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चरित्रहीनता: विकराल सामाजिक समस्या

एक जोरदार झटका,

और शुरू हो गया विचारो का मंथन,

कई मंचो पर चिल्लाने लगे बुद्धिजीवी,

सियार की तरह,

कैसे हुआ ये ?

क्यों हुआ ?

अरे पकड़ो,

कौन है जिम्मेदार ?

लटका दो फांसी पर,

बना दो नपुंसक उन पिशाचो को,

जिन्होंने नरेन्द्र, गाँधी, बुद्ध की भूमि को,

कलंकित किया है |

पर कोई नहीं बात करता,

और न करना चाहता,

इस सतत, स्वाभाविक, जन्मजात मानवीय विकृति को,

जिसको हराया था गाँधी ने, नरेन्द्र ने और…

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Added by DRx Ravi Verma on December 30, 2012 at 12:30am — 4 Comments

अब सदबुद्धि का वरदान दे

दामिनी गयी दुनिया से देख,

क्या विधाता का यह लेख है |

बेटी पूछती अपना कसूर,

क्यां इंसानियत कुछ शेष है।

बेटे में ऐसा क्या है अलग,

जो देता दर्जा उसे विशेष है।

क्यों न सख्त सजा अपराध की,

गर तराजू करता इन्साफ है ।

मूक है शासक चादर ताने,

हैवानियत छू रही आकाश है ।

मानवता पर लग रहा कलंक,

सभ्य समाज का पर्दाफाश है ।

कानून बना है, और बन जाएगा,

उससे क्या संस्कार आ जायेगा।

समाज और सरकार अब जानले,

नैतिक शिक्षा जरूरी यह…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 29, 2012 at 6:30pm — 8 Comments

*****(श्रद्धा सुमन)*****

'दामिनी' चली गई दुनियां से 

छोड़ गई कितने सवाल

क्या लड़की होना ही था 

उसका घोर अपराध ?

जब तक फाँसी पर न लटकेंगे 

उसके अपराधी 

शांत न होगी रूह उसकी 

कब होगा इन्साफ 

कितने सपने संजोए होंगे 

कितने देखे होंगे ख़्वाब 

पूरे हुए,न रहे अधूरे 

जिंदगी ने छोड़ा साथ 

कानून की देवी की जो खुली न …

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Added by Deepak Sharma Kuluvi on December 29, 2012 at 12:00pm — 5 Comments

नए साल की नई सुबह

पुराने साल को अलविदा, नए साल का स्वागतम

पुराने अनुभवों से नया गीत गायेंगे हम

नई उमंगें, नई तरंगे लेकर आया नया साल

नए वादों, नए इरादों से नई कहानी लिखेंगे हम



बुराइयों को मिटाकर

अच्छाइयों को अपनाकर

काँटों पर राह बनाकर

नई मंजिलें पाएंगे हम



बेटियां दामिनी बन तड़प-तड़प नहीं मरेगी अब

कल्पना ,सुनीता बन चाँद को घर बनाएँगी अब

आतंकवादी ,बलात्कारी को फांसी पर चढ़ायेंगे अब

भ्रष्टाचार मिटाकर विकसित भारत…

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Added by shubhra sharma on December 29, 2012 at 11:00am — 12 Comments

विकास बनाम इंसानियत – दर

रोज़ होती रही चर्चायें

बैठकों पे बैठकें

कार्यालयों से लेकर चौपालों तक

कारखानों से लेकर शेयर बाज़ारों तक

हर जगह

कोशिशें जारी हैं

कैसे बढ़े

कितना बढ़े

कहाँ-कहाँ कितनी गुंजाईशें है

सभी लगे हैं

देश विकसित हो या विकासशील

या हो अविकसित

मगर चिंतायें

सबकी एक है

कैसे बढ़े विकास-दर

कैसे बढ़े व्यापार

बाज़ार भाव

कैसे बढ़े निर्यात

फिर चाहे

मौत का सामान ही क्यों न हो

व्यापार बढ़ना चाहिए

विकास-दर बढ़ती…

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Added by नादिर ख़ान on December 28, 2012 at 11:00pm — 3 Comments

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयंगे

छोडो मेहँदी खडक संभालो

खुद ही अपना चीर बचा लो

द्यूत बिछाये बैठे शकुनि,

मस्तक सब बिक जायेंगे

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे

कब तक आस लगाओगी तुम,

बिक़े हुए अखबारों से,

कैसी रक्षा मांग रही हो

दुशासन दरबारों से|

स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं

वे क्या लाज बचायेंगे

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आयंगे

कल तक केवल अँधा राजा,

अब गूंगा बहरा भी है

होठ सी दिए हैं जनता के,

कानों पर पहरा भी है

तुम ही…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on December 28, 2012 at 4:59pm — 12 Comments

