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ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़

२१२२  १२२२   २

झोपड़ी को डुबाने निकले
सारे बादल दिवाने   निकले

खेत घर हो गए बंजर से
बच्चे बाहर कमाने  निकले

द्रोपदी सी प्रजा है बेबस
जब से राजा ये काने  निकले

आदमी भूल आदम की पर
पाक खुद को बताने  निकले

जब्त गम को किया तब हम भी
इस जहां को हँसाने  निकले

माँ को खोया तो समझा मैंने
हाथ से जो खजाने  निकले

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on July 22, 2014 at 7:00pm — 10 Comments

बैसाखियाँ- डा० विजय शंकर

बैसाखियाँ बैसाखियाँ बैसाखियाँ ,

हर तरफ बैसाखियाँ ,

उनके लिए जिन्हें जरुरत है ,

उनकें लिए भी , जिन्हें जरुरत नहीं है .

लोगों को बैसाखियों की जरुरत हो न हो

बैसाखियों को तो सबकी जरुरत है.

सब उन्हें लें , उनके सहारे आगे बढ़ें ,

अन्यथा बिलकुल न बढ़ें , नहीं तो ,

बढ़ना क्या , चलने लायक नहीं रह जायेगें .

फिर हमारे पास , हमको लेने आयेंगें .

हमें समझें , हमारा महत्व समझें ,

क्यों हमारा धंधा खराब करते हैं



मौलिक एवं अप्रकाशित.

डा० विजय… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on July 22, 2014 at 1:16pm — 14 Comments

रीतिरात्मा काव्यस्य - डा0 गोपाल नारायन श्रीवास्तव

रीति संप्रदाय पर चर्चा करने से पूर्व  यह स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि भारतीय हिन्दी साहित्य के रीति-काल में प्रयुक्त ‘रीति’ शब्द से इसका कोई प्रयोजन नहीं है I रीति-काल में लक्षण ग्रंथो के लिखने की एक बाढ़ सी आयी, जिसके महानायक केशव थे और इस स्पर्धा में कवियों के बीच आचार्य बनने की होड़ सी लग गयी I परिणाम यह हुआ कि अधिकांश कवि स्वयंसिद्ध आचार्य बने और कोई –कोई कवि न शुद्ध आचार्य रह पाए और न कवि I इस समय ‘रीति ‘ शब्द का प्रयोग काव्य शास्त्रीय लक्षणों के लिए हुआ I  किन्तु, जिस रीति संप्रदाय की…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 22, 2014 at 11:30am — 17 Comments

आग्रही नयी पीढ़ी

सामाजिक सुरक्षा को तरसे

एकल परिवारों में जो पले,

आर्थिक सुरक्षा और -

स्नेह भाव मिले

संयुक्त परिवार की ही

छाया तले |

घर परिवार में

हर सदस्य का सीर  

बुजुर्ग भी होते भागीदार,

बच्चो की परवरिश हो,

संस्कार या व्यवहार |

 

अभिभावक व माता पिता

जताकर समय का अभाव

नहीं बने

अपराध बोध के शिकार,

संयुक्त परिवार तभी

रहे और चले |

प्रतिस्पर्था से भरी

सुरसा सामान…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 22, 2014 at 10:30am — 10 Comments

भुला देना

मरा था मैं तड़प कर वो जमाना भी भुला देना

बसाया था तुझे दिल में फसाना भी भुला देना



जले खुद थे चरागो से बचाया था तुझे हमने

नहीं ये राह फूलो की बताना भी भुला देना



सहे है दर्द हम कितने पता हो तो जरा बोलो

छुपा कर दर्द मेरा  मुस्‍कुराना भी भुला देना



निगााहो में बसाया था तुझे आखे बनाया था

चली जो छोड़ कर अाँसू बहाना भी भुला देना





उड़े आंचल तुम्‍हारे थे सभाला था हवाओं से

कहा था कुछ हवाओं ने बताना भी भुला…

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Added by Akhand Gahmari on July 21, 2014 at 8:00pm — 23 Comments

कौन छोड़ा इस हवस के आदमी ने - गजल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर ’ )



