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Chandresh Kumar Chhatlani
  • Male
  • Udaipur, Rajasthan
  • India
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Sheikh Shahzad Usmani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post अमृतसर रेल दुर्घटना विभीषिका पर 5 लघुकथाएं
"ये पांचों बेहतरीन लघुकथायें फीचर किये जाने पर तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब  डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी साहिब।"
18 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post अमृतसर रेल दुर्घटना विभीषिका पर 5 लघुकथाएं
"आदाब। नई सदी की विकासशील साम्प्रदायिकता,  मीडियापा, चोर-उचक्कों के विकासशील चोलों में मौक़ापरस्ती, भाव-विस्फोटक-संवेदनशीलता और बहुरूपिया विकासशील शैतानियत इंगित करती बेहतरीन प्रतीकात्मक/संकेतात्मक/मानवेत्तर सम्ममिश्रित शैली की तात्कालिक समसामयिक…"
yesterday
TEJ VEER SINGH commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post अमृतसर रेल दुर्घटना विभीषिका पर 5 लघुकथाएं
"हार्दिक बधाई आदरणीय भाई चंद्रेश जी। हालिया दुर्घटना पर गज़ब की एक से बढ़कर एक लघुकथायें।"
Monday
Chandresh Kumar Chhatlani's blog post was featured

अमृतसर रेल दुर्घटना विभीषिका पर 5 लघुकथाएं

(1). मेरा जिस्म एक बड़ी रेल दुर्घटना में वह भी मारा गया था। पटरियों से उठा कर उसकी लाश को एक चादर में समेट दिया गया। पास ही रखे हाथ-पैरों के जोड़े को भी उसी चादर में डाल दिया गया। दो मिनट बाद लाश बोली, "ये मेरे हाथ-पैर नहीं हैं। पैर किसी और के - हाथ किसी और के हैं।"तो क्या हुआ, तेरे साथ जल जाएंगे। लाश को क्या फर्क पड़ता है?" एक संवेदनहीन आवाज़ आई।"वो तो ठीक है… लेकिन ये ज़रूर देख लेना कि मेरे हाथ-पैर किसी ऐसे के पास नहीं चले जाएँ, जिसे मेरी जाति से घिन आये और वे जले बगैर रह जाएँ।""मुंह चुप कर…See More
Monday
Chandresh Kumar Chhatlani posted a blog post

अमृतसर रेल दुर्घटना विभीषिका पर 5 लघुकथाएं

(1). मेरा जिस्म एक बड़ी रेल दुर्घटना में वह भी मारा गया था। पटरियों से उठा कर उसकी लाश को एक चादर में समेट दिया गया। पास ही रखे हाथ-पैरों के जोड़े को भी उसी चादर में डाल दिया गया। दो मिनट बाद लाश बोली, "ये मेरे हाथ-पैर नहीं हैं। पैर किसी और के - हाथ किसी और के हैं।"तो क्या हुआ, तेरे साथ जल जाएंगे। लाश को क्या फर्क पड़ता है?" एक संवेदनहीन आवाज़ आई।"वो तो ठीक है… लेकिन ये ज़रूर देख लेना कि मेरे हाथ-पैर किसी ऐसे के पास नहीं चले जाएँ, जिसे मेरी जाति से घिन आये और वे जले बगैर रह जाएँ।""मुंह चुप कर…See More
Monday
Chandresh Kumar Chhatlani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"रचना पसंद करने और अपनी टिप्पणी द्वारा मेरा उत्साहवर्धन करने हेतु सादर आभार आदरणीय विजय निकोरे जी सर।"
Sunday
vijay nikore commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"सामाजिक स्थिति पर प्रकाश डालने मे सफ़ल हुई है आपकी लघु कथा। हार्दिक बधाई, आदरणीय चंद्रेश कुमार जी"
Friday
Chandresh Kumar Chhatlani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"आदरणीय डॉ. विजय शंकर जी सर, आपका रचना पर आना ही मेरे लिए बहुत बड़े सम्मान की बात है। रचना के मर्म तक पहुँच कर आपकी प्रेरणादायी समीक्षा मेरे सिर आँखों पर। सादर, "
Oct 17
Chandresh Kumar Chhatlani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"रचना पर अपनी उपस्थिति और उत्साह बढ़ाते शब्दों हेतु सादर आभार आदरणीया नीलम उपाध्याय जी।"
Oct 17
Chandresh Kumar Chhatlani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"रचना पर आकर अपनी टिप्पणी द्वारा उत्साहवर्धन करने और अच्छे सृजन हेतु मार्ग सुझाने हेतु हार्दिक आभार आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' भाई जी।"
Oct 17
Chandresh Kumar Chhatlani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"रचना पर आकर आशीर्वाद स्वरुप टिपण्णी देने हेतु सादर आभार आदरणीय तेजवीर सिंह जी सर।"
Oct 17
Chandresh Kumar Chhatlani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"बहुत-बहुत आभार आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी साहब आपने रचना का बहुत अच्छा विश्लेषण किया और बेहतरीन सृजन के लिए मेरी हौसला अफ़ज़ाई की।"
Oct 17
Sheikh Shahzad Usmani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"//उसने झूठ भरी आवाज़ में कहा "लेकिन बेटे इस वृद्धाश्रम में कोई कमी नहीं।"//  इस अभिव्यक्ति में अनकहे में बहुत कुछ है; तो // लेकिन वहां तो… आपके बिना वह अनाथ-आश्रम है// इस में भी आज के जीवन और आत्म-मूल्यांकन/सिंहावलोकन की…"
Oct 15
Sheikh Shahzad Usmani left a comment for Chandresh Kumar Chhatlani
"आदाब। आपकी अद्वितीय लघुकथा ''सत्यव्रत" भी मंच पर "फ़ीचर" किये जाने पर तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी  साहिब।"
Oct 15
Dr. Vijai Shanker commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"आदरणीय चंद्रेश कुमार जी , निसंदेह बहुत ही अच्छी लघु - कथा है , प्रेरक भी है। पर इसमें एक जबरदस्त व्यंग ( छुपा हुआ ) भी है , हम आज भी माँ का अर्थ बता रहे हैं। कहाँ हैं हम ? कहाँ है हमारी उन्नत अवस्था ? सांस्कृतिक मूल्य ? क्या है हमारी शिक्षा व्यवस्था…"
Oct 15
Sheikh Shahzad Usmani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"आपकी यह रचना भी मंच पर "फ़ीचर" किये जाने पर तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी साहिब।"
Oct 15

