For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (17,255)

वृज की होली

होरी खेलत कृष्ण मुरारी

वृज बीथिन्ह मँह , अजिर , अटारी

होरी खेलत कृष्ण मुरारी

अबिर , गुलाल मलैं गोपियन कै

लुकैं छिपैं वृज की सब नारी

ढूँढि - ढूँढि रंग - कुंकुम मारैं

घूमि - घूमि गोपी दैं गारी

श्याम सामने रोष दिखावहिं

पाछे मुसकावहिं सब ठाढ़ी

होरी खेलत कृष्ण मुरारी

चिहुँक - चिहुँक राधा पग धारहिं

श्याम पकरि चुनरी रंग डारहिं

विद्युत चाल चपल मनुहारी

लपक - झपक कीन्ही…

Continue

Added by Usha Awasthi on March 13, 2020 at 1:30pm — 4 Comments

किसी भी रहरवाँ* को जुस्तजू होती है मंज़िल की (६८ )

(1222 1222 1222 1222 )

.

किसी भी रहरवाँ को जुस्तजू होती है मंज़िल की 

सफ़ीनों को मुसल्सल खोज रहती है जूँ साहिल की

**

न करना तोड़ने की कोशिश-ए-नाकाम इस दिल को

बड़ी मज़बूत दीवारें सनम हैं शीशा-ए-दिल की

**

किया तीर-ए-नज़र से वस्ल की शब में हमें बिस्मिल

नहीं मालूम क्या है आरज़ू इस बार क़ातिल की

**

सियाही पोतने से रोशनी का रंग नामुमकिन

बनाएगी तुम्हें बातिल ही संगत रोज़ बातिल*…

Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 11, 2020 at 4:00pm — 2 Comments

करेगा तू क्या मिरी वकालत (ग़ज़ल)

बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़बूज़ अस्लम

121   22   121   22

फ़रेब-ओ-धोका है ये अदालत

करेगा तू क्या मिरी वकालत [1]

रसूल कितने ही आ चुके पर

गई न इंसान की जहालत [2]

सनम रिझाएँ ख़ुदा मनाएँ

है गू-मगू की ये अपनी हालत [3]

जो मुड़ गया राह-ए-इश्क़ से तो

रहेगी ता-उम्र फिर ख़जालत [4]

किसे फ़राग़त जो दे तवज्जो

दिखाइएगा किसे बसालत [5]

है मुख़्तसर मेरी गुफ़्तगू पर

है ग़ौर और फ़िक्र में तवालत…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 10, 2020 at 5:30pm — 4 Comments

दिल के हाल सुने दिलवाला (लघुकथा)

"अपनी पैरों से रौंदें, दूजी जो भा जाये!"



"घर की मुर्ग़ी दाल बराबर; नयी पीढ़ी को कौन समझाये!"



अपनापन त्याग कर ख़ुदग़र्ज़ी, मनमर्ज़ी, दोगलापन, पागलपन, बचकानापन दिखाती अपने मुल्क की नई पीढ़ी की सोच और पलायन-गतिविधियों पर दो बुजुर्गों ने अपनी-अपनी राय यूं ज़ाहिर की।



"... 'ओल्ड इज़ गोल्ड' कहावत को छोड़ो जी; ओल्ड इज़ सोल्ड! नई पीढ़ी है सो बोल्ड! उन्हें ज़मीनी स्टोरीज़ टोल्ड हों या अनटोल्ड! हम बुड्ढे तो हुए क्लीन-बोल्ड!" उनमें से एक ने दूसरे से कहा, लेकिन ख़ुद के…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 10, 2020 at 2:34pm — 4 Comments

रंगों के घन खूब उड़ायें - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

***

आओ नाचें,  झूमें, गायें  फिर  से अब के होली में

इक-दूजे को खूब लुभायें फिर से अब के होली में।१।

**

देख के जिसको मन ललचाये ज़न्नत के वाशिन्दों का

रंगों के  घन  खूब  उड़ायें  फिर  से  अब के होली में।२।

**

जीवन में  रंगत  हो  सब  के  संदेश  हमें देे होली 

रोते जन को यार हँसायें फिर से अब के  होली में।३।

**

आग सियासत चाहे कितनी यार लगाये नफरत की

प्रेम…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2020 at 7:30am — 8 Comments

होली के इन रंगों में (ग़ज़ल)