2122    2122    2122

**************************

घाट सौ-सौ  हैं  दिखाए  तिश्नगी  ने

कौन छोड़ा  इस  हवस के आदमी ने

**

करके  वादा   रोशनी  का हमसे यारो

रोज  लूटा  है   हमें   तो   चाँदनी ने

**

राह बिकते मुल्क  के सब रहनुमा अब

क्या किया ये  खादियों  की  सादगी ने

**

रात जैसे  इक  समंदर  तम  भरा  हो

पार जिसको नित  किया आवारगी ने

**

झूठ को जीवन दिया है इसतरह कुछ

यार  मेरे  सत्य को  अपना  ठगी ने

**

पास आना था हमें  यूँ भी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 21, 2014 at 7:46pm — 10 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : भुट्टे वाली (गणेश जी बागी)

            "भुट्टे ले लो, हरे ताजे भुट्टे ले लो !" हर रोज सुबह-सुबह मैले कुचैले कपडे पहने, सर पर टोकरी लिए भुट्टे वाली कॉलोनी में आ जाती थी, मैं तो उसकी आवाज़ से ही जगता था ।

               …
Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 21, 2014 at 6:30pm — 25 Comments

एक खौफनाक रात

यह बात 24 जून 1989 की है मेरे पिता जी जनपद देवरिया के पडरौना में तैनात थे। हम लोग वही से अपनी कार यू0पी0के0 4038 से पडरौना से अपनी मौसी की शादी में भाग लेने धरहरा मुँगेर जा रहे थे। हमारे साथ हमारी माता जी, दो भाई, मामा और वह मौसी जिनकी शादी थी और उनकी एक मित्र रूबी थी। हम लोग सुबह 6 बजे पडरौना से निकल कर 12 बजे गोपालगंज बिहार के पास पहुँचे थे उसी समय हम लोगो की कार खराब हो गयी हमारे मामा गोपालगंज बिहार से लाये मगर शा वह कार किसी तरह को गोपालगंज के अपने गैरेज में लाया मगर वह कार को पूरी तरह…

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Added by Akhand Gahmari on July 20, 2014 at 4:17pm — 12 Comments

ग़ज़ल : ज्ञान थोड़ा बयान ज़्यादा है

बह्र : २१२२ १२१२ २२

आजकल ये रुझान ज़्यादा है

ज्ञान थोड़ा बयान ज़्यादा है

 

है मिलावट, फ़रेब, लूट यहाँ

धर्म कम है दुकान ज्यादा है

 

चोट दिल पर लगी, चलो, लेकिन

देश अब सावधान ज़्यादा है

 

दूध पानी से मिल गया जब से

झाग थोड़ा उफ़ान ज़्यादा है

 

पाँव भर ही ज़मीं मिली मुझको

पर मेरा आसमान ज़्यादा है

 

ये नई राजनीति है ‘सज्जन’

काम थोड़ा बखान ज़्यादा है

---------

(मौलिक एवं…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 20, 2014 at 3:35pm — 21 Comments

गंगा के फ़ूल (लघु कथा) // --शुभ्रांशु पाण्डेय

छपाक्… ! 

मन्नू ने गंगा में कूद कर यात्रियों के चढ़ाये नारियल और फूल छान लिये. 

“अरे ये क्या किया.. जाने देते.. ”, एक यात्री डपटता हुआ चिल्लाया, “..फ़िर किसी और को बेच दोगे.. साले पूजा की चीजें भी नहीं छोडते हैं ये..” 

“जब पूजा करना तो बोलना.. वर्ना सरकार ने अब गंगा को गंदा करने वालों को जेल भेजना शुरु कर दिया है..”, एक तिरछी मुस्कान के साथ मन्नू ने आँख…

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Added by Shubhranshu Pandey on July 20, 2014 at 11:30am — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
‘महिला उत्थान’ (लघु कथा )

