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बृजेश कुमार 'ब्रज'
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on दिनेश कुमार's blog post ग़ज़ल --- ख़ुद-परस्ती का दायरा क्या था / दिनेश कुमार
"बहुतखूब बहुतखूब आदरणीय..बेहतरीन ग़ज़ल"
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल मनोज अहसास
"वाह बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय..बेहतरीन"
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post कुछ कही कुछ अनकही है
"ग़ज़ल बहुत ही खूबसूरत कही है आदरणीय..और आदरणीय समर जी ने एक ज्ञान बात भी बताई..बहुत बहुत शुक्रिया.."
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on rajesh kumari's blog post हाशिये पर आपकी दस्तार है कुछ कीजिये (ग़ज़ल राज)
"क्या कहने आदरणीया बहुत ही शानदार ग़ज़ल कही है.."
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Samar kabeer's blog post जनाब निलेश 'नूर' की ज़मीन में ग़ज़ल नम्बर 2 (कुछ नये क़वाफ़ी के साथ)
"वाह खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय.. सौ गुनह होते ही पूरे मारना था इसलिये मैं भी इक शिशुपाल की बदकारियाँ गिनता रहा..बेहतरीन"
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on babitagupta's blog post अनावरण या आडंबर [लघु कथा]
"बहुत ही भावपूर्ण लघु कथा है आदरणीया..बधाई"
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Naval Kishor Soni's blog post तेरी-मेरी कहाँ सियासत ?
"उम्दा रचना है आदरणीय..."
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Neelam Upadhyaya's blog post हाइकू
"वाह भाव भरे हाइकू आदरणीया..बधाई"
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on TEJ VEER SINGH's blog post निकम्मा - लघुकथा –
"वाह आदरणीय बहुत ही ग़ज़ब की लघु कथा है वाकई..पढ़ते हुए बहुत अच्छा लगा.."
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Alok Rawat's blog post ग़ज़ल
"बहुत ही खूबसूरत और सरस  ग़ज़ल कही है आदरणीय..सादर"
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post माँ   ....
"उत्तम बहुत ही उत्तम रचना आदरणीय.."
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post 'दो सितारों का मिलन' (लघुकथा)
"बहुत खूब लघु कथा हुई आदरणीय.."
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on babitagupta's blog post सदा बिखरी रहे ये हंसी..
"अच्छी प्रस्तुति है आदरणीया.."
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Mohan Begowal's blog post जिंदगी की उधेड़बुन (लघुकथा )
"बहुत ही संवेदनशील लघु कथा हुई आदरणीय..लेकिन आखरी दो पंक्तियों में कसावट की कमी लगी.."
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Manan Kumar singh's blog post प्रजातंत्र(लघुकथा)
"बहुत ही बढ़िया सांकेतिक लघुकथा लिखी है आदरणीय..."
Jul 13
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on राज लाली बटाला's blog post आप पर किस की मिह्ऱबानी है
"उम्दा ग़ज़ल कही है आदरणीय राज लाली जी..बधाई"
Jul 13

Profile Information

Gender
Male
City State
noida
Native Place
jhansi

बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog

ग़ज़ल...यादों के सरमाये-बृजेश कुमार 'ब्रज'

बह्र-ए-मीर पर आधारित ग़ज़ल

कमबख्त कहाँ से आये इतनी रात गये

उनकी यादों के साये इतनी रात गये

आज उभर के आया है इक दर्द पुराना

बेलौस हवा सहलाये इतनी रात गये

कश्ती कागज की गहरे यादों के दरिया

अब नींद कहाँ से आये इतनी रात गये

गीली मिटटी की सौंधी सौंधी सी खुशबू

अंतस में आग लगाये इतनी रात गये

किस प्रियतम के लिए हुआ बैचैन पपीहा

जो घड़ी घड़ी चिल्लाये इतनी रात गये

दूर उफ़क़ से आती हैं ग़मगीन…

Continue

Posted on July 1, 2018 at 4:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल....दिल जला के रौशनी होती नहीं है-बृजेश कुमार 'ब्रज'

फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन

दर्द अपना यूँ सर-ए-बाज़ार कर के

क्या मिलेगा वक़्त से तक़रार कर के

कुछ नहीं हासिल,समझते क्यों नहीं हो

गम उठाना आह भरना प्यार कर के

सामने उस मोड़ पर कुछ अनमना सा

शख़्स इक बैठा है सब न्योछार कर के

बन्दगी उल्फत है मैं था इस गुमां में

वो नहीं आया अना को पार कर के

दिल जला के रौशनी होती नहीं है

ये भी 'ब्रज' ने देखा है सौ बार कर के



(मौलिक एवं अप्रकाशित)…

Continue

Posted on June 25, 2018 at 6:00pm — 24 Comments

लघुकथा-पराकाष्ठा

मोबाइल पर मेल का नोटिफिकेशन देख मोहन की आँखें चमक उठीं।शायद पायल का मेल हो।जल्दी से मेल खोला..हाँ ,ठीक 17 दिन बाद पायल का मेल था।अक्सर मेल नोटिफिकेशन देख खिल जाता है मोहन लेकिन अक्सर मायूसी ही हाथ लगती।खैर देखूं तो सही क्या लिखा है...अपने चश्मे को ठीक करता हुआ मोहन मेल पढ़ने लगा।"56 को हो गईं हूँ मैं और आप भी 60-65 तो होंगे ही,अब तो बता दो क्या मायने रखती हूँ मैं?और क्यों?" पिछले 40 सालों से ये सवाल कई बार पूछा था पायल ने लेकिन "कुछ सवालों को लाजबाब रहने दो" कह कर हर बार टाल गया मोहन।पर…

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Posted on June 22, 2018 at 5:30pm — 20 Comments

ग़ज़ल...पिछले कुछ दिनों से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन

हूँ बहुत हैरान पिछले कुछ दिनों से

ज़ीस्त है हलकान पिछले कुछ दिनों से

चाँद भी है आजकल कुछ खोया खोया

रातें हैं वीरान पिछले कुछ दिनों से

आदमी हूँ आदमी के काम आऊँ

है यही अरमान पिछले कुछ दिनों से

कौड़ियों के भाव बिकती हैं अनाएं

मर गया ईमान पिछले कुछ दिनों से

जोश में है भीड़ 'ब्रज' आक्रोश भी है

बस नहीं है जान पिछले कुछ दिनों से

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

बृजेश कुमार…

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Posted on June 12, 2018 at 5:00pm — 14 Comments

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At 6:59pm on October 24, 2017, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

स्वागत है आदरणीय ,  आपको मित्र के रूप में पाना मेरा सौभाग्य है .

At 11:43pm on November 17, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

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