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Sushil Sarna
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post उम्मीद .......
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुन्दर रचना हुई है। हार्दिक बधाई। "
1 hour ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post उम्मीद .......
"आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - सृजन के भावों को आत्मीय मान से सम्मानित करने का दिल से आभार । आप की बात में दम है सर लेकिन मेरे सृजन का पात्र इसको झूठ मानने के बावजूद उम्मीद रखता है । सादर नमन सर हार्दिक आभार"
yesterday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Sushil Sarna's blog post उम्मीद .......
"जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी पर्वाज़ ली है, कविता भावपूर्ण हुई है। मगर अन्त 'झूठ ही सही' से क्यों? 'आभासी ही सही' या 'ख़याली ही सही' से होना चाहिए। सादर। "
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

उम्मीद .......

उम्मीद .......मैं जानती हूँ बन्द साँकल में कोई आवाज नहीं होती मगर होती हैं उसमें उम्मीद की सीढ़ियों पर सोयी अनगिनत प्यासी उम्मीदें किसी के लौट आने कीमैं ये भी जानती हूँ कि उम्मीद के दामन में दर्द के सैलाब होते हैं कुछ हसीन ख़्वाब होते हैं साँझ के साथ उम्मीद भी जवान होती है शब इन्तज़ार के पैरहन में रोती है जानती हूँ उम्मीद झूठी होती है मगर दिल की बसती में उम्मीद तो उम्मीद होती हैनज़र की ख़ामोशी ख़ामोश साँकल से बात करती है किसी दस्तक की फरियाद करती है तन्हाई से गुफ़्तगू होती है…See More
yesterday
Sushil Sarna commented on योगराज प्रभाकर's blog post कविता: ज़माने में बनी है हिंद की पहचान हिंदी से
"वाह आदरणीय योगराज प्रभाकर जी हिन्दी दिवस पर बहुत सुंदर और सार्थक प्रस्तुति सर । हार्दिक बधाई सर"
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

उस रात ....

उस रात .......उस रात वो बल्ब की पीली रोशनी देर तक काँपती रही जब तुम मेरी आँखों के दामन में मेरे ख्वाबों को रेज़ा-रेज़ा करके चले गए और मैं बतियाती रही तन्हा पीली रोशनी से देर तकउस रात मुझसे मिलने फिर मेरी तन्हाई आई थी मेरी आरज़ू की हर सलवट परतेरी बेवफाई मुस्कुराई थी और मैं अन्धेरी परतों में बीते लम्हों को बीनती रही देर तकउस रात तुम उल्फ़त के दीवान का पहला अहसास बन कर आए मेरी हर नफस में समाये दूरियाँ सिमटती गईं हया बेहया हुई जाने कब टूट गया वो तिलस्म बांहों का और मैं मिटाती रही बदन से तुम्हारी…See More
Tuesday
Chetan Prakash commented on Sushil Sarna's blog post एक दोहा गज़ल - नज़रें
"नमस्कार,  भाई सुशील सरना  जी, दोहा ग़ज़ल  का आपका  प्रयास  अच्छा  ही कहा जाएगा, आपको  इस  हेतु  बधाई  ! लेकिन  दूसरा  दोहा संशोधन  चाहता  है, दूसरा ( सानी ) मिसरा  भाव से…"
Sep 10
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post चाँद - चाँदनी पर दोहावली ......
"आदरणीय सरना जी अच्छे दोहे हुए...हार्दिक बधाई"
Sep 10
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post एक दोहा गज़ल - नज़रें
"बहुत शानदार सृजन है आदरणीय...बधाई"
Sep 10
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Sushil Sarna's blog post एक दोहा गज़ल - नज़रें
"जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ, दूसरे शे'र पर जनाब सौरभ पाण्डेय जी से सहमत हूँ।  सादर।"
Sep 7

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post एक दोहा गज़ल - नज़रें
"आपने मुग्ध कर दिया आदरणीय सुशील सरना जी.  सशक्त प्रयास के लिए हार्दिक धन्यवाद.  दूसरे शेर में अब का दो बार आना तनिक खल रहा है. इस शेर को आप कहीं बेहतर कर सकते हैं. बाकी सभी, पुन: कहूँ, सशक्त हैं. "
Sep 6
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post चाँद - चाँदनी पर दोहावली ......
"जनाब सुशील सरना जी आदाब, दोहों का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें । 'देख चाँद को चाँदनी ,करे झील पर रक्स ।सिमट गया है चाँद का, उजियारी में अक्स' इस दोहे में 'रक़्स' और 'अक्स' की तुकांतता दुरुस्त नहीं है, क्योंकि…"
Sep 6
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post एक दोहा गज़ल - नज़रें
"जनाब सुशील सरना जी आदाब, दोहे की बह्र पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है, बधाई स्वीकार करें ।"
Sep 6
Chetan Prakash commented on Sushil Sarna's blog post चाँद - चाँदनी पर दोहावली ......
"आदाब, सुशील सरना जी, दोहावली आपका अच्छा प्रयास कहा जाएगा! किन्तु कुछ शब्दों का प्रयोग सही नहीं जान प़ड़ा, यथा 'रक्स' जिसे रश्क़ होना चाहिए! साथ ही 'वीचि वीचि' जैसा शब्द-यु्म मैंने पहली बार प्रयुक्त हुआ देखा, आशय आप ही, माननीय…"
Sep 5
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा मुक्तक ......
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर"
Sep 4
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा मुक्तक ......
"आदरणीय समर कबीर साहब , आदाब सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार"
Sep 4

Profile Information

Gender
Male
City State
Jaipur-Rajasthan
Native Place
New Delhi
Profession
Retired from Central Govt.Service as Superintending Officer
About me
I am a simple,sentimental and transparent person.Poetry is my hobby and passion

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उम्मीद .......

