For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Mahendra Kumar
  • Male
  • India
Share

Mahendra Kumar's Friends

  • Ajay Tiwari
  • Samar kabeer
  • vijay nikore
  • नादिर ख़ान
  • rajesh kumari
  • मिथिलेश वामनकर
  • योगराज प्रभाकर
 

Mahendra Kumar's Page

Latest Activity

आशीष यादव commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : इक दिन मैं अपने आप से इतना ख़फ़ा रहा
"बेहतरीन अशआर। सुंदर गजल।"
Dec 15, 2019
Samar kabeer commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : इक दिन मैं अपने आप से इतना ख़फ़ा रहा
"जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें । 'तू अपने हक़ में क्यूँ कभी भी सोचता नहीं' इस मिसरे में 'कभी' के साथ 'भी' का प्रयोग उचित नहीं होता,इसे बदलने का प्रयास करें ।"
Dec 13, 2019
Mahendra Kumar posted a blog post

ग़ज़ल : इक दिन मैं अपने आप से इतना ख़फ़ा रहा

अरकान : 221 2121 1221 212इक दिन मैं अपने आप से इतना ख़फ़ा रहाख़ुद को लगा के आग धुआँ देखता रहादुनिया बनाने वाले को दीजे सज़ा-ए-मौतदंगे में मरने वाला यही बोलता रहामेरी ही तरह यार भी मेरा अजीब हैपहले तो मुझको खो दिया फिर ढूँढता रहारोता रहा मैं हिज्र में और हँस रहे थे तुमदावा ये मुझसे मत करो, मैं चाहता रहाकुछ भी नहीं कहा था अदालत के सामनेवो और बात है कि मैं सब जानता रहाईनाम क़ौमी एकता का मिल गया उसेजो आदमी को आदमी में बाँटता रहातू अपने हक़ में क्यूँ कभी भी सोचता नहींकल रात देर तक मैं यही सोचता रहा(मौलिक…See More
Dec 12, 2019
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : इक दिन मैं अपने आप से इतना ख़फ़ा रहा
"आपकी पारखी नज़र को सलाम आदरणीय निलेश सर। इस मिसरे को ले कर मैं दुविधा में था। पहले 'दी' के साथ कहा फिर 'के' के साथ और आख़िर में पुनः 'दी' कर दिया पर पूर्ण विश्वास नहीं था कि कौन बेहतर है। आपने संशय दूर कर दिया। मिसरा…"
Dec 10, 2019
Nilesh Shevgaonkar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : इक दिन मैं अपने आप से इतना ख़फ़ा रहा
"बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है आ. महेंद्र जी। .ख़ुद को लगा दी ..ख़ुद को लगा के . बस ऐसी ही छोटी मोटी गुँजाइश है। .बहुत बहुत बधाई "
Dec 10, 2019
Mahendra Kumar posted blog posts
Dec 10, 2019
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : ख़ून से मैंने बनाए आँसू
"बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण धामी जी। हृदय से आभारी हूँ। सादर।"
Dec 10, 2019
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : ख़ून से मैंने बनाए आँसू
"ख. भाई महेंद्र जी, उम्दा गजल हुई है हार्दिक बधाई।"
Dec 9, 2019
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : ख़ून से मैंने बनाए आँसू
"बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर सर। हृदय से आभारी हूँ। सादर आदाब।"
Dec 8, 2019
Samar kabeer commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : ख़ून से मैंने बनाए आँसू
"जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।"
Dec 8, 2019
Mahendra Kumar commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post कुछ ज्वलन्त विषयों पर कुण्डलिया
"बढ़िया कुण्डलियाँ हैं आदरणीय सुरेन्द्र जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।"
Dec 4, 2019
Mahendra Kumar commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post उर उमंग से भर गया
"अच्छी रचना है आदरणीय प्रदीप जी। हार्दिक बधाई। सादर।"
Dec 4, 2019
Mahendra Kumar commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post यादें
"हार्दिक बधाई आदरणीय प्रदीप जी, अच्छी रचना हुई है।  //वो आकाश में बिजली का वो कौंधना// इस पंक्ति में एक "वो" अतिरिक्त है। सादर।"
Dec 4, 2019
Mahendra Kumar commented on Manju Saxena's blog post लघुकथा....अर्धांगिनी
"आदरणीया मंजू जी, लघुकथा का अच्छा प्रयास है। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। अनावश्यक विस्तार की तरफ़ आदरणीय समर कबीर सर ने इशारा कर ही दिया है। उनकी बात का संज्ञान लें। मंच से जुड़ी रहेंगी तो निश्चित ही आपको मंच से और हम सबको आपसे बहुत कुछ सीखने को…"
Dec 4, 2019
Mahendra Kumar commented on Sushil Sarna's blog post ३ क्षणिकाएँ :
"तीनों ही क्षणिकाएँ उम्दा हुई हैं आदरणीय सुशील सरना जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।"
Dec 4, 2019
Mahendra Kumar commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post मन है कि मानता ही नहीँ ....
"अच्छी रचना है आदरणीय प्रदीप जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।"
Dec 4, 2019

