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धर्मेन्द्र कुमार सिंह
  • Male
  • Raigarh, CG
  • India
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धर्मेन्द्र कुमार सिंह's Discussions

बहर सारिणी
7 Replies

ग़ज़ल की बहरें समझना बहुत टेढ़ी खीर है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि बहर के बारे में जानकारी तो बहुत ज्यादा मिल जाती है अंतर्जाल पर पर कहीं भी व्यवस्थित ढंग से नहीं मिलती। तो जहाँ सूचना ज्यादा हो वहाँ उसको…Continue

Started this discussion. Last reply by Admin Jan 30, 2011.

 

धर्मेन्द्र कुमार सिंह's Page

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धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

मुहब्बतनामा (उपन्यास अंश)

दूसरी मुहब्बत के नाममेरे दूसरे इश्क़,तुम मेरे जिंदगी में न आते तो मैं इसके अँधेरे में खो जाता, मिट जाता। तुम मेरी जिन्दगी में तब आये जब मैं अपना पहला प्यार खो जाने के ग़म में पूरी तरह डूब चुका था। पढ़ाई से मेरा मन बिल्कुल उखड़ चुका था। स्कूल बंक करके आवारा बच्चों के साथ इधर-उधर घूमने लगा था। घर वालों से छुपकर सिगरेट और शराब पीने लगा था। आशिकी, पुकार और भी न जाने कौन-कौन से गुटखे खाने लगा था। मेरे घर के पीछे बने ईंटभट्ठे के मजदूरों के साथ जुआ खेलने लगा था। दोस्तों के साथ मिलकर दुकानों से सामान…See More
Tuesday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"बहुत ही दुखद समाचार है, विनम्र श्रद्धांजलि।"
May 2
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post किसी रात आ मेरे पास आ मेरे साथ रह मेरे हमसफ़र (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Aazi Tamaam जी "
Apr 29
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post किसी रात आ मेरे पास आ मेरे साथ रह मेरे हमसफ़र (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी"
Apr 29
Aazi Tamaam commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post किसी रात आ मेरे पास आ मेरे साथ रह मेरे हमसफ़र (ग़ज़ल)
"सादर प्रणाम आदरणीय धर्मेंद्र जी अच्छी ग़ज़ल हुई है"
Apr 27
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post किसी रात आ मेरे पास आ मेरे साथ रह मेरे हमसफ़र (ग़ज़ल)
"आ. भाई धर्मेंद्र जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।"
Apr 26
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

किसी रात आ मेरे पास आ मेरे साथ रह मेरे हमसफ़र (ग़ज़ल)

११२१२ ११२१२ ११२१२ ११२१२किसी रात आ मेरे पास आ मेरे साथ रह मेरे हमसफ़रतुझे दिल के रथ पे बिठा के मैं कभी ले चलूँ कहीं चाँद परतुझे छू सकूँ तो मिले सुकूँ तुझे चूम लूँ तो ख़ुदा मिलेतू जो साथ दे जग जीत लूँ तूझे पी सकूँ तो बनूँ अमरमेरे हमनशीं मेरे हमनवा मेरे हमक़दम मेरे हमजबाँ तुझे तुझ से लूँगा उधार, फिर, भरूँ किस्त चाहे मैं उम्र भरकहीं धूप है कहीं छाँव है कहीं शहर है कहीं गाँव हैहै कहाँ चली मेरी रहगुज़र तू जो साथ है तो किसे ख़बरमेरी भूख तू मेरी प्यास तू मेरा जिस्म तू मेरी जान तूतेरा नाम ख़ुद का बता रहा तू…See More
Apr 25
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post चेहरे पर मुस्कान बनाकर बैठे हैं (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Aazi Tamaam जी "
Apr 25
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post चेहरे पर मुस्कान बनाकर बैठे हैं (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी"
Apr 25
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post अगर हक़ माँगते अपना कृषक, मजदूर खट्टे हैं (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी "
Apr 25
Aazi Tamaam commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post चेहरे पर मुस्कान बनाकर बैठे हैं (ग़ज़ल)
"छठा शैर बेहद पसंद आया सादर प्रणाम आदरणीय धर्मेंद्र अच्छी ग़ज़ल है"
Apr 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post चेहरे पर मुस्कान बनाकर बैठे हैं (ग़ज़ल)
"आ. भाई धर्मेंद्र जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।"
Apr 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post अगर हक़ माँगते अपना कृषक, मजदूर खट्टे हैं (ग़ज़ल)
"आ. भाई धर्मेंद्र जी, नये रूप में बिम्ब गढ़ने के लिए हार्दिक बधाई।"
Apr 18
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

