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January 2016 Blog Posts (140)

कुण्डलिया छंद (मेरा एक प्रयास)

रोपे जो थे फूल सब, लगते पेड़ बबूल !

काँटों बदले बीज सब, जो मन राखा शूल !!

जो मन राखा शूल, ध्यान में धारण कीजे !

मिलता वही प्रतिफल, ध्यान में जो धर लीजे !!

कहे हेम कविराय, बुरा क्यों मन में सोचे !

रोपे  भले बबूल, मन से फूल ही रोपे  !!

.

मौसम के यह ढंग भी, लगते बड़े विचित्र !

शरद ऋतु मेँ दिखते हैं, गर्मी के परिदृश्य !!

गर्मी के परिदृश्य, कि मौसम बहुत चिढ़ाता !

कभी वर्षा ऋतु में, सुखार है अति सताता !!

कहे हेम कविराय, घटाओ अभी…

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Added by Hem Chandra Jha on January 28, 2016 at 11:00am — 3 Comments

ठोकर

ठोकर

एक हल्का सा धमाका हुआ और रेल की पटरी एक जगह से ऊखड़ गयी। कोहरे भरी सुबह को और घना करते बारूद के धुऐं पर एक उचटती नजर डाल वो सोचने लगा। "हमारे जीवन में धुंध की तरह छाया अँधेरा भी अब जल्दी ही छंट जायेगा। घर की टूटी छत, मां की बीमारी, बहन का गौना और खाली पेट सोने की आदत। बस कुछ ही पल में ट्रेन यहाँ से गुजरेगी और........।"

ट्रेन की आती आवाज ने उसे सतर्क कर दिया। दिमाग अभी भी विचारो में उलझा था। "बाबा तुमने कहा था न कि मेरे सपनो को मेरा बेटा पूरे करेगा। अब बहुत जल्दी आप की हर बात को… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on January 27, 2016 at 11:03pm — 9 Comments

मेरी माँ ने झूठ बोल के आंसू छिपा लिया

मेरी माँ ने झूठ बोल के आंसू छिपा लिया
भूखी रह भरे पेट का बहाना बना लिया...

.…

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Added by Ashwani Kumar on January 27, 2016 at 2:30pm — 5 Comments

कवच और कुण्डल

152
कवच और कुण्डल
---------------------- 
संसार  के जीर्णतम प्राणी से भी भयाक्रान्त वह,
जीवन सम्हाले है क्यों कि ,
उसके वक्षस्थल पर दुर्भाग्य का कवच 
और कानों में विपन्नता के बाले हैं।
तिरस्कार ,घृणा और उपहास का,
जन्मजात.....
साम्राज्य पाकर भी,
अपनत्व की , कुछ  साॅंसों की आस पाले है।
ग्रीष्म, वर्षा और शीत का मनमीत
अंतहीन अंबर है घर का छत…
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Added by Dr T R Sukul on January 27, 2016 at 10:19am — 12 Comments

शाखें गुल ख्वाब में खिली है अभी / गजल

शाखें गुल ख्वाब में खिली है अभी

इश्क में चोट ये नई है अभी

दिल है नादान कोई समझाये

आबरू -ए-वफ़ा बची है अभी

इस लुटे घर में कैसी आबादी

गैरों के सदके में बसी है अभी

बंध गए हैं हवा के पर सारे

क्यों दुआ बे असर हुई है अभी

राज नजरों नें आज जान लिया

गिरह ये कौन सी कसी है…

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Added by kanta roy on January 27, 2016 at 12:00am — 6 Comments

महज इक आदमी है तू - ग़ज़ल-(लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

1222    1222    1222    1222

**********************************

भला तू देखता क्यों है महज इस आदमी का रंग

दिखाई क्यों न देता  है धवल  जो दोस्ती  का रंग /1



सुना  है  खूब  भाता है  तुझे  तो  रंग भड़कीला

मगर जादा बिखेरे है  छटा सुन सादगी का रंग/2



किसी को जाम भाता है किसी को शबनमी बँूदें

किसे मालूम है कैसा भला इस तिश्नगी का रंग/3



महज इक आदमी है तू न ही हिंदू न ही मुस्लिम

करे बदरंग क्यों बतला तू बँटकर जिंदगी का रंग/4



अगर बँटना ही है तुझको…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 26, 2016 at 10:41am — 16 Comments