‘महिला उत्थान’ मुद्दे पर संगोष्ठी से घर लौटते  ही कुमुद से उसके पति ने कहा... “अभी थोड़ी देर पहले ही दीपा आई थी मिठाई लेकर वो  बहुत अच्छे नम्बरों से पास हुई है  कंप्यूटर कोर्स तो उसका पूरा हो ही गया था,तुम्हारी प्रेरणा और  मार्ग दर्शन से कितना कुछ कर लिया इस लड़की ने हमारे घर में काम करते-करते....  अब सोचता हूँ अपने ऑफिस में एक वेकेंसी निकली है इसको रखवा दूँ “

 कुमुद कुछ सोच कर बोली”अजी इतनी भी क्या जल्दी, वैसे भी सोचो इतनी अच्छी काम वाली फिर कहाँ मिलेगी, फिर तो ये काम करेगी…

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Added by rajesh kumari on July 20, 2014 at 11:00am — 28 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - अदावत भी हमी से, हमदमी भी ( गिरिराज भन्डारी )

1222     1222      122  ---  

कभी महसूस कर मेरी कमी भी

तेरी आँखों में हो थोड़ी नमी भी

 

नदी की धार सी पीड़ा बही, पर

किनारों के दिलों में क्या जमी भी ?

 

खुशी तो है उजालों की, मगर क्यों

कहीं बाक़ी दिखी है बरहमी* भी     ( खिन्नता )

 

उड़ाने आसमानी भी रखो पर

तुम्हे महसूस होती हो ज़मी भी

 

ये रिश्ता किस तरह का है बताओ ?

अदावत* भी हमी से, हमदमी भी       ( दुश्मनी )

 

उफ़क पे देख लाली है खुशी…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 20, 2014 at 10:39am — 22 Comments

सामायिक गीत !

सामायिक गीत !

==========

मन से मन की बात चलेगी

सहज भाव अपनापन होगा।

जुड़े नहीं जो तार ये मन के

सूखा और सूनापन होगा !



छद्म ,छल-कपट छलिया बन के

मेघदूत आये सावन के !

किसका ये सब रचा हुआ है /

मुद्दे का सत्यापन होगा !

मन से मन की बात चलेगी

सहज भाव अपनापन होगा   …।



हर मौसम को धरा सह…

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Added by AVINASH S BAGDE on July 19, 2014 at 9:19pm — 15 Comments

माँ, बहन, बेटी के आँसू

 

माँ, बहन, बेटी के आँसू पे यहाँ रोता है दिल

रोज़ लुटती अस्मतें, क़त्लों का ग़म ढोता है दिल |

 

आबरू को उम्रदारों ने भी बदसूरत किया

मर्दों का बचपन भी है बदकार बद होता है दिल |

 

शाहो-साहब औ’ गँवारों सब में बद शह्वानीयत  

सब की आँखों में चढ़ा शर्मो-हया खोता है दिल |

 

है हुक़ूमत बेअसर बेख़ौफ़ हैं ज़ुल्मो-ज़बर  

हर घड़ी हर साँस जैसे ख़ार पे सोता है दिल |

 

आज भी शै की तरह हैं घर या बाहर…

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Added by Santlal Karun on July 19, 2014 at 7:25pm — 34 Comments

एका अपने देश का

 

भारत तेरा रूप सलोना, यहाँ-वहाँ सब माटी सोना |

 

कहीं पर्वत-घाटी, जंगल, कहीं झरना-झील, समुन्दर

कहीं गाँव-नगर, घर-आँगन, कहीं खेत-नदी, तट-बंजर

कश्मीर से कन्याकुमारी, कामरूप से कच्छ की खाड़ी

तूने जितने पाँव पसारे, एक नूर का बीज है बोना |

 

इस डाल मणिपुरी बोले, उस डाल मराठी डोले

इस पेड़ पे है लद्दाखी, उस पेड़ पे भिल्लीभिलोडी

कन्नड़-कोयल, असमी-तोता, उर्दू–बुलबुल, उड़िया-मैना

एक बाग के सब हैं पंछी, सब से चहके…

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Added by Santlal Karun on July 19, 2014 at 7:00pm — 26 Comments

“खुशी जी आपको मेरा सलाम” / एक संस्मरण.........