Profile Information

Gender
Male
City State
Allahabad
Native Place
Fatehpur

Mahendra Kumar's Blog

ग़ज़ल : इक दिन मैं अपने आप से इतना ख़फ़ा रहा

अरकान : 221 2121 1221 212

इक दिन मैं अपने आप से इतना ख़फ़ा रहा

ख़ुद को लगा के आग धुआँ देखता रहा

दुनिया बनाने वाले को दीजे सज़ा-ए-मौत

दंगे में मरने वाला यही बोलता रहा

मेरी ही तरह यार भी मेरा अजीब है

पहले तो मुझको खो दिया फिर ढूँढता रहा

रोता रहा मैं हिज्र में और हँस रहे थे तुम

दावा ये मुझसे मत करो, मैं चाहता रहा

कुछ भी नहीं कहा था अदालत के सामने

वो और बात है कि मैं सब जानता…

Continue

Posted on December 10, 2019 at 10:00am — 4 Comments

ग़ज़ल : ख़ून से मैंने बनाए आँसू

अरकान : 2122 1122 22

चाहा था हमने न आए आँसू

उम्र भर फिर भी बहाए आँसू

कोई तो हो जो हमारी ख़ातिर

पलकों पे अपनी सजाए आँसू

मार के अपने हसीं सपनों को

ख़ून से मैंने बनाए आँसू

वक़्त बेवक़्त कहीं भी आ कर

याद ये किसकी दिलाए आँसू

कोई भी तेरा न दुनिया में हो

रात दिन तू भी गिराए आँसू

दुनिया में इनकी नहीं कोई क़द्र

इसलिए मैंने छुपाए आँसू

आपसे मिल के ये पूछूँगा मैं

आपने…

Continue

Posted on December 3, 2019 at 5:46pm — 4 Comments

ग़ज़ल : मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ

बह्र : 1222 1222 122

तुम्हारे शहर से मैं जा रहा हूँ

बिछड़ने से बहुत घबरा रहा हूँ

 

वहाँ दुनिया को तू अपना रही है

यहाँ दुनिया को मैं ठुकरा रहा हूँ

 

उठा कर हाथ से ये लाश अपनी

मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ

 

तुम्हारे इश्क़ में बन कर मैं काँटा

सभी की आँख में चुभता रहा हूँ

 

नहीं मालूम जाना है कहाँ पर

न जाने मैं कहाँ से आ रहा हूँ

 

मुहब्बत रात दिन करनी थी तुमसे

तुम्हीं से…

Continue

Posted on January 31, 2019 at 7:51pm — 8 Comments

ग़ज़ल : मुझसे मत बोलिए मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है

बह्र : 2122 1122 1122 22/112

मैंने देखा है कि दुनिया में क्या क्या होता है

मुझसे मत बोलिए मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है

 

इश्क़ ही सबसे बड़ा ज़ुर्म है इस दुनिया में

ये ख़ता कर लो तो हर शख़्स ख़फ़ा होता है

 

जो गलत करते हैं, वो लोग सही होते हैं

और जो अच्छा करे तो वो बुरा होता है

 

मैं भी इस ज़ख़्म को नासूर बना डालूँगा

दर्द बतलाओ मुझे कैसे दवा होता है

 

कभी दिखता था ख़ुदा मुझको भी मेरे अन्दर

और अब इस पे भी…

Continue

Posted on January 27, 2019 at 11:30am — 10 Comments

Comment Wall (1 comment)

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

At 9:45am on January 27, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय महेंद्र जी
बहुत शुक्रिया
 
 
 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-105 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. प्रतिभाबहन , चित्रानुरूप उत्तम दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई ।"
42 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-105 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई सतविन्द्र जी, सादर अभिवादन । काव्यात्मक उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार ।दो दोहों में…"
43 minutes ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

दुनिया में सब इश्क़ करें तो कितना अच्छा हो (ग़ज़ल)

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २जब चाहें तब इश्क़ करें तो कितना अच्छा होदुनिया में सब इश्क़ करें तो कितना…See More
2 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post फुलवारी बन रहना (नवगीत)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी,  Dr. Geeta…"
4 hours ago
विवेक ठाकुर "मन" commented on विवेक ठाकुर "मन"'s blog post एक ग़ज़ल - ख़ुद को आज़माकर देखूँ
"बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय"
5 hours ago
narendrasinh chauhan commented on Sushil Sarna's blog post पाप .... (दो क्षणिकाएँ )
"KHUB SUNDAR SIR "
8 hours ago
सतविन्द्र कुमार राणा replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-105 in the group चित्र से काव्य तक
"कथन चित्र से छीन कर, दोहे रचे महान, कुछ में लेकिन शिल्प का, नहीं रहा है ध्यान।।"
10 hours ago
सतविन्द्र कुमार राणा replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-105 in the group चित्र से काव्य तक
"उत्तम दोहे हैं रचे, सीधी साची बात बातों-बातों में मिली, हर ढोंगी को मात। हार्दिक बधाई"
10 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-105 in the group चित्र से काव्य तक
"दोहा छंद ________ 1)  उकड़ू बैठा दीन है, नहीं फूटते बोल। मैडम सर  हैं पीटते, जन सेवा का…"
12 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

पाप .... (दो क्षणिकाएँ )

पाप .... (दो क्षणिकाएँ )तुम्हारे अत्याचारों को सह जाऊँगी तुम्हारी अर्धांगिनी हूँ मैं तुम देव हो…See More
17 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-105 in the group चित्र से काव्य तक
"दोहे**निर्धन से रख बैर की, अजब अनौखी रीतमौसम आया शीत का, धनवानों का मीत।१।**किट-किट बजते दाँत हैं,…"
20 hours ago
vijay nikore posted blog posts
yesterday

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service