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धर्मेन्द्र कुमार सिंह
  • Male
  • Raigarh, CG
  • India
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धर्मेन्द्र कुमार सिंह's Discussions

बहर सारिणी
7 Replies

ग़ज़ल की बहरें समझना बहुत टेढ़ी खीर है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि बहर के बारे में जानकारी तो बहुत ज्यादा मिल जाती है अंतर्जाल पर पर कहीं भी व्यवस्थित ढंग से नहीं मिलती। तो जहाँ सूचना ज्यादा हो वहाँ उसको…Continue

Started this discussion. Last reply by Admin Jan 30, 2011.

 

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धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी में (ग़ज़ल)

1222 1222 122-------------------------------जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी मेंवो फ़्यूचर खोजता है लॉटरी मेंदिखाई ही न दें मुफ़्लिस जहां सेन हो इतनी बुलंदी बंदगी मेंदुआ करना ग़रीबों का भला हो भलाई है तुम्हारी भी इसी मेंअगर है मोक्ष ही उद्देश्य केवलनहीं कोई बुराई ख़ुदकुशी मेंयही तो इम्तिहान-ए-दोस्ती हैख़ुशी तेरी भी हो मेरी ख़ुशी मेंउतारो ये तुम्हें अंधा करेगीरहोगे कब तलक तुम केंचुली मेंजलें पर ख़ूबसूरत तितलियों के न लाना आँच इतनी टकटकी मेंसियासत, साँड, पूँजी और शुहदेमिलें अब ये ही ग़ालिब की गली…See More
Jul 15
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post चोर का मित्र जब से बना बादशाह (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया  Dr.Prachi Singh जी"
Jul 14
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी में (ग़ज़ल)
"जनाब  Samar kabeer साहब,, आप सही कह रहे हैं, एक शब्द या को ये कर देने से शेर की सुंदरता बढ़ रही है। सुझाव  के लिए आभारी हूँ जनाब। बेबह्र  मिसरे की तरफ ध्यान दिलाने के लिए शुक्रिया। इसे शीघ्र ही  ठीक करता हूँ। मुहब्बत बनी…"
Jul 14
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी में (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय  मिथिलेश वामनकर जी"
Jul 14
Samar kabeer commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी में (ग़ज़ल)
"जनाब धर्मेन्द्र कुमार जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें । 'उतारो या तुम्हें अंधा करेगी' इस मिसरे में 'या' की जगह "ये" करना उचित होगा । 'महज एक जिस्म दिखता षोडशी में' ये मिसरा बह्र में नहीं है,…"
Jul 13

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी में (ग़ज़ल)
"आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी, क्या ही खूब ग़ज़ल कही हैं। एक से बढ़कर एक अशआर हुए हैं। इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई। सादर"
Jul 3
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी में (ग़ज़ल)

1222 1222 122-------------------------------जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी मेंवो फ़्यूचर खोजता है लॉटरी मेंदिखाई ही न दें मुफ़्लिस जहां सेन हो इतनी बुलंदी बंदगी मेंदुआ करना ग़रीबों का भला हो भलाई है तुम्हारी भी इसी मेंअगर है मोक्ष ही उद्देश्य केवलनहीं कोई बुराई ख़ुदकुशी मेंयही तो इम्तिहान-ए-दोस्ती हैख़ुशी तेरी भी हो मेरी ख़ुशी मेंउतारो ये तुम्हें अंधा करेगीरहोगे कब तलक तुम केंचुली मेंजलें पर ख़ूबसूरत तितलियों के न लाना आँच इतनी टकटकी मेंसियासत, साँड, पूँजी और शुहदेमिलें अब ये ही ग़ालिब की गली…See More
Jun 24

सदस्य टीम प्रबंधन
Dr.Prachi Singh commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post चोर का मित्र जब से बना बादशाह (ग़ज़ल)
"सभी अशआर बहुत धारदार हुए हैं धर्मेन्द्र भाई जी  बहुत बधाई "
Jan 16
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

चोर का मित्र जब से बना बादशाह (ग़ज़ल)

212 212 212 212 --------------------चोर का मित्र जब से बना बादशाहचोर को चोर कहना हुआ है गुनाहवो जो संख्या में कम थे वो मारे गएकुछ गुनहगार थे शेष थे बेगुनाहआज मुंशिफ के कातिल ने हँसकर कहाअब मेरा क्या करेंगे सुबूत-ओ-गवाहखून में उसके सदियों से व्यापार है बेच देगा वतन वो हटी गर निगाहएक बंदर से उम्मीद है और क्या  मारता है गुलाटी करो वाह वाहएक मौका सुनो फिर से दे दो उसेजो बचा है उसे भी करे वो तबाह-------------(मौलिक एवं अप्रकाशित)See More
Jan 7
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post होता है इंक़िलाब सदा इंतिहा के बाद (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी"
Jan 5
धर्मेन्द्र कुमार सिंह replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"बहुत दुखद खबर है। उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि।"
Dec 28, 2023
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post होता है इंक़िलाब सदा इंतिहा के बाद (ग़ज़ल)
"आ. भाई धर्मेंद्र जी, सादर अभिवादन। अच्छी गजल हुई है। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।"
Sep 21, 2023
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

होता है इंक़िलाब सदा इंतिहा के बाद (ग़ज़ल)

