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प्रेम दीपक

 

बंधन में मत बाँध सखी
उन भावों को
जो नित-नित
मानसपट पर चित्रित होते हैं –
स्वप्नों के छंद में बाँध सखी
उन छंदों को
जो पलकों पर पुलकित, अधरों पर बिम्बित होते हैं.

 

नयनों से ढुलके जो दो-चार बूँद सखी
अपने हिय के पत्र-पुष्प पर
टल-मल-टल
उनमें अपनी किरणों को पिरो देना
मेरी पीड़ा के होमकुण्ड में गंगाजल.

जब आग बुझे, कुछ राख उड़े
तम छाए सखी,
उस नीरव हाहाकार को तुम कुचल देना
स्वप्निल रातों में विधु का जब अट्टहास उठे
अपने हृदय के सघन वाष्प से ढँक देना.

अंतिम प्रहर में पल्लव-पुट पर आँसू बरसे
समाधि पर मेरे तुम धीरे से आना
जो दीप नहीं जला सकी हो जीवन में,
प्रिये, एक बार
बस एक बार,
समाधि पर मेरी यूँ ही जला देना.

.
(मौलिक तथा अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Vindu Babu on July 29, 2014 at 8:09am
सघन भावों से सजी बड़ी सुन्दर रचना हुई है आदरणीय.
रचना को पढ़ना सुखद लगा...आपको हार्दिक बधाई.
सादर
Comment by vijay nikore on July 27, 2014 at 5:41pm

इस बहुत ही सुन्दर भावमय रचना के लिए बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on July 24, 2014 at 3:51am
आदरणीया राजेश कुमारी जी,आपने मेरी रचना को पसंद किया,मुझे प्रोत्साहन मिला. हार्दिक आभार.सादर.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on July 24, 2014 at 3:48am
आदरणीया सविता तथा आदरणीय चौहान जी, आप लोगों का हार्दिक आभार.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on July 24, 2014 at 3:46am
आदरणीय लाडीवाला जी, आपने इस रचना में मेरी पसंद की पंक्तियों का उल्लेख करके मुझे विशेष आनंद प्रदान किया. आपका हार्दिक आभार. सादर.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on July 24, 2014 at 3:42am
आदरणीय सौरभ जी, जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ आपकी प्रतिक्रिया की बहुत बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है.
//अपनी इस प्रस्तुति से आपने इस मंच को समृद्ध किया है आदरणीय// इससे बड़ा पुरस्कार और क्या हो सकता है मेरे लिए.
आपकी टिप्पणी में अधिकांशत: शब्दों की अपनी विशिष्ट व्यंजना होती है जिसके फलस्वरूप मूल रचना (जिसके संदर्भ में उन शब्दों को पिरोया गया हो) अपनी सभी कमियों को लेकर भी उज्ज्वलतर हो उठती हैं ठीक उसी तरह जैसे सुबह की धूप खिलने के साथ ही अंधेरे में सोयी वादियाँ जग जाती हैं. आपकी स्नेहिल और गहरी दृष्टि को नमन आदरणीय.सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on July 24, 2014 at 3:19am
आदरणीया वेदिका जी, आपने अपने हृदय की दृष्टि से मेरी रचना को देख. आपका हार्दिक आभार.सादर.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on July 24, 2014 at 3:16am
भाई रामशिरोमणि जी, आपकी स्नेहल प्रतिक्रिया के लिए आभार.सादर.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on July 24, 2014 at 3:15am
आदरणीय जीतेंद्र गीत जी, आपको मेरी रचना पसंद आयी...मुझे प्रोत्साहन मिला.हार्दिक आभार. सादर.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on July 24, 2014 at 3:12am
आदरणीय संतलाल करुण जी, आपका हार्दिक आभार.सादर.

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