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शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"
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शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" posted a blog post

माधव मालती छन्द, नारी शौर्य गाथा

कष्ट सहकर नीर बनकर,आँख से वो बह रही थी। क्षुब्ध मन से पीर मन की, मूक बन वो सह रही थी। स्वावलम्बन आत्ममंथन,थे पुरुष कृत बेड़ियों में। एक युग था नारियों की,बुद्धि समझी ऐड़ियों में।आज नारी तोड़ सारे बन्धनों की हथकड़ी को, बढ़ रही है,पढ़ रही है,लक्ष्य साधें हर घड़ी वो। आज दृढ़ नैपुण्य से यह,कार्यक्षमता बढ़ रही है। क्षेत्र सारे वो खँगारे, पर्वतों पर चढ़ रही है।नभ उड़ानें विजय ठाने, देश हित में उड़ रही वो, पूर्ण करती हर चुनौती हाथ ध्वज ले बढ़ रही वो। संकटों में कंटकों से है उबरती आत्मबल से, अब न अबला पूर्ण सबला…See More
Jun 26
शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" commented on शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"'s blog post लावणी छन्द,संपूर्ण वर्णमाला पर प्रेम सगाई
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, उत्साहवर्ध एवं सुझाव हेतु आपका हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ।"
Jun 16
शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" posted photos
Jun 13
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"'s blog post लावणी छन्द,संपूर्ण वर्णमाला पर प्रेम सगाई
"आ. शुचिता बहन, रचना अच्छी हुई है । हार्दिक बधाई । छंद विषयक आ. सौरभ जी की बात का संज्ञान अवश्य लें । सादर.."
Jun 11

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"'s blog post लावणी छन्द,संपूर्ण वर्णमाला पर प्रेम सगाई
"आदरणीया शुचिता जी, वर्णमाला को  साधते हुए कथ्य की समरचना अपने आप में छंद परंंपरा का निर्वहन ही है. आपका यह एक श्लाघनीय प्रयास है.  हार्दिक बधाई ! यह अवश्य है कि मात्रिका के निर्वहन प्रति भी सचेत रहना था. यह भी अभ्यास से संयत हो…"
Jun 11
शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" commented on शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"'s blog post लावणी छन्द,संपूर्ण वर्णमाला पर प्रेम सगाई
"प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार आदरणीय बासुदेव भैया।"
Jun 10
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' commented on शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"'s blog post लावणी छन्द,संपूर्ण वर्णमाला पर प्रेम सगाई
"शुचि बहन यह अनूठा प्रयोग करते हुए इस सुंदर छंद बद्ध सृजन की बहुत बहुत बधाई।"
Jun 10
शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"'s blog post was featured

लावणी छन्द,संपूर्ण वर्णमाला पर प्रेम सगाई

(सम्पूर्ण वर्णमाला पर एक अनूठा प्रयास).अभी-अभी तो मिली सजन से, आकर मन में बस ही गये। इस बन्धन के शुचि धागों को, ईश स्वयं ही बांध गये।उमर सलोनी कुञ्जगली सी, ऊर्मिल चाहत है छाई। ऋजु मन निरखे आभा उनकी, एकनिष्ठ हो हरषाई।ऐसा अपनापन पाकर मन, ओढ़ ओढ़नी झूम पड़ा, और मेरे सपनों का राजा, अंतरंग मालूम खड़ा।अ: अनूठा अनुभव प्यारा, कलरव सी ध्वनि होती है। खनखन चूड़ी ज्यूँ मतवाली, गहना हीरे-मोती है।घन पानी से भरे हुए ज्यूँ, चन्द्र-चकोरी व्याकुलता। छटा निराली सावन जैसी, जरा-जरा मृदु आकुलता।झरझर झरना प्रेम का बरसे,…See More
Jun 9
शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" updated their profile
Jun 5
शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" added a discussion to the group बाल साहित्य
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कुकुभ छन्द,बादल दादा-दादी जैसे

बाल-कविताश्वेत,सुनहरे,काले बादल,आसमान पर उड़ते हैं।दादा-दादी के केशों से,मुझे दिखाई पड़ते हैं।।मन करता बादल मुट्ठी में,भरकर अपने सहलाऊँ।दादी के केशों से खेलूँ, सुख सारा ही पा जाऊँ।।रिमझिम बरसा जब करते घन,नभ पर नाच रहे मानो।दादी मेरी पूजा करके,जल छिड़काती यूँ जानो।।काली-पीली आँधी आती,झर-झर बादल रोते हैं।गुस्से में जब होती दादी,बिल्कुल वैसे होते हैं।।दादी पर दादाजी मेरे,कभी जो बड़बड़ करते हैं।उमड़-घुमड़ कर बड़े जोर से,बादल गड़गड़ करते हैं।।जब भी खेलूँ आँख मिचौनी,साया घन सा चाहूँ मैं।दादी के आँचल में…See More
Jun 5
शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post समझा बताओ किसने किताबों ने जो कहा-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"वाहः हर बात डंके की चोट पर यतार्थ को बयां करती हुई। सभी शेर एक से बढ़कर एक नए हैं भाई लक्ष्मण धामी जी।"
Jun 4
शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" joined Admin's group
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भारतीय छंद विधान

