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ख़्वाब ....

ख़्वाब ....

चोट लगते ही
छैनी की
शिला से आह निकली
जान होती है
पत्थर में भी
ये अहसास हुआ आज
छीलता रहा पत्थर को
निकालना था एक ख़्वाब
बुत की शक्ल में
उसके गर्भ से
रो दी शिला
जब
ख़्वाब
बुत में
धड़कने लगा
क्या हुआ
जो रिस रहा था खून
बुतगर के हाथ से

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on March 12, 2019 at 5:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल : आईना उसे सच का दिखा क्यों नहीं देते



221 1221 1221 122

बातिल को नज़र से ही गिरा क्यों नहीं देते

आईना उसे सच का दिखा क्यों नहीं देते//1

अब ऐब तुम्हारा तो नज़र आने लगा है

अफ़वाह नई कोई उड़ा क्यों नहीं देते//2

क्या बेच नहीं पा रहा अपनी अना को वो

अख़बार कोई उसको पढ़ा क्यों नहीं देते//3

महफ़िल में तमाशा न करो ऐ मेरे मुंसिफ़

क़ातिल तो वहीं पर है सज़ा क्यों नहीं देते//4

क्या प्यार सभी क़ौम से है उसको अभी तक

टीवी पे नई बहस दिखा क्यों नहीं…

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Added by क़मर जौनपुरी on March 12, 2019 at 1:13pm — 8 Comments

जाने क्या कह रहा है मेरा आज मन ..गीत



शीत जैसी चुभन, आग जैसी जलन।।

जाने क्या कह रहा है मेरा आज मन।।

इक कशिश पल रही है हृदय में कहीं।

कश्मकश चल रही , साथ मेरे कोई।।

डुबकियां ले रहा ही मेरा आज मन।।

इस कदर है अधर से अधर का मिलन।।

जैसे पुरवा पवन छू रही हो बदन।।..१

जाने क्या कह रहा है .....

गर हूँ तन्हा मेरे साथ तन्हाई है।

भीड़ के साथ हूँ तो ये रूसवाई है।

दौड़कर पास आना लिपटना तेरा।।

मेरे आगोश में यूँ सिमटना तेरा।।

यूँ लगे जैसे मिलतें हो धरती…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 12, 2019 at 10:48am — 2 Comments

माँ (कविता)

माँ! तुम हो शक्ति स्वरूपा

न पाया तुमसा कोई दूजा

समय से भी तुमने की लड़ाई

हर बार समय को आँख दिखाई

नन्हीं नन्हीं क्यारियों में तुमने

प्यार-मुहब्बत के बीज जो बोये

अपने प्यार से सींचा है तुमने

घर-आँगन महकाया है तुमने

माँ तुमसा और न कोई देखा

हर दुःख को तुमने हँसते हुए फेंका

हर बार जब भी मैं घबरायी

सामने तुम ही तुम नज़र आई

कैसा डर! यह पूछा जब तुमने

नारी शक्ति से परिचय करवाया तुमने

आज जो भी कुछ है मैंने पाया

संग मेरे रहा तुम्हारा… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 12, 2019 at 9:52am — 5 Comments

माँ भारती पुकारती

भारत के नौजवानों ,माँ भारती पुकारती ,

देश के सपूत तुम ,फर्ज तो निभाइए |

मुश्किल घड़ी है आज,दाव पे लगी है लाज,

सिंग सा दहाड़ कर देश को जगाइए |

वीरता रगों में भर ,शौर्य की कहानी गढ़ ,

प्रचंड चंड रूप तो शत्रु को दिखाइए |

पावन मन गंगा हो ,ले हाथ में तिरंगा हो ,

वन्दे मातरम् गीत ,गाते सब जाइए |

        ***********

मौलिक और अप्रकाशित रचना 

महेश्वरी कनेरी 

 

Added by Maheshwari Kaneri on March 11, 2019 at 5:30pm — 5 Comments

मन भी कितना आतुर है ..

22-22-22-2

मन भी कितना आतुर है।।

ज्यूँ सबकुछ जीवन भर है।।

पशुओं  कि यह हालत भी।

इंसानों से बेहतर है।।

लोक समीक्षा इतनी ही।

जितना चिड़िया का पर है।।

मेरा मेरा मुझको ही।

छाया है सब छप्पर है।।

कितना तुम अब भागोगे ।

तीन-कदम* पर ही घर है।।(बचपन जवानी बुढ़ापा)

खूब बड़े बन जाओ क्या…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 11, 2019 at 2:49pm — 3 Comments

कुण्डलिया छंद-

बेटा-बेटी  में  किया, जिसने   कोई  भेद।
उसने मानो कर लिया, स्वयं नाव में छेद।।
स्वयं नाव में छेद, भेद  की  खोदी  खाई।
बहिना से ही दूर, कर दिया उसका भाई।।
कोई  श्रेष्ठ न तुच्छ, लगें  दोनों  ही  प्रेटी।
ईश्वर  का   वरदान,  मानिये   बेटा-बेटी।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