बह्र मुतक़ारिब असरम मक़्बूज़ महज़ूफ़ 16-रुक्नी

(बह्र-ए-मीर)

2 2   2 2   2 2   2 2   2 2   2 2   2 2   2

छुपे हैं जाने कितने क़िस्से होली के इन रंगों में

प्यार मुहब्बत यारी रिश्ते होली के इन रंगों में

बच्चों की अठखेली इनमें और दुआएँ पुरखों की

जवाँ दिलों के ख़्वाब मचलते होली के इन रंगों में

नीला सब्ज़ गुलाबी पीला लाल फ़िरोज़ी नारंगी

जीवन के सब रंग झलकते होली के इन रंगों में

सदा मनाते आए होली मिल कर सब हिंदुस्तानी…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 10, 2020 at 12:00am — 4 Comments

महसूस होता क्या उसे दर्द-ए-जिगर नहीं (६७ )

ग़ज़ल ( 221 2121 1221 212 )

महसूस होता क्या उसे दर्द-ए-जिगर नहीं

या दर्द मेरा कम है कि जो पुर-असर नहीं

**

महलों में रहने वाले ही क्या सिर्फ़ हैं बशर

फुटपाथ पर जो सो रहे वो क्या बशर नहीं

**

साक़ी सुबू उड़ेल दे है तिश्नगी बहुत 

ये प्यास दूर कर सके पैमाना-भर नहीं

**

इंसान सब्र रख ज़रा ग़म की भले है शब

किस रात की बता हुई अब तक सहर नहीं

**

या रब ग़रीब का हुआ…

Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 9, 2020 at 11:30pm — 5 Comments

सम्मोहन

सम्मोहन 

सम्मोहन !

जानता था मन, शायद न लौटेंगे हम

वह प्रथम-मिलन की वेला ही होगी 

शायद हमारा अंतिम मिलन

अंतिम मुग्ध आलिंगन

उस परस्पर-गुँथन में थी लहराती

चिन्तनशील यह उलझन गहरी

जी में फिर भी था अतुल उत्साह

कि रहेंगे जहाँ भी, खुले रहेंगे हमारे

सुन्दरतम मन-मंदिर के वातायन

खुले रहेंगे पूरम्पूर परस्पर प्राणों के द्वार

कि तड़पती भागती दिशाओं के पार भी

अजाने…

Continue

Added by vijay nikore on March 8, 2020 at 12:30am — 6 Comments

सौन्दर्य-अनुभूति

सौन्दर्य-अनुभूति

नई जगह नई हवा नया आकाश

न जाने कितने बँधनों को तोड़

अनेक बाहरी दबावों को ठेल

सैकड़ों मीलों की दूरी को तय कर

मुझसे मिलने तुम्हारा चले आना

मानसिक प्रष्ठभूमि में होगी ज़रूर

पावन स्नेह के प्रति तुम्हारी साधना

और इस प्रष्ठभूमि में तुमसे मिलना

था मेरे लिए भी उस स्वर्णिम क्षण

सौन्दर्य का आकर्षण

हमारा वह प्रथम मिलन

सुखद सरल भाव-विनिमय

खुल गए थे…

Continue

Added by vijay nikore on March 7, 2020 at 5:46am — 2 Comments

होली के दोहे :

होली के दोहे :

नटखट नैनों ने किया, कुछ ऐसा हुड़दंग।

नार नशा हावी हुआ, फीकी लगती भंग।।१

साजन लेकर हाथ में, आये आज गुलाल।

बाहुबंध में शर्म से, लाल हो गए गाल।। २

अधरों पर है खेलती, एक मधुर मुस्कान।

तन पर रंगों ने रची, रिश्तों की पहचान।। ३

होली के त्योहार पर ,इतना रखना ध्यान।

नारी का अक्षत रहे ,रंगों में सम्मान।।४

गौर वर्ण पर रंग ने, ऐसा किया धमाल।

नैनों नें की मसखरी, गाल हो गए लाल।।…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 6, 2020 at 5:08pm — 4 Comments


मुख्य प्रबंधक
तीन क्षणिकाएँ (गणेश बाग़ी)

तीन क्षणिकाएँ ...

एक: पन्ने

कुछ पन्ने

अलग करने योग्य

जुड़ने चाहिए

बच्चों की कापियों में

ताकि ...



