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पत्ता परिवर्तन / लघुकथा

वह ताश की एक गड्डी हाथ में लिए घर के अंदर चुपचाप बैठा था कि बाहर दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने दरवाज़ा खोला तो देखा कि बाहर कुर्ता-पजामाधारी ताश का एक जाना-पहचाना पत्ता फड़फड़ा रहा था। उस ताश के पत्ते के पीछे बहुत सारे इंसान तख्ते लिए खड़े थे। उन तख्तों पर लिखा था, "यही है आपका इक्का, जो आपको हर खेल जितवाएगा।"

 

वह जानता था कि यह पत्ता इक्का नहीं है। वह खीज गया, फिर भी पत्ते से उसने संयत स्वर में पूछा, "कल तक तो तुम अपनी गड्डी छोड़ गद्दी पर बैठे थे, आज इस खुली सड़क में फड़फड़ा क्यों रहे हो?"

 

पत्ते ने लहराते हुए उत्तर दिया, "मेरे प्रिय भाई! चुनावी हवा बड़ी तेज़ चल रही है...। आप तो अपने हो, अपना खेल खेलते समय ताश की गड्डी में से आप मुझे ही सबके सामने फेंकना।"

 

वह खुश हो उठा, आखिर लगभग पाँच सालों बाद वह दर्शक से फिर खिलाड़ी बना था। उसने उस पत्ते के रंग और समूह को गौर से निहारा और अपनी ताश की गड्डी में से उसी रंग और समूह के राजा को निकाल कर पूछा, "तुम्हारा राजा यही है क्या?"

 

पत्ते ने स्नेहपूर्वक उत्तर दिया, "हाँ प्रिय भाई।"

 

अब उसने आशंकित स्वर में प्रश्न किया, "लेकिन कुछ दिनों बाद यह राजा भी कहीं पिछले राजाओं की तरह बदल कर जोकर तो नहीं बन जाएगा?"

 

यह सुनते ही पत्ते के पीछे खड़े इंसान उस राजा की जय-जय कार के नारे लगाने लगे और वह पत्ता उड़ कर दूसरे दरवाज़े पर चला गया।

 

वह निराश हो गया। दरवाज़ा बंद कर उसने अपने हाथ में सहेजी हुई ताश की पूरी गड्डी को अपने घर के अंदर उछाल दिया।

                                                                 

और आश्चर्य! आसमान में उड़ रहे वे सारे पत्ते जोकर वाले पत्ते में बदलने लगे।

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Neelam Upadhyaya on April 30, 2019 at 10:27am

समसामयिक विषय पर अच्छी रचना। बधाई स्वीकार करें आदरणीय चंद्रेश कुमार छतलानी जी।

Comment by Samar kabeer on April 29, 2019 at 3:13pm

जनाब चंद्रेश जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,मेरी तरफ़ से बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 24, 2019 at 11:49am
  • आदाब। ... वाह! चुनावी हवा म़े इक्के/राजा/ .... जोकर और दर्शक/ खिलाड़ी के प्रतीकों में समसामयिक परिदृश्य चित्रण के साथ सार्थक चिंतन प्रेरित करती बेहतरीन रचना। हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी साहिब।

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