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DR ARUN KUMAR SHASTRI
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DR ARUN KUMAR SHASTRI commented on शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"'s blog post लावणी छन्द,संपूर्ण वर्णमाला पर प्रेम सगाई
"युं तो आपके नाम के साथ् आपके साथी का नाम जुड़ा होने से सामाजिक रुप से आप सम्पूर्ण ही जान पड्ती है कोई कमी भी नही फिर भी न जाने मेरा भ्रम ही हो आपकी रचना में आप अपने स्वभाव को छुपा नही पाई , कुछ न कुछ किसी कोने में कुछ दवा हुआ सा लगा मुझे -इन्सान जो…"
Nov 9, 2021
DR ARUN KUMAR SHASTRI commented on शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"'s blog post लावणी छन्द,संपूर्ण वर्णमाला पर प्रेम सगाई
"शृंगार रस का अनुभूत प्रयोग हुआ है इस रचना के म|ध्यम से शुचिता जी , एक लय है इस रचना में साथ् ही पढ़ते पढ़ते गुनगुनाने का मन करता है हाँ एक बात और एक छवि उभरती है अपने प्रियतम की जो इस रचना की सबसे खूब्सूरत पह्लू है शुचिता जी , बधाई  स्वीकार…"
Nov 9, 2021
DR ARUN KUMAR SHASTRI commented on vijay nikore's blog post आश्वासन
"सुन्दर अति सुन्दर रोमान्स से भरी , एक एक शब्द सुन्दर रुप से आपने रचा है एसी रचना कभी कभार ही बनती है , मै इसको 7 /10  न . दूंगा "
Nov 9, 2021
DR ARUN KUMAR SHASTRI commented on vijay nikore's blog post यह भूला-बिसरा पत्र ...तुम्हारे लिए
"भाई विजय जी , आपके लेखन में भावनाओ का उत्तम सामन्जस्य दीख पड़ता है मुझे , प्रेम को आपने करीब से देखा है व अपनत्व को खुल् के जिया है , मुझे आपकी ये रचना बहुत पसन्द आई | "
Nov 9, 2021
Rachna Bhatia and DR ARUN KUMAR SHASTRI are now friends
Oct 26, 2021
DR ARUN KUMAR SHASTRI replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-124
"लेखक डॉ अरुण कुमार शास्त्री [ एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-124 में सहभागिता के लिए विधा *हास्य कविता* शीर्षक -** म्हारो वेलेंटाइन डे ** मैया मन्ने भी मनानो से अंग्रेजी त्यौहार के बोलें से छोरा छोरी प्रेम दिवस की…"
Feb 14, 2021
Samar kabeer commented on DR ARUN KUMAR SHASTRI's blog post प्रतिकर्ष
"जनाब डॉ.अरुण कुमार शास्त्री जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।"
Feb 9, 2021
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on DR ARUN KUMAR SHASTRI's blog post प्रतिकर्ष
"आ. भाई अरुण जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Feb 6, 2021
DR ARUN KUMAR SHASTRI posted a blog post

प्रतिकर्ष

तेरे आकर्षण का पल पल प्रतिकर्ष सताता हैसामजिक ताना बाना मिरी उलझन बढ़ाता है //नदिया के पास जाऊं तो शीतल हो जाऊंसाथ दो अगर तो मैं मुस्कान बन जाऊं //आकर्षक सा छद्म आव्हान मुझे बुलाता है //सामजिक ताना बाना मिरी उलझन बढ़ाता है //तुमसे कहने का मैं कोई मौका न छोड़ताबस एक इशारा मिलता तो ही तो बोलता //ऊहा पोह के सागर में अब गोता खाता हूँसामजिक ताना बाना मिरी उलझन बढ़ाता है //दर्द की बात न करूंगा दर्द अब बेमानी हुआचाय की चुस्की में मैं इसको बिसराता हूँ //तुम्हारा साथ पा जाऊँ खुदा से मिल जाऊंसामजिक ताना बाना…See More
Feb 5, 2021
DR ARUN KUMAR SHASTRI posted a blog post

