For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

September 2016 Blog Posts (189)

सीमा ने बलिदान क्यों माँगा

कभी विधि चले  साथ 

कभी झटक दिए हाथ
कैसा ये खेल कैसे खिलौने 
बिन बदरा…
Continue

Added by amita tiwari on September 30, 2016 at 8:30pm — 11 Comments

ककुभ छंद (16, 14 चरणांत 22)

कब वीरों की दग्ध चिता पर कब समाधि पर आओगे

कब सुख से सूखे लोचन पर करुणा  के घन लाओगे

 

काले मन से कब छूटेगा

मोह श्वेत परिधानों का

कब तक आलंबन पाओगे

व्योम प्रवृत्त विमानों का

कब तक शोणित की सरिता में तुम निर्विघ्न नहाओगे

 

नश्वर देह सुरक्षित कितना

रक्षक के समुदायों से

दंभ भरा अस्तित्व बचेगा

कब तक कठिन उपायों से

मन के उजले संकेतों को कब तक तुम झुठलाओगे

 

झूठा नाटक कब तक मरने

वालों पर…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 30, 2016 at 7:07pm — 14 Comments

ख़्वाबों की लहद ....

ख़्वाबों की लहद ....

ये आंखें

न जाने कितने चेहरे

हर पल जीती हैं

हर चेहरे के

हज़ारों ग़म पीती हैं

मुस्कुराती हैं तो

ख़बर नहीं होती

मगर बरस कर

ये सफर को अंजाम

दे जाती हैं

ज़हन की मिट्टी को

किसी दर्द का

पैग़ाम दे जाती हैं

मेरी तन्हाईयों को

नापते -नापते

न जाने कितने आफ़ताब लौट गए

मेरी तारीकियों में

हर शरर ने

अपना वज़ूद खोया है

हर लम्हा

किसी न किसी लम्हे के लिए

वक्त की चौखट से…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 30, 2016 at 3:24pm — 14 Comments

कौन बुरा लगता है

आजकल देखने मे
कौन बुरा लगता है,
रोता है वो फिर भी,
हंसता हुआ लगता है।
दिल में है दर्द
पलकें हैं भीगी हुयी,
कोई हमसे यूँ ही
रूठा हुआ लगता है।
डूबा हूँ पानी में
प्यासा हूँ बैठा हुआ
समन्दर भी मुझे अब
सूखा हुआ लगता है।
कौन यहाँ बिखरा गया
फूल और पतियों को,
पेड़ हर तरफ यहाँ ,
टूटा हुआ लगता है।
सब कुछ तो है घर की
दीवारों में सजा हुआ
आिशयाँ मेरा फिर भी
बिखरा हुआ लगता है।
मौलिक अप्रकाशित

Added by S.S Dipu on September 30, 2016 at 12:05am — 4 Comments

ग़ज़ल-आरसी भी तरस जाता, तब मुहँ दिखाती हो |

बहर : २१२  २१२  २१२  २१२  २२

ना करो ऐसे↓ कुछ, रस्म जैसे निभाती हो

आरसी भी तरस जाता↓, तब  मुहँ दिखाती हो |

छोड़कर  तब गयी अब हमें,  क्यों रुला/ती हो   

याद के झरने↓ में आब जू, तुम बहाती हो |  

रात दिन जब लगी आँख, बन ख़्वाब आती हो

अलविदा कह दिया फिर, अभी क्यों सताती हो ? 

  

जिंदगी जीये हैं इस जहाँ मौज मस्ती से

गलतियाँ  भी किये याद क्यों अब दिलाती हो |

प्रज्ञ हो  जानती हो कहाँ  दुःखती  रग…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on September 29, 2016 at 10:30pm — 10 Comments

गुमान (कविता )

क्यों करते

खुदकी वाह वाही

होती उसकी

फिर बुराई

माना बहुत कुछ

जान गये हो

खुद को भी

पहचान गये हो

न इतना

गुमान करो

खुद का खुद

सम्मान हरो

अच्छे हो

जानो खुदको

इन्सां हो

मानो खुदको ।

चलो भले

अपनी ही चाल

न खींचों

दूसरों की खाल

धीरे धीरे

चलना है

दौड़ना नहीं

बस चलना है ।

जय हो जय हो

का नारा छोड़ो

स्व तारीफ़ से

नाता तोडो ।

एक दिन

पेड़ क्या

बन जाओगे

ज़मीन…

Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 29, 2016 at 10:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल /अलका चंगा

