For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

April 2019 Blog Posts (89)

ग़ज़ल _वो कुछ न इसके सिवा करेंगे

ग़ज़ल _(वो कुछ न इसके सिवा करेंगे)

(मफा इला तुन _मफा इला तुन)

वो कुछ न इसके सिवा करेंगे l

बना के अपना दगा करेंगे l

किसी से हो जाए उनको उलफत

यही ख़ुदा से दुआ करेंगे l

सितम जफ़ा जिनकी ख़ास फितरत

वो कह रहे हैं वफ़ा करेंगे l

कभी हमें आज़मा के देखो

ये दिल है क्या जाँ फिदा करेंगे l

नज़र पे पहरे अगर लगे तो

खयाल में हम मिला करेंगे l

लगा के इलज़ामे बे…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 30, 2019 at 1:14pm — 6 Comments

अपनी ज़ुल्फों को धो रही है शब - सलीम रज़ा रीवा

2122 1212 22

अपनी ज़ुल्फों को धो रही है शब

और ख़ुश्बू निचो रही है शब

oo

मेरे ख़ाबों की ओढ़कर चादर

मेरे बिस्तर पे सो रही है शब

oo

अब अंधेरों से जंग की ख़ातिर

कुछ चराग़ों को बो रही है शब

oo

सुब्ह--नौ के क़रीब आते ही

अपना अस्तित्व खो रही है शब

oo

दिन के सदमों को सह रहा है दिन

रात का बोझ ढो रही है शब

___________________

"मौलिक व…

Continue

Added by SALIM RAZA REWA on April 29, 2019 at 10:51am — 6 Comments

सजती चुनाव में यहाँ जब तस्तरी बहुत - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/२२२/१२१२



सजती चुनाव  में  यहाँ  जब  तस्तरी बहुत

फिर भी बढ़े है रोज क्यों ये भुखमरी बहुत।१।



उतरा न मन का मैल जो सियासत ने भर दिया

दे कर  भी  हमने  देख  ली  है  फ़िटकरी बहुत।२।



अब खेल वो दिखाएगी उसको चुनाव में

जनता से जिसने है करी बाज़ीगरी बहुत।३। 



नेता न आया  एक  भी  सेवा  की राह पर

लोगों ने कह के देख ली खोटी खरी बहुत।४।



क्या होगा उनके राज का जनता बतायेगी

करते सदन में जो रहे गत मशखरी बहुत।५।



आता…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 28, 2019 at 7:04pm — 11 Comments

महाभुजंगप्रयात छंद में मेरी दूसरी रचना

धरें वेशभूषा तपस्वी सरीखा, जियें किन्तु जो ऐश की जिंदगानी
सने हाथ हैं खून से भी उन्हीं के, सदा बोलते जो यहाँ छद्म बानी
पता ही नहीं मूल क्या ज़िन्दगी का, लगे एक सा जिन्हें आग पानी
उन्हें आप यूँ ही मनस्वी न बोलो, जुबाँ से भले वे लगें आत्म ज्ञानी।।

शिल्प -यगण ×8

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on April 28, 2019 at 2:36pm — 6 Comments

गज़ब करता है अय्यारी.......तरही ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222

गज़ब करता है अय्यारी ज़माने से ज़माना भी

हक़ीक़त जो है इस पल में है कल का वो फ़साना भी

न मानो तो सकल संसार है इक शै महज़, लेकिन

हर इक शै ज्ञान का खुद में है अतुलित इक खज़ाना भी

बहुत अलगाव का परचम उठाए फिर लिए यारों

समय कहता है आवश्यक हुआ सबको मिलाना भी

उन्होंने पूछा उसको किस लिए फ़िलवक्त चुप है वो

समंदर हौले से बोला है इक तूफाँ उठाना भी

बहाते नीर हो क्यूँकर, जो बादल से कहा…

Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 28, 2019 at 2:30pm — 4 Comments

दो क्षणिकाएं : ....

दो क्षणिकाएं : ....

नैन पाश में
सिमट गयी
वो
बनकर एक
एक भटकी सी
खुशबू
और समा गई
मेरी

अदेह देह में

..........................

