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ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़

२१२२  १२२२   २

झोपड़ी को डुबाने निकले
सारे बादल दिवाने   निकले

खेत घर हो गए बंजर से
बच्चे बाहर कमाने  निकले

द्रोपदी सी प्रजा है बेबस
जब से राजा ये काने  निकले

आदमी भूल आदम की पर
पाक खुद को बताने  निकले

जब्त गम को किया तब हम भी
इस जहां को हँसाने  निकले

माँ को खोया तो समझा मैंने
हाथ से जो खजाने  निकले

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

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Comment

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Comment by आदित्य श्रीराधेकृष्ण सोऽहं on July 27, 2014 at 3:16pm

बहुत सुन्दर! 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 24, 2014 at 2:54pm

आदरणीय गुमनाम भाई , बढ़िया गज़ल कही है , आपको दिली बधाइयाँ !!

द्रोपदी सी प्रजा है बेबस
जब से राजा ये काने  निकले ------- बहुत खूब ! भाई जी बधाइयाँ ॥

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 24, 2014 at 8:03am

धन्यवाद दोस्तो आपकी बातें हौसला बढ़ाती हैं

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2014 at 12:42am
आदरणीय गुमनाम पिथौरागढ़ी जी , बात है और बात में दम है , रचना के लिए बधाई .

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 23, 2014 at 11:35pm

द्रोपदी सी प्रजा है बेबस
जब से राजा ये काने  निकले ..

बहुत खूब !

आपकी ग़ज़ल का अंदाज़भा गया, भाईजी.. सतत प्रयार रहें.

शुभेच्छाएँ

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 23, 2014 at 11:12pm

आदमी भूल आदम की पर
पाक खुद को बताने  निकले

माँ को खोया तो समझा मैंने
हाथ से जो खजाने  निकले

बहुत बेहतरीन शे'र कहे आपने आदरणीय गुमनाम जी, हार्दिक बधाई आपको

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 23, 2014 at 4:49pm

dhanywaad dosto

Comment by Santlal Karun on July 23, 2014 at 4:07pm

आदरणीय गुमनाम जी,

अच्छी ग़ज़ल ; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! --

"खेत घर हो गए बंजर से 
बच्चे बाहर कमाने  निकले 

द्रोपदी सी प्रजा है बेबस 
जब से राजा ये काने  निकले"

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 23, 2014 at 11:38am

गुमनाम जी

बहुत अच्छी गजल हुयी है i

 

जब्त गम को किया तब हम भी
इस जहां को हँसाने  निकले

माँ को खोया तो समझा मैंने
हाथ से जो खजाने  निकले

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 23, 2014 at 11:12am

आ0 भाई गुमनाम जी , इस गजल के लिए हार्दिक बधाई ।

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