वो खेल सकें

राजा-मंत्री, चोर-सिपाही

उड़ा सकें

हवाई जहाज

चला सकें

कागज की नाव

बिना डर,

बगैर किसी

असुविधा के ।

***

दो : कोना

बचाकर रखता हूँ

एक छोटा-सा कोना

अपने दिल में ...

जब होता…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 6, 2020 at 8:39am — 4 Comments

रक्खो भुजंग जैसा चन्दन में आदमी को - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२२/२२१/२१२२

*

फूलों की क्या जरूरत उपवन में आदमी को

भाने  लगे  हैं  काँटे  जीवन  में  आदमी  को।१।

**

क्या क्या मिला हो चाहे मन्थन में आदमी को

विष की तलब रही  पर  जीवन में आदमी को।२।

**

आजाद जब है  रहता उत्पात करता बेढब

लगता है खूब अच्छा बन्धन में आदमी को।३।

**

आता बुढ़ापा जब है रूहों की करता चिन्ता

तन की ही भूख केवल यौवन में आदमी को।४।

**

कितना हरेगा विष ये चाहे पता नहीं पर

रक्खो भुजंग जैसा चन्दन में आदमी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 5, 2020 at 4:21pm — 2 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : सब्जीवाला (गणेश जी बाग़ी)

उफ्फ !! ये सब्जी वाले भी न, बड़ा हल्ला करते हैं । साहित्यिक एवं सामाजिक संस्था के राष्ट्रीय सचिव खान साहब ने संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री गुप्ता से कहा ।

"वो सब छोड़िए खान साहब, ये बताइये कि कितने कवियों और कवयित्रियों की अंतिम सूची बनी जिन्हें सम्मानित करने का प्रस्ताव है ?"

"जी गुप्ता साहब, आपके निदेशानुसार 25 कवियों और 125 कवयित्रियों की सूची तैयार कर ली गयी है, किंतु एक बात समझ नही आयी कि इनमें से अधिकतर तो कोई स्तरीय साहित्यकार भी नही हैं, फिर क्यों आपने उन्हें साहित्य और…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 5, 2020 at 9:30am — 14 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

1222×4

किसी की याद में ज़ख्मों को दिल मे पालते रहना,

तबाही का ही रस्ता है यूँ शोलों पर खड़े रहना।

न जाने कौन से पल में कलम गिर जाए हाथों से,

मगर तुम आखिरी पल तक ग़ज़ल के सामने रहना।

जहाँ पर शाम ढलती है वहाँ पर देखकर सोचा,

मेरी यादों में रहकर तुम यूँ ही मेरे बने रहना।

वो आएं या न आएं ये तो उनकी मर्जी है लेकिन,

मुहब्बत की है तो बस रास्ते को देखते रहना।

किसी सूरत भी मेरा दिल बहल सकता नहीं फिर…

Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on March 4, 2020 at 11:00pm — 1 Comment

ज़बान :

ज़बान :

बड़ी अजीब है ये दुनिया 

जाने कितने ताले लगाए फिरती है 

अपनी ज़बान  पर 

खूनी मंज़र चुपचाप सह जाती है 

हकीकत  में किसी के पास 

वो ज़बान  ही नहीं 

जो सच को बयाँ कर सके 

इसीलिये अक्सर लोग 

रूहानी आवाज़ को 

अपने अंदर ही दफ़्न कर लेते हैं 

घोंट देते हैं अहसासों का गला 

और छटपटाने देते हैं 

वेदना की व्याकुलता को 

किसी परकटे पंछी की तरह 

अंदर ही अंदर 

रूहानी परतों के…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 4, 2020 at 7:42pm — 2 Comments

होली के रंगों से फिर क्यों - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



जो दुनिया से तन्हा लड़कर प्यार बचाया करते हैं

वो ही  सच्चे  अर्थों  में   सन्सार  बचाया  करते हैं।१।

**

उन लोगों से ही तो  कायम  हर शय की ये रंगत है

जो पत्थर दिल दुनिया में जलधार बचाया करते हैं।२।

**

तुम तो अपने सुख की खातिर खून को पानी करते हो

हम राख  की  ढेरी  में  देखो  अंगार  बचाया  करते हैं।३।

**

जो कहते हैं हम तो डूबे प्यार के रंगो में…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 4, 2020 at 7:30am — 5 Comments

समूची धरा बिन ये अंबर अधूरा है

समूची धरा बिन ये अंबर अधूरा है

ये जो है लड़की

हैं उसकी जो आँखे

हैं उनमें जो सपने

जागे से सपने

भागे से सपने…

Continue

Added by amita tiwari on March 4, 2020 at 1:07am — 2 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : माँद (गणेश बाग़ी)

अतुकांत कविता : माँद

=============

क्या आपने कभी देखी है ?