इस समूह में भारतीय छंद शास्त्रों पर चर्चा की जा सकती है | जो भी सदस्य इस ग्रुप में चर्चा करने के इच्छुक हों वह सबसे पहले इस ग्रुप को कृपया ज्वाइन कर लें !See More
Jun 3
शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" commented on शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"'s blog post लावणी छन्द,संपूर्ण वर्णमाला पर प्रेम सगाई
"अतिशय आभार आशीष यादव जी।"
Jun 2
शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" commented on शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"'s blog post माधव मालती छन्द, नारी शौर्य गाथा
"आपने रचना को मान दिया, हार्दिक आभार आशीष यादव जी।"
Jun 2
आशीष यादव commented on शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"'s blog post माधव मालती छन्द, नारी शौर्य गाथा
"बहुत सुंदर रचना हुई है"
Jun 1
आशीष यादव commented on शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"'s blog post लावणी छन्द,संपूर्ण वर्णमाला पर प्रेम सगाई
"बहुत सुंदर। "
Jun 1

Profile Information

Gender
Female
City State
Tinsukia (Assam)
Native Place
Tinsukia
Profession
कवयित्री
About me
नाम - शुचिता अग्रवाल, "शुचिसंदीप" जन्म स्थान - 26.11.1969 सुजानगढ़,राजस्थान सम्प्रति- 'अनुराग हाउस', चालिहा नगर, सेक्टर 3, बाई लेन 3, अथवा 'अनुराग' जी एन बी रोड पो.ओ. तिनसुकिया (असम) 786125 लेखन विधा- कविता, गीत प्रकाशित कृति- "दर्पण"(काव्य संग्रह) सदस्य- नारायणी साहित्य अकादमी तिनसुकिया के सचिव पद पर कार्यरत। email: suchisandeep2010@gmail.com

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लावणी छन्द,संपूर्ण वर्णमाला पर प्रेम सगाई

(सम्पूर्ण वर्णमाला पर एक अनूठा प्रयास)

.

अभी-अभी तो मिली सजन से,

आकर मन में बस ही गये।

इस बन्धन के शुचि धागों को,

ईश स्वयं ही बांध गये।

उमर सलोनी कुञ्जगली सी,

ऊर्मिल चाहत है छाई।

ऋजु मन निरखे आभा उनकी,

एकनिष्ठ हो हरषाई।

ऐसा अपनापन पाकर मन,

ओढ़ ओढ़नी झूम पड़ा,

और मेरे सपनों का राजा,

अंतरंग मालूम खड़ा।

अ: अनूठा अनुभव प्यारा,

कलरव सी ध्वनि होती है।

खनखन चूड़ी ज्यूँ मतवाली,

गहना…

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Posted on June 1, 2021 at 8:30am — 7 Comments

माधव मालती छन्द, नारी शौर्य गाथा

कष्ट सहकर नीर बनकर,आँख से वो बह रही थी।

क्षुब्ध मन से पीर मन की, मूक बन वो सह रही थी।



स्वावलम्बन आत्ममंथन,थे पुरुष कृत बेड़ियों में।

एक युग था नारियों की,बुद्धि समझी ऐड़ियों में।

आज नारी तोड़ सारे बन्धनों की हथकड़ी को,

बढ़ रही है,पढ़ रही है,लक्ष्य साधें हर घड़ी वो।



आज दृढ़ नैपुण्य से यह,कार्यक्षमता बढ़ रही है।

क्षेत्र सारे वो खँगारे, पर्वतों पर चढ़ रही है।

नभ उड़ानें विजय ठाने, देश हित में उड़ रही वो,

पूर्ण करती हर चुनौती…

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Posted on May 31, 2021 at 5:00pm — 4 Comments

कामरूपछन्द_वितालछन्द, माँ की रसोई

माँ की रसोई,श्रेष्ठ होई,है न इसका तोड़,

जो भी पकाया,खूब खाया,रोज लगती होड़।

हँसकर बनाती,वो खिलाती,प्रेम से खुश होय,

था स्वाद मीठा,जो पराँठा, माँ खिलाती पोय।

खुशबू निराली,साग वाली,फैलती चहुँ ओर,

मैं पास आती,बैठ जाती,भूख लगती जोर।

छोंकन चिरौंजी,आम लौंजी,माँ बनाती स्वाद,

चाहे दही हो,छाछ ही हो,कुछ न था बेस्वाद।

मैं रूठ जाती,वो मनाती,भोग छप्पन्न लाय,

सीरा कचौरी या पकौड़ी, सोंठ वाली चाय।

चावल पकाई,खीर लाई,तृप्त मन हो जाय,…

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Posted on May 25, 2021 at 8:30pm — 2 Comments

रसाल_छन्द, प्रकृति से खिलवाड़

सुस्त गगनचर घोर,पेड़ नित काट रहें नर,

विस्मित खग घनघोर,नीड़ बिन हैं सब बेघर।

भूतल गरम अपार,लोह सम लाल हुआ अब,

चिंतित सकल सुजान,प्राकृतिक दोष बढ़े सब।

दूषित जग परिवेश, सृष्टि विषपान करे नित।

दुर्गत वन,सरि, सिंधु,कौन समझे इनका हित,

है क्षति प्रतिदिन आज,भूल करता सब मानव,

वैभव निज सुख स्वार्थ,हेतु बनता वह दानव।

होय विकट खिलवाड़,क्रूर नित स्वांग रचाकर।

केवल क्षणिक प्रमोद,दाँव चलते बस भू पर,

मानव कहर मचाय,छोड़ सत धर्म विरासत…

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Posted on May 22, 2021 at 5:00pm — 2 Comments

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मिथिलेश वामनकर
said…

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