चेहरे पर मुस्कान बनाकर बैठे हैं (ग़ज़ल)

22 22 22 22 22 2.चेहरे पर मुस्कान बनाकर बैठे हैंजो नकली सामान बनाकर बैठे हैंदिल अपना चट्टान बनाकर बैठे हैंपत्थर को भगवान बनाकर बैठे हैंजो करते बातें तलवार बनाने कीउनके पुरखे म्यान बनाकर बैठे हैंआर्य, द्रविड़, मुस्लिम, ईसाई हैं जिसमेंउसको हिन्दुस्तान बनाकर बैठे हैंब्राह्मण-हरिजन, हिन्दू-मुस्लिम सिखलाकरबच्चों को हैवान बनाकर बैठे हैंबेच-बाच देगा सब, जाने से पहलेबनिये को सुल्तान बनाकर बैठे हैंहुआ अदब का हाल न पूछो कुछ ऐसा पॉण्डी को गोदान बनाकर बैठे हैंजाने कैसा ये विकास कर बैठे हमवन को रेगिस्तान…See More
Apr 14
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post अगर हक़ माँगते अपना कृषक, मजदूर खट्टे हैं (ग़ज़ल)
"//क्योंकि सड़े हुए या खराब खाद्य पदार्थों में बैक्टीरिया की वृद्धि के कारण अक्सर खट्टा स्वाद होता है इसी अर्थ का विस्तार आदमी, आँकड़े, दस्तूर इत्यादि के लिए किया गया है// ये ख़याल आपको मुबारक हो।  मैं आपके इस फ़लसफ़े से सहमत नहीं हूँ। सादर। "
Apr 14
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post अगर हक़ माँगते अपना कृषक, मजदूर खट्टे हैं (ग़ज़ल)
"जैसा कि कड़वाहट के साथ होता है, खट्टे का पता लगाना अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह उन खाद्य पदार्थों की पहचान करने में मदद कर सकता है जो खतरनाक हो सकते हैं, क्योंकि सड़े हुए या खराब खाद्य पदार्थों में बैक्टीरिया की वृद्धि के कारण अक्सर…"
Apr 14

Profile Information

Gender
Male
City State
रायगढ़, छत्तीसगढ़
Native Place
प्रतापगढ़
Profession
अभियांत्रिकी

धर्मेन्द्र कुमार सिंह's Blog

मुहब्बतनामा (उपन्यास अंश)

दूसरी मुहब्बत के नाम

मेरे दूसरे इश्क़,

तुम मेरे जिंदगी में न आते तो मैं इसके अँधेरे में खो जाता, मिट जाता। तुम मेरी जिन्दगी में तब आये जब मैं अपना पहला प्यार खो जाने के ग़म में पूरी तरह डूब चुका था। पढ़ाई से मेरा मन बिल्कुल उखड़ चुका था। स्कूल बंक करके आवारा बच्चों के साथ इधर-उधर घूमने लगा था। घर वालों से छुपकर सिगरेट और शराब पीने लगा था। आशिकी, पुकार और भी न जाने कौन-कौन से गुटखे खाने लगा था। मेरे घर के पीछे बने ईंटभट्ठे के मजदूरों के साथ जुआ खेलने लगा था। दोस्तों के साथ मिलकर…

