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शिज्जु "शकूर"
  • Male
  • Raipur, C.G.
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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"आदरणीय अजय गुप्ता जी हार्दिक आभार आपका"
Dec 29, 2018

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"बहुत शुक्रिया मोहतरम आरिफ़ साहिब"
Dec 29, 2018

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"मोहतरम समर कबीर साहिब हौसला अफ़्ज़ाई के लिए बहुत शुक्रिया आपका, संकलन आने के बाद आपके सुझाव के अनुसार संशोधन की गुज़ारिश करूंंगा।"
Dec 28, 2018

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"ख़ामुशी से जीना, मेरा भी तरीक़ा बन गयासच को झुठलाना यहाँ जब एक ढर्रा बन गया इस ज़माने की हवा का वो हुआ मुझ पर असरभूलकर मैं अपनी फ़ितरत दूसरों सा बन गया पत्थरों को तोड़कर, जब रुख हवा का मोड़करचल पड़ा बेख़ौफ़ मैं तो मेरा रस्ता बन गया हक़बयानी किसको अच्छी…"
Dec 28, 2018

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"अच्छी कोशिश है आ. मुनीश तन्हा जी सादर बधाई"
Dec 28, 2018

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"कोशिश अच्छी है आदरणीय अतेन्द्र जी सादर बधाई। मोहतरम समर कबीर. साहिब की बातों का संज्ञान लें।"
Dec 28, 2018

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"आ. रवि भैया बेहतरीन मुरस्सा ग़ज़ल हुई है। हर शे'र उम्दा है दिली दाद कुबूल. फरमाएँ"
Dec 28, 2018

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"चांदनी को मैंने चाहत की नज़र से देखा जब चांद में कैसे न जाने तेरा चेहरा बन गया"
Dec 28, 2018

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"मोहतरम जनाब मुनव्वर अली ताज साहिब इस ग़ज़ल के लिए तहेदिल में मुबारकबाद आपको"
Dec 28, 2018

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"आपकी ग़ज़ल दुबारा पोस्ट हो गई है मोहतरम सुरख़ाब बशर साहिब"
Dec 28, 2018

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"अच्छी ग़ज़ल हुई आ. अजय जी हार्दिक बधाई आपको इस ग़ज़ल के लिए। पुछल्ले मज़ेदार हैं। अलबत्ता, मतले के सानी को कहन के हवाले से एक बार फिर से देखियेगा। भी शब्द से मतलब कुछ और निकल रहा है।"
Dec 28, 2018

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"वाह, अच्छी ग़ज़ल हुई है मोहतरम सुरख़ाब बशर साहिब बहुत बधाई आपको"
Dec 28, 2018

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"अच्छी गज़ल हुई है आ. अंजलि जी, बहुत मुबारकबाद,  चांदनी को मैंने चाहत की नज़र से देखा जब चांद में कैसे न जाने तेरा चेहरा बन गया// दुरुस्त कर लीजियेगा"
Dec 28, 2018

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"अच्छी गज़ल है मोहतरम मो. अनीस शैख साहिब मुबारकबाद कुबूल फरमाएँ"
Dec 28, 2018

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"आदरणीय मोहन बेगोवाल जी,  इस प्रस्तुति के लिए आपको सादर बधाई"
Dec 28, 2018

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-102
"अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीय गजेन्द्र श्रोत्रिय जी, गिरह भी खूब लगाई है आपने। हार्दिक बधाई इस ग़ज़ल के लिए।  शुक्र है ये, तुझको खोकर, मैं सभी का बन गया //  ज़रा देखियेगा कैसा है"
Dec 28, 2018

Profile Information

Gender
Male
City State
Raipur
Native Place
Raipur
Profession
Creative writer in Konsole group
About me
I emotional and introvert person usually like to spend time alone, it is selfish nature because sometimes our beloved one wishing to spend time with us

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एक ग़ज़ल - शिज्जु शकूर

221 2121 1221 212

बे-ख़्वाब आँखों में दबे लम्हात से अलग
गुज़री है ज़िन्दगानी अलामात से अलग

दस्तार रह गई है रवाजों के दरमियाँ
पर इश्क़ खो गया है रिवायात से अलग

जीने की चाह में हुआ बंजारा आदमी
बस घूमता दिखे है मक़ामात से अलग

किस रिश्ते की दुहाई दूँ अहल ए जहाँ को मैं
है क्या यहाँ पे कहिये फ़सादात से अलग

वो वक़्त और ही था कि मौसम बदलते थे
मौसम रहा न अब कोई बरसात से अलग

-मौलिक व अप्रकाशित

Posted on November 12, 2018 at 1:26pm — 13 Comments

जितना बड़ा जो झूठा है वो, उतना ही अधिक चिल्लाता है - शिज्जु शकूर

221 1222 22 221 1222 22

जितना बड़ा जो झूठा है वो, उतना ही अधिक चिल्लाता है

आवाज़ के पीछे चुपके से, रस्ते से यूँ भी भटकाता है

 

तुम बाँच रहे हो जो इतना, अज्दाद के किस्से मंचों से

उन किस्सों को सुनने वाला अब, पत्थर पे जबीं टकराता है

 

इंसान फ़कत है इक ज़र्रा, मिट जाएगा खुद इक झटके में

आकाश को छूती मीनारें, बेकार ही तू बनवाता है

 