नूतन बर्ष

       नूतन बर्ष

आओ करें अमृत मंथन

जीवन के संघर्ष मे

दिल मे कुछ संकल्प ले

इस नूतन वर्ष में

सोचें सदा वतन हित में

देशभक्ति हो मन चित में

 परस्पर सदभाव हो

विकाश से लगाव हो

देश को खुशहाल बनाएँ

भ्रष्टाचार दूर भगाएँ

 खुशियों से भरा हो दामन

फिंजा देश की हो मनभावन

प्रगतिशील बढ़ चले कारवाँ

निकृष्ट से उत्कर्ष में

कल्याणकारी बयार बहे

इस नूतन बर्ष   में

 Dr.Ajay Khare Aahat

 

Added by Dr.Ajay Khare on December 28, 2012 at 12:29pm — 4 Comments

अनूठा कीर्तिमान

अनूठा कीर्तिमान
 
क्या ऐसा नहीं लगता यह साल 
बलात्कार का आया है 
हर चैनल,अखवार में मुद्दा 
सुर्ख़ियों में यह छाया है 
शर्मसार है भारत माँ 
अपने कपूतों की करतूतों से 
दुनियां की नज़र में हिन्दोस्तान ने 
नाक अपना कटवाया है 
दुआ करो सब मिलकर 
ऐसी घटनाएँ न हों 
नए साल में चारो और 
बस सुख शांति ही…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on December 28, 2012 at 11:31am — 6 Comments

तुम उजला सन्दर्भ हो , जिसका मैं हूँ वही कहानी...

मैं हूँ बंदी बिन्दु परिधि का, तुम रेखा मनमानी |

मैं ठहरा पोखर का जल, तुम हो गंगा का पानी ||

मैं जीवन की कथा-व्यथा का नीरस सा गद्यांश कोई इक |

तुम छंदों में लिखी गयी कविता का हो रूपांश कोई इक |

मैं स्वांसों का निहित स्वार्थ हूँ , तुम हो जीवन की मानी  ||

धूप छाँव में पला बढा मैं विषम्तायों का हूँ सहवासी |

तुम महलों के मध्य पली हो ऐश्वर्यों की हो अभ्यासी | 

मैं आँखों का खारा संचय , तुम हो वर्षा अभिमानी ||

विपदायों, संत्रासों से मेरा अटूट अनुबंध रहा…

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Added by ajay sharma on December 27, 2012 at 10:30pm — 4 Comments

दिल जरा कमजोर है

हाँथ तेरे सौंप दी अब जिंदगी की डोर है,

जानके मत तोड़ना तुम दिल जरा कमजोर है,

भूलना है भूल जाना, गैर तुम मुझको समझ,

प्रेम में बंधन नहीं, ताकत न कोई जोर है,…

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Added by अरुन 'अनन्त' on December 27, 2012 at 3:30pm — 6 Comments

मूँछ

 मूँछ 

-------- 

मूँछ की भी अजब कहानी 

खिले आनन् दिखे  जवानी

कद लम्बा और चौड़ा सीना 

पहने उस पर कुरता झीना 

चलता  राह रोबीली चाल 

काला टीका औ उन्नत भाल 

कभी तलवार कभी मक्खी कट 

छोटी बड़ी कभी सफा चट

बगैर मूँछ  लगता  चेहरा   खुश्क …

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 27, 2012 at 12:19pm — 6 Comments

कुण्डलिया एक प्रयास

आदरणीय श्री अरुण कुमार निगम सर के द्वारा संशोधित की गई कुण्डलिया आप सभी के समक्ष सादर पेश कर रहा हूँ कृपया स्वीकारें .

सोवत जागत हर पिता, करता रहता जाप,

रखना बिटिया को सुखी, हे नारायण आप

हे नारायण आप , कृपा अपनी बरसाना

मिले मान सम्मान,मिले ससुराल सुहाना

बीते जीवन…

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Added by अरुन 'अनन्त' on December 27, 2012 at 11:58am — 10 Comments

खामोश बही सरिता.

नदी चली पाथर से,बही मिली सागर से,

पवित्र सरिता जल संग निस्तार लिए/

प्रदूषित अकुलायी,बहती चली आयी,

अधजली मानव की लाशों का भार लिए/

 …

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Added by Ashok Kumar Raktale on December 27, 2012 at 10:30am — 7 Comments

साँतवे सिलिंडर का इंतज़ाम (व्यंग्य) // शुभ्रांशु पाण्डेय

फिलहाल शादी का सीजन खत्म हो चुका है. शादी के सीजन के खत्म होने पर समझिये सभी के लिये आराम का समय. आराम यानि मन का आराम, तन का आराम, धन का आराम और पेट का आराम ! तन और मन की बातें तो जाने दें, लेकिन धन और पेट का आराम सभी के लिए सुकून देने वाला है. प्रत्येक निमंत्रण-पत्र का लिफ़ाफ़ा प्राप्तकर्ता से भी एक अदद लिफ़ाफ़े की उम्मीद तो करता ही है. वो लिफ़ाफ़ा कितना मोटा होगा ये निमंत्रण-पत्र के रूप में आनेवाले लिफ़ाफ़े पर निर्भर करता है. आपकी ओर से जाने वाला हर लिफ़ाफ़ा आपके घर का एकतरह…
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Added by Shubhranshu Pandey on December 26, 2012 at 9:59pm — 8 Comments

ठीक है...............