एक नज़्म - बे - क़ायदा

वक़्त मिलता है कहाँ आज के मौसुल में रक़ीबा दर - ब - दर डोलने का हुनर मंद है ये ख़ाक सार इक अदद पेट ही है जिसने न जाने कितनी जिंदगियां लीली है तुखंम उस पर कभी भरता नहीं हर वक्त सुरसा सा मुँह खोल के रखता है न जाने किस कदर इसमें ख़ज़ीली हैं। ईंते ख़ाबां मुलम्मा कौन सा इस पर चढ़ा होगा दिखाई भी तो नहीं देता मगर इक बात मुझको इसके जानिब ये ज़रुर कहनी है। अगरचे ये नहीं होता बा कसम ये दुनिया नहीं होती ये जो फौज इंसानो को दीखती है ना हर कदम जर्रे जर्रे पर बा खुदा ये बिना इसके तो क्या फिर यहाँ होती थी बहुत सोचा…See More
Feb 4, 2021
Samar kabeer left a comment for DR ARUN KUMAR SHASTRI
"जनाब अरुण कुमार जी,ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका धन्यवाद ।"
Feb 1, 2021
DR ARUN KUMAR SHASTRI left a comment for Samar kabeer
"प्रिय मित्र समीर साहिब जी गज़ब लिखा ख़ास कर ये पंक्तियाँ मुझे बेहद सुकून दे गई आग तो सर्द हो चुकी कब की क्यों अबस राखदान फूँकता है हुक्म से रब के ल'अल मरयम का देखो मुर्दे में जान फूँकता है डॉ अरुण कुमार शास्त्री // एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त"
Jan 31, 2021
DR ARUN KUMAR SHASTRI commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post नज़्म (कृषि बिल पर किसानों के शकूक-ओ-शुब्हात)
"behad khoobsoorat line bn bdi hai aamir saahib  रखेंगे हम ज़ख़ीरा कर ज़मीं उगलेगी जो सोना किसी का बस न कुछ होगा कि ख़ुद-मुख़्तार यारों हम "
Jan 31, 2021
DR ARUN KUMAR SHASTRI commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post नज़्म (कृषि बिल पर किसानों के शकूक-ओ-शुब्हात)
"janaab ameerudeen  amir sahib aapki nazam bahtreen umdaa lagi mujhe, khoob padan aaiyee   जनाब चेतन प्रकाश जी  ko आदाब karte huye mujhe bhi inko salaam behjnaa hai ye jab likhte hain to ooper neeche daaye baaye kuch nhi dekhte…"
Jan 31, 2021
DR ARUN KUMAR SHASTRI commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post निष्ठुर नगर -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"नदी सूखी हुई  कहती  है  प्यासे खेत सेतेरे हिस्से का पानी पी गया निष्ठुर नगर।३प्रिय मित्र लक्ष्मण धामी जी गज़ब लिखा ख़ास कर ये पंक्तियाँ मुझे बेहद सुकून दे गई डॉ अरुण कुमार शास्त्री // एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त"
Jan 31, 2021
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on DR ARUN KUMAR SHASTRI's blog post नज़्म
"आ. भाई अरुण जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Jan 31, 2021

Profile Information

Gender
Male
City State
DELHI NCR
Native Place
DELHI
Profession
EMINENT CONSULTANT
About me
LOVE THY GOD AND HUMANITY VASUDHAIV KUTUMBKAM

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प्रतिकर्ष

तेरे आकर्षण का पल पल प्रतिकर्ष सताता है

सामजिक ताना बाना मिरी उलझन बढ़ाता है //

नदिया के पास जाऊं तो शीतल हो जाऊं

साथ दो अगर तो मैं मुस्कान बन जाऊं //

आकर्षक सा छद्म आव्हान मुझे बुलाता है //

सामजिक ताना बाना मिरी उलझन बढ़ाता है //

तुमसे कहने का मैं कोई मौका न छोड़ता

बस एक इशारा मिलता तो ही तो बोलता //

ऊहा पोह के सागर में अब गोता खाता हूँ

सामजिक ताना बाना मिरी उलझन बढ़ाता है //

दर्द की बात न करूंगा दर्द अब बेमानी हुआ

चाय…

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Posted on February 2, 2021 at 4:45pm — 2 Comments

एक नज़्म - बे - क़ायदा

वक़्त मिलता है कहाँ

आज के मौसुल में

रक़ीबा दर - ब - दर

डोलने का हुनर मंद है

ये ख़ाक सार

इक अदद पेट ही है

जिसने न जाने कितनी

जिंदगियां लीली है

तुखंम उस पर कभी भरता नहीं

हर वक्त सुरसा सा

मुँह खोल के रखता है

न जाने किस कदर

इसमें ख़ज़ीली हैं।

ईंते ख़ाबां मुलम्मा कौन सा

इस पर चढ़ा होगा

दिखाई भी तो नहीं देता

मगर इक बात मुझको

इसके जानिब ये ज़रुर कहनी है।

अगरचे ये नहीं होता

बा कसम ये दुनिया नहीं होती

ये जो…

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Posted on February 2, 2021 at 4:30pm

नज़्म

बेबाक दिलबरी का आलम न पूँछिये। 

हम से मोहब्बत का बस हुनर सीखिये ।

दिल में लगी हो आग तो सेक लीजिये। 

वरना लगा के दाग यूँ सितम न कीजिये। 

तारीफ़ कीजिये या के…

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Posted on January 25, 2021 at 10:00pm — 2 Comments

आणविक अनुप्रस्थान

आणविक अनुप्रस्थान लघु कथा



वेदना से संवेदना हो तो मानवीय प्रकल्प उपजता है ऐसा मेरा सोचना था , तुम क्या सोचती हो इसी विषय में मैं अनभिज्ञ था , फिर एक दिन तुम बिना बताये कहीं चली गई। आभास था जाओगी और वो आभास प्रकटतः घटित भी हुआ। मुझे लेकिन इस अजन्मे विरह का अभ्यास किंचित न था सो मैं खिन्नता से खिसियानी बिल्ली अर्थात बिल्ले सा भ्रमित मन से एकांत में उतर गया। अब तक अपने…

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Posted on January 12, 2021 at 3:29am

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At 2:52pm on February 1, 2021, Samar kabeer said…

जनाब अरुण कुमार जी,ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका धन्यवाद ।

At 12:39pm on September 12, 2020,
प्रधान संपादक
योगराज प्रभाकर
said…

कृपया अपनी रचना यहाँ पोस्ट करें:

http://www.openbooksonline.com/forum/topics/119-1?xg_source=activity&xg_raw_resources=1

 
 
 

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