एक अलग रिश्ता --

बेहद दुःखद ख़बर थी, रहमान नहीं रहा, फोन रखने के बाद भी वो बहुत देर तक सकते में रहा। अभी दो घंटे पहले ही तो लौटा था वो हॉस्पिटल से, ऐसी कोई बात लग तो नहीं रही थी, लेकिन अचानक एक अटैक आया और सब कुछ ख़त्म। मौत भी कितनी ख़ामोशी से दबे पाँव आती है, जिन्दगी को खबर ही नहीं होती और उसे शरीर से दूर कर देती है। तुरन्त कपड़े बदल कर कुछ रुपये, ए टी एम और बाइक की चाभी लेकर घर से निकल पड़ा। रास्ते भर पिछले कई साल उसके दिमाग में सड़क की तरह चलते रहे। चार साल पहले ही उसने ज्वाइन किया था इस ऑफिस में और धीरे धीरे…

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Added by विनय कुमार on January 26, 2016 at 2:13am — 8 Comments

‘धुंध’ : हरि प्रकाश दुबे

‘धुंध’ : हरि प्रकाश दुबे

 

“अरे आइये – आइये अवस्थी जी, आज इतनी सर्द शाम को आप मेरे घर, वाह! अरे रुकिए पहले पीने के लिए कुछ लेकर आता हूँ, ये लीजिये ब्रांडी है, ठीक रहेगी । पर यह क्या, इतना पसीना क्यों आ रहा है आपको?”

“अरे कुछ ख़ास नहीं, बस थोडा सा घबरा गया था।“

ओह !..“ अवस्थी जी अब पहेलियाँ मत बुझाइये, ठीक –ठीक बताइये की हुआ क्या ?”    

“क्या बताऊं चौधरी साहब ! आज अभी कुछ देर पहले, कुछ बाइक सवार लोगों ने मुझे रास्ते में घेर लिया, जबरन गाड़ी का शीशा खुलवाया और…

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Added by Hari Prakash Dubey on January 26, 2016 at 12:15am — 10 Comments

अक्षम्य कर्म (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"अक्षम्य कर्म"- (लघुकथा)



पड़ोसन के लिए बहुत ही जिज्ञासा का विषय था कि सामने वाले मकान से कल की तरह आज रात को भी ज़ोर से रोने की आवाज़ें क्यों आ रहीं थीं। खिड़की से झांक कर देखा तो पाया खन्ना साहब की पत्नी प्रियंका ही रो रही थी।



साहस जुटाते हुए , उनके घर जाकर जब उसने प्रियंका से वज़ह पूछी तो मुश्किल से उसने कहा- "मेरे पिताजी ने मायके आने के लिए सख़्ती से मना कर दिया है! पति ने मुझसे किनारा कर लिया है। सास देवरानी के यहाँ चली गई हैं ! सब मुझे ही कोस रहे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 25, 2016 at 9:31pm — 9 Comments

मैं राजपथ हूँ [ गणतंत्र दिवस पर ]

मैं राजपथ हूँ 

भारी बूटों की ठक ठक

बच्चों की टोली की लक दक  

 अपने सीने पर महसूसने को 

हूँ फिर से आतुरI

सर्द सुबह को जब 

जोश का सैलाब 

उमड़ता है मेरे आस पास 

सुर ताल में चलती टोलियाँ 

रोंद्ती हैं मेरे सीने को 

कितना आराम पाता हूँ 

सच कहूं ,तभी आती है साँस में साँस

इतराता हूँ अपने आप पर I

पर आज कुछ डरा हुआ हूँ 

भविष्य को लेकर चिंतित भी 

शायद बूढा हो रहा हूँ…

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Added by pratibha pande on January 25, 2016 at 4:52pm — 8 Comments

