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ग़ज़ल : ज्ञान थोड़ा बयान ज़्यादा है

बह्र : २१२२ १२१२ २२

आजकल ये रुझान ज़्यादा है

ज्ञान थोड़ा बयान ज़्यादा है

 

है मिलावट, फ़रेब, लूट यहाँ

धर्म कम है दुकान ज्यादा है

 

चोट दिल पर लगी, चलो, लेकिन

देश अब सावधान ज़्यादा है

 

दूध पानी से मिल गया जब से

झाग थोड़ा उफ़ान ज़्यादा है

 

पाँव भर ही ज़मीं मिली मुझको

पर मेरा आसमान ज़्यादा है

 

ये नई राजनीति है ‘सज्जन’

काम थोड़ा बखान ज़्यादा है

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित) 

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:42pm

बहुत बहुत धन्यवाद  gumnaam pithoragarhi जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:42pm

बहुत बहुत धन्यवाद Ram Awadh जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:41pm

बहुत बहुत शुक्रिया laxman dhami जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:41pm

बहुत बहुत धन्यवाद गिरिराज  जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:41pm

बहुत बहुत धन्यवाद  narendrasinh chauhan जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:40pm

बहुत बहुत शुक्रिया Saurabh जी, स्नेह बना रहे

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:40pm

बहुत बहुत धन्यवाद जितेन्द्र जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:39pm

बहुत बहुत शुक्रिया  नादिर ख़ान  साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:39pm

बहुत बहुत शुक्रिया डॉ गोपाल नारायन जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:39pm

 बहुत बहुत धन्यवाद JAWAHAR जी

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