ठीक है, ठीक है, ठीक है
मूर्खता घाघ की लीक है

चाटना, काटना, बाँटना 
लूट की नीच तकनीक है

झूट है न्याय की भावना 
आ रही देश को हीक है

लाल है हुक्म के होंठ क्यों 
खून है या रची पीक है

राज है तो हमें डर नहीं 
सोच ये तंत्र की ज़ीक़ है

ज़ीक़ – तंग
~अमितेष 

Added by अमि तेष on December 26, 2012 at 8:47pm — 10 Comments

लघुकथा: अधार्मिक

देश के प्रतिष्ठित सरकारी हस्पतालों में से एक में गर्मियों की दोपहर को डॉक्टरों के विश्राम कक्ष में बैठकर लस्सी पीते हुए, वे चारों डॉक्टर आपस में देश-दुनिया की 'गंभीर' चर्चा में लगे हुए थे। अचानक उनमे से एक की नज़र अपनी कलाई घड़ी पर घूम गई, जिसकी सुइयां उनके लिए निर्धारित विश्राम के समय से कुछ ज्यादा ही आगे घूम गईं थीं। उसने हड़बड़ाते हुए अपनी कुर्सी छोड़ी और बाकी के साथियों को घड़ी की तरफ इशारा करते हुए बोला-

- जरा टाइम देखो डियर, तुम लोगों का भी राउंड का वक़्त हो गया है।

- अबे बैठ…

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Added by Dipak Mashal on December 26, 2012 at 6:37am — 11 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
प्रयाग में कुंभ (मत्तगयंद सवैया) // -सौरभ

बालक-वृंद सुनैं, यह भारत-भूमि सदा सुख-साध भरी है

पावन चार नदी तट हैं, इतिहास कहे छलकी ’गगरी’ है

नासिक औ हरिद्वार-उजैन क घाट प बूँद ’अमी’ बिखरी है

धाम प्रयाग विशेष सदा जहँ धर्म-सुकर्म ध्वजा फहरी है



पुण्यधरा तपभूमि महान जो बारह साल प कुंभ सजावैं

तीनहुँ…

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Added by Saurabh Pandey on December 26, 2012 at 12:30am — 48 Comments

दिया ह्रदय में रख दूंगा

मन में मेरे जो आएगा लिख कर उसको रख दूंगा

चाह नहीं कुछ नाम कमाऊँ दिया ह्रदय में रख दूंगा !

घर में मेरे जो आएगा मान दिए खुश कर दूंगा

जीवन मेरे जो छाएगा प्यार किये जीवन दूंगा

उपवन मेरा जो सींचेगा खुशहाली छाया दूंगा

पथ में राही साथ चले मुस्कान भरे स्वागत दूंगा

मै एक तपस्वी कांटे बोकर प्राण भी लो ,

कभी नहीं कह पाऊँगा ..

मन में मेरे जो आएगा लिख कर उसको रख दूंगा ………..



सूरज के गर साथ चलेंगे गर्मी हम पाएंगे ही

अंगार अगर हम…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on December 25, 2012 at 10:30pm — 15 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सर्व नाश

थर्रा गये  मंदिर ,मस्जिद ,गिरिजा घर   

जब  कर्ण  में पड़ी  मासूम की चीत्कार 

सहम गए दरख़्त के सब फूल पत्ते  

बिलख पड़ी हर वर्ण हर वर्ग  की दीवार 

रिक्त हो गए बहते हुए चक्षु  समंदर 

दिलों में  नफरतों के नाग रहे फुफकार

उतर  आये   दैत्य देवों  की भूमि पर 

और ध्वस्त किये अपने देश के संस्कार  

 दर्द के  अलाव में  जल  रहे हैं जिस्म                  

 नाच रही हैवानियत मचा…

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Added by rajesh kumari on December 25, 2012 at 7:38pm — 24 Comments

जीवन की जंग...

खास  आदमी  जीने  के, मौके करे तलाश 

आम आदमी अपनी ही, ढोते फिरता लाश!!!
--
मन पांखी  उड़ता रहे,चाहे गगन विशाल।
देखे तन का घोसला ,देता खुद को डाल ।।
--
सोचे है कुछ आदमी ,होती है कुछ बात!
होना होनी के लिये ,करना अपने हाथ।।
--
अलग अलग है बानगी ,अलग अलग है रंग।
जारी  है हर मोड़ पे, इस  जीवन  की  जंग।।
--
आँखों में जब अश्क का,दरिया सा…
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Added by AVINASH S BAGDE on December 25, 2012 at 12:33pm — 11 Comments

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