जल पर पड़ी
जल
सूखने लगा
पेड़ों पर पड़ी
पेड़ सूखने लगा
जीवों पर पड़ी
तो कंठ सूखने लगा
तृप्ती की आस में
अंततः
साँझ की गोद में
तृषित ही
सो गई
धूप

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on April 28, 2019 at 1:58pm — 4 Comments

मौजूँ मत

मौजूँ मत

राजनीति की दूषित दरिया,मिलकर स्वच्छ बनाएं

मतदाता परिपक्व हृदय से,अपना फर्ज निभाएं ll

माननीय बन वीर बहूटी,नित नव रूप दिखाएं

ये बर्राक करें बर्राहट ,इनको सबक सिखाएं ll

किरकिल सा बहुरूप बदलते,झटपट चट कर जाते

ये बरजोर करें बरजोरी, खाकर नहीं अघाते ll

वक्त आ गया समझाने का,अब इनको मत छोड़ो

सेवक नहीं बतोला बनजी, दोखी दंश मरोड़ो.ll

हर मत की कीमत को समझें,है मतदान जरूरी

बूथों पर मौजूँ मत करके, इच्छा…

Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on April 28, 2019 at 1:14pm — 5 Comments

ये पब्लिक है? (लघुकथा)

"सच कहूं! मुझे भी पता नहीं था कि मेरी अग्नि से मिट्टी के आधुनिक चूल्हे पर चढ़ी एक साथ चार हांडियों में मनचाही चीज़ें एक साथ पकाई जा सकती हैं!"



"तो तुम्हारा मतलब हमारे मुल्क की मिट्टी में आज़ादी के चूल्हे पर लोकतंत्र के चारों स्तंभों की हांडियां एक साथ चढ़ा कर मनचाही सत्ता चलाने से है ... है न?"



"तो तुम समझ ही गये कि इस नई सदी में तुम्हारे मुल्क में मेरी ही आग कारगर है; फ़िर तुम इसे चाहे जो नाम दो : धर्मांधता, तानाशाही, सामंतवाद, भ्रष्टाचार, भय या तथाकथित हिंदुत्व…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 28, 2019 at 9:36am — 2 Comments

साहिलों पर .... (लघु रचना )

साहिलों पर .... (लघु रचना )

गुफ़्तगू
बेआवाज़ हुई
अफ़लाक से बरसात हुई
तारीकियों में शोर हुआ
सन्नाटे ने दम तोड़ा
तड़प गयी इक मौज़
बह्र-ए-सुकूत में
और
डूब गए सफ़ीने
अहसासों के
लबों के
साहिलों पर

(अफ़लाक=आसमानों )

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on April 27, 2019 at 5:41pm — 4 Comments

प्याज भी बोलते हैं (लघुकथा) राज़ नवादवी

प्याज भी बोलते हैं- एक लघुकथा

-------------------------------------

हर कोई सब्ज़ी वाले से बड़ा प्याज माँगता है। कल मैं भी ठेलेवाले भाई से प्याज ख़रीदते समय बड़े प्याज माँग बैठा। तभी, बड़े प्याजों के बीच बैठे एक छोटे प्याज ने मुझसे कहा,

"भाई साहब, हर कोई बड़ा प्याज माँगता है, तो हमारा क्या होगा? हम भी तो प्याज हैं!"

मैं सकपका गया, ये कौन बोल रहा है? प्याज? क्या प्याज भी बोलते हैं? तभी मैंने देखा वहीं पड़े कुछ बड़े प्याज आंनद…

Continue

Added by राज़ नवादवी on April 27, 2019 at 1:00pm — 7 Comments

हरेक बात में उसका जवाब उल्टा है ।



1212-1122-1212-22

हरेक बात पे उसका जवाब उल्टा है ।।

मगर वो प्यार मुझे बेशुमार करता है।।

वो मेरे इश्क-ए- मरासिम* बनाएगा' इकदिन यूँ।(प्यार के रिश्ते)

बड़े यकींन से उल्फ़त की बात करता है।।

यूँ बर्फ आब-ओ-हवा वादियों से गुजरी हो।

उसी तरह से मेरा ज़िस्म अब पिघलता है।।

कभी भी वक्त न ठहरा हुआ लगे मुझको।

के चावी कौन भला सुब्ह शाम भरता है।।

यकीं न हो तो जरा गौर कर के देखो तुम ।

तुम्हारी आँख में भारी तुम्हारा'…

Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on April 27, 2019 at 12:30pm — 3 Comments

तेरे मेरे दोहे ....

तेरे मेरे दोहे ....