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Posted on May 3, 2021 at 10:30pm

किसी रात आ मेरे पास आ मेरे साथ रह मेरे हमसफ़र (ग़ज़ल)

११२१२ ११२१२ ११२१२ ११२१२

किसी रात आ मेरे पास आ मेरे साथ रह मेरे हमसफ़र

तुझे दिल के रथ पे बिठा के मैं कभी ले चलूँ कहीं चाँद पर

तुझे छू सकूँ तो मिले सुकूँ तुझे चूम लूँ तो ख़ुदा मिले

तू जो साथ दे जग जीत लूँ तूझे पी सकूँ तो बनूँ अमर

मेरे हमनशीं मेरे हमनवा मेरे हमक़दम मेरे हमजबाँ 

तुझे तुझ से लूँगा उधार, फिर, भरूँ किस्त चाहे मैं उम्र भर

कहीं धूप है कहीं छाँव है कहीं शहर है कहीं गाँव…

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Posted on April 25, 2021 at 6:10pm — 4 Comments

चेहरे पर मुस्कान बनाकर बैठे हैं (ग़ज़ल)

22 22 22 22 22 2

.

चेहरे पर मुस्कान बनाकर बैठे हैं

जो नकली सामान बनाकर बैठे हैं

दिल अपना चट्टान बनाकर बैठे हैं

पत्थर को भगवान बनाकर बैठे हैं

जो करते बातें तलवार बनाने की…

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Posted on April 14, 2021 at 9:30pm — 4 Comments

अगर हक़ माँगते अपना कृषक, मजदूर खट्टे हैं (ग़ज़ल)

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

अगर हक़ माँगते अपना कृषक, मजदूर खट्टे हैं

तो ख़ुश्बू में सने सब आँकड़े भरपूर खट्टे हैं

मधुर हम भी हुये तो देश को मधुमेह जकड़ेगा 

वतन के वासिते होकर बड़े मज़बूर, खट्टे…

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Posted on April 12, 2021 at 10:28pm — 7 Comments

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At 12:19am on September 23, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय बड़े भाई  धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी, 

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें...

At 8:41pm on September 22, 2013, जितेन्द्र पस्टारिया said…

" जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें " आदरणीय धर्मेन्द्र जी

At 11:20am on September 22, 2013,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

At 10:23pm on December 13, 2012, seema agrawal said…

स्वागत है धर्मेन्द्र जी 

At 6:18pm on September 22, 2012,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

At 10:06am on September 22, 2012,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

भाई धर्मेन्द्रजी, 

सरल, सफल, सहज, सुगढ़
सुफल, सुमिल, सुधी
सस्वर.. .
संयत, सुहृद, सुभाव, सशब्द
संभव सदा
सबल-प्रखर.. .
शुभभावना-शुभकामना-सुसंस्मरण संप्रेष्य है !

अनेकानेक बधाइयाँ.

At 9:20am on September 22, 2012, Er. Ambarish Srivastava said…

कविता शुचिता शिल्प से, शोभित मित्र कविन्द्र.

जन्मदिवस    शुभकामना,   भाई   जी   धर्मेन्द्र..    सादर   

At 8:15am on September 22, 2012, कुमार गौरव अजीतेन्दु said…

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ आदरणीय धर्मेन्द्र सर.........

At 12:10pm on September 21, 2012, लक्ष्मण रामानुज लडीवाला said…

जन्म दिन की हार्दिक शुभ कामनाए स्वीकारे आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी, 

प्रभु आपको समाज और देश निर्माण में योगदान देने की शक्ति प्रदान करे | आपका 

हमारा स्नेह बना रहे |

At 1:55pm on April 7, 2011, nemichandpuniyachandan said…
aapki zarra-nawazee ke liye sukariya.
 
 
 

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