Profile Information

Gender
Male
City State
Udaipur Rajasthan
Native Place
Udaipur Rajasthan
Profession
Lecturer

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अमृतसर रेल दुर्घटना विभीषिका पर 5 लघुकथाएं

(1). मेरा जिस्म

 

एक बड़ी रेल दुर्घटना में वह भी मारा गया था। पटरियों से उठा कर उसकी लाश को एक चादर में समेट दिया गया। पास ही रखे हाथ-पैरों के जोड़े को भी उसी चादर में डाल दिया गया। दो मिनट बाद लाश बोली, "ये मेरे हाथ-पैर नहीं हैं। पैर किसी और के - हाथ किसी और के हैं।

"तो क्या हुआ, तेरे साथ जल जाएंगे। लाश को क्या फर्क पड़ता है?" एक संवेदनहीन आवाज़ आई।

"वो तो ठीक है… लेकिन ये ज़रूर देख लेना कि मेरे हाथ-पैर किसी ऐसे के पास नहीं चले जाएँ, जिसे मेरी जाति से घिन आये और वे…

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Posted on October 22, 2018 at 9:00am — 3 Comments

सत्यव्रत (लघुकथा)

"व्रत ने पवित्र कर दिया।" मानस के हृदय से आवाज़ आई। कठिन व्रत के बाद नवरात्री के अंतिम दिन स्नान आदि कर आईने के समक्ष स्वयं का विश्लेषण कर रहा वह हल्का और शांत महसूस कर रहा था। "अब माँ रुपी कन्याओं को भोग लगा दें।" हृदय फिर बोला। उसने गहरी-धीमी सांस भरते हुए आँखें मूँदीं और देवी को याद करते हुए पूजा के कमरे में चला गया। वहां बैठी कन्याओं को उसने प्रणाम किया और पानी भरा लोटा लेकर पहली कन्या के पैर धोने लगा।

 

लेकिन यह क्या! कन्या के पैरों पर उसे उसका हाथ राक्षसों के हाथ जैसा…

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Posted on October 14, 2018 at 2:23pm — 15 Comments

भटकना बेहतर (लघुकथा)

कितने ही सालों से भटकती उस रूह ने देखा कि लगभग नौ-दस साल की बच्ची की एक रूह पेड़ के पीछे छिपकर सिसक रही है। उस छोटी सी रूह को यूं रोते देख वह चौंकी और उसके पास जाकर पूछा, "क्यूँ रो रही हो?"

वह छोटी रूह सुबकते हुए बोली, "कोई मेरी बात नहीं सुन पा रहा है… मुझे देख भी नहीं पा रहा। कल से ममा-पापा दोनों बहुत रो रहे हैं… मैं उन्हें चुप भी नहीं करवा पा रही।"

वह रूह समझ गयी कि इस बच्ची की मृत्यु हाल ही में हुई है। उसने उस छोटी रूह से प्यार से कहा, "वे अब तुम्हारी आवाज़…

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Posted on August 20, 2018 at 11:30pm — 10 Comments

खोटा सिक्का (लघुकथा)

"ये लो! मैं बुध ग्रह को जीत गया।" उस सितारे की तीव्र तरंगदैर्ध्य वाली खुशी से भरपूर ध्वनि से आसपास की आकाशगंगाएं गुंजायमान हो उठीं।

 

सूदूर अंतरिक्ष में, जहाँ समय और विस्तार अनंत हैं, चार सितारे अपने ही प्रकार का जुआ खेल रहे थे। दांव पर लग रहे थे, उनके सौरमंडल के विभिन्न छोटे-बड़े ग्रह, उपग्रह, उल्कापिंड आदि। मनुष्यों से प्रेरित हो हमारा सूर्य भी उनमें से एक था। हालांकि उस समय उसका समय सही नहीं था। वह लगातार हार रहा था।

 

शनि के वलय, मंगल का सबसे ऊंचा पर्वत,…

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Posted on August 2, 2018 at 7:00pm — 3 Comments

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At 10:20pm on October 15, 2018, Sheikh Shahzad Usmani said…

आदाब।

आपकी अद्वितीय लघुकथा ''सत्यव्रत" भी मंच पर "फ़ीचर" किये जाने पर तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी  साहिब।

At 4:37pm on April 2, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

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