गणतंत्र की आस में तरसता घुमंतू समाज

सड़क किनारे पसरी घोर निराशा और उस निराशा में डूबी हुयी जिंदगियां, चिथड़ों में लिपटे हुए बच्चे, टूटी फूटी झोपड़ियों में सुलगते चूल्हे और उसी सड़क पर सरकार के नुमाइंदों की सरपट दौड़ती चमकती कारों में चर्चा गरम हो रही होती है डिजिटल इंडिया की, पर उन नेताओं को सड़क की जिंदगी बसर करती इस  कौम की  बदहाल  तस्वीर नज़र नहीं आती. जो कि इनके छदम दावों को धूल धूसरित करती है माना कि जीवन अनवरत संघर्ष का नाम है, जिसका कर्म है सदैव चलते रहना, आगे बढ़ते रहना. किन्तु…

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Added by DR. HIRDESH CHAUDHARY on January 25, 2016 at 12:30pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - चोरों के हाथों में मत रखवाली दो ( गिरिराज भंडारी )

22  22  22  22  22  2

हाथों को पत्थर , आँखों को लाली दो

मुँह खोलो, चीखो चिल्लाओ , गाली दो

 

ऊँचे सुर में आल्हा गाओ , सरहद पर

वीरों को मंचों से मत कव्वाली दो

 

जिस बस्ती मे रहा हमेशा अँधियारा 

उस बस्ती को दिन में भी दीवाली दो

 

तुम पगड़ी पहनो ले जाओ केसरिया

लाओ सर पर मेरे टोपी जालीदो

 

छद्म वेश में राहू केतू आये फिर

अमृत नहीं उन्हे ज़हर की प्याली दो

 

कहीं मूर्खता की सीमा तो…

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Added by गिरिराज भंडारी on January 25, 2016 at 9:40am — 14 Comments

गजल

2212 2212 2212 12

बदले भले मौसम कभी मत आप दहलिये

सुलगे हमीं कितना कहें चुपचाप रह लिये।1



बदली हुई रुत देखते जाती रही खुदी

होगी नजर फिर आपकी सोचा उछह लिये।2



सूनी पड़ी है देखिये अपनी जहाँ अभी

आकर यहाँ चुपचाप ही निः शंक टहलिये।3



आधी अधूरी आज तक दिल की लगी रही

अबतक सहे हम हैं बहुत बस आज कह लिये।4



अब तो खिले कुछ फूल हैं फिर आपकी नजर

मसले गये हर बार सहते खार रह लिये।5



इतरा रहे कितना अभी गेंदा गुलाब हैं

छितरा रहे… Continue

Added by Manan Kumar singh on January 25, 2016 at 8:18am — 6 Comments

ग़ज़ल-मुझे फिर लगे आज तानों के पत्थर।

१२२ १२२ १२२ १२२



मुझे फिर लगे आज तानों के पत्थर।

कई बद से बदतर जुबानों के पत्थर।



ग़ज़ल के ये लहजे नये है, जवां है।

न समझो इन्हें तुम ढलानों के पत्थर।



जिन्हें कब्र पर शाह की रख गये तुम।

वे पत्थर है मुफलिस मकानों के पत्थर।



खता आज ऐसी हुई है कि मुझको।

लगेंगे हजारों जमानों के पत्थर।



समझता नहीं चाल उसकी कभी वो।

पडे है जहन पर गुमानों के पत्थर।



बहुत दर्द था रात आहों में उनकी।

उठा ले गये वो दुकानों के… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on January 24, 2016 at 10:30pm — 14 Comments

विद्या दान – ( लघुकथा ) –

विद्या दान – ( लघुकथा  ) –

 सारे शहर में इश्तिहार लगे थे कि  शास्त्रीय संगीत की प्रख्यात गायिका पदमश्री सुमित्रा देवी  गंधर्व की सोलह  वर्षीय सुपुत्री एवम शिष्या संगीतिका गंधर्व के जीवन का प्रथम गायकी कार्य क्रम शाम को सात बजे टैगोर भवन में होगा!

इस क्षेत्र के जाने माने एवम  मशहूर लोग स्तब्ध थे क्योंकि सुमित्रा देवी ने संगीत के प्रति अपनी अटूट आस्था के चलते शपथ ली थी कि ना तो वह कभी विवाह करेंगी और ना कभी किसी को शिष्य बनायेंगी!

