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Usha Awasthi
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Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post क्यों ना जड़ पर चोट ?
" सादर प्रणाम, सुरेंद्र नाथ सिंह जी, उत्साह बढ़ाती टिप्पणी हेतु बहुत धन्यवाद"
Saturday
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Usha Awasthi's blog post क्यों ना जड़ पर चोट ?
"आद उषा अवस्थी जी सादर अभिवादन। बढ़िया रचना हुई है। बधाई स्वीकार कीजिये।"
Saturday
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post उरिझै कवनेउ मंद
"प्रणाम, डा0 प्राची सिंह जी,मैं यह बात पटल पर कई बार कह चुकी हूँ कि मैं किसी विधा  का ख्याल रखकर नहीं लिखती। केवल मेरा ध्यान भावों पर रहता है कि वह  ठीक से व्यक्त हों। कृपया  इसे अतुकान्त ही जानें। टिप्पणी हेतु बहुत आभार आपका  "
Friday
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post उरिझै कवनेउ मंद
"हार्दिक धन्यवाद डा0 प्राची सिंह जी, मुझे मालूम है कि मैं इसे बेहतर लिख सकती थी । मैंने इसको केवल पन्द्रह मिनट में लिख कर डाल दिया था । निश्चय ही मुझे रुक कर डालना चाहिए था। पुनः आभार आपका। या "
Thursday

सदस्य टीम प्रबंधन
Dr.Prachi Singh commented on Usha Awasthi's blog post उरिझै कवनेउ मंद
"अहा ! आनंदित करता दोहा प्रयास बहुत सुन्दर शिल्प कहीं कहीं कमज़ोर रह गया,, सतत अभ्यास से जल्दी ही सध जाएगा सस्नेह "
Thursday
Usha Awasthi posted a blog post

उरिझै कवनेउ मंद

सत्य सुनावै मनई कोउभरि साँसैं जमुहाईंझूठि जहाँ पर चलि रहाहुइ चैतन मुसुकाहिंबहुतै मजा मिलै जहाँचुगली खावैं लोगनमक, खटाई, मिरचि जबचटकि , तबहिं मन मोदका कलजुग ना दिखावैसत्पथ धरहि जो पाँवतपति मरूथल रेत जसिदीखै कहूँ न छाँवमौनी अब तौ साधिहौंवाहै मा आनन्दई सांसारिक जालि माउरझै कवनेउ मंदमौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Thursday
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post क्यों ना जड़ पर चोट ?
"सादर प्रणाम ,  भाई लक्ष्मण धामी जी, रचना पर आपके विचार जानकर खुशी हुई।हार्दिक धन्यवाद"
Jul 6
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post क्यों ना जड़ पर चोट ?
"आ. ऊषा जी, सादर अभिवादन । अच्छी कविता हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Jul 6
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post क्यों ना जड़ पर चोट ?
"आदाब , आ0, हार्दिक आभार आपका"
Jul 5
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Usha Awasthi's blog post क्यों ना जड़ पर चोट ?
"आदरणीया ऊषा अवस्थी जी आदाब, सुन्दर रचना हुई है बधाई स्वीकार करें। सादर। "
Jul 5
Usha Awasthi posted a blog post

क्यों ना जड़ पर चोट ?

पैसों से क्या जान कोहम पाएगें तोल ?सदा - सदा को बुझ गएजब चिराग़ अनमोलकिन-किन के थे वरद हस्तजो पनपी यह खोटखोज-खोज उनकी करेंक्यों ना जड़ पर चोट ?इस बढ़ती विष बेल परयदि ना डली नकेलचक्रब्याज की वृद्धि समबढ़ जाएगा खेलघर के ही दुश्मन करेंजन्म भूमि से घातपर दुख से मतलब नहींअपना सुख दिन - रातपा कर शह उन्मुक्त होनित बढ़ते दुर्दान्तरक्षक बल  को ख़ौफ़ बिनमार रहे पथ भ्रान्तमौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Jul 4
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे
"आदाब , आ0 ,आपको  प्रस्तुति सुन्दर लगी , जान कर प्रसन्नता हुई । हार्दिक धन्यवाद आपको"
Jul 4
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Usha Awasthi's blog post रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे
"आदरणीया ऊषा अवस्थी जी आदाब, इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें। सादर। "
Jul 3
Usha Awasthi posted a blog post

रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे

रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसेअजहूँ न आए पिया रे..ये बदरा कारे - कजरारे बार- बार आ जाएँ दुआरेघर आँगन सब सूना पड़ा रेसूनी सेजरिया रेरिमझिम....तन-मन ऐसी अगन लगाएजो बदरा से बुझे न बुझाए )अब तो अगन बुझे तबही जबआएँ साँवरिया रेरिमझिम...छिन अँगना छिन भीतर आऊँदीप बुझे सौ बार जलाऊँपिया हमारे घर आएगेंछाई अँधियारी रेरिमझिम .....मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Jul 3
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post खो बैठे जब होश
"आ. हार्दिक धन्यवाद आपको"
Jul 2
Dr. Vijai Shanker commented on Usha Awasthi's blog post खो बैठे जब होश
"“ कलियुग इसको ही कहें ” समयानुकूल प्रस्तुति , आदरणीय सुश्री उषा अवस्थी जी , बधाई , सादर।"
Jul 2

Profile Information

Gender
Female
City State
Lucknow
Native Place
Uttar Pradesh
Profession
Author

ब्राहम्ण

उषा अवस्थी

मान दिया होता यदि तुमने
ब्राम्हण को , सुविचारों को
सदगुण की तलवार काटती
निर्लज्जी व्यभिचारों को

उसको काया मत समझो ,
ज्ञान विज्ञान समन्वय है
द्वैत भाव से मुक्त, जितेन्द्रिय
सत्यप्रतिज्ञ , समुच्चय है

कर्म , वचन , मन से पावन
वह ब्रम्हपथी , समदर्शी है
नहीं जन्म से , सतत कर्म से
तेजस्वी , ब्रम्हर्षि है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Usha Awasthi's Blog

उरिझै कवनेउ मंद

सत्य सुनावै मनई कोउ

भरि साँसैं जमुहाईं

झूठि जहाँ पर चलि रहा

हुइ चैतन मुसुकाहिं

बहुतै मजा मिलै जहाँ

चुगली खावैं लोग

नमक, खटाई, मिरचि जब

चटकि , तबहिं मन मोद

का कलजुग ना दिखावै

सत्पथ धरहि जो पाँव

तपति मरूथल रेत जसि

दीखै कहूँ न छाँव

मौनी अब तौ साधिहौं

वाहै मा आनन्द

ई सांसारिक जालि मा

उरझै कवनेउ मंद

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on July 8, 2020 at 6:28pm — 3 Comments

क्यों ना जड़ पर चोट ?

पैसों से क्या जान को

हम पाएगें तोल ?

सदा - सदा को बुझ गए

जब चिराग़ अनमोल

किन-किन के थे वरद हस्त

जो पनपी यह खोट

खोज-खोज उनकी करें

क्यों ना जड़ पर चोट ?

इस बढ़ती विष बेल पर

यदि ना डली…

Continue

Posted on July 4, 2020 at 5:50pm — 6 Comments

रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे

रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे

अजहूँ न आए पिया रे..

ये बदरा कारे - कजरारे 

बार- बार आ जाएँ दुआरे

घर आँगन सब सूना पड़ा रे

सूनी सेजरिया रे

रिमझिम....

तन-मन ऐसी अगन लगाए

जो बदरा से बुझे न बुझाए )

अब तो अगन बुझे तबही जब

आएँ साँवरिया रे

रिमझिम...

छिन अँगना छिन भीतर आऊँ

दीप बुझे सौ बार जलाऊँ

पिया हमारे घर आएगें

छाई अँधियारी रे

रिमझिम .....

मौलिक…

Continue

Posted on June 30, 2020 at 9:00pm — 2 Comments

क्यों करते अह्वान ?

कितने सालों से सुनें

शान्ति - शान्ति का घोष

अपने ही भू- भाग को

खो बैठे , बेहोश

जब दुश्मन आकर खड़ा

द्वार , रास्ता रोक

क्या गुलाम बन कर रहें ?

करें न हम प्रतिरोध 

ज्ञान - नेत्र को मूँद लें

खड़ा करें अवरोध 

गीता से निज कर्म - पथ

का , कैसै हो बोध ?

ठुकराते ना सन्धि को

कौरव कर उपहास

कुरूक्षेत्र का युद्ध क्यों ?

फिर बनता इतिहास

सोलह कला प्रवीण…

Continue

Posted on June 25, 2020 at 10:30am

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At 6:29am on August 5, 2018, Kishorekant said…

सुन्दर रचना केलिये हार्दिक अभिनंदन सुश्री उषा अवस्थिजी ।

At 9:01pm on September 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए....

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है.

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"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया, कोशिश करूंगा कि नियमित रह सकूं।"
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"आद0 लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी सादर अभिवादन ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और प्रतिक्रिया का हृदयतल से आभार…"
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सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post ग़ज़ल- रोज़ सितम वो ढाते देखो हम बेबस बेचारों पर
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