2122 1212 22

जुगनुओं की बरात मुश्किल है।
साथ हो कायनात मुश्किल है।।

चांदनी गर बिखर नहीं जाती
इन निगाहों से मात मुश्किल है।।

यूँ हकीकत छुपी नहीं रहती।
आईने से निजात मुश्किल है।।

रात के बाद निकलता है दिन।
कैसे कह दूँ हयात मुश्किल है।।

दो जहां को सवाँर दूँ तब भी।
इस जहां की बिसात मुश्किल है।।

फासले दरमियाँ न आ पाते।
चुगलियों से निजात मुश्किल है।।


मौलिक और अप्रकाशित

Added by अलका 'कृष्णांशी' on September 29, 2016 at 10:00pm — 18 Comments

" स्मार्ट फोन का जमाना "/अर्पणा शर्मा

देखो भाई, स्मार्ट फोन का, जमाना आया,

साथ में नेट-पैक वालों की, चाँदी कर लाया,

उँगलियों के स्पर्श से, चलता ये पुर्जा,

हजारों रूपये का , इस पर होता खर्चा,

हर छुअन पर , जाता है सिहर,

जहाँ छुओ, वहाँ खुल जाता, एक नया मंजर,

फेसबुक, व्हाट्सएप की बड़ी बहार है,

चुटीले-उपदेशी संदेशों की भरमार है,

विभिन्न समूहों में होरहीं, गहन चर्चाएँ,

सारे राष्ट्र की समस्याएँ, यहीं सुलझाएँ,

अपने -अपने गुटों की, खुली है चौपाल,

सरकार भी चौकन्नी…

Continue

Added by Arpana Sharma on September 29, 2016 at 8:00pm — 6 Comments

भाई साहब सबकी अर्थी, बस कन्धों पर जानी है-----इस्लाह के लिए ग़ज़ल

22 22 22 22 22 22 22 2

माटी माटी जुटा रही पर जीवन बहता पानी है

स्वार्थ लिप्त हर मनुज हुआ कलयुग की यही कहानी है



मन की आग बुझे बारिश से, सम्भव भला कहाँ होगा

तुम दलदल की तली ढूंढते ये कैसी नादानी है



भौतिकता तो महाकूप है मत उतरो गहराई में

दर्पण कीचड़ युक्त रहा तो मुक्ति नहीं मिल पानी है



बीत गया सो बीत गया क्षण, बीता अपना कहाँ रहा

हर पल दान लिए जाता है समय शुद्ध यजमानी है



स्वर्ण महल अवशेष न दिखता हस्तिनापुर बस कथा रहा।

बाबर वंश… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 29, 2016 at 5:41pm — 21 Comments

तरही ग़ज़ल/सतविन्द्र कुमार

बह्र :2212  2212  2212  2212



खलती रही अब तक हमें जिस साज की आवाज़ ही

अब कान में घुलती हुई अपनी तरफ हैं खींचती।





अब खा रहे हैं काग वो खाना किसी के श्राद्ध में

आते नहीं इंसान को गुरबत में जिसके ख़्वाब भी।



जो बेचते हैं भूख जनता को दिखा कर रोटियां

वो खुद सियासत में मजे से खा रहे हैं शीरनी।





दीपक बिकें तो फिर गरीबो का बने त्यौहार कुछ

बिजली से जगमग हो रही चारों तरफ दीपावली।





करके सितम इंसान पर तू जान क्यूँ है… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 29, 2016 at 2:00pm — 18 Comments

दीवारें

आज ना जाने

क्यों सहमी हुईं

है दीवारें

गरम

चाय का प्याला

लिया

ठंडी हवा का

लुत्फ़ लिया

देखा चाँद

की ओर

सब कुछ

स्याह सा लगा

काले बादल

इधर उधर

बिखरने को

मचल रहे थे

तेज़ हवाएँ

बेलगाम

चलने लगी

काँच की

खिड़की भी

छटपटाने

तड़पने लगी

तेज़ी से बिजली

चटकी

चादर में

मैं सिमट गयी

बुझी हुई

आँखों से

फिर देखा

दीवार की

तरफ़

दरारें बे हिसाब

थी… Continue

Added by S.S Dipu on September 28, 2016 at 9:45pm — 1 Comment

ग़ज़ल ( अहदे वफ़ा चाहिए )

ग़ज़ल ( अहदे वफ़ा चाहिए )