Added by Hariom Shrivastava on March 11, 2019 at 10:30am — 7 Comments

फिर उठीं है जाग देखों शहर में शैतानियाँ

फिर उठीं है जाग देखों शहर में शैतानियाँ

दर्द आहों में बदलने क्यूँ लगी कुर्वानियाँ

जान लेने को खड़े तैयार सारे आदमी

हर जगह बढ़ने लगी है आज कल विरानियाँ

घूमते थे रात दिन हम आपकी ही चाह में

जब समझ आया खुदा तो हो गईं आसानियाँ

जोड़ तिनके है बनाया आशियाँ तुम सोच लो

आबरू इस में छुपी है मत करो नादानियाँ

गंध आने है लगी क्यूँ फिर यहाँ बारूद की

याद कर तू बस खुदा को छोड़ बेईमानियाँ

आदमी मजबूर देखो हो गया इस दौर में

खून में शामिल…

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Added by munish tanha on March 10, 2019 at 8:00pm — 3 Comments

मैं वक्त कहाँ कब रुकता हूँ .

22-22-22-22

मैं कुछ और कहाँ कहता हूँ।।
गैरों से लिपटा - अपना हूँ।।

वैमनष्यता न सर उठा पाए।
दुश्मन की तरहा रहता हूँ।।

दरपण भी छू सकता है क्या।
बस ये ऐसे ही - पूछा हूँ।

कलियाँ खुशबू बिखरायेंगी।
मैं वक़्त कहाँ कब रुकता हूँ।।

आमोद रखो, बिश्वास रखो।
पग पग जीवन में अच्छा हूँ।।


..अमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 10, 2019 at 11:30am — 5 Comments

कुण्डलिया छंद -

बेटा-बेटी    में    करें, भेदभाव    क्यों    लोग।
सबका अपना भाग्य हैं, जब हो जिसका योग।।
जब हो जिसका योग, और प्रभु की जो मर्जी।
कौन  श्रेष्ठ  या  हेय,  धारणा  ही   ये    फर्जी।।
पुत्री  हो   या   पुत्र, नहीं   इसमें   कुछ   हेटी।
दोनों    एक    समान, आज   हैं    बेटा-बेटी।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

Added by Hariom Shrivastava on March 10, 2019 at 10:30am — 7 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

दरमियाँ    हुस्न    पर्दा    दारी   है ।

कैसे    कह   दूँ  के   बेक़रारी   है ।।

ऐ  कबूतर  जरा  सँभल   के  उड़ ।

देखता  अब   तुझे    शिकारी   है ।।

कौन  कहता  बहुत  ख़फ़ा  हैं  वो ।

आना  जाना  तो  उनका   जारी है ।।

सब   बताता   है   नूर   चेहरे   का ।

रात    उसने   कहाँ    गुजारी    है ।।

कैसे  कर  लूं …

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 10, 2019 at 9:00am — 5 Comments

प्लेन उड़ाती लडकियां

प्लेन उड़ाती लडकियां

(लघुकथा)

एयरोनॉटिकल शो। किस्म किस्म के हवाई जहाज़ आसमान में करतब दिखाते उड़े जाते हैं। अधिकतर प्लेन लड़कियां उड़ा रही हैं।

"पापा, पापा... मैं भी प्लेन उड़ाऊंगी...।" एक छोटी बच्ची अपने पिता से ज़िद कर रही है।

लड़कियां आसमान में प्लेन उड़ा रही हैं। लड़कियां आसमान छू रही हैं। लड़कियों का आत्मविश्वास आसमान पर है और एक छोटी बच्ची अपने पिता से ज़िद कर रही है, "पापा, पापा... मैं भी प्लेन उड़ाऊंगी।"

लोग कहते हैं, “लड़कियों को पंख लग गये…

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Added by Mirza Hafiz Baig on March 9, 2019 at 7:58pm — 8 Comments

सच की झूठी जिल्दकारी क्या करूँ ..

2122-2122-212

याद आती है तुम्हारी क्या करूँ ।।

छाई रहती है खुमारी  क्या करूँ।।

अब नहीं चलता , मेरे पे बस मेरा।

बढ़ रही नित बेक़रारी क्या करूँ।।

खुद मुआफ़िक आयत ए कुरआन हो।

इसमें अच्छी अर्श कारी क्या करूँ।।

झूठा' सिक्का अब चलन बाजार का

सच की झूठी जिल्दकारी क्या करूँ।।

हर्ज़ कोई बात से…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 9, 2019 at 3:30pm — 4 Comments

सरसी छंद - "अरुणोदय"