सियार की माँद !

मैं बताता हूँ

क्या होती है माँद !

जमीन के अंदर

सियार बनाता है

सुरक्षित आशियाना

जिसे कहते हैं माँद

माँद से जुड़े होते है

छोटे-लंबे

कई सारे रास्ते

ताकि

जब कोई खतरा हो

तो उसका कुनबा

निकल सके सुरक्षित...

देश की न्याय प्रणाली भी है

उसी माँद की मानिंद

एक रास्ता बंद होता है

तो कई…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 3, 2020 at 7:59am — 4 Comments

झोल खाई हुई खुशी

झोल खाई हुई खुशी

तारों भरी रात, फैल रही चाँदनी

इठलाता पवन, मतवाला पवन

तरू-तरु के पात-पात पर

उमढ़-उमढ़ रहा उल्लास

मेरा मन क्यूँ उन्मन

क्यूँ इतना उदास…

Continue

Added by vijay nikore on March 2, 2020 at 4:30am — 4 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : आदमखोर (गणेश बाग़ी)

अतुकांत कविता : आदमखोर

==================

नुकीले दाँत

लंबे-लंबे नाखून

उभरी हुई बड़ी-बड़ी आँखें

चार पैर

लंबी-सी जीभ

बेतरतीब बाल

भयानक चेहरा

बेडौल शरीर

डरावनी दहाड़ ?

नहीं-नहीं ...

वो ऐसा बिलकुल नहीं है

उसके पास हैं

मोतियों जैसे दाँत

तराशे हुए नाखून

खूबसूरत आँखें

दो पैर, दो हाथ

सामान्य-सी जीभ

सलोना चेहरा

सजे-सँवरे बाल

आकर्षक शरीर

मीठे बोल

किंतु... 

वो…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 1, 2020 at 11:18pm — 2 Comments

Monthly Archives

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आदरणीया बबिता जी, बहुत अच्छे से बुनी लघुकथा के लिए बधाई हो l"
14 minutes ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"सादर नमस्कार। आदरणीया अर्चना त्रिपाठी जी ने बहुत ही बड़ी और महत्वपूर्ण बात अपनी टिप्पणी में कह ही दी…"
3 hours ago
Archana Tripathi replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"अमानत ब्याह में आई बेटियों की बिदाई की रस्म में पिता का सहयोग कर रेवती मम्मी के पास पहुंची। बेटियों…"
3 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आदाब। साहित्यिक पत्रिका वेबसाइट जगत की धरोहर ओबीओ लघुकथा गोष्ठी के इस मासिक अंक 60 में आपकी…"
3 hours ago
Archana Tripathi replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आ. रवि भसीन शाहिद जी ,आपकी कथा आज दिन ब दिन बढ़ते विवाद को सुलझाने की सीढ़ी हो सकती है।हार्दिक बधाई…"
4 hours ago
Archana Tripathi replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"बढ़िया कथा आ. बबिता गुप्ता जी, वाकई में कर्जे की धरोहर अत्यंत पीड़ादायी होती हैं।हार्दिक बधाई आपको"
4 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"धरोहर (लघुकथा) ताज महल की सैर कर रहे राहुल और प्रियंका ख़ूब मूड में थे। घूम-घूम कर थक गए तो एक जगह…"
5 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आदरणीया बबिता गुप्ता जी, बहुत ख़ूब! दिल को छू गई आप की लघुकथा।"
5 hours ago
babitagupta replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"धरोहर 'विचारा लख्खाराम को मौत के मुंह में उसकी बीमारी से ज्यादा कर्ज के बोझ की चिंता ने ढकेल…"
7 hours ago

प्रधान संपादक
योगराज प्रभाकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी अंक-६० में आप सभी का हार्दिक स्वागत है."
7 hours ago
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted blog posts
8 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on अमीरुद्दीन खा़न "अमीर "'s blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अमीरुद्दीन ख़ान 'अमीर' साहिब, मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने नाचीज़ की सलाह पर ग़ौर किया।…"
8 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service