है रंग बदलने में माहिर, हर शख़्स सियासत के अंदर

कुछ भी कहे वो लेकिन मतलब, कुछ और…

Continue

Posted on March 25, 2018 at 8:13am — 19 Comments

इसी दुनिया में अपनी मुख़्तसर दुनिया बनाता हूँ

1222 1222 1222 1222

ज़मीन-ओ-आसमाँ के दरमियाँ रस्ता बनाता हूँ

इसी दुनिया में अपनी मुख़्तसर दुनिया बनाता हूँ



चढ़ाकर चाक पर मिट्टी कहा कुम्हार ने मुझसे

जहाँ जैसी ज़रूरत है इसे वैसा बनाता हूँ



बना लेता है अपने आप ही ये मुख़्तलिफ़ शक्लें

मेरा फ़न सिर्फ़ इतना है कि आईना बनाता हूँ



गुज़श्ता ज़िंदगी के तज़्रबों से वाकिए चुनकर

अकेला होता हूँ जब भी, कोई किस्सा…

Continue

Posted on February 22, 2018 at 11:24am — 5 Comments

ख़्वाब तूने कोई बुना होगा

2122 1212 22/112

ख़्वाब तूने कोई बुना होगा

तब तेरा रतजगा हुआ होगा

 

सर यक़ीनन मेरा झुकेगा जनाब

आपसे जब भी सामना होगा

 

मुद्दतों बाद मेरी याद आई

मुश्किलों से कहीं घिरा होगा

 

मुझको मेहनत लगी थी लिखने में

उसको एहसास इसका क्या होगा

 

शहर में होना आरज़ी है मगर

तज़्किरा मेरा बारहा होगा

 

आरज़ी – थोड़े समय के लिए, तज़्किरा – जिक्र

 

-मौलिक व अप्रकाशित

Posted on September 21, 2017 at 11:24am — 6 Comments

Comment Wall (31 comments)

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At 6:39am on July 2, 2018, राज़ नवादवी said…

आदरणीय शिज्जू शुकुर साहब, तरही मुशायरे में मेरी ग़ज़ल में शिरकत का दिल से शुक्रिया. समयाभाव था, कमेंट बॉक्स बंद हो चुका है. इसलिए यहाँ से आभार प्रकट कर रहूँ हूँ.सादर 

At 10:50pm on April 18, 2016, RATNA PRIYA PANDEY said…
धन्यवाद सर
At 7:06pm on January 3, 2016, Sushil Sarna said…

नूतन वर्ष 2016 आपको सपरिवार मंगलमय हो। मैं प्रभु से आपकी हर मनोकामना पूर्ण करने की कामना करता हूँ।

सुशील सरना

At 9:27pm on April 19, 2015, Mala Jha said…
सप्रेम धन्यवाद महोदय मुझे OBO जैसे प्रतिष्ठित मंच पर स्थान देने के लिए।बहुत बहुत आभार आपका।
At 9:48am on December 31, 2014, Rahul Dangi said…
आदरणीय शिज्जू "शकूर" जी आपका स्वागत है ! और धन्यवाद भी कि आपने मुझ कम बुद्धि को भी अपनी दोस्ती के काबिल समझा! सादर!
At 9:42pm on June 18, 2014, Sushil Sarna said…

aadrneey Shijju Shakoor saahib aapke margdarshan ka main aabhaaree hoon....koshish kroonga ki bataaee bahar pr aage badh skoon....tahe dil se shukriya

At 7:39pm on June 17, 2014, Sushil Sarna said…

हा हा हा …… बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय शिज्जु शकूर जी आपने हमारी रचना को कविता का दर्जा तो दिया। .... काश हमें भी ग़ज़ल लिखने का अंदाज़ आ जाए ? सर मेरी कोशिश तो ग़ज़ल लिखने की थी मगर बह्र में उलझता चला गया कभी ११२ कभी ११२१ करता फिर जब उलझन से छुटकारा न मिला तो रचना बना कर डाल दिया। आप की ज़र्रा नवाज़ी होगी अगर मेहरबानी करके इसी की नीचे लिखी चंद पंक्तियों की बह्र बना कर मुझ नौसिखिये को ग़ज़ल का हुनर सिखाएंगे। तकलीफ के लिए मुआफ़ी चाहता हूँ। शुक्रिया

अपनी हर सांस में...तुझे करीब पाता हूँ
तुझे हर ख्याल में अपना हबीब पाता हूँ
बिन तेरे ज़िंदगी की हर मसर्रत है झूठी
राहे वफ़ा में तुझे अपना नसीब पाता हूँ

At 3:39pm on June 3, 2014, Sushil Sarna said…

aadrbeey Shajju jee, namaskaar-kya apko aik takleef de sakta hoon ? aapkee kripa hogee yadi mujhe thoda sa trhee gazal kya hotee hai, btaayenge. gazal to samajh rhaa hoon pr trhee gazal smajh naheen aa rhee.aapke amuly smay men se kuch smay maang rhaa hoon, please dont mind. 

sushil sarna

At 10:59am on June 3, 2014, RACHNA JAIN said…

आपकी सभी रचनाएँ बहुत खूब हैं सर .... फिर भी, आपकी सलाह पर अमल करेंगे ... शुक्रिया !!

At 10:25am on June 3, 2014, RACHNA JAIN said…

बहुत खूब लिखा सर आपने... बधाई ...!!

 
 
 

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