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Mahendra Kumar
  • Male
  • India
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Mahendra Kumar replied to Ajay Tiwari's discussion मिर्ज़ा ग़ालिब द्वारा इस्तेमाल की गई बह्रें और उनके उदहारण in the group ग़ज़ल की कक्षा
"आदरणीय अजय जी, इस शोधपरक लेख के लिए आपकी जितनी भी तारीफ़ की जाए वो कम है। बहुत से लोगों की तरह ग़ालिब मेरे भी प्रिय शाइर हैं। उनके द्वारा प्रयुक्त बह्रों को एक स्थान पर देखना निश्चित ही बेहद सुखद एहसास है। इस सद्प्रयास हेतु आपको दिल से ढेरों बधाई…"
Sep 7
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"धन्यवाद सर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"आपकी टिप्पणी से अभिभूत हूँ सर। लिखना सार्थक रहा। पिछली बार इसकी बहुत कमी खली। मैं इंतज़ार ही करता रह गया। आपने जिस बिंदु की चर्चा की है उसे सुधारने का प्रयास करता हूँ। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद एवं हृदय से आभार। सादर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीया नीलम जी। हार्दिक आभार। सादर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"आभारी हूँ आदरणीय ओमप्रकाश क्षत्रिय जी। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"सादर आदाब आदरणीय समर कबीर सर। रचना को पसंद करने के लिए आपका हृदय से आभारी हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"हार्दिक आभार आदरणीय मुज़फ़्फ़र इक़बाल सिद्दीक़ी जी। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"बहुत शुक्रिया आदरणीया बरखा जी। हार्दिक आभार। सादर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"हार्दिक आभार आदरणीय तस्दीक़ अहमद ख़ान जी। सादर आभार।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"अन्य प्रतिक्रियाओं को देखकर ऐसा नहीं लगता कि मैं जो कहना चाहता था वो नहीं कह पाया फिर भी इस पर एक बार पुनः विचार करूँगा। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा जी। हार्दिक आभार। सादर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीया बबिता जी। आपका हृदय से आभारी हूँ। सादर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीया नीता जी। आभारी हूँ। सादर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"धन्यवाद आदरणीय अजय जी। हार्दिक आभार। सादर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"रचना के मर्म तक पहुँचने के लिए आपका हृदय से आभारी हूँ आदरणीय विनय कुमार जी। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीया कनक हरलालका जी। हार्दिक आभार। सादर।"
Aug 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए हृदय से आभारी हूँ आदरणीय वीर मेहता जी। आपके सुझाव अनुसार उस हिस्से को और प्रभावी बनाने की पूरी कोशिश रहेगी। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।"
Aug 31

Profile Information

Gender
Male
City State
Allahabad
Native Place
Fatehpur

Mahendra Kumar's Blog

धार्मिक पशु (लघुकथा)

उसका सपना था कि दुनिया ख़त्म हो जाए और दुनिया ख़त्म गयी। अब अगर कोई बचा था तो सिर्फ़ वो और उसकी टूटी-फूटी मोहब्बत।

"अब तो इसे मुझसे बात करनी ही पड़ेगी।" खण्डहर बन चुके शहर की वीरान सड़क पर खड़े उस शख़्स ने कहा।

वह उससे बेपनाह मुहब्बत करता था। वह चाहता था कि वो उसे देखे, उसे समझे, उससे बात करे मगर वो हमेशा ही किसी न किसी और को ढूँढ लेती थी। वह इस बात से हमेशा दुःखी रहता था कि उसे छोड़कर वो बाकी सबसे बात करती है मगर उससे नहीं। उसने कहीं पढ़ा था कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है।…

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Posted on August 10, 2018 at 8:30am — 10 Comments

कवि (अतुकान्त कविता)

संवेदनाओं की पथरीली चोटी पर बैठकर

अपने रिसते हुए घावों को देखता हुआ

ये कौन है

जो कभी कुत्ते की तरह

जीभ से उन्हें चाटता है

तो कभी मुट्ठी में नमक भर कर

उनमें उड़ेल देता है

और फिर एक तपस्वी की तरह

ध्यान लगाकर सुनता है

अपनी आहों और कराहों को?

पत्थरों को उठा कर

अपने लहू में डुबा कर

भावनाओं की लहरों पर बैठे हुए

कौन लिख रहा है उनसे

अपना मृत्यु लेख?

किसी फन्दे पर लटक कर

एक पल में शान्ति से गुज़र जाने की अपेक्षा…

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Posted on June 27, 2018 at 9:03am — 4 Comments

शहीद (लघुकथा)

संसद भवन के बाहर भूख हड़ताल पर बैठे हुए उन युवाओं को दो महीनों से अधिक का समय हो गया था पर न तो किसी अख़बार में इसकी कोई ख़बर थी और न ही न्यूज़ चैनल्स पर चर्चा। 

“इन बेरोज़गार लौंडों के पास अब कोई काम नहीं रह गया है।” बड़ी-बड़ी मूँछों वाले उस स्थानीय बुज़ुर्ग ने अपने पास खड़े अधेड़ से कहा। “कुछ नहीं मिला तो सरकार को ही बदनाम करने में लग गए।”

“कह क्या रहे हैं ये लोग?” अधेड़ ने जिज्ञासा व्यक्त की।

“कह रहे हैं कि जब देश की जनता भूखों मर रही है तो कोई…

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Posted on June 25, 2018 at 4:30pm — 9 Comments

मानव सभ्यता का इतिहास (लघुकथा)

“कितने हसीन थे वो दिन जब पूरे आसमान पर अकेले मेरा राज हुआ करता था।” अपनी पतंग को माँझे से बाँधते हुए छोटा सा वह लड़का अपने सुनहरे अतीत में खो गया। 

अपने मोहल्ले में तब वो अकेले ही पतंग उड़ाने वाला हुआ करता था। न तो उसे कोई रोकने वाला था और न ही टोकने वाला। वह पूरी तरह से स्वतंत्र था। उस वक़्त उसकी बस एक ही हसरत होती, “एक दिन अपनी पतंग चाँद तक ले जाऊँगा।”

मगर यह ज़्यादा दिन चला नहीं। धीरे-धीरे उसके मोहल्ले में दूसरे पतंगबाज़ भी आने लगे। उनके आते ही आसमान में…

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Posted on June 22, 2018 at 5:37pm — 8 Comments

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