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प्रिया
कहती हो
कहाँ रही
नवेली.
अब कहाँ कजरा
चमेली का गजरा
छूई-मुई
लाजवन्ती.
सुबह का नास्ता
बच्चों का स्कूल
प्रीत गए भूल.
बनाकर टिफिन
घर से ऑफिस
ऑफिस से घर
भागदौड़.
तुम नहीं जानती
कितना सुखद लगता है
आज भी तुम्हारा रूप
किचन में
आँचल से पसीने पोंछती
तुम -अद्भुत सजती हो .
जब अपने को
सहज ही सहेजकर
ऑफिस के लिए
निकलती हो
खुदा कसम
नवेली ही लगती हो.

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 22, 2014 at 7:38pm

आ० सौरभ जी,
सराहना के लिए बहुत आभार.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 22, 2014 at 2:49pm

आम जीवन के सुख-दुख अपने होते हैं, आम होते हैं..

कोमल भावाभिव्यक्ति के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 20, 2014 at 9:54pm

आ० गोपल नारायण जी ,
आपकी सराहना रूपी "टोटके" के बाद नज़र लगने की संभावना ही समाप्त हो गई.बहुत-बहुत आभार सह नमन.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 20, 2014 at 9:18pm

आपकी नजर को नजर न लगे सर i  क्या बात है ?

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 20, 2014 at 6:36pm

आदरणीया मीना जी,
रचना आपको भा गई,आपकी सराहना भी पा गई.
बहुत -बहुत आभार.मैं कृतज्ञ हुआ.

Comment by Meena Pathak on July 20, 2014 at 6:18pm

क्या बात है ..अति सुन्दर ...बधाई आदरणीय विजय जी 

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 20, 2014 at 11:10am

आ० संतलाल करुण जी,
आपकी सराहना पाकर मैं धन्य हुआ.बहुत बहुत आभार सह अभिनन्दन.

Comment by Santlal Karun on July 20, 2014 at 7:19am

आदरणीय विजय प्रकाश शर्मा जी,

संवेदना तथा अनुभूति से उपजे अत्यंत अर्थवान, प्रभावपूर्ण और पठनीय रचना के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !  

कृपया ध्यान दे...

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