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आह ! वह सुख ----

पावसी मेह  में भीगा हुआ चंद्रमुख I

यौवन की दीप्ति से राशि-राशि  सजा 

जैसे प्रसन्न उत्फुल्ल नवल नीरजा I  

 

मुग्ध लुब्ध दृष्टि ----

सामने सदेह सौंदर्य एक सृष्टि I

अंग-प्रत्यंग प्रतिमान में ढले

ऐसा रूप जो ऋतुराज को छले  I

 

नयन मग्न नेत्र------

हुआ क्रियमाण कंदर्प-कुरुक्षेत्र I

उद्विग्न  प्राण इंद्रजाल में फंसे

पंच कुसुम बाण पोर-पोर में धंसे I

 

वपु धवल कान्त -----

अंतस में हा-हा वृत्ति, बहिरंग शांत  I

लज्ज -कंप भाव अनुराग से सने

अर्ध मुकुल नैनों में स्वप्न थे घने  I

 

रूप अपरूप -----

मंदिर के दीप की वर्तिका अनूप  I

दशक पूर्व जैसा ताप जैसा था प्रकाश I

आज भी वही अतृप्ति और वही प्यास I

 

एक चिर सत्य -----

भाव की सजीवता सदैव ही अमर्त्य  I

कुछ भी अतीत से नहीं अधिक समृद्ध

स्मृति  में कभी  नहीं नेह होता वृद्ध  I

 

मौलिक व् अप्रकाशित

 

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 10, 2013 at 12:04pm

आदरणीया  मीना पाठक जी

आपका बहुत-बहुत आभार i \

सादर i

Comment by Meena Pathak on December 9, 2013 at 3:28pm

बेहद सुन्दर और भावपूर्ण रचना हेतु बधाई आप को | सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 6, 2013 at 11:42am

आदरणीय निकोरे जी

आपके स्नेह का आभारी हूँ i

सादर i

Comment by vijay nikore on December 6, 2013 at 10:28am

सर्वथा एक नवीन प्रस्तुति। सुन्दर और मनोहारी। बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 4, 2013 at 5:58pm

प्रियंका बिटिया को  आशीष i

Comment by Priyanka singh on December 4, 2013 at 3:13pm

एक चिर सत्य -----

भाव की सजीवता सदैव ही अमर्त्य  I

कुछ भी अतीत से नहीं अधिक समृद्ध

स्मृति  में कभी  नहीं नेह होता वृद्ध  I 

सत्य.....सुंदर....भावपूर्ण ..... रचना ...बधाई सर ...

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 4, 2013 at 2:39pm

अरुण श्रीवास्तव जी

आपके प्रोत्साहन के लिए शत शत आभार  i

Comment by Arun Sri on December 4, 2013 at 11:39am

एक चिर सत्य -----

भाव की सजीवता सदैव ही अमर्त्य  I

कुछ भी अतीत से नहीं अधिक समृद्ध

स्मृति  में कभी  नहीं नेह होता वृद्ध  I ........... इस उपसंहारीय कथन के साथ न्याय करता हुआ , भाव को अपने चरम पर पहुंचाता हुआ कविता का एक एक शब्द ! प्रेम के अंतरंग क्षणों का ऐसा वर्णन भी हो सकता है , मुझ जैसे नए लोगों के लिए तो ये आश्चर्य ही है ! इस आश्चर्य को जी लूँ कुछ देर अभी ! आज का दिन अच्छा है मेरे लिए ! सादर !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2013 at 11:03pm

आदरणीया कल्पना रामानी जी

आपका आशिर्वाद मेरी प्रेरणा बने i  शत-शत  आभार i  

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2013 at 10:59pm

महिमा श्री जी

आपकी प्रतिक्रिया का आभारी हूँ  i

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