द्रवित हुए दृग द्वार से , अंतस के उदगार।

मौन रैन में हो गए, घायल सब स्वीकार।।

रेशे जीवन डोर के, होते बड़े महीन।

बिन श्वासों के देह ये, लगती कितनी दीन।।

दृशा दूषिका से भरी, दूषित हुए विचार।

वर्तमान में हो गए, खंडित सब संस्कार।।

लोकतंत्र में है मिला, हर जन को अधिकार।

अपने वोटों से चुने, वो अपनी सरकार।।

हर भाषण में हो रही, प्रजातंत्र की बात।

प्रजा झेलती तंत्र के ,नित्य नए…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 26, 2019 at 4:28pm — 8 Comments

पेड़-पोधे और हम

वो भी क्या दिन थे यारो

जब मिलजुल कर मौज मनाते थे

कभी पेड़ की डाल पर चढ़ जाते

कभी तालाब में डुबकी लगाते थे

रंग-बिरंगे फूलों से तब

भरे रहते थे बाग-बगीचे

सुंदर वातावरण बनाते और

आँगन को महकाते थे ||

 

कू-कू करती कोयल के

हम सुर से सुर मिलाते थे

रंग-बिरंगे तितलियों के पीछे

सरपट दौड़ लगाते थे

पक्षियों की चहचाहट में

जैसे, खुद को ही भूल जाते थे

मिलजुल कर मौज मनाते थे ||

 

स्वच्छ वायुं…

Continue

Added by PHOOL SINGH on April 26, 2019 at 2:32pm — 2 Comments

पुरानी पहचान-लघुकथा

"अरे, उस भलेमानस के पास जाना है, चलिए मैं ले चलता हूँ", सामने वाले व्यक्ति ने जब उससे यह कहा तो उसे एकबारगी भरोसा ही नहीं हुआ. अव्वल तो लोग आजकल किसी का पता जानते ही नहीं, अगर जानते भी हैं तो एहसान की तरह बताते हैं. और राकेश के बारे में उसकी राय तो भलेमानस की बिलकुल ही नहीं थी.

चंद साल ही तो हुए हैं जब राकेश उसकी टोली का सबसे खतरनाक सदस्य हुआ करता था. किसी को भी मारना पीटना हो, धमकाना हो या वसूली करनी हो तो राकेश सबसे आगे रहता था. और इसी वजह से उसे एक प्राइवेट फाइनेंस कंपनी में नौकरी भी…

Continue

Added by विनय कुमार on April 25, 2019 at 7:14pm — 6 Comments

महाभुजंगप्रयात छंद में पहली रचना

नहीं वक़्त है ज़िन्दगी में किसी की, सदा भागते ही कटे जिन्दगानी
कभी डाल पे तो कभी आसमां में, परिंदों सरीखी सभी की कहानी
ख़ुशी से भरे चंद लम्हे मिले तो, गमों की मिले बाद में राजधानी
सदा चैन की खोज में नाथ बीते, किसी का बुढ़ापा किसी की जवानी।।

शिल्प-लघु-गुरु-गुरु (यगण)×8 

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on April 25, 2019 at 6:47am — 8 Comments

नफ़स की धुन नही थमीं...



हजज़ मुरब्बा मक़बूज

अरकान :-  मुफाइलुन मुफाइलुन (1212-1212)

मुझे  उसी  से प्यार हो ।।

जो तीर दिल के पार हो ।।

पहाड़ जैसी' जिंदगी ।

कोई तो दाबे'दार हो।।

सवाल  बस मेरा यही ।

अदब ओ ऐतबार हो।।(शिष्टाचार,विश्वास)

नफ़स की  धुन नहीं थमें।(आत्मा,soul)

कोई भी कितना यार हो।।

लुग़त* की …

Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on April 24, 2019 at 11:00pm — 1 Comment

जाल .... ( 4 5 0 वीं कृति)

जाल .... ( 4 5 0 वीं कृति)

बहती रहती है

एक नदी सी

मेरे हाथों की

अनगिनित अबोली रेखाओं में

मैं डाले रहता हूँ एक जाल

न जाने क्या पकड़ने के लिए

हाथ आती हैं तो बस

कुछ यातनाएँ ,दुःख और

काँच की किर्चियों सी

चुभती सच्चाईयाँ

डसते हैं जिनके स्पर्श

मेरे अंतस में बहती

जीत और हार की धाराओं को

काले अँधेरों में भी मुझे

अव्यक्त अभियक्तियों के रँग

वेदना के सुरों पर

नृत्य करते नज़र आते हैं

नदी

हाथों की…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 24, 2019 at 1:24pm — 5 Comments