--------

फऊलन -फऊलन -फऊलन -फअल

न कुछ तुम से इसके सिवा चाहिए ।

हमें सिर्फ़ अहदे वफ़ा चाहिए ।

जो दौलत है ले जाओ तुम भाइयों

मुझे सिर्फ़ माँ की दुआ चाहिए ।

करे ऐब गोई जो हर शख़्स की

उसे दोस्तों आइना चाहिए ।

जो क़ायम करे एकता मुल्क में

हमें सिर्फ़ वह रहनुमा चाहिए ।

कहीं दिल लगाना भी है लाज़मी

अगर दर्दे ग़म का मज़ा चाहिए ।

ज़रूरी है ख़िदमत भी मख़लूक़ की

अगर…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on September 28, 2016 at 9:26pm — 14 Comments

अगर बेटे की भाई से अदावत और हो जाती

1222 1222 1222 1222 तरही ग़ज़ल

अगर  बेटे की भाई से अदावत और हो जाती

मेरे अपने ही घर में इक बगावत और हो जाती

 

जहाँ खामोशी से मेरी जसामत और हो जाती

वहीं कुछ कहने से मेरे मुसाफत और हो जाती

  

हिमानी के शिखर पर डाल गलबहियाँ पलक मींचे

युगल प्रेमी यही सोचे क़यामत और हो जाती

 

सुलगती साँसे जलता तन पिला दो मय ये आँखों की

जहाँ सब कुछ हुआ इतनी इनायत और हो जाती

 

 इधर बेटा उधर भाई पिता करते तो क्या करते

अगर…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on September 28, 2016 at 5:07pm — 8 Comments

पुरानी किताबें ....

पुरानी किताबें ........

पुरानी किताबें

कुछ भी तो नहीं

सिवाय पुरानी कब्रों के

जिनमें दफ़्न हैं

चंद सूखे गुलाब

कुछ सिसकते हुए

मुहब्बत के ख़ुश्क से हर्फ़

कुछ पुराने पीले

टुकड़े टुकड़े से

अधूरे प्रेम के

प्रेम पत्र

पुरानी किताबें

जिनमें सो गयी

जीने की आस लिए

कई आकांक्षाएं

घुटी हुई सांसें

मोटी सी ज़िल्द की

अलमारी में

कैदियों से जीते

मौन कई अफ़साने

जंज़ीरों में…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 28, 2016 at 3:00pm — 12 Comments

लघुकथा शीर्षक " श्राद्ध "/अर्पणा शर्मा

पितृपक्ष चल रहे थे और नगर के बड़े सेठजी ने अपने पिताजी के श्राद्ध पर एक भव्य आयोजन किया था। 11 पंड़ित मंत्रोच्चार कर सेठजी के पिताजी की तस्वीर को नाना प्रकार के व्यंजन समर्पित कर रहे थे। नाते- रिश्तेदारों के साथ ही बाहर माँगनेवालों और दरिद्रों की भीड़ प्रतीक्षारत थी कि कब भोजन शुरू हो और उनको भी मिले। दान की सामग्री पंड़ाल में एक मेज पर रखी थी जिसे सेठजी का ज्येष्ठ पुत्र संभाल रहा था। अंदर पंड़ित जी ने श्राद्ध की महिमा का बखान करते हुए कहा कि 84 लाख योनियों में जन्म से मुक्ति के लिये विधि… Continue

Added by Arpana Sharma on September 28, 2016 at 12:30pm — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४४

गैर ही तू सही तेरा असर तो बाक़ी है 

लज्ज़तेयाद का वीराना घर तो बाक़ी है

माना मंजिल नहीं इश्बाह की हासिल मुझको 

पैरों के वास्ते इक रहगुज़र तो बाक़ी है

तेरे सीने की आग बुझ गई तो क्या कीजे 

मेरे सीने में धड़कता जिगर तो बाक़ी है

सोज़िशें रोज़ की जीने नहीं देतीं मुझको 

क्या करें साँसों का लंबा सफ़र तो बाक़ी है

तेरी साँसें भी हैं मलबूस मेरी साँसों से 

मेरे भी सीने में तेरा ज़हर तो बाक़ी…

Continue

Added by राज़ नवादवी on September 28, 2016 at 12:26pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४3