यही कोई 40 से 45 के बीच की रही होगीं वो गठीला बदन, घने काले बाल थ्री स्टेप में कटे हुए, माथे पर सुर्ख लाल बिंदी उनके चेहरे की खूबसूरती को और भी बढ़ा रही थी हलकी हवा के झोके से उनके बालों की लटकती हुई लट लयमान होकर मानो उनके चेहरे को पूरी तरह से ढकना चाह रही हो उनके एक ओर शून्य में एकटक निहारने की कोशिश जो बरबस उनकी तरफ मुझे आकर्षित कर रही थी  उनके व्यक्तित्व को देखकर कोई भी ये महसूस कर सकता था कि उनके चेहरे पर प्रकति ने स्थाई रूप से मुस्कुराहट और प्यार चिपकाए होंगे लेकिन वक्त के थपेड़ों ने…

Continue

Added by sunita dohare on July 19, 2014 at 5:30pm — 9 Comments

लाजवन्ती

प्रिया

कहती हो

कहाँ रही

नवेली.

अब कहाँ कजरा

चमेली का गजरा

छूई-मुई

लाजवन्ती.

सुबह का नास्ता

बच्चों का स्कूल

प्रीत गए भूल.

बनाकर टिफिन

घर से ऑफिस

ऑफिस से घर

भागदौड़.

तुम नहीं जानती

कितना सुखद लगता है

आज भी तुम्हारा रूप

किचन में

आँचल से पसीने पोंछती

तुम -अद्भुत सजती हो .

जब अपने को

सहज ही सहेजकर

ऑफिस के लिए

निकलती हो

खुदा कसम

नवेली ही लगती…

Continue

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 19, 2014 at 5:30pm — 8 Comments

दिल या ख़ुदा मिलता नहीं

 2212  / 2212 /  2212 /  2212

 

दिल के मकाँ में यार कोई दिलकुशा मिलता नहीं

भीगा पड़ा है आशियाँ अब दिलशुदा मिलता नहीं |

 

हमने वफ़ा में बाअदब जानो-ज़िगर सब दे दिया

उनकी वफ़ा, चश्मो-अदा, दिल गुमशुदा मिलता नहीं |

 

उम्मीद हमने छोड़ दी उनकी इनायत पे बसर

ये ज़िन्दगी रहमत-गुज़र दिल या ख़ुदा मिलता नहीं |

 

उनकी वफ़ा के माजरे, बेबस्तगी पे क्या कहें 

उन पे फ़ना दिल रोज़ होता दिल जुदा मिलता नहीं |

 

यों दिलज़दा मेरा…

Continue

Added by Santlal Karun on July 19, 2014 at 5:00pm — 16 Comments

भूख (लघुकथा)

"अरे बेटा , कैसे खा लिया तुमने उस ठेले से समोसा और पानी पूरी ? तुम तो जानते नहीं कि कितने गंदे हाथ होते हैं उनके और कैसा पानी और तेल इस्तेमाल करते हैं वो लोग"! मम्मी परेशान थीं और पापा चिंतित |
बड़े भाई ने भी टोक दिया "तुमसे ये उम्मीद नहीं थी, तुम तो मेडिकल के छात्र हो" |
"लेकिन मम्मी, मुझे भूख बहुत लगी थी"|
अब सब खामोश थे |

.
(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by विनय कुमार on July 19, 2014 at 1:00pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
प्रेम दीपक

प्रेम दीपक

 

बंधन में मत बाँध सखी

उन भावों को

जो नित-नित

मानसपट पर चित्रित होते हैं –

स्वप्नों के छंद में बाँध सखी

उन छंदों को

जो पलकों पर पुलकित, अधरों पर बिम्बित होते हैं.

 

नयनों से ढुलके जो दो-चार बूँद सखी

अपने हिय के पत्र-पुष्प पर

टल-मल-टल

उनमें अपनी किरणों को पिरो देना

मेरी पीड़ा के होमकुण्ड में गंगाजल.

जब आग बुझे, कुछ राख उड़े

तम छाए सखी,

उस नीरव हाहाकार को तुम कुचल देना

स्वप्निल रातों…

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Added by sharadindu mukerji on July 19, 2014 at 2:00am — 20 Comments

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