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दोहे - प्रेम



एक सिवा मै प्रेम के , करूँ न दूजी बात ।

प्रेम मेरी पहचान हो , प्रेम हो मेरी जात ।

आती जाती सांस में , आये जाये प्रेम ।

प्रेम हो मेरी साधना , प्रेम बने व्रत नेम ।

प्रेम कि लहरें जब उठें , बहे अश्रु की धार ।

प्रेम की वीणा जब बजे , जुड़े ह्रदय के तार ।

प्रेम कि पावन धार में, मेरा मै बह जाय ।

मेरी अंतरआत्मा , प्रीतम से मिल जाय ।

नाची मीरा प्रेम में , प्रेम में मस्त कबीर ।

प्रेम खजाना जब मिला , हुए फ़कीर…

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Added by Neeraj Nishchal on November 22, 2013 at 8:13pm — 7 Comments

तमाम रात गुजरने के बाद आते हैं

वो अपने यार को छलने के बाद आते हैं

दिलों में दर्द उभरने के बाद आते हैं

 

चमकते चाँद सितारे गगन में लगता है  

विरह की आग में जलने के बाद आते हैं

 

न कोई देख ले चेहरे की झुर्रियां यारों  

तभी वो खूब सँवरने के बाद आते हैं

 

हमारे दर्द भी करते हैं नौकरी शायद

हमेशा शाम के ढलने के बाद आते हैं

 

तुम्हारी याद के जुगनू भी बेबफा तुम से

तमाम रात गुजरने के बाद आते हैं…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on November 22, 2013 at 1:30pm — 31 Comments

तेरा सब कुछ है...( अतुकांत )

शरीर तोड़ श्रम के बाद

थक-हार लेट गया

खेत की मेढ में पड़ी,

टूटी खटिया पर..

सर्द हवाओं के बीच

गुनगुनी धूप से तन को राहत मिल रही थी..

पर मन को सुकून नही

वो गुनगुना स्पर्श नही

जो कभी किसी स्पर्श से मिलता था..

 

सोचा..उठूँ, थोडा और श्रम करूँ

फिर बेजान हो इक लाश की तरह घर पहुँच कर,

बिस्तर पर छोड़ दूंगा

जो कल भोर होते ही

फिर से जी उठेगा...

 

चल घर तक चल..

घर राह तक रही है तेरी बूढी…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on November 22, 2013 at 1:30pm — 29 Comments

स्मृति

आह ! वह सुख ----

पावसी मेह  में भीगा हुआ चंद्रमुख I

यौवन की दीप्ति से राशि-राशि  सजा 

जैसे प्रसन्न उत्फुल्ल नवल नीरजा I  

 

मुग्ध लुब्ध दृष्टि ----

सामने सदेह सौंदर्य एक सृष्टि I

अंग-प्रत्यंग प्रतिमान में ढले

ऐसा रूप जो ऋतुराज को छले  I

 

नयन मग्न नेत्र------

हुआ क्रियमाण कंदर्प-कुरुक्षेत्र I

उद्विग्न  प्राण इंद्रजाल में फंसे

पंच कुसुम बाण पोर-पोर में धंसे I

 

वपु धवल कान्त…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 22, 2013 at 1:06pm — 32 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
!! प्रयास , कृष्ण हो जाने का !! ( अतुकांत )

 

कालीदास

मौन शास्त्रार्थ में

खुले पंजे के जवाब में

मुक्का दिखाते हैं

विद्वान अर्थ लगाते हैं

उन्हें ख़ुद पता नहीं

वो शास्त्रार्थ जीत जाते हैं…

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Added by गिरिराज भंडारी on November 22, 2013 at 1:00pm — 28 Comments

दोहे : अरुन शर्मा 'अनन्त'

प्रेम रूप हैं राधिका, प्रेम हैं राधेश्याम ।

प्रेम स्वयं माते सिया, प्रेम सियापतिराम ।।



सत्यवती सा प्रेम जो, हो जीवन में साथ ।

कष्ट उचित दूरी रखे, मृत्यु छोड़ दे हाथ ।।



अद्भुत भाषा व्याकरण, विभिन्न रूप प्रकार ।

प्रेम धरा पर कीमती, ईश्वर का उपहार ।।…



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Added by अरुन 'अनन्त' on November 22, 2013 at 12:58pm — 13 Comments

हंसी में उड़ा गयी

आँख से आँख वो ऐसे कुछ लड़ा गयी ।

नज़र पे अज़ीब सी कशिश वो चढ़ा गयी ।

झोकें सी गुज़री जब मेरे करीब से ,

साँसों को थामकर  धड़कनें  बढ़ा गयी ।

आरज़ू बड़ी थी पर कुछ भी न कह सका ,

बोलने के वक्त आवाज़ लड़खड़ा गयी ।

के घायल खड़ा रहा बनके शिकार मै ,

तीरे नज़र मेरे जिगर पे गड़ा गयी ।

लगा एक पल जैसे कयामत करीब हो ,

मेरी बायीं आँख तभी फड़फड़ा गयी ।

मुड़ के मेरी ओर फिर यूँ मुस्करायी ,

ज्यूँ मेरी बेबसी हंसी में उड़ा…

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Added by Neeraj Nishchal on November 22, 2013 at 11:30am — 4 Comments

कैसा लगता है ....