नियत समय पर कार्य क्रम शुरु हुआ!सर्व प्रथम…

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Added by TEJ VEER SINGH on January 24, 2016 at 8:02pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
फिर जमाने से बशर दर्द छुपाता क्यूँ है (फिलब्दीह ग़ज़ल 'राज')

बेवजह बात जिरह करके बढाता क्यूँ है                                                                                                                             एक मासूम पे इल्जाम लगाता क्यूँ है

 

खोल देती हैं सभी राज पनीली आँखें                                                                                                                               फिर जमाने से बशर दर्द छुपाता क्यूँ है

 …

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Added by rajesh kumari on January 24, 2016 at 6:03pm — 7 Comments

सम्मान हो इनाम(lलघुकथा)

मिन्दो बस्ती की अकेली लडकी, जिस ने सिलाई कड़ाई के काम में सिखलाई प्राप्त कर घर में काम शुरू किया, मगर उतना काम न मिलता कि गुजरा हो सके, तभी उसने रविन्द्र की फैक्टरी में काम पर रखने के लिए विनती की, तो रविन्द्र ने उस से कुछ बातें की और उसे सिलाई के काम पर रख लिया I बाप तो बचपन में ही उन्हें छोड़ कर कहीं चला गया था I शुरू में तो उसे उनके मुताबिक काम करने व् समझने में समस्या आई, मगर जल्दी ही उसने खुद को बाकी लोगों के साथ अडजस्ट कर लिया और धीरे धीरे उसकी काम में दिलचस्पी बढने लगी तो उस ने…

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Added by मोहन बेगोवाल on January 24, 2016 at 2:00pm — 4 Comments

//माँ भारती पुकारे// (सार छंद)

जागो जागो वीर सपूतो. माँ भारती पुकारे ।

आतंकी बनकर बैरी फिर. छुपछुप है ललकारे ।।

उठो जवानो जाकर देखो. छुपे शत्रु पहचानो ।

मिले जहाँ पर कायर पापी. बैरी अपना मानो ।।

काट काट मस्तक बैरी के. हवन कुण्ड पर डालो।

जयहिन्द मंत्र उद्घोष करो. जीवन यश तुम पा लो ।।

जिनके मन राष्ट्र प्रेम ना हो. बैरी दल के साथी ।

स्वार्थी हो जो चलते रहते. जैसे पागल हाधी ।।

छद्म धर्म जो पाले बैठे . जन्नत के ले चाहत ।

धरती को जो दोजक करते. उनके बनो महावत ।।

बैरी के तुम छाती… Continue

Added by रमेश कुमार चौहान on January 24, 2016 at 10:14am — 4 Comments

उल्टी गंगा (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"मम्मा, छोड़ो भी अब यह सब! देशभक्त सैनिकों की तस्वीरें दिखाने, उनकी दिलेरी के किस्से सुनाने और देशभक्ति गीत और भाषण सुनाने से भी मुझ पर कोई असर नहीं पड़ने वाला!" -आदित्य ने ध्वज फहराते सैनिक पिता की तस्वीर एक तरफ रखकर अपनी माँ से कहा।



"तो तुम अपने पापा और दादा जी के सपने पूरे नहीं करोगे?"



"नहीं, मुझे नहीं रही कोई रुचि सैनिक जीवन में! क्या मिला है मुझे? न दादा जी का प्यार, न पापा का और न ही बड़े भाई का? सैनिकों की शहादत और सम्मानों से उनके परिजनों को प्यार नहीं, सिर्फ कुछ… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 23, 2016 at 12:29pm — 7 Comments

आ जाओ कि शाखों पे बहार आने लगी है / गजल

आ जाओ कि शाखों पे बहार आने लगी है

इक आस शगुन बन के मेरे दिल से उठी है



ये रात जुदाई की है लम्बी मेरे महबूब

हर एक घड़ी इसकी मेरी जाँ पे बनी है



इक जुर्म-ए- मोहब्बत में जमाना है मुख़ालिफ़

ये कैसी सज़ा है कि जो क़िस्मत में लिखी है



आँखें मेरी खुशीयों के कई जाम उंडले साहिब

बस फिक्र है इतनी ये गली तेरी गली है



शबनम ने भिगोया है समाँ चारो तरफ से

बाँहों में जो महबूब के इक रात मिली है



बातों में वफ़ादारी की छलका दे… Continue

Added by kanta roy on January 23, 2016 at 10:34am — 7 Comments

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