रोज़मर्रा की ज़रुरत बद से बदतर हो गई 

दाल-रोटी ही हमारा अब मुक़द्दर हो गई

फ़िक्र में आलूदगी ही हर घड़ी का काम है 

रात को दो गज ज़मीं ही मेरा बिस्तर हो गई

सूखी कलियों की तरह हर ख़्वाब ही कुम्हला गया 

धूप यूँ हालातेनौ की नोकेनश्तर हो गई

जिस्म भी अब थक गया है सांस भी अब बोझ है 

मेरे कदमों की गराँबारी ही ठोकर हो गई

यास की तारीकियों से यूँ हुई रौशन हयात 

ज़ुल्मतेवीराँ से मेरी जाँ मुनव्वर हो…

Continue

Added by राज़ नवादवी on September 28, 2016 at 12:00pm — No Comments

मेरे हिस्से की हँसी

तुम चुरा

ना लो

मेरे हिस्से की

हँसी

इस कारण

मुस्कुराना छोड़

दिया है

दर्द ना आँखों से

छलक पाएँ

पालकों

से आँखों को

सिया है

मन्नतें माँगी

नही फिर भी

बिन माँगे झोली

भरी देखी

कसाई बना है

वक़्त सभी का

आज़ादी पर

रोक

लगी देखी

बेपरवाह सब

घूम रहे

लगता नहीं

ये घर लौटेंगे

शहर में

घूम रहे भेड़िए

सचाई पर

बेड़ियाँ

लगी देखी

अपनापन पनपता

बाँटे किससे… Continue

Added by S.S Dipu on September 28, 2016 at 10:05am — 5 Comments

गजल(कर गुजरते कुछ.......)

छद्मवेशी देशभक्त दोस्तों को समर्पित)

2122 2122 2122 2

***

कर गुजरते कुछ अभी तैयार बैठे हैं

देख अपनों की दशा लाचार बैठे हैं।1



दुश्मनों की नस दबाते, शोर मच जाता,

इश्क के तो ढ़ेर सब बीमार बैठे है।2



दोस्त वह खंजर चलाता आँख बेपानी,

भर रहे हामी मुए इस पार बैठे हैं।3



जीतते आये दिलों पे राज भी करते

भेदियों की भीड़ है मन मार बैठे हैं।4



फूल कितने भी खिलाये चुभ रहे काँटे

बागवाँ पहले यहाँ सब हार बैठे हैं।5



रोशनी… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 28, 2016 at 8:34am — 13 Comments

ग़ज़ल -- मेयार शायरी का क़ायम जनाब रखना ( दिनेश कुमार दानिश )

221--2122--221--2122



मेयार शायरी का क़ायम जनाब रखना

ता-उम्र फ़िक्रो-फ़न के ताज़ा गुलाब रखना



जाती है जान जाए लेकिन न कम हो इज़्ज़त

सहराओं के मुक़ाबिल क्या चश्मे आब रखना



देना हिसाब होगा हम सबको रोज़-ए-महशर

गठरी में तुम भी अपनी कुछ तो सवाब रखना



तहज़ीब का तक़ाज़ा कहता है औरतों को

शर्मो हया का हर पल रुख़ पर नक़ाब रखना



हर वक़्त भागना ही जीवन नहीं है प्यारे

साँसों के इस सफ़र में कुछ सब्रो-ताब रखना



उम्मीद पर टिकी… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 28, 2016 at 7:17am — 2 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"तरही का मुख्य उद्देश्य अभ्यास तक सीमित है, इस दृष्टि से और बहरों पर भी तरही मिसरे देना कठिन न होगा…"
4 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूस बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम । कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।। घास…See More
17 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सादर नमस्कार। मुझे ऐसी ही एक चर्चा की अपेक्षा थी। आवश्यकता महसूस हो रही थी। हार्दिक धन्यवाद और…"
19 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के सभी सम्मानित सदस्यों को सादर नमस्कार। आदरणीय तिलक राज कपूर सर द्वारा…"
19 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सभी आदरणीय सदस्यों को नमस्कार, एक महत्वपूर्ण चर्चा को आरम्भ करने के लिए प्रबन्धन समिति बधाई की…"
19 hours ago
Admin posted a discussion

ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा

साथियों,विगत कई माह से ओ बी ओ लाइव आयोजनों में कतिपय कारणवश सदस्यों की भागीदारी बहुत ही कम हो रही…See More
20 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय  अखिलेश जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । सहमत एवं संशोधित "
yesterday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय सुशीलजी हार्दिक बधाई। लगातार बढ़िया दोहा सप्तक लिख रहें हैं। घूस खोरी ....... यह …"
yesterday
Jaihind Raipuri posted a blog post

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है…See More
Mar 5
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
Mar 4
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
Mar 4
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
Mar 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service