एक ग़ज़ल मनोज अहसास

22  22  22  22  22  22  22  2

एक ताज़ा ग़ज़ल

आदमी सोच के कुछ चलता है,दुनिया में हो जाता कुछ।

मानव की इच्छाएं कुछ है, अर मालिक का लेखा कुछ ।

अपने अपने दुख के साये मैं हम दोनों जिंदा है ,

तू क्या समझे,मैं क्या समझूं, तेरा कुछ है, मेरा कुछ ।

दुनिया के ग़म ,रब की माया और सियासत की बातें ,

खुद से बाहर आ सकता तो, इन पर भी लिख देता।

एक जरा सी बात हमारी हैरानी का कारण है,

ख्वाब में हमने कुछ देखा था ,आंख खुली तो…

Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on April 23, 2019 at 10:51pm — 5 Comments

पत्ता परिवर्तन / लघुकथा

वह ताश की एक गड्डी हाथ में लिए घर के अंदर चुपचाप बैठा था कि बाहर दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने दरवाज़ा खोला तो देखा कि बाहर कुर्ता-पजामाधारी ताश का एक जाना-पहचाना पत्ता फड़फड़ा रहा था। उस ताश के पत्ते के पीछे बहुत सारे इंसान तख्ते लिए खड़े थे। उन तख्तों पर लिखा था, "यही है आपका इक्का, जो आपको हर खेल जितवाएगा।"

 

वह जानता था कि यह पत्ता इक्का नहीं है। वह खीज गया, फिर भी पत्ते से उसने संयत स्वर में पूछा, "कल तक तो तुम अपनी गड्डी छोड़ गद्दी पर बैठे थे, आज इस खुली सड़क में फड़फड़ा…

Continue

Added by Chandresh Kumar Chhatlani on April 23, 2019 at 10:20pm — 3 Comments

लड़की (लघुकथा)

अम्मा को चारपाई पर लेटे देख बिटिया किशोरी भी उसके बगल में लेट गई और दोनों हाथों से उसे घेर कर कसकर सीने से लगाकर चुम्बनों से अपना स्नेह बरसाने लगी। इस नये से व्यवहार से अम्मा हैरान हो गई। उसने अपनी दोनों हथेलियों से बिटिया का चेहरा थामा और फ़िर उसकी नम आंखों को देख कर चौंक गई। कुछ कहती, उसके पहले ही बिटिया ने कहा :



"अम्मा तुम ज़मीन पे चटाई पे लेट जाओ!"



जैसे ही वह लेटी, किशोरी अपनी अम्मा के पैर वैसे ही दाबने लगी, जैसे अम्मा अपने मज़दूर पति के अक्सर दाबा करती…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 23, 2019 at 6:19pm — 4 Comments

Monthly Archives

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-105 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. प्रतिभाबहन , चित्रानुरूप उत्तम दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई ।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-105 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई सतविन्द्र जी, सादर अभिवादन । काव्यात्मक उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार ।दो दोहों में…"
2 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

दुनिया में सब इश्क़ करें तो कितना अच्छा हो (ग़ज़ल)

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २जब चाहें तब इश्क़ करें तो कितना अच्छा होदुनिया में सब इश्क़ करें तो कितना…See More
4 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post फुलवारी बन रहना (नवगीत)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी,  Dr. Geeta…"
6 hours ago
विवेक ठाकुर "मन" commented on विवेक ठाकुर "मन"'s blog post एक ग़ज़ल - ख़ुद को आज़माकर देखूँ
"बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय"
6 hours ago
narendrasinh chauhan commented on Sushil Sarna's blog post पाप .... (दो क्षणिकाएँ )
"KHUB SUNDAR SIR "
10 hours ago
सतविन्द्र कुमार राणा replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-105 in the group चित्र से काव्य तक
"कथन चित्र से छीन कर, दोहे रचे महान, कुछ में लेकिन शिल्प का, नहीं रहा है ध्यान।।"
12 hours ago
सतविन्द्र कुमार राणा replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-105 in the group चित्र से काव्य तक
"उत्तम दोहे हैं रचे, सीधी साची बात बातों-बातों में मिली, हर ढोंगी को मात। हार्दिक बधाई"
12 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-105 in the group चित्र से काव्य तक
"दोहा छंद ________ 1)  उकड़ू बैठा दीन है, नहीं फूटते बोल। मैडम सर  हैं पीटते, जन सेवा का…"
13 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

पाप .... (दो क्षणिकाएँ )

पाप .... (दो क्षणिकाएँ )तुम्हारे अत्याचारों को सह जाऊँगी तुम्हारी अर्धांगिनी हूँ मैं तुम देव हो…See More
19 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-105 in the group चित्र से काव्य तक
"दोहे**निर्धन से रख बैर की, अजब अनौखी रीतमौसम आया शीत का, धनवानों का मीत।१।**किट-किट बजते दाँत हैं,…"
21 hours ago
vijay nikore posted blog posts
yesterday

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service