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AMAN SINHA
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  • Samar kabeer
  • लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
 

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नाथ सोनांचली commented on AMAN SINHA's blog post दर्द से यारी
"आद0 अमन सिन्हा जी सादर अभिवादन बढ़िया सृजन और भावभियक्ति पर आपको बहुत बहुत बधाई"
Oct 13
Dr. Vijai Shanker commented on AMAN SINHA's blog post जुनून
"आदरणीय अमन सिन्हा जी , हुआ क्या राहों मे तेरे, जो बस पत्थर ही पत्थर हैचूमेंगे पाँव वो तेरे ये “जुनून” तुझसे कहता है.बहुत ही सुन्दर , प्रेरक प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई , सादर।"
Oct 6

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on AMAN SINHA's blog post जुनून
"आदरणीय अमन जी, आपके प्रयास के लिए बधाइयाँ.  मात्राएँ और विन्यास पर समझ बढ़ाएँगे तो कहन में सान्द्रता बढ़ेगी.  शुभ-शुभ  "
Oct 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on AMAN SINHA's blog post जुनून
"आ. अमन जी, अभिवादन। सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Oct 4
AMAN SINHA commented on AMAN SINHA's blog post क्षितिज
"@मुसाफिर साहब @समर कबीर साहब  आप दोनों का तहे दिल से शुक्रिया "
Oct 4
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on AMAN SINHA's blog post क्षितिज
"आ. भाई अमन जी, अभिवादन । अच्छी प्रस्तुति हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें। "
Oct 4
AMAN SINHA posted a blog post

दर्द से यारी

हर संगदिल को दिल का पता बता दियाजितने बेवफा मिले सबको घर दिखला दियासभी ने छोड़ दिया जिस ग़म को खुशी के खातिरहमे जहाँ भी दिखा,उसे हंसके गले लगा लियासाथ हो दर्द तभी जीने का मज़ा आता हैग़म जुदाई का हो तो पीने का मज़ा आता हैछुपा के रख सके जो दर्द को जहन मे अपनेज़ख्मों को सीने का मज़ा बस उसी को आता हैखुशी है बुलबुला एक दिन फूट जाएगाहंसाया इसने जितना, उतना ही रुलाएगाहमसफर है सच्चा ग़म ही अपना यारोंजो आया तो अपने साथ लेकर जाएगाजो फिरते हैं ढूंदते दिल का सुकून दूकानों मेउन्हे नहीं मालूम ये मिलते है सिर्फ…See More
Oct 3
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on AMAN SINHA's blog post कुछ बदला सा
"आ. भाई अमन जी, अभिवादन। अच्छी प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई।"
Oct 3
AMAN SINHA commented on AMAN SINHA's blog post दिखने दो
"@विजय निकोरे साहब,  धन्यवाद "
Oct 2
AMAN SINHA commented on AMAN SINHA's blog post कुछ बदला सा
"@विजय निकोरे साहब,  धन्यवाद "
Oct 2
AMAN SINHA commented on AMAN SINHA's blog post जुनून
"@अमीरुद्दीन साहब,  शुक्रिया, अभार "
Oct 2
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on AMAN SINHA's blog post जुनून
"जनाब अमन सिन्हा जी आदाब, ख़ूबसूरत ख़यालात और जज़्बात से पुर अच्छी रचना हुई है बधाई स्वीकार करें। सादर। "
Oct 1
AMAN SINHA commented on AMAN SINHA's blog post जुनून
"@समर कबीर साहब,  हौंसला बढाने के लिये धन्यवाद "
Oct 1
AMAN SINHA commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (दिलों से ख़राशें हटाने चला हूँ )
"जनाब अमिरुद्दिन साहब,  आप लोगोंं को पढ कर समझ मे आता है की अभी कितना कुछ सिखना मेरे लिये बाकी है और जरूरी भी है। रचना बहुत अच्छी और दिल को छुने वाली लगी।  "
Oct 1
AMAN SINHA commented on Sushil Sarna's blog post तो रो दिया .......
"आदरणिय सुशिल जी, अति सुंदर रचना के लिए बधाई "
Oct 1
Samar kabeer commented on AMAN SINHA's blog post जुनून
"जनाब अमन सिन्हा जी आदाब. सुंदर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें I "
Sep 30

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AMAN SINHA's Blog

दर्द से यारी

हर संगदिल को दिल का पता बता दिया

जितने बेवफा मिले सबको घर दिखला दिया

सभी ने छोड़ दिया जिस ग़म को खुशी के खातिर

हमे जहाँ भी दिखा,उसे हंसके गले लगा लिया

साथ हो दर्द तभी जीने का मज़ा आता है

ग़म जुदाई का हो तो पीने का मज़ा आता है

छुपा के रख सके जो दर्द को जहन मे अपने

ज़ख्मों को सीने का मज़ा बस उसी को आता है

खुशी है बुलबुला एक दिन फूट जाएगा

हंसाया इसने जितना, उतना ही रुलाएगा

हमसफर है सच्चा ग़म ही अपना यारों

जो…

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Posted on October 1, 2021 at 11:30am — 1 Comment

जुनून

रगो मे खून बनकर तेरे, यूँ “जुनून” बहता है

बिना मंज़िल के ना रुकना, ये सुकून कहता है

हुआ क्या राहों मे तेरे, जो बस पत्थर ही पत्थर है

चूमेंगे पाँव वो तेरे ये “जुनून” तुझसे कहता है

 

है मुश्किल सफर तेरा ये, गलियां तुझसे कहती है

चुनी ये राह जिसने भी, गुमान दुनिया करती है

तू देख कर चट्टानों को कभी हिम्मत नहीं खोना

पल भर की नाकामी पर तू भूल कर भी नहीं रोना

 

पहाड़ो मे सुराख कर दे, ये हिम्मत बस तुझी मे…

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Posted on September 30, 2021 at 10:00am — 7 Comments

क्षितिज

वो जहां पर असमा और धरा मिल जाते है

छोर मिलते ही नहीं पर साथ में खो जाते है

है यही वो स्थान जिसका अंत ही नहीं

मिल गया या खो गया है सोचते है सब यही



सबको है चाह इसकी पर राह का पता नहीं

बिम्ब या प्रतिबिम्ब है ये भ्रम सभी को है यही

कामना को पूर्ण करने श्रम छलांगे भरता है

मरीचिका के जाल में जैसे मृग कोई भटकता है



है धरा का अंत वही जिस बिंदु से शुरुआत है

यात्रा अनंत इसकी कई युगों की बात है

ओर ना है छोर इसका शुन्य सा आकाश है

जिसका जग को…

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Posted on September 27, 2021 at 10:36am — 3 Comments

कुछ बदला सा

कुछ बदला-बदला सा ये जहां नज़र आता है, 

राह अब भी है वही पर, अजनबी सा नज़र आता है

तन तो हमेशा ही अपना था मगर,

न जाने क्यों अब पराया सा नज़र आता है

 

ज़िंदगी को हमने कुछ यूं गुज़रते देखा

जैसे रेत को बंद मुट्ठी से फिसलते देखा

ज़ोर जितना भी लगाया रोकने मे उसे

छोटे से छेद से जिंदगी को निकलते देखा

एक आहट सी हुई किसी के आने की जैसे

साँसो मे घुल सी गयी किसी की खुशबू जैसे

इस खुशबू से मेरा वास्ता एक अरसे से रहा

रूह…

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Posted on September 22, 2021 at 10:00am — 5 Comments

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