1-

धीरे-धीरे आसमान का, रंग हो रहा लाल।

अतिमनभावन दृश्य सुहावन,है अरूणोदय काल।।

पसरा था जो गहन अँधेरा, अब तक चारों ओर।

उसे चीरकर आयी देखो, प्राणदायिनी भोर।।

2-

नवप्रभात ने फूँक दिए ज्यों, सकल सृष्टि में प्राण।

मंगलमय हो गया सबेरा, मिला तिमिर से त्राण।।

जलनिधि की जड़ता का जैसे, किया सूर्य ने अंत।

जीव-जंतु जड़-जंगम जलधर, हुए सभी जीवंत।।

3-

सागर की गहराई में भी, जीवन है संगीन।

घड़ियालों के बीच वहाँ पर, प्राण बचाती मीन।।

सूरज के आ जाने…

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Added by Hariom Shrivastava on March 8, 2019 at 1:41pm — 6 Comments

मैं एक स्त्री भी हूँ

"अंतर्रष्ट्रिय  महिला दिवस पर विशेष"

सिर्फ माँ बहन पत्नी बेटी की,

परिभषा में मत उल्झओ

सबसे पहले मैं एक स्त्री हूँ,

मुझे मेरा सम्मन दिलवाओ।।

 

सिर्फ वंश…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on March 8, 2019 at 11:30am — 2 Comments

हाँ मैं नारी हूँ

हाँ मैं नारी हूँ

घर की मर्यादा हूँ…

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Added by Neelam Upadhyaya on March 8, 2019 at 10:30am — 6 Comments

तेरे रुखसार हैं या दहके गुलाब-------ग़ज़ल

1222 1222 2121

तेरे रुख़्सार हैं या दहके ग़ुलाब

ये तेरी ज़ुल्फ़ है या तेरा हिज़ाब

हटा के ज़ुल्फ़ का पर्दा, उँगलियों से

बिखेरो चाँदनी मुझ पर माहताब

करीब आ तो, निगाहों के पन्ने पलटूँ

मैं पढ़ना चाहूँ तेरे मन की किताब

महज़ चर्चा तुम्हारा, बातें तुम्हारी

इसे ही सब कहें, चाहत बे-हिसाब

ज़माना तुहमतें चाहे जितनी भी दे

ग़ज़ल पंकज की, है तुझको इंतिसाब

===============================

कठिन शब्दों के…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 8, 2019 at 8:24am — 2 Comments

उम्र भर जो भी ग़रीबी के निशाँ देखेगा (३६)

उम्र भर जो भी ग़रीबी के निशाँ देखेगा 

कैसे मुमकिन है वो बाँहों में जहाँ देखेगा 

** 

कितना बारूद भरा होगा बताना मुश्किल 

लफ्ज़ से कोई निकलता जो धुआँ देखेगा 

**

दिल की रानाई का अंदाज़ा लगाए कैसे 

जो फ़क़त हुस्न कि फिर शोला-रुख़ाँ* देखेगा 

**

दर्द महसूस भला ग़म का उसे हो क्यों कर 

ज़िंदगी…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 8, 2019 at 1:00am — 1 Comment

गज़ल: बच्चा बच्चा मर मिटेगा अपने हिंदुस्तान पर

2122 2122 2122 212

आंच आई गर कभी इस देश के अभिमान पर

बच्चा बच्चा मर मिटेगा अपने हिंदुस्तान पर//1

ये तिरंगा झुक नहीं सकता किसी के सामने

सर कटा देंगे हम अपना इसकी ऊंची शान पर//2

चाहे जितनी मुश्किलें आएं हमारी राह में

दाग़ हम लगने न देंगे देश के सम्मान पर//3

जीत लेंगे जंग हम दुश्मन लड़े चाहे जहां

ख़ौफ़ बरपा हम करेंगे शत्रु की मुस्कान पर//4

ज़ुल्म हम करते नहीं पर ज़ुल्म सहते भी नहीं

है भरोसा हमको अपने शांति के…

Continue

Added by क़मर जौनपुरी on March 7, 2019 at 10:30pm — 2 Comments

दो हमशक्ल ग़ज़लें

एक बह्र ---दो हमशक़्ल ग़ज़ल

2122--2122--212

रस्म-ए-उल्फ़त है य' ऐसा कीजिए

रात-दिन उसको ही चाहा कीजिए

बदनसीबी का तमाशा कीजिए

आज फिर उसकी तमन्ना कीजिए

यूँ न हरदम मुस्कुराया कीजिए

जब सताए ग़म तो रोया कीजिए

ख़ुद को मसरूफ़ी दिखाया कीजिए

जब कभी बेकार बैठा कीजिए

अच्छा तो 'खुरशीद' जी हैं आप ही

आइए साहब उजाला कीजिए

©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर । 9413408422



2122--2122--212

आइने में ख़ुद को देखा कीजिए

फिर…

Continue

Added by khursheed khairadi on March 6, 2019 at 8:24pm — 1 Comment

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