बताओ तो, कि कैसा लगता है ... 

किसी अंजान जगह पर 

किसी अंजान सफर पर 

किसी अंजान का साथ 

खुशी के वो अंजान पल 

साथ गुज़ारना, साथ चलना 

वो एहसास, वो पल 

बताओ तो, कि कैसा लगता है .... 

और फिर अचानक ... 

एक दिन 

किसी अंजान का बिछड़ जाना 

किसी अंजान बातों पर 

किसी अंजान कारणो पर 

फिर लौट कर न आना 

सिर्फ इंतज़ार रह जाना 

किसी से कुछ न कह पाना 

सिर्फ और सिर्फ यादें रह जाना 

बताओ तो, कि…

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Added by Amod Kumar Srivastava on November 21, 2013 at 8:17pm — 8 Comments

पिला देती अगर साकी तो मैं भी बोल देता सच

१२२२   १२२२  १२२२  १२२२ 

पिला देती अगर साकी तो मैं भी बोल देता सच

हलक से गर उतर जाती तो मैं भी बोल देता सच

 

हसीं नगमे, हसीं जलवे, हसीं महफ़िल हसीनो की

हँसी रुसवा न गर होती  तो मैं भी बोल देता सच

 

कहें शायर घनी काली घटाएं इन की जुल्फों को

न उनकी नींद गर उडती  तो मैं भी बोल देता सच

 

बड़ी दिलकश हसीं कातिल चमकता चाँद सब कहते

हंसी गर सच को सह पाती तो मैं भी बोल देता सच

 

कतल होने मे गर आये मजा…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on November 21, 2013 at 4:30pm — 26 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
गूँजी फिजाएं ......................डॉ० प्राची

वर्जना के टूटते

प्रतिबन्ध नें- 

उन्मुक्त, भावों को किया जब, 

खिल उठीं

अस्तित्व की कलियाँ 

सुरभि चहुँ ओर फ़ैली, 

मन विहँस गाने लगा मल्हार...

...फिर गूँजी फिजाएं …

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Added by Dr.Prachi Singh on November 21, 2013 at 4:30pm — 41 Comments

ख़्वाबों की हसीन शाम दें ………

ख़्वाबों की हसीन शाम दें ………



क्यूँ

बेवज़ह की

तकरार करती हो

इकरार भी करती हो

इंकार भी करती हो

खुद ही रूठ कर

छुप जाती हो

अपने ही आँचल में

झुकी नज़रों से

फिर किसी के

मनाने का

इंतज़ार भी करती हो

तुम जानती हो

तुम मेरी धड़कन हो

तुम मेरी साँसों की वजह हो

हम इक दूसरे की

पलकों के ख्वाब हैं

कोई अपने ख्वाबों से

रूठता है भला

तुम्हारा ये अभिनय बेमानी है

वरना इस ठिठुरती रात के…

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Added by Sushil Sarna on November 21, 2013 at 1:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल -निलेश 'नूर'-बात जो तुम से निभाई न गई

२१२२, ११२२, २२/ ११२   

.

बात जो तुम से निभाई न गई,

बस वही हम से भुलाई न गई.

....

वो नई रोज़ बना ले दुनियाँ,  

हम से किस्मत भी बनाई न गई.

....

थी दरो दिल पे छपी इक तस्वीर,

जल गया जिस्म, मिटाई न गई.

....

बस मेरे हक़ में बयाँ देना था, 

उन से आवाज़ उठाई न गई.

....

ख्व़ाब था दिल से मिला लें हम दिल,

आँख से आँख मिलाई न गई.  

....

हम गले मिलते भला…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on November 21, 2013 at 7:30am — 20 Comments

ग़ज़ल - देख लेना क्रान्ति अपनी रंग लायेगी ज़रूर

ग़ज़ल

 

देख लेना क्रान्ति अपनी रंग लायेगी ज़रूर

ये महा हड़ताल शासन को झुकायेगी ज़रूर

 

देखकर गहरा अंधेरा किसलिए मायूस हो

रात कितनी भी हो लम्बी भोर आयेगी ज़रूर

 

हौसला हालात से लड़ने का होना चाहिए

आयेंगे तूफ़ां तो कश्ती डगमगायेगी ज़रूर

 

अब बग़ावत पर उतर आओ सुनो पूरी तरह

वर्ना ये सत्ता तुम्हें  भी नोंच खायेगी ज़रूर

 

ये हमारी सारी माँगें मान तो ली जायेंगी

हाँ मगर सरकार हमको…

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Added by अजीत शर्मा 'आकाश' on November 21, 2013 at 6:30am — 11 Comments

क्यों, जीवन पर्यन्त मरीचिकायें आखेट करती है जीवन का ???