उम्मीद .......

मैं जानती हूँ

बन्द साँकल में

कोई आवाज नहीं होती

मगर होती हैं उसमें

उम्मीद की सीढ़ियों पर सोयी

अनगिनत प्यासी उम्मीदें

किसी के लौट आने की

मैं ये भी जानती हूँ

कि उम्मीद के दामन में

दर्द के सैलाब होते हैं

कुछ हसीन ख़्वाब होते हैं

साँझ के साथ

उम्मीद भी जवान होती है

शब

इन्तज़ार के पैरहन में रोती है

जानती हूँ

उम्मीद झूठी होती है

मगर दिल की बसती में

उम्मीद…

Continue

Posted on September 15, 2021 at 4:00pm — 3 Comments

उस रात ....

उस रात .......

उस रात

वो बल्ब की पीली रोशनी

देर तक काँपती रही

जब तुम मेरी आँखों के दामन में

मेरे ख्वाबों को रेज़ा-रेज़ा करके

चले गए

और मैं बतियाती रही

तन्हा पीली रोशनी से

देर तक

उस रात

मुझसे मिलने फिर मेरी तन्हाई आई थी

मेरी आरज़ू की हर सलवट पर

तेरी बेवफाई मुस्कुराई थी

और मैं

अन्धेरी परतों में

बीते लम्हों को बीनती रही

देर तक

उस रात

तुम उल्फ़त के दीवान का

पहला अहसास…

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Posted on September 13, 2021 at 3:42pm

चाँद - चाँदनी पर दोहावली ......

चाँद -चाँदनी पर दोहावली ......

देख रहा है चाँदनी , आसमान से चाँद ।

मिलने आया झील में , नीले नभ को फाँद।1।

देख चाँद को चाँदनी ,करे झील पर रक्स ।

सिमट गया है चाँद का, उजियारी में अक्स ।2।

चाँद फलक का ख़्वाब तो, धवल चाँदनी नूर ।

वीचि -वीचि क्रीड़ा करे, सोम प्रीत में चूर ।3।

विभा चाँद की  देखती, तारों वाली रात ।

नील झील से कौमुदी, करे चाँद से बात ।4।

छुप-छुप देखे चंद्रिका, अपने विधु का रूप ।

बिम्ब चाँद…

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Posted on September 3, 2021 at 3:55pm — 5 Comments

एक दोहा गज़ल - नज़रें

एक दोहा गज़ल - नज़रें -(प्रथम प्रयास )



नज़रें मंडी हो गईं, नज़र बनी बाज़ार ।

नज़र नज़र में बिक गया, एक जिस्म सौ बार।

*

नजरों को झूठी लगे, अब नजरों की प्रीत ,

हवस सुवासित अब लगे, नजरों की मनुहार ।

*

नजरों से छुपती नहीं , कभी नज़र की बात ,

नजरें करती हैं सदा, नजरों से व्यापार ।

*

भद्दा लगता है बड़ा ,काजल का शृंगार ,

लुट जाता है जब कभी ,नजरों का संसार ।

*

कह देती है हर नज़र , अन्तस की हर बात ,

कहीं नज़र की जीत है, कहीं नज़र की…

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Posted on August 31, 2021 at 11:12pm — 7 Comments

Comment Wall (35 comments)

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At 9:12pm on August 13, 2021, Om Parkash Sharma said…

आदरणीय सुशील सरना जी ,

सादर अभिवादन , आपके नाम और सावन पर लिखे सभी दोहे मन मोह गए । दोनों कविताएं 'मौसम को' व प्रश्न गंभीर भावों को लिए हुए है। साधुवाद । 

At 11:15pm on September 17, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय सुशील सरना जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी "कविता : कितना अच्छा होता" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |
आपको प्रसस्ति पत्र यथा शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 1:35am on May 6, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका मेल बॉक्स ब्लॉक होने के कारण मेल सेंड नहीं हो रहा है. 

At 1:29am on May 6, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय सुशील सरना सर, विलम्ब से प्रत्युत्तर हेतु क्षमा. आपको मेल कर दिया है. सादर 

At 10:17pm on April 7, 2016, केवल प्रसाद 'सत्यम' said…

आ० सरना भाई जी, सादर  प्रणाम!

आपका हार्दिक स्वागत है.  मित्रता से भाग्योदय होता है ,  मैं धन्य हुआ. सादर

At 9:46am on April 1, 2016, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय सुशील जी ..महीने का सक्रिय सदस्य चुने जाने पर मेरी तरफ से हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

At 6:02am on March 20, 2016, केवल प्रसाद 'सत्यम' said…

आ०  सुशील सरना भाई जी, सादर प्रणाम!  आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" चुने जाने पर बहुत-बहुत बधाई. सादर

At 4:22pm on March 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

सुशील सरना जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 9:00pm on February 17, 2016, Tasdiq Ahmed Khan said…

मोहतरम जनाब सुशील सरना  साहिब ,  यह  आप सब की हौसला अफ़ज़ाई का नतीजा है  , जिसके लिए   आप का बहुत बहुत शुक्रिया ,महरबानी

At 8:47pm on January 11, 2016, सतविन्द्र कुमार राणा said…
धन्यवाद आदरणीय sushil Sarna जी।आपको भी सपरिवार सादर हार्दिक शुभकामनाएं!
 
 
 

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