी रंग उसका पसंदीदा रंग था!वह वैसे भी शुभ अशुभ में विश्वास नहीं करती थी!

शकील अहमद से उसकी मुलाक़ात एक शादी में हुई थी!शकील का व्यक्तित्व भी गज़ब का  था!वह भी अप्रतिम सौंदर्य की मालकिनथी ! दौनों ने एक दो मुलाक़ात में ही निक़ाह का फ़ैसला कर लिया !

शकील की…

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Added by TEJ VEER SINGH on December 1, 2015 at 6:46pm — 15 Comments

जुबाँ से इस कदर कड़वा तू हरदम बोलता क्यूँ है...

1222  1222  1222  1222

बुराई का बुराई से जहाँ में सामना क्यूँ है

कि इतनी ज़ुल्म की बढ़ती हुयी अब इन्तेहा क्यूँ है...१

 

 हमारी राह में तुमने, तुम्हारी राह में हमने

जो बोये थे वही कटेंगे इतना सोचता क्यूँ है ....२

 

कभी मेरी भी बातें सुन कभी मुझसे भी आकर मिल

तेरी परछाई हूँ मुझसे तू इतना भागता क्यूँ है ..३

  

ज़रा सा देख ले तू इक नज़र मेरे भी बच्चों को

तेरे बच्चों के जैसे हैं, तू इनसे रूठता क्यूँ है…

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Added by नादिर ख़ान on December 1, 2015 at 6:00pm — 13 Comments

फासले

द्वार खोला तो महीनों बाद अमित को सामने पाकर वह चौंक उठी।

" आप ?"

" हाँ मैं, सोनिया को छोड़ आया हूँ। अब तुम्हारी कीमत का अहसास हो गया है मुझे ,सॉरी मेघा, अब घर लौट आया हूँ, प्लीज़ माफ़ कर दो मुझे "

" बेशक कर दूँगी ,पर एक बात का ईमानदारी से जवाब दीजिये ,अगर मैं आपको छोड़कर किसी और के पास चली गई होती,तो क्या मुझे सहर्ष स्वीकार कर लेते ? "

उसने असमंजस में मेघा की ओर देखा फिर दृष्टि झुकाते हुए बोला

" नहीं "

वेदना व हिकारत के मिले जुले भाव से पति के झुके हुए चेहरे को उसने… Continue

Added by jyotsna Kapil on December 1, 2015 at 12:43pm — 12 Comments

वक्त बनके आ गये हो टल जाओगे

2122 2122 2222
वक्त बनके आ गये हो टल जाओगे
गर्दिशें कर तो अभी ही ढल जाओगे।
बुझ रहे दीये अभी रोशन जो रफ्ता
रोशनी बख्शो नजर में पल जाओगे।
हम बिठा लेते नयन में भूलें सब कुछ
कर भला वरना नजर से चल जाओगे।
आग उर में ले चले तो रौशन कर मग
बेवजह बाँटो तपिश मत जल जाओगे।
छल गये हो बार कितनी पूछो खुद से
सच न हो एक बार फिर अब छल जाओगे।

.
मौलिक व अप्रकाशित@

Added by Manan Kumar singh on December 1, 2015 at 10:00am — 2 Comments

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