रचना पूर्व प्रकाशित होने के कारण तथा ओ बी ओ नियमों के अनुपालन के क्रम मे प्रबंधन स्तर से हटा दी गयी है, लेखक से अनुरोध है कि भविष्य में पूर्व प्रकाशित रचनाएँ ओ बी ओ पर पोस्ट न करें | (08.12.2013 / 22:35)

एडमिन
2013120807

Added by dr lalit mohan pant on November 21, 2013 at 12:00am — 10 Comments

दोहा- 9 (प्रेम पियूष)

पूर्ण चाँदनी रात है, अगणित तारे संग !

अब विलम्ब क्यों है प्रिये , छेड़ें प्रेम प्रसंग!!

कनक बदन पर कंचुकी ,सुन्दर रूप अनूप !

वाणी में माधुर्य ज्यों , सरदी में प्रिय धूप !!

अद्भुत क्षण मेरे लिए,जब आये मनमीत !

ह्रदय बना वीणा सरस ,गाता है मन गीत !!

प्रेम न देखे जाति को ,सच कहता हूँ यार !

यह तो सुमन सुगंध सम ,इसका सहज प्रसार !!

विरह सिंधु में डूबता ,खोजे मिले न राह !

विकल हुआ अब ताकता,मन का बंदरगाह…

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Added by ram shiromani pathak on November 20, 2013 at 11:30pm — 31 Comments

झूठ जीता सत्य हारा

झूठ जीता सत्य हारा

राजनीति की अग्नि में

जले देश सारा

 

रिश्ते नाते स्वार्थ-सिद्धि की धुरी में  

समय मजदूरों का गुजरे नौकरी में

श्रम किया जी तोड़

किन्तु फल है खारा

 

मन लगा के पर हुआ जाता गगन सा

लक्ष्य के आगे हैं किन्तु तम गहन सा

सिन्धु की गहराई

जाने बस किनारा

 

घात की यह वेदना क्यूँ माँ सहे अब

ज्ञान की नदिया भी क्यूँ उल्टी बहे अब

मिट गयी अब नेह की

वो मूल धारा…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on November 20, 2013 at 10:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल : क्यूँ जाति की न अब भी दीवार टूटती है

बह्र : २२१ २१२२ २२१ २१२२

 

इक दिन हर इक पुरानी दीवार टूटती है

क्यूँ जाति की न अब भी दीवार टूटती है

 

इसकी जड़ों में डालो कुछ आँसुओं का पानी

धक्कों से कब दिलों की दीवार टूटती है

 

हैं लोकतंत्र के अब मजबूत चारों खंभे

हिलती है जब भी धरती दीवार टूटती है

 

हथियार ले के आओ, औजार ले के आओ

कब प्रार्थना से कोई दीवार टूटती है

 

रिश्ते बबूल बनके चुभते हैं जिंदगी भर

शर्मोहया की जब भी दीवार टूटती…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 20, 2013 at 10:28pm — 18 Comments

काबिल न था

हाले दिल जो छुपाने के काबिल न था ।

क्या कहूं मै सुनाने के काबिल न था ।

इस ज़माने ने मुझको नकारा नहीं

मै तो खुद ही ज़माने के काबिल न था ।

इस लिए वो मुझे आज़माते रहे ,

मै उन्हें आज़माने के काबिल न था ।

रंग तनहाइयों में ही भरने लगा ,

वो जो महफ़िल सजाने के काबिल न था ।  

बोझ रस्मों रिवाज़ों के कुछ भी न थे ,

पर उन्हे मै उठाने के काबिल न था ।

सूख कर दरिया वो राह में खो गया ,

जो सागर को पाने के…

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Added by Neeraj Nishchal on November 20, 2013 at 7:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल

२ १  २    २ १    २  २ १ २ २

साथ उन से अब  कहाँ  से  बात होगी ׀

दिन को दुनिया,और खुद …

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Added by मोहन बेगोवाल on November 20, 2013 at 7:00pm — 5 Comments

हँसते रहे रोते रहे |

गूंजती थी जब खमोशी, हादसे होते रहे |

रात जागी थी जहां पर दिन वहीँ सोते रहे ||

 

अनमने से भाव थे वह अनमनी सी थी नजर

अनमने सिंगार पर ही मुग्ध हम होते रहे ||

 

कौंध कर बिजली गिरी वसुधा दिवाकर भी डरा,

कुंध तनमन क्रोध संकर बीज हम बोते रहे ||

 

भावना विचलित हुई जब चीर नैनो से हटा,

चार अश्रु गिर धरा पर माटी में खोते रहे ||

 

पीर बढती ही गई जब भावना के वेग से,

हम किनारे पर रहे हर शब्द को धोते रहे…

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Added by Ashok Kumar Raktale on November 20, 2013 at 7:00pm — 25 Comments

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