बह्र : 221 2121 1221 212ज़ालिम बढ़ा दे ज़ुल्म ज़रा हर ख़ता के बाद  होता है इंक़िलाब सदा इंतिहा के बाद किसने बदल दिया है ये कानून देश का होने लगी है जाँच यहाँ अब सज़ा के बादबीमारियों से देश बचा लोगे जान लोकरती असर है ख़ूब दुआ पर दवा के बादजिसने भी तप किया उसे देवत्व मिल गयाइंसान कौन-कौन बना देवता के बाद?ऐसा विकास भी न हमें आप दीजिएमिलता सभी को जैसे ख़ुदा पर कज़ा के बाद-----------------(मौलिक एवं अप्रकाशित)See More
Sep 13, 2023
Dr. Vijai Shanker commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post धुँआँ उठा है नफ़रत का (नवगीत)
"विचारणीय ❤"
Aug 14, 2023
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post धुँआँ उठा है नफ़रत का (नवगीत)
"आ. भाई धर्मेंद्र जी, सादर अभिवादन। अच्छा नवगीत हुआ है। हार्दिक बधाई। आ. भाई सौरभ जी की बात से सहमत हूँ। "
Aug 8, 2023

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post धुँआँ उठा है नफ़रत का (नवगीत)
"नवगीत के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ< आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  वोटर बेचारा  मोहरा भर है पूँजी की हसरत का  .. एक सार्थक हामी  जनता को  अनुमान नहीं है आने वाली आफ़त का ...  जनता अनुमान से अधिक तार्किक ढंग से सोचती है,…"
Aug 8, 2023

Profile Information

Gender
Male
City State
रायगढ़, छत्तीसगढ़
Native Place
प्रतापगढ़
Profession
अभियांत्रिकी

धर्मेन्द्र कुमार सिंह's Blog

जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी में (ग़ज़ल)

1222 1222 122

-------------------------------

जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी में

वो फ़्यूचर खोजता है लॉटरी में

दिखाई ही न दें मुफ़्लिस जहां से

न हो इतनी बुलंदी बंदगी में

दुआ करना ग़रीबों का भला हो …

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Posted on June 22, 2024 at 3:30pm — 4 Comments

चोर का मित्र जब से बना बादशाह (ग़ज़ल)

212 212 212 212 

--------------------

चोर का मित्र जब से बना बादशाह

चोर को चोर कहना हुआ है गुनाह

वो जो संख्या में कम थे वो मारे गए

कुछ गुनहगार थे शेष थे बेगुनाह

आज मुंशिफ के कातिल ने हँसकर कहा

अब मेरा क्या करेंगे सुबूत-ओ-गवाह

खून में उसके सदियों से व्यापार है 

बेच देगा वतन वो हटी गर निगाह

एक बंदर से उम्मीद है और क्या  

मारता है गुलाटी करो वाह वाह

एक मौका सुनो फिर से दे…

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Posted on January 5, 2024 at 12:46pm — 2 Comments

होता है इंक़िलाब सदा इंतिहा के बाद (ग़ज़ल)

बह्र : 221 2121 1221 212

ज़ालिम बढ़ा दे ज़ुल्म ज़रा हर ख़ता के बाद  

होता है इंक़िलाब सदा इंतिहा के बाद 

किसने बदल दिया है ये कानून देश का 

होने लगी है जाँच यहाँ अब सज़ा के बाद

बीमारियों से देश बचा लोगे जान…

Continue

Posted on September 13, 2023 at 8:17pm — 2 Comments

धुँआँ उठा है नफ़रत का (नवगीत)

पास आ गया है बेहद

जब से चुनाव फिर संसद का

राजनीति की चिमनी जागी

धुँआँ उठा है नफ़रत का

आहिस्ता-आहिस्ता 

सारी हवा हो रही है जहरीली

काले-काले धब्बों ने …

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Posted on August 2, 2023 at 8:26pm — 4 Comments

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At 12:19am on September 23, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय बड़े भाई  धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी, 

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें...

At 8:41pm on September 22, 2013, जितेन्द्र पस्टारिया said…

" जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें " आदरणीय धर्मेन्द्र जी

At 11:20am on September 22, 2013,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

At 10:23pm on December 13, 2012, seema agrawal said…

स्वागत है धर्मेन्द्र जी 

At 6:18pm on September 22, 2012,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

At 10:06am on September 22, 2012,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

भाई धर्मेन्द्रजी, 

सरल, सफल, सहज, सुगढ़
सुफल, सुमिल, सुधी
सस्वर.. .
संयत, सुहृद, सुभाव, सशब्द
संभव सदा
सबल-प्रखर.. .
शुभभावना-शुभकामना-सुसंस्मरण संप्रेष्य है !

अनेकानेक बधाइयाँ.

At 9:20am on September 22, 2012, Er. Ambarish Srivastava said…

कविता शुचिता शिल्प से, शोभित मित्र कविन्द्र.

जन्मदिवस    शुभकामना,   भाई   जी   धर्मेन्द्र..    सादर   

At 8:15am on September 22, 2012, कुमार गौरव अजीतेन्दु said…

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ आदरणीय धर्मेन्द्र सर.........

At 12:10pm on September 21, 2012, लक्ष्मण रामानुज लडीवाला said…

जन्म दिन की हार्दिक शुभ कामनाए स्वीकारे आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी, 

प्रभु आपको समाज और देश निर्माण में योगदान देने की शक्ति प्रदान करे | आपका 

हमारा स्नेह बना रहे |

At 1:55pm on April 7, 2011, nemichandpuniyachandan said…
aapki zarra-nawazee ke liye sukariya.
 
 
 

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"हार्दिक आभार आपका।"
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"सही कहा आपने "
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"आदरणीय आप और हम आदरणीय हरिओम जी के दोहा छंद के विधान अनुरूप प्रतिक्रिया से लाभान्वित हुए। सादर"
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"सही सुझाव "
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"आभार"
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"जी हार्दिक धन्यवाद "
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"आदरणीय अशोक रक्ताले जी, मैने बस ओ बी ओ के स्वर्णिम काल को याद किया है। बस उन